Part 02-Jatak Kathein books and stories free download online pdf in Hindi

भाग-२ जातक कथाएं

जातक

कथाएँ

सं. कौशल्या


© COPYRIGHTS


This book is copyrighted content of the concerned author as well as NicheTech / Hindi Pride.

Hindi Pride / NicheTech has exclusive digital publishing rights of this book.

Any illegal copies in physical or digital format are strictly prohibited.

NicheTech / Hindi Pride can challenge such illegal distribution / copies / usage in court.

अनुक्रमणिका

१.भाग्य का लिखा

२.गुरु-मंत्र

३.गीदड़ की चालाकी

४.मेहनत का फल

५.ज़हरीले आम

६.ईमानदारी

७.पेड़ों की बुद्धिमानी

८.मृत्युदायी फल

९.परीक्षा

१०.सबसे बड़ी मुसीबत

११.भविष्यवाणी

१२.भगवान की इच्छा

१३.भिखारी की पहेलियाँ

१४.चिंता का रोग

१५.बलिदान

१६.पंडित का मंत्र

१७.सोने का मृग

१८.वशीकरण मंत्र

१९.भाग्य और बुद्धि

२०.सेर को सवा सेर

२१.निर्दयी सास

२२.समय बड़ा बलवान

भाग्य का लिखा

एक गाँव में रामू नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत नेक और वफादार इन्सान था। वह ढोल बजाने का कार्य करता था।

गाँव में यदि किसी के घर खुशी का अवसर होता तो रामू को ही याद किया जाता था।

सभी गाँव वालों को रामू का ढोल बजाना बहुत अच्छा लगता था, इसलिए गाँव वाले खुशी के अवसर पर रामू को ही बुलाते थे।

रामू का ढोल इतना अच्छा था कि उस पर चोट पड़ते ही दूर-दूर तक गाँव वाले समझ जाते थे कि रामू ढोल बजा रहा है। गाँव में यदि कबड्डी या फुटबाल का खेल होता तब भी रामू को ढोल बजाने के लिए बुलाया जाता था।

इतनी मेहनत करने के बाद भी रामू को ढोल बजाने के बदले थोड़ा-सा अनाज मिलता था। इशसे उसे दो वक्त की रोटी भी ठीक से नहीं मिल पाती थी। कभी-कभी तो रामू को भूखे पेट ही सोना पड़ता था। उस समय तो धन के नाम पर लोगों के पास कुछ टके ही होते थे। जिनके बल पर वे स्वयं को अमीर समझने लगते थे।

कुछ लोग अनाज देकर अपनी जरूरत की वस्तुएँ खरीद लेते थे।

रामू की आमदनी कम होने के कारण उसकी पत्नी उससे हर समय झगड़ा करती थी। वह रामू को यही समझाती थी कि ढोल बजाना बंद करो और कोई दूसरा दाम-धंधा शुरू कर दो, ताकि हमें दो वक्त की रोटी आराम से मिल सके। प्रायः पति-पत्नी में इसी प्रकार की नोंक-झोंक होती रहती थी।

रामू का शिवकुमार नाम का एक पुत्र भी था। वह भी रूखा-सुखा खाकर बड़ा तो हो गया, लेकिन अपने परिवार को गरीबी में देखकर उसे बहुत दुःख होता था। एक दिन शिवकुमार ने देखा कि उसके घर में रोटी बनाने के लिए आटा भी नहीं था। यह देखकर उसे बहुत दुःख हुआ। वह सोचने लगा कि जिस काम को करने से हम दाने-दाने को तरसते रहे, उस काम को करने से क्या लाभ? क्या यह भी जिंदगी है। शिवकुमार को अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगा।

एक बार उसी गाँव के राजा के यहाँ कोई उत्सव मनाया जा रहा था। दूर-दूर से कलाकार उत्सव में भाग लेने के लिए आए थे।

इस अवसर पर शिवकुमार भी चला गया था। सभी कलाकारों ने इस उत्सव में अपनी कला का प्रदर्शन किया। राजा विद्वान और कलाकारों का बहुत सम्मान करता था।

