शारदा माँ Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

शारदा माँ

शारदा माँ

आज अनीता जब माँ से मिलने आई सी यू में गयी तो माँ सो रही थी। आई सी यू में वैसे ही आधे घंटे मिलने का समय दिया जाता था, जिसमे सभी थोड़ी-थोड़ी देर के लिए मिलने की कोशिश करते थे। अनीता माँ शारदा की बड़ी बेटी है, छोटी बेटी नीलम और बेटा राजू भी अभी प्रतीक्षा में थे कि अनीता मिल कर बाहर आ जाए तो फिर बारी-बारी वह भी माँ से मिलकर आ जाएँ। आज तो और भी कई रिश्तेदार आए हुए थे माँ से मिलने के लिए, और सभी की यही इच्छा थी कि थोड़ी देर के लिए ही सही पर एक बार मिल लें। शारदा की छोटी बहन लक्ष्मी, उनका बेटा बहू और बेटियाँ भी आयीं हुई थीं। अनीता ने जब देखा कि माँ तो सो रही है, और मुझे जल्दी बाहर जाकर नीलम को मिलने के लिए भी भेजना है, ज्यादा देर तक यहाँ रुक कर प्रतीक्षा भी नहीं कर सकती तो अनीता ने धीरे से हाथ लगाकर माँ को हिलाया, अनीता के हाथ लगते ही माँ जग गयी और अनीता से बोली, “मैं तो भगवान से मिलने गयी थी।” अनीता हंस कर कहने लगी कि यहाँ तो आपसे मिलने वाले बाहर लाइन लगाए खड़े हैं और आप हमारे मिलने के समय भगवान से मिलने चली गईं। अच्छा माँ बताओ क्या बात हुई भगवान से, तो माँ चुप हो गयी और कुछ नहीं बोली। फिर थोड़ी देर बाद कहने लगी कि मेरा तो आलू पूरी खाने का मन कर रहा है, तू ऐसा कर, सौ डेड-सौ किलो आलू की सब्जी और पूरी बनवा लेना मैं खाऊँगी। तब तो यही लगा कि शायद बीमारी के कारण इस तरह की बातें कर रहीं हैं लेकिन ठीक दो दिन बाद सातवें नव्रात्रे के सुबह-सुबह ब्रह्म-मुहूर्त में माँ शारदा सदा-सदा के लिए भगवान के पास चली गयी। सत्ताईस दिन हो गए थे उन्हे आइ सी यू में भर्ती हुए, डॉ प्रतिदिन कोई न कोई नया टेस्ट कर रहे थे एवं इसी कोशिश में लगे हुए थे कि किसी तरह से शारदा अग्रवाल ठीक होकर अपने घर चली जाएं लेकिन उन्होने तो दो दिन पहले ही दूसरे घर जाने का संकेत दे दिया था।

शारदा की एक छोटी बहन लक्ष्मी एवं तीन भाई, सभी एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में पली-बढ़ी एवं सब तरह से सम्पन्न परिवार की बेटी शारदा को बचपन में कभी किसी तरह की कमी महसूस नहीं हुई, पिता और भाई सभी बड़े लाड़-प्यार से रखते थे। माँ का साया तो बचपन मे ही सिर से उठ गया था जब वो सिर्फ नौ बरस की थीं। शारदा की शादी सेना में कार्यरत युवक राजेंद्र से हुई एवं लक्ष्मी की शादी एक कारोबारी युवक से हुई। नौकरी में सीमित वेतन मिलता है और उसी में अपना बजट बना कर गुजारा करना पड़ता है। सेना की नौकरी में हर 3 साल बाद स्थानांतरण, जगह-जगह जाना, वहाँ नए सिरे से रहना, बच्चों की पढ़ाई भी नए सिरे से नई जगह शुरू करना, लेकिन इस सबके बावजूद शारदा सदैव पूरी हिम्मत से अपने परिवार को आगे बढ़ाने एवं पढ़ाने में लगी रही।

सन चौरासी में राजेंद्र जी की तैनाती अमृतसर में थी और उन्हीं दिनों पूरे भारत में सिख-विरोधी दंगे हो गए। ये बनिया परिवार उधर अमृतसर मे सिखों के बीच में घिरा हुआ था, दिन रात भय और आतंक का माहौल था, न बच्चे सो पाते थे और राजेंद्र और शारदा भी पूरी पूरी रात जाग कर काट रहे थे। धीरे-धीरे दंगे शांत हुए, एक उलझन सी राजेन्द्रजी के मन में घर कर गयी थी कि कब तक बच्चों को लेकर जगह-जगह भटकते रहेंगे और उन्होने शारदा से सलाह करके अपनी नौकरी से स्वैच्छिक सेवा-निवृति लेने का फैसला कर लिया। सेवा-निवृति लेकर राजेंद्र और शारदा बच्चों को लेकर दिल्ली आकर रहने लगे।

