मृगछलना राज बोहरे द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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मृगछलना

मृगछलना

आसमान में हलके से बादल थे। श्वेत-धवल बादल। धूप में खूब गर्माहट थी लेकिन हवा सुरीली (ठंड़ी) थी। यह बसंत का मौसम था। सर्दी जा रहीं थी और गर्मी की पदचाप माहौल में गूँज रही थी।

टैम्पो घरघराता हुआ परेश के एकदम पास से गुजरा तो वह चौंक गया। उसे लगा था कि किनारे पर बैठी लड़की वही है- वही यानी मधु। मधु के लिए ही तो वह जबलपुर आया है।

मधु उसकी क्या लगती है ? यदि कोई उससे पूछे, तो वह टाल जाएगा। रिश्तों के कोष में ऐसा कोई उपयुक्त शब्द नहीं है जो उनके संबंधो को ठीक-ठीक पहचाने। वैसे भी बड़े भाई की साली से छोटे भाई का क्या रिश्ता हुआ ? इस का जब वह तलाशता है, तो उसे निराशा ही हाथ लगती है।

कुछ आगे जाकर संयोग से वह टैम्पो रूक गया था। परेश लंबे डग रखता हुआ उधर ही लपका। परेश ने उस कन्या को अब ठीक ढंग से देखा और खुद पर हँसा-धत्तेरे की, यह तो कोई और है। वह पलटा और रेस्ट-हाउस की ओर चल पड़ा।

जबलपुर आए उसे तीन दिन हो चुके है। इन तीन दिनों में सोते-जागते, उठते-बैठते उसकी आँखों के सामने एक ही चेहरा आता रहा है - मधु का, और उसके मन-मस्तिष्क में एक ही नाम गूँजता रहा है- मधु, मधु मधु। जाने क्यों उसे यह भी लगता रहा है कि जबलपुर में मधु से उसकी मुलाकात घर पर जाने से पहले यूँ ही कहीं बाजार या चौराहें पर आते-जाते होगी। घर जाना तो बाद में होगा। उसने मन-ही-मन वे डायलॉग सोच रखें हैं, जो अन्यत्र अनायास मिल जाने पर वह पूरी नाटकीय भाव-भंगिमा के साथ मधु से बोलेगा। उन्हें सुनकर जरूर ही मधु अनुकूल प्रतिक्रिया करेगी। परेश का भोला मन इसी आाशा में है।

मधु की बड़ी बहन क्षिप्रा का ब्याह दो वर्ष पहले हुआ है, वह अपनी ससुराल जा चुकी है- सो मधु अकेली हैं। दोनों बहनें ऐसी मुँहफट और बोल्ड हैं कि माँ-बाप को लड़का न होने की कमी नहीं अखरने दी, उन दोनों नें । अब मधु कुछ सुस्त-सी हो गई है, यहाँ आते वक्त परेश का क्षमा भाभी ने बताया था।

परेश पर्यटन विभाग में है। जबलपुर आते वक्त वह सरकारी टूर बना लाया है। टूरिज़्म के रेस्ट-हाउस में ठहर के उसने ये तीन दिन बिताए है, ताकि पहले वह इत्मीनान से अपना सरकारी काम निपटा सके। बाद मेूं तो वह होगा और होगी मधु। तब काम-धंधे की फिकर कौन करेगा! वह काम से मुक्त व निश्चिंत होकर मधु के साथ घूमना चाहता है, क्योंकि मधु के यहाँ पहुँचकर शायद वह सब कुछ भूल जाए, जैसाकि पिछली मुलाकातों में हुआ।

मधु से परेश की पहली मुलाकात दो वर्ष पहले सोलाह जून को दभोह ं हुई थी। जहाँ कि परेश के बडे़ भाई दिवेश की बारात गई थी। मधु उस शादी में मौजूद थी, और होती भी क्यों न, उसकी सगी ममेरी बहन की शादी जो थी। क्षमा भाभी मधु के मामा की लड़की हैं, इसी कारण दमाह में मधु न केवल मौजूद थी, बल्कि खूब बनी-ठनी सबके आकर्षण का केंद्र भी थी। वह शरारतों में तो शुरू से ही अव्वल रहती आई है। शादी की रस्मों के दौरन उसकी शरारत का पहला निशाना बना था-परेश।