राजा ने यह घोषणा पूरे गाँव में करवा दी थी कि जिसकी धुन पर सबके पैर थिरकने लगेंगे, वही विजेता माना जाएगा और उसे बहुत सारा इनाम मिलेगा। सभी ढोलकियों के ढोल बजाने के बाद शिवकुमार ने भी उत्सव में ढोल बजाया। शिवकुमारस के ढोल की तान सुनकर सबके पैर थिरकने लगे और सब अपनी सुध-बुध खोकर झूमने लगे। युवराज, मंत्री, दरबारी और राजा कोई भी अपने को रोक नहीं पाए और मस्त होकर नाचने लगे।

नाचना-गाना बंद होने का बाद राजा उठ गए, क्योंकि वे विजेता का नाम घोषित करना चाहते थे। सभी कलाकारों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन बहुत अच्छा किया था, किंतु महाराजा के मन को बालक शिवकुमार की प्रतिभा ने मोह लिया था। इतनी छोटी आयु में ढोल का इतना अच्छा प्रदर्शन देखकर महाराज हैरान थे।

सभी कलाकार प्रतियोगिता का परिणाम जानने के लिए बहुत उत्सुक थे। आखिर में राजा परिणाम घोषित करने के लिए खड़े हुए।

उन्होंने सभी कलाकारों की बहुत प्रशंसा की और बालक शिवकुमार को अपने पास बुलाया। महाराज ने शिवकुमार को विजयी घोषित करते हुए आशीर्वाद के साथ-साथ इनाम भी दिया। रामू भी अपने पुत्र को विजयी देखकर खुशी से फूला नहीं समा रहा था।

महाराज ने शिवकुमार को स्वर्णाभूषण और सोने की मोहरें इनाम में प्रदान कीं। रामू और शिवकुमार इन पुरस्कारों को देखकर बहुत खुश थे। रामू और शिवकुमार जंगल की ओर चल दिए।

शिवकुमार खुशी के कारण अपना ढोल पीटने लगा। रामू ने उसे समझाते हुए कहा, “पुत्र! जंगल में ढोल पीटना बंद करो। तुम्हारे ढोल की आवाज सुनकर यदि चोर या डाकु आ गए तो हमारा सारा धन लूट लेंगे।”

उसी जंगल में डाकुओं का एक गिरोह ठहरा हुआ था। उन्होंने ढोल की आवाज सुनकर शिवकुमार और रामू को घेर लिया। डाकुओं का सरदार क्रोधित होकर बोला, “जल्दी से सारा माल हमें दे दो वरना हम तुम्हें जान से मार डालेंगे।” रामू ने कहा, “मालिक! हम पर दया करो, हम तो पहले से ही गरीब हैं।”

जब डाकुओं का सरदार नहीं माना तो रामू ने स्वर्णाभूषण और मोहरों वाली गठरी उसी को दे दी। तभी झाड़ी में से एक साँप ने निकलकर डाकू के पैर में काट लिया। डाकुओं का सरदार तो जमीन पर गिरकर मर गया। उसके सभी साथी भाग गए।

डाकुओं को भागते देखखर रामू और शिवकुमार बहुत खुश हुए। उन्होंने आभूषणों और मोहरों से भरी गठरी उठाई तथा अपने घर को चले गए। रामू ने अपनी पत्नी को सारी बातें बताइर्ं तो बहुत खुश हुई। उसने अपने जीवन में इतने गहने पहले कभी नहीं देखे थे। जो जिसके भाग्य में लिखा होता है, वह उसे अवश्य ही मिलता है।

गुरु-मंत्र

सीताराम नाम का एक प्रकांड पंडित काशी से अध्ययन करकेआया। जिस गाँव में वह रहता था, उस गाँव के लोग किसी कीबुद्धिमानी की प्रशंसा करना तो दूर बल्कि उसका उपहास करते थे।

गाँव वालों का यह व्यवहार विद्वान ब्राह्मण को तनिक भी पसंद नहींथा। वह हमेशा यही सोचता था कि बुद्धिमान ही बुद्धि की कदर करसकता है।