पीतम पुरा उन दिनों नया बसा था, एक प्लॉट डी डी ए से राजेंद्र जी के नाम पर आवंटित हुआ और उसी को बनाने मे सारा परिवार जी जान से लग गया। दिल्ली में घर बनाना सबसे टेड़ा काम है, ठेकेदार को देखना, सामान का प्रबंध करना और इसमे ही राजेन्द्र और शारदा पूरा-पूरा दिन खड़े रहते थे। तीन दिन से काम बंद था और राजेंद्र मायूस होकर कहने लगे, “शारदा, शायद ठेकेदार हमारा काम आगे नहीं करेगा।” शारदा को यह बात सुनकर गुस्सा आ गया और बोली, “कैसे नहीं करेगा, पाँच हजार रुपये हिसाब से ज्यादा लेकर गया है, ऐसे कैसे काम छोड़ जाएगा, आप एक बार उसको बुलाओ, मैं बात करूंगी।” राजेंद्र ने ठेकेदार को बुलवा लिया, वह अपने साथ दो आदमी और लेकर आया एक उसका भाई था और दूसरा उसका लड़का था लेकिन राजेंद्र और शारदा दोनों ही थे। पांचों वहीं बैठ कर बात करने लगे तो लड़का बोला, “आप लोग आपस में लिख लो कि हम इस ठेके को भंग करते हैं, हिसाब जैसे भी होगा कर लेंगे।” राजेंद्र कुछ बोले उससे पहले ही शारदा बोल पड़ी, “काम करवाने को हमने तो मना नहीं किया, तुम्ही लोग मना कर रहे हो इसलिए लिख कर भी तुम्ही दोगे।” इस बात को सुनकर ठेकेदार थोड़ा घबरा गया एवं कहने लगा कि अगर में लिख कर दूँ तो तुम क्या कर लोगे। शारदा बोली, “तुम लिख कर तो दो फिर हम बताएँगे कि हम क्या कर लेंगे, हम तुम्हें जेल भिजवाएंगे।” जेल की बात सुनकर ठेकेदार सकपका गया और अपने भाई और बेटे से सलाह करने बाहर चला गया। उसी दिन से ठेकेदार ने काम शुरू करवा दिया एवं पूरा घर बनने तक नहीं छोड़ा। इस तरह पीतम पुरा में राजेंद्र और शारदा का अपना एक घर बना।

घर पूरा बनने पर गृह प्रवेश में सभी रिश्तेदार, मित्र और पास-पड़ोस वाले आए। शारदा की बहन का बेटा उमेश बोला, “अब मैं सबको जिम कॉर्बेट पार्क घुमाने ले जाऊंगा, बताओ कब चलना है।” शारदा ने कहा, “जब भी तुम्हारा मन करे बता देना लेकिन वहाँ पर एक तो मुझे हाथी की सवारी करवानी पड़ेगी और दूसरे बाघ जरूर दिखाना पड़ेगा।” उमेश बोला, “हाँ मौसी सब जानवर हैं वहाँ चल कर तो देखो बहुत आनंद आएगा और आप बार-बार जाने के लिए कहोगी।”

जिम कॉर्बेट जाकर शारदा हैट लगाकर हाथी पर बैठी और हाथ मे बंदूक लिए हुए फोटो खिंचवाया, बिलकुल शिकारी की तरह लग रही थी। हाथी की सवारी करते हुए ही दूर एक बाघ का पूरा परिवार विश्राम करते हुए देखा। शेरनी लेटी हुए थी बच्चे खेल रहे थे और शेर बैठा हुआ चारों तरफ नजर रखे हुए था। शारदा सोचने लगी हम भी तो यही करतें हैं। मैं जब घर के काम में लगी रहती हूँ बच्चे बाहर खेलने चले जाते हैं तो राजेंद्र जी उनका ख्याल रखते हैं। हाथी अपनी मस्त चाल से चला जा रहा था, और शारदा को उसकी पीठ पर बड़ा आनंद आ रहा था। वहाँ से पूरा वन दिखाई दे रहा था वहीं से।

रोज-रोज हाथी की सवारी करते-करते हाथी भी तीन चार दिनों में शारदा को पहचानने लगा था, कभी कभी महावत से पूछ कर हाथी को खाने के लिए फल भी दे देती थी। शाम को महावत हाथी को छोड़ दिया करता था और हाथी मदमस्त चाल से चलता हुआ राम गंगा में जाकर जल-क्रीडा करता था। उस दिन शारदा भी राम गंगा के किनारे बैठ कर शीतल जल को निहार रही थी। शाम का समय था, नदी का किनारा और मौसम बहुत ही खुशगवार था, सामने ही हाथी राम गंगा में अठखेलियाँ कर रहा था, कभी अपनी सूंड में पानी भर कर अपनी कमर पर डाल रहा था और कभी शारदा पर फुव्वारे फेंक रहा था। हालांकि पानी शारदा तक नहीं पहुंचता था लेकिन हाथी को ऐसा करने में आनंद आ रहा था। इस परमानंदित करने वाले वातावरण में शारदा यह भी भूल; गयी कि बच्चे विश्राम गृह में प्रतीक्षा कर रहे होंगे और इस चेतावनी को भी भूल गयी जो वहाँ लिखी हुई थी, “राम गंगा के किनारे जाना मना है क्यूंकी यहाँ पर जंगली जानवर पानी पीने आते हैं।” हुआ भी ऐसा ही कि चीते का एक पूरा परिवार वहाँ पर पानी पीने के लिए आ गया, लेकिन शारदा इस सब से बेखबर हाथी की अठखेलियाँ देखने में मग्न थी। हाथी की निगाह जब शेर के परिवार पर पड़ी तो हाथी नदी से बाहर आ गया एवं तुरंत ही उसने शारदा को अपनी सूंड में उठाकर पीठ पर बैठा लिया। पहले तो शारदा बुरी तरह से घबरा गयी और शोर मचाने लगी लेकिन जैसे ही उसकी नजर चीते के परिवार पर पड़ी तो शारदा के मुह से आवाज निकलनी बंद हो गयी और वह चुपचाप हाथी की पीठ पर बैठी रही। हाथी तेज गति से विश्राम गृह की तरफ चल पड़ा और शारदा को सुरक्षित वहाँ ले जाकर पर उतार दिया।