टीका के वक्त दूल्हा बने दिवेश भैया जब ‘ मड़वा मारने ‘ अपनी ससुराल के आँगन में प्रविष्ट हुए तो परेश भी कौतूहलवश उनके साथ चला गया था। मंडप के नीचे आँख मूँदे दुल्हन बनी खड़ी क्षमा भाभी ने मंडप पर बीजना (बाँस का पंखा) फेंकते दिवेश भैया पर अक्षत उछाले थे, ठीक तभी उनके पास से एक जुमला और उछला था- अरे, दूल्हा तो अपने साथ एक डुप्लीकेट लाया है, शायद सौतेला भाई है।

परेश की शक्ल-सूरत और कदकाठी दिवेश भैया से हू-ब-हू मिलती है, अतः तय था इस फिकरे का लक्ष्य वहीं था। यह कमेंट सुनकर उसने भाभी के पास खड़ी युवतियों को घूरना शुरू किया और अन्य युवतियों से फिसलती उसकी नज़र जब मधु पर पड़ी, तो वह शरारत से मुस्काराती नजर आई थी। चौकन्नी आँखें, गोल मुखड़ा, सुतवाँ नाक और अजंता की मूर्ति-सा तराशा बदन यानी कि ’कुछ खास है’ वाला टेलीविजन का विज्ञापन स्लोगन मधु पर पूरा सही बैठता था। अचानक किसी ने टहोका था, तो वह लुटा-लुटा-सा मंडप के नीचे से लौट आया था, मन में वह चेहरा बसाए। यह तो बाद में पता लगा कि उसका नाम मधु है।

बाद में जयमाला लिये भाभी को सँभालती मधु मंच की ओर आती दिखी, तो परेश लपककर दिवेश भैया के पास जा खड़ा हुआ था। भाभी के साथ ही मधु भी मंच पर चढ़ आई थी। और अ बवह ठीक उसके सामने थी भाभी के पीछे से झँकती हुई।

दूल्हा-दूलहन ने परस्पर जयमालाएँ पहनाई, और तालियाँ बज ही रही थीं कि दिवेश भैया के एक मित्र ने चिल्लाकर उसे संबोधित किया, ’’परेश, तू भी पहना दे यार एक वरमाला, उस पीछेवाली को।’’

मधु लजा गई थी और परेश तो पानी-पानी हो गया था- ताड़नेवाले सचमुच कयामत की नज़र रखते है।

वह मंच से नीचे उतरकर पीछेवाली कुर्सी पर जाकर बैठ गया था। मंच पर ग्रुप फोटोग्राफ हो रहे थे। इसके बाद दूसरी रस्में होने लगीं। कुछ पल के लिए परेश का ध्यान मधु से हट गया, उसे पिताजी ने गहनों का सूटकेस सौंप दिया था।

आधी रात हो गई थी। प्रायः सभी बराती डेरा (जनवासे, विश्राम-गृह) में लौट चुके थे। और परेश क्षमा भाभी के घर के सामने ही सूने पंड़ाल में एक कुर्सी पर बैठा अकेला बोर हो रहा था, कि अचानक ही किसी काम में उलझी मधु बाहर निकलती दिखी। परेश की सुस्ती काफूर हो गई थी। वह तत्परता से उठा और मधु से बोला- ’’ एक्सक्यूज़ मी मैडम, एक मिनट रूकेंगी, आप ?’’

मधु हकलाती-सी बोली, ’’ज्ज जी कहिए!’’