अगर रास्ते में किसी मूर्ख को हीरा मिल जाए तो वह काँचका टुकड़ा समझकर फेंक देगा। एक दिन वह ब्राह्मण भी गाँव वालोंकी आदतों से तंग आकर दूसरे गाँव की ओर चल दिया। उसी गाँवमें ब्राह्मण का एक शिष्य भी रहता था। जब उसे इस बात का पताचला तो वह बहुत दुःखी हुआ और उनके साथ चलने की जिद करनेलगा। वह ब्राह्मण से बार-बार यदी कह रहा था कि, “गुरुजी! मैं यहाँनहीं रह सकता। आपके जाने के बाद में मेरा यहाँ क्या होगा?”

ब्राह्मण ने अपने शिष्य से कहा, “मैंने यहाँ के लोगों कोसमझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे नहीं माने। मुझे गाँव वालोंका व्यवहार तनिक भी पसंद नहीं है। इसलिए हमें दूसरे गाँव में जाकरमुसीबतें उठानी पडे और वहाँ भी सुख से न रह सकें। तुम मेरे साथचलने से पहले अच्छी तरह सोच लो।”

शिष्य ने कहा, “गुरुजी! मैं आने वाली कठिनाइयों के विषयमें सोचकर ही आपका साथ नहीं छोड़ सकता। ब्रह्म-हठ, राज-हठ,त्रिया-हठ इन्हें कोई भी बदल नहीं सकता। जिस प्रकार मैं भी अपनाहठ नहीं छोड़ सकता और आपके साथ जाकर रहूँगा।”

गुरुजी ने कहा, “ठीक है बालक, तुम मेरे साथ चलो। तुमदूसरे गाँव में जाकर यह प्रचार करना कि मेरे गुरुजी को हीरे-मोतियोंकी वर्षा करने वाला मंत्र आता है, जिसका जाप करने से हीरे-मोतियोंकी बरसात होने लगती है।”

शिष्य बहुत ही चंचल स्वभाव का बालक था। वह बोला,“गुरुजी! छू-मंत्र के प्रभाव से आप अमीर क्योंम नहीं बनते? हीरे-मोतियों को इकट्ठा करके हमें किसी सेठ और जमींदार के समान बड़ीहवेली में रहना चाहिए, फिर हमें इधर-उधर भटकने की क्याआवश्यकता है?”

गुरुजीने अपने शिष्य से कहा, “पुत्र! जिस प्रकार सूर्य अपनेप्रकाश का लाभ नहीं उठाता, पेड़ दूसरों को छाया देता है, उसी प्रकारछू-मंत्र का लाभ भी दूसरों को ही मिलेगा। छू-मंत्र का जाप मैं जिनकेलिए स्वयं करूँगा, केवल उन्हीं लोगों को लाभ मिलेगा। मैं या मेराअपना कोई इस छू-मंत्र का लाभ नहीं उठा सकता। यदि ऐसा हुआतो मेरी या मेरे अपने की मृत्यु हो जाएगी।”

शिष्य ने कहा, “गुरुजी! मुझे इस बात का पता नहीं था किआप सचमुच इतने बड़े विद्वान हैं। हमें राजा के पास चलना चाहिएक्योंकि हीरे की कदर चौहरी ही करता है।” गुरुजी ने उ्रूद्गार दिया,“पुत्र! मैं भगवान, गुरु और माता-पिता को ही सबसे महान्‌ समझताहूँ, जिनकी कृपा से ही सब कुछ होता है। गुरु का नाम लेकर हमेंबुद्धिहीन लोगों से दूर चले जाना चाहिए।”

इतना कहकर गुरुजी ने अपना सामान बाँध लिया। सामान केनाम पर गुरुजी के पास एक धोती, कुरता और कुछ ग्रंथ थे। इसकेबाद उन्होंने अपने शिष्य से कहा, “पुत्र! जल्दी करो। रात होने सेपहले जंगल पार करना है। रास्ते में यदि हमें कोई लुटेरा मिल गयातो