शारदा अपने तीनों बच्चों व पति के साथ बड़े मजे से अपने पीतम पुरा वाले घर में रह रही थी। अनेक प्रकार के भोजन बनाने में प्रवीण थी शारदा, क्योंकि उनके चाचा की बड़शाहबुल्ला चौक पर हलवाई की बड़ी सी दुकान थी बचपन में शारदा जब भी उधर से निकलती चाचा आवाज देकर बुला लेते और दुकान से कुछ न कुछ खिला कर ही भेजते तभी शारदा चाचा से उसको बनाने की विधि जान लिया करती थी, यह शारदा की जिज्ञासु प्रवृति ही जो वह सब कुछ जानना चाहती थी। कढ़ी बनाने मे तो उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता था।

शारदा माँ के बड़े भाई राज कुमार के यहाँ एक सत्यनारायण कथा का आयोजन था, जिसमें राजकुमार ने अपने सभी बहन भाइयों को सपरिवार आमंत्रित किया था। उन दिनों राज कुमार नाइवाड़ा चावडी बाज़ार में ही रह रहे थे और आयोजन भी वहीं पर था। शारदा माँ आयोजन में सम्मिलित होने के लिए चल दी और राजेंद्र घर पर ही रह गए। पीतम पुरा उन दिनों नया बसा था, घर भी काफी दूर-दूर थे और घर खाली छोडने में डर भी लगता था, कहीं कोई चोरी न हो जाए। इसलिए यही उचित समझा गया कि राजेंद्र जी घर पर रुक जाएंगे एवं शारदा व तीनों बच्चे अनीता, नीलम और पारस आयोजन में शामिल होने चले जाएंगे। पीतम पूरा से 901 न. की बस चलती थी जो कमला मार्केट तक जाती थी, शारदा माँ ने अपना व तीनों बच्चों का टिकिट लेने के लिए कंडक्टर को 100 का नोट दिया तो कंडक्टर ने 4 टिकिट के 25 रु काट कर 75 रु वापस कर दिये। बस जैसे ही लाल किले के बस स्टैंड पर पहुंची तो शारदा माँ बच्चों को लेकर वहीं उतर गयी क्योंकि वहाँ से नाइवाड़ा नजदीक पड़ता था। अपने घर जा रही थी तो खाली हाथ भी नहीं जाना चाइए अतः वहीं स्टैंड के पास खड़े हुए फल वाले से 75 रु के सेब खरीद लिए एवं कंडक्टर के दिये हुए 75 रु ज्यों के त्यों उस फल वाले को पकड़ा दिये। फल वाले ने पैसे लेकर गिनने शुरू किए तो देखा कि उनमे 5 का एक नोट आधा ही था। फल वाला कहने लगा, “बहन जी, क्या मूर्ख बनाने को मैं ही मिला था?” शारदा माँ ने पूछा, “क्यों भैया, क्या हुआ?” तब फल वाले ने वह पाँच का नोट दिखाया जो सिर्फ आधा टुकड़ा था। तब तक बस भी वहीं सामने स्टैंड पर ही खड़ी थी और कंडक्टर यह सब देखकर हंस रहा था। शारदा माँ को यह बात अच्छी नहीं लगी, एक तो कंडक्टर ने आधा नोट दिया है और ऊपर से हंस भी रहा है। शारदा माँ ने फल वाले से वह आधा पाँच का नोट हाथ में लिया और अचानक कंडक्टर की तरफ घूम गयी वहाँ जाकर शारदा माँ ने आव देखा न ताव, एक झन्नाटेदार थप्पड़ कंडक्टर के गाल पर रसीद कर दिया। अचानक जोरदार थप्पड़ और वह भी एक महिला के हाथ से कंडक्टर को लगा तो वह घबरा गया और बोला, “बहन जी माफ करना, मैंने देखा नहीं था, अभी मैं आपको नोट बदल कर देता हूँ।” कंडक्टर से दूसरा नोट लेकर फल वाले को दिया एवं फल लेकर बच्चों को रिक्शा में बैठाकर अपने भाई के घर चल पड़ी, ऐसी बहादुर थी हमारी शारदा माँ।