’’ तो दूल्हे के डुप्लीकेट की बात आप कर रहीं थी। ’’ परेश उसकी छटपटाहट का मजा लेते हुए बोला था और मधु की आँखें धरती पर जा चिपकी थी।

टचानक तभी कुछ और युवतियाँ भी वहाँ आ गई थी। वे सब भाभी की सेहेलियाँ थी। परेश का तभी पता लगा था कि उस युवती का नाम मधु है और वह क्षमा भाभी की बुआ की बेटी है। मधु ने भी जाना था कि वह दूल्हा का छोटा भाई परेश है, जो सागर यूनिवर्सिटी से इतिहास में रिसर्च कर रहा है।

फिर तो वह रात उन लोगों की चहचहाहट में पलक झपकते-सी बीत गई। बिलकुल तड़के ही भाभी की सब सखियाँ खिसकने लगी थीं। अंत में वहाँ मधु और परेश ही बचे थें। नितांत अकेले। मधु की प्यासी-सी आँखें परेश को आमंत्रण-सा देती मिली थी।

परेश ने संजीदा होते हुए कहा था, ’’मधुजी, आप सचमुच बहुत खूबसूरत है। आप बहुत पसंद आई मुझे। मेरे लिए तो भैया की ये शादी खूब यादगार रहेगी।’’

’’आप खूब अच्छे डायलॉग मार लेते है, जीजाजी।’’ मधु ने उसकी संजीदगी को अपनी निश ष्छल आवाज़ से छिन्न-भिन्न कर दिया था और पेरश लुटा-पिटा-सा उसे देखता रहा था। वह उठकर गुनगुनाते हुए भीतर की ओर चल दी थी और उसकी मादक चाल देखकर परेश जाने कहाँ खो गया था।

बरात विदा होते वक्त मधु परेश से केवल इतना बोली थी, ’’जल्दी ही जबलपुर आइएगा। हम इंतजार करेंगे। ’’

परेश तो दो-चार दिन बाद ही जबलपुर के लिए सूटकेस जमा रहा था। क्षमा भाभी ने उसका उत्साह क्षीण कर दिया। वे खिलखिलाती हुई बोली थीं कि भैयाजी आप सचमुच बहुत भोले हो। मधु आपको बेवकूफ बना गई। कोई गलतफहमी मत पालिए मन में। मधु हरेक को ऐसे ही हवा देती है। ये तो स्वभाव है उसका।

परेश को भाभी की बातों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ था, पर उसकी जबलपुर यात्रा टल गई थी।

इस बीच परेश की नौकरी लग गई पर्यटन विभाग ने उसे पहली पोस्ंिटग ओरछा में दी थी। कुछ दिन वह बोर हुआ, फिर ओरछा के इतिहास और रायप्रविण की प्रणयगाथा जानकर उसका मन वहाँ के खँडहरों और वीरान नदी-तटों में बहलने लगा। विदेषी पर्यटकों को वह रस ले-लेकर राजा इंद्रजीत और रायप्रवीकी मोहब्बत के किस्से सुनाता। हर बार उसका मन जाने क्यों तड़प उठता-यह प्रेम कहानी सुनाते-सुनाते।

परेश की दूसरी मुलाकात सागर में हुई थी मधु से, क्षमाा भाभी की मौसी की लड़की की शादी में। मधु ने सागर पहुँचते ही परेश को बुलाकर कहा था, ’’देखो यार जीजाजी, हम तो इस शादी में केवल आपसे मिलने आए है। आप आज बहुत स्मार्ट लग रहे है। क्या बात है, कहीं शादी-वादी हो रही है क्या ? या कहीं लाइन मारने जा रहे हो !’’

यह सुनकर वह पुलक उठा था। फिर उन दोनों ने एक कोना तलाष लिया था और बातों में डूब गए थें। परेश की रूचि, आदतें और आमदनी से संबंधित सैकड़ों सवाल पूछती रही थी मधु। एक बार तो वह अचानक खड़ी हुई और परेश को उठाकर खुद की लंबाई नापने लग गई थी। चेहरे पर गाढ़ी मुस्कराहट लाकर वह फुसफुसाई थी- चलो यार, लंबाईवाली दिक्कत भी हल हो गई। मधु की आँखों की प्यास और आमंत्रण उसे कायल कर देता है।

वह मधु की ओर मुग्ध भाव से निहारता रह गया था। बाद में उसने मधु को सागर शहर घुमाया था अपने स्कूटर पर बैठाकर, औ मधु के ना-ना करते हुए भी एक सलवार-सूट खरीद के उसे प्रेजेंट में दिया था।

परेश ने देखा कि उस शादी में सब युवकों के आकर्षण का केंद्र थी मधु। हर लड़का मधु से बात करना चाहता था, उसकी सेवा करना चाहता था। रात में मधु को एकाध लड़के से मुस्करा के बात करते देखा, तो परेश ने उसे उलाहना दिया। जवाब में मधु ने उलटा परेश को ही ताना मारा था कि जब इतनी चिंता है तो मेरे पास रहो न हरदम! ऐसा संभव नहीं था, उचित भी नहीं था।

जबलपुर के लिए बस में बैठ रही मधु खूब प्रसन्न थी, जबकि परेश क्षण-क्षण गंभीर हो रहा था। मधु उससे बोली थी, ’’ अब तो जबलपुर आओगे न!’’

’’हाँ, जरूर आऊँगा।’’

क्षमा भाभी को पूरा किस्सा सुनाके जब परेश बोला कि आपकी बात झूठी हुई। मधु सचमुच मुझे चाहती है। तो भाभी पूर्ववत् अपनी बात दोहराती रहीं थी। उन्होंने चंदू का किस्सा सुनाया था परेश को।

मधु की सगी बड़ी बहन क्षिप्रा का देवर चंदू ऐसा ही दीवाना हो गया था-मधु का। वह कई बार जबलपुर जाता था और जब एक बार सिनेमाहाल में अंधकार में उसने मधु को जरा-सा छू-भर लिया, तो मधु तमक उठी थी और चंदू के गाल पर वो तमाचा लगाया था कि शर्म और लज्जा में डूबा चंदू सदा के लिए जबलपूर छोड़ भागा था।

कुछ क्षण के लिए परेश परेषान हो उठा था-- चंदू का किस्सा सुनकर। लेकिन मन पर किसका वष है ? उसके मन ने तुरंत ही नया तर्क गढ़ लिया था-गलती चंदू की ही थी उस घटना में।

शरीफ घराने की लड़कियाँ ऐसी हरकतें भला कहाँ सहन कर सकती हैं … और फिर कहाँ मधु, कहाँ दुवला-पतला टिंगू मास्टर चंदू। दोनों की कोई जोड़ी ही न थी। बेरोजगार चंदू की औकात कहाँ थी मधु की इच्छाएँ पूरी करने की ? …..हाँ, परेश हर नज़र से मधु के लायक है।

कश्मीर की अषांति के घबराए पर्यटक उन दिनों खजुराहों और ओरछा की ओर भारी संख्या मंें आना शुरू हुए, तो परेश का व्यस्त होना पड़ा और उसे छुट्टियाँ ही नहीं मिलीं। इस कारण फिर से उसकी यात्रा टल गई थी।

मधु से तीसरी मुलाकात इंदौर में हुई थी परेश की। परेश वहाँ पी.एस.सी के एग्जाम देने गया था। पहले ही दिन जब उसने अपने पापा के साथ मधु को वहाँ पाया, तो सुखद आष्चर्य से भर गया था। पता लगा कि मधु प्री-टेस्ट में पास हो गई थी और अब पूरी तैयारी के साथ परीक्षा देने आई है। परेश को देखकर मधु बहुत प्रसन्न हुई।

पेपर के बाद वे लोग बाहर निकले तो मधु ज़िद करके उसे अपने साथ नेहरू नगर तक ले गई थी। वे लोग वहीं ठहरे थे-मधु की बुआ के घर। चाय पीते वक्त सकुचाते हुए मधु के पापा बोले थे, ’’ परेश बेटा, मेरे पास आठ-दस दिन की छुट्टी नहीं है, इसलिए मैं आज ही लौट रहा हूँ। तुम मधु को परीक्षा दिला देना। चिंता मत करना, आखिरी दिन मैं आ जाऊँगा इसे लेने। ’’

’’ठीक है।’’ वह तपाक से बोला था, ’’ मैं ही जबलपूर पहुँचा दूँगा इन्हें। ’’

’’ नहीं, इतना कष्ट नहीं कराएँगें आपसे। ’’ उसके पापा कृतज्ञ भाव से बोले थे।

परेश आठ दिन तक मधु की सेवा में लगा रहा। सुबह बुआ के घर से मधु को लेता और परीक्षा दिला के उसे छोड़ आता। मधु के सान्निध्य में उसका मन पढ़ाई में कहाँ से लगत, सो उसके सभी पेपर बिगड़ गए थे, पर उसे परवाह न थी।

यदा-कदा मधु पुछती- जीजाजी, कभी याद आती है हमारी। तो परेश बोलता-तुम्हारी ही तो याद आती है। मधु कहती-इन दिनों आपके साथ रहने से खूब मजा आएगा।

कहने-सुनने की बात और थी, सच यह था कि मधु अपनी पढ़ाई में ऐसी डूबी थी िकवह परेश से पढ़ाई के अलाबा कोई दूसरी बातें करती ही नहीं थी।

आखिरी दिन मधु के पापा इंदौर पहुँच गए। वे लोग साथ-साथ लौटे। परेश उतारा तो मधु का वही पुराना आग्रह सामने था- आप जबलपुर कब आ रहे है? वे ही आमंत्रण देती गहरी आँखें उसके चेहरे पर फिर गढ़ गई थी।

’’जल्दी ही,’’ पूरे विश्वास से वह बोला था।

इस बार उसने क्षमा भाभी से बात नहीं की। वे पता नहीं कौन-सी नई बात गढ़ लेंगी- मधु के बारे में । उसने चुपचाप जबलपुर की तैयारी की और चला आया यहाँ।

कल से वह दो दिन तक मधु के साथ ही रहेगा। बाजार, सिनेमा और हरसंभव वो जगह जहाँ वे जा सकते है- जरूर जाएँगें। एक तरह से डेटिंग ही करेंगे वे दोनों। क्योंकि दोनों तरफ है आग बाराबर लगी हुई, यह वो ठीक से मानता है।

सुबह मधु के यहाँ पहुँचकर परेश आष्चर्य से भर देगा, उसे। मन-ही-मन उसने वे सब संवाद दोहराना शुरू कर दिए, जो उसे कल बोलने थे। इसी मनःस्थिति में जाने कब उसकी आँख लग गई ।

वे दोनों अकेले थे, उस वक्त। भेड़ाघट की एक चट्टान पर बैठकर धुआँधार प्रपात का कलरव सुन रहे थे-वे दोनों। परेश ने आस-पास का जायजा लिया, तो ज्ञात हुआ कि दूर-दूर तक कोई नहीं है, वहाँ। बस वे दोनों है और चारों ओर पसरी हैं - धुल-मटमैली विषाल चट्टानें।

एकाएक परेश की नज़रें मधु के माहक और सुंदर-सुडौल चेहरे से फिसलती हुई उसके दाएँ हाथ पर पहुँची तो नज़रें बँध गई उसकी। पतली और तराषी हुई-सी अपनी जादुई अँगुलियाँ एक विषेष अंदाज में धुली-कठोर चट्टान पर रख रखी थीं मधु ने। परेश ने नफासत से मधु का हाथ पकड़ा और आहिस्ता से एक बोसा अंकित कर दिया था, उस पर।

ठक्- ठक्- ठक्।

किवाड़ों पर गूँजती तेज दस्तक से परेश की नींद टूटी, तो वह चौंककर जागा। मादक स्वप्न की अवषिष्ट स्मृति उसके पस्तिष्क में शेष थी। इस कारण एक गाढ़ी मुस्कान तिर आई परेश के होठों पर। अपने कपड़े सँभालते उसने किवाड़ खोले, तो दरवाजे पर रेस्ट-हाउस का चौकीदार खड़ा था, ’’ साहबजी, आपने सात बजे जगाने का बोला था न, इसलिए डिस्टर्ब किया, साढ़े सात बज गए है।’’

’’ऐं ं ं ं ं साढ़े सात!’’ चौंककर घड़ी देखी परेश ने, और चौकीदार से चाय लाने का कहके बाथरूम की ओर लपका।

आठ बजे लकदक होकर उसने रेस्ट-हाउस छोड़ दिया। उसका मन तेजी से धड़क रहा था, इस वक्त।

कॉलबेल की तीखी ठनक के साथ ही भीतर कहीं दूर से मधु की महीन आवाज गूँजी थी, उसके कानों में, ’’कौन है ?’’

वह जानबूझकर चुप रहा। पदचाप समीप आई। परेश की धड़कने बढ़ गई । दिल उछल के बाहर आने को व्याकुल हो रहा था। शरीर बेकाबू-सा हो रहा था उसका। काष कि घर पर मधु अकेली हो।

किवाड़ खुले। अलसाई मुद्रा में उबासी लेती मधु उसके सामने थी।

’’हैलो ं ं ं ं ’’ मुस्कराते हुए परेश ने केवल इतना कहा।

’’ आइए जीजाजी, पधारिए।’’ मुँह पर एक फीकी-सी औपचारिक मुस्कान लाती मधु ने एक तरफ हटके उसे भीतर आने का इषारा किया । परेश के प्रविष्ट होते ही वह लपककर अंदर चली गई, अपनी मम्मी को पुकारते हुए, ’’मम्मी! देखो तो कौन आए है।’’

मनव-मन बड़ा दुराग्राही होता है। परेश को विश्वास था कि मधु उसे देखते ही उछल पड़ेगी। ं ं ं ं और ं ं ं ं और संभव है उसे लिपट भी जाए। पर यहाँ तो माजरा कुछ और है। मधु के व्यवहार में न अपने प्रतीक्षित प्रियजन के आने की अतिरिक्त उमंग है, न पहली बार घर आने का उत्साह।

वह सहमा-सहमा-सा खड़ा रहा एक ओर, उसके दिल ने कहा कि संभव है, मधु इन दिनों स्त्रीत्व के विषेष दिनों में हो ं ं ं ंया यह भी हो सकता है कि आगंतुक का स्वागत करने का यही शालीन तरीका हो मधु का। अभी निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है।

’’नमस्ते बेटा’’ मधु की मम्मी ने अचानक उसे चौंका दिया। ’’बैठो न, अभी तक खड़े ही हो।’’

’’ऐं ं ं ं ं ं ंहाँ ं ं ं ं नमस्ते। बैठ रहा हूँ आंटीजी। ’’ एक कुर्सी को खिसकाकर वह उकडूँ बैठ गया।

काफी देर तक आंटी उससे घर तथा क्षमा भाभी के मायके के समाचार पूछती रही थीं और वह बेमन से बताता रहा था, मन-ही-मन कुढ़ते हुए कि मधु भी सचमुच शरारती है। देखो जनबूझकर खुद भीतर जा बैठी है और मुझे यहाँ मम्मी से उलझा दिया है।

पूरे एक घंटे के बाद मधु ड्राइंगरूम में दिखी, अब परेश ने उसे गौर से देखा। रूखे और बेतरतीब बिखरे बालों के कारण मधु का चेहरा बड़ा मायूस और आकर्षणहीन-सा दिख रहा था। उसने एक ढीला-ढाला गाउन पहन रखा था। गाउन बैसे भी गंदा और धिसा हुआ था, और फिर उसमें कैद मधु का बदन बड़ा बेडौल-सा लगा उसे। उसकी प्रायः चख-चख करती जुबान आष्चर्यजनक ढंग से खामोष थी। परेश का मन कुछ और बुझ गया मधु को देखकर।

’’लीजिए, खाना खा लीजिए।’’ मधु के हाथ में भोजन की थाली थी, जिसे टेबल पर रखती हुई वह नितांत रूखे में बोल रही थी।

’’खाना’’ वह चौंका। होना तो यह चाहिए था कि इस वक्त हलका नाष्ता और चाय हाी हो जाती, फिर खाने के वक्त खाना आता। सीधा खाना परोसने का मतलब तो यहीं है कि खाओं और खिसको यहाँ से। न ये पूछा कि कब आए ? सामान कहाँ है ? कैसे हो ? न कोई व्यंगयोक्ति उछाली उस पर ं ं ं ं बस सीधी खाने की थाली पटक दी उसके सामने । जैसे इतनी दूर वह सिर्फ खाना भकोसने आया है।

’’ क्यों ? साढ़े नौ तो बज गए है। दफ्तर जाते वक्त खाना खाके ही निकलते हो ना। लो जल्दी शुरू हो जाओ ं ं ं ं तकल्लुफ नहीं। ’’ मधु ने दायाँ हाथ उसके कंधे पर रखकर बाएँ हाथ से उसे खाने का इषारा किया और पानी लाती हँू कहकर भीतर चली गई।

परेश को कुछ नहीं सूझा, तो उसने यकायक अपने सामने वाली थाली खिसका ली। दो सब्जी, अचार और पूड़ी सजा रखी थीं मधु ने थाली में। उसने पहला कौर तोड़ा था कि कॉलबेल चीख उठी। मम्मी उठीं और किवाड खोले। दरवाजे पर एक आधुनिक-सा दिखता युवक हाथ में चाबियों का छल्ला घुमाता व्यग्र मुद्रा में खड़ा हुआ था।

उसे देख मम्मी खिल उठीं, ’’ अरे राकेष बेटा, आओ।’’

भीतर आता वह युवक आतुर हो पूछ रहा था, ’’ मधु कहाँ है ?’’

’’ भीतर है, तुम बैठो तो, ’’ कहते हुए मम्मी ने दरवाजा बंद किया और उस युवक को बैठने का इषारा करने लगीं।

परेश को लगा कि मुँह के कौर में बाल है। परेषान हो उठा वह यकायक। कौर उगलना बड़ी गंदी हरकत होगी और निगल लेगा, तो दिन-भर परेषान रहेगा। वह उठा और भीतर की ओर बढ़ गया। आँगन में वाषबेसिन था। परेश ने वहाँ कौर थूककर कुल्ला किया और ड्रंाइगरूम में लौट आया।

’’बाल था।’’ बिना पूछे ही स्पष्टीकरण-सा देता परेश खिसियानी हँसी हँस रहा था।

’’ कोई बात नहीं,’’ कहती मम्मी ने राकेष से उसका परिचय कराया ं ं ं ं ’’परेश बेटा, ये राकेष है। मधु के पापा के दोस्त के लड़के! ये नेवी में इंजीनियर है, विषाखापट्टनम में। मधु से खूब छनती है इनकी। यह शहर नया है न इनके लिए, सो विषाखापट्टनम से आते ही सीधे मधु के पास भागते है।’’

’’हैलो,’’ खाना छोड़ राकेष की झुककर विष किया परेश ने।

’’ और बेटा राकेष, ये परेश हैं मेरी भतीजी के देवर, सागर वाले।’’

’’ हैलो ं ं ं ं , ’’ राकेष औपचारिक अंदाज में बोला था। मम्मी मधु को बुलाने भीतर चली गई थीं।

अचानक ही आँधी की तरह मधु ड्राइंगरूम में दाखिल हुई और अपने हाथ में पकड़ी पत्रिका सत्यकथा को एक ओर उछालती हुई एक सिसकारी-सी लेकर चीख उठी थी, ’’ अरे वाह, आ गए तुम!’’

राकेष का चेहरा प्रफुल्लित हो उठा था और वह मधु को एकटक ताके जा रहा था। एक क्षण बाद ही वह सँभलकर बोला, ’’ हाँ, कल रात आया हँू।’’

’’कित्ते दिन रहोगे!’’ मधु व्यग्र थी।

’’सात दिन।’’ अपनी भौंहे उचकाता राकेष बोला था।

’’ये ठीक है, खूब मजा आएगा।’’ मधु चहक रही थी।

’’तुम कैसी हो मधु ?’’ राकेष का स्वर नेह में ऊभ हो रहा था।

’’अच्छी हँू। तुम सुनाओ। कभी याद आती है हमारी!’’

’’विषाखापट्टनम में आप लोगों को ही तो याद किया करता हूँ।’’

’’क्यों फेंकते हो, हम नहीं लपेटवाले।’’ मस्ती में आती मधु को यकायक परेश का ध्यान आया था और उसने परेश को भी संबंधित कर डाला था, ’’जीजाजी, आप भी ऐसी बातें करते रहते हो। लेकिन ये बस सब मुँहदेखी बातें है।’’

परेश तड़प उठा था। ये आरोप तो मधु पर लगाना चाहता था वह।

’’रहने दे, मधु उन्हें खाना तो खा लेने दे।’’ हँसती हुई मधु की मम्मी टोक रही थीं उसे।

मधु पुनः राकेष की ओर मुखातिब हो गई थी, ’’बड़े स्मार्ट लग इस बार। क्या बात है ? कहीं शादी-वादी तय हो रही है क्या ? या कहीं लाइन मारने जा रहे हो ?’’

परेश को यकायक लगा कि उसका दम घुट रहा है। पेट के भीतर से हवा का गोला-सा ऊपर आया और उसका निवाला गले में फँस गया। उसको ठसका लगा, तो देर तक खाँसता रहा। आँखों से आँसू झरने लगे थे। पानी पिया तो खाँसी कम हुई। निवाले को जैसे-तैसे गटका। उसके बाद अब कुछ खाने की इच्छा नहीं थी। थाली खिसकाई और हाथ धोने उठ खड़ा हुआ।

मधु की मम्मी चौंकी, ’’अरे परेश, ये क्या, तुमने तो ं ं ं।’’

’’प्लीज़ आंटी। अब एक कौर भी नहीं खा पाऊँगा। सॉरी।’’

हाथ पोंछते हुए वह ड्राइंगरूम में लौटा, तो वे तीनों किसी बात पर लगातार हँसे जा रहे थे। उसे लगा शायद उसकी हरकतों पर ही हँस रहे है।

’’अच्छा मधु, अब मैं चलता हूँ । निकलना है मुझे अभी ं ं ं ओ.के. राकेष जी, मिलेगें फिर ं ं ं ’’ बिना किसी भूमिका के तेजी से ये शब्द बोलता परेश दरवाजे की ओर बढ़ा तो मधु की मम्म ने मधु को टोका, ’’मधु ओ मधु ! ं ं ं ं सुन तो जराफ ये परेश जा रहे है।

स्हज रूप् से उठती मधु ने उससे नमस्ते की और खुद आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया। बाहर निकलते परेश को पीछे से उसकी आवाज सुनाई दी, ’’फिर कभी आइएगा।’’

जन-बूझकर उसने कोई उत्तर नहीं दिया और वह मौन होकर तेज कदमों से रेस्ट-हाउस की ओर चल पड़ा। भीतर-ही-भीतर पूरे शहर के माहौल से एक घुटन-सी हो रही थाी उसे। अ बवह सामान उठााकर जल्द-से-जल्द जबलपुर छोड़ देना चाहता था।

रेस्ट-हाउस से चलते वक्त जब चौकीदार को टिप देने के लिए उसने पर्स खोला तो पर्स में मधु का फोटो अनायास ही नज़र आ गया। परेश को मधु की वे आमंत्रण देती प्यासी आँखें उसे फिर से विचलित करने लगीं। उसने मन में तर्क गढ़ा - शायद मधु इस बार किसी वजह से परेषान थी, सो खुल के नहीं मिल सकी। खैर, अगली बार देखेंगें !

जबलपुर छोड़ते वक्त वह फिर से अनमना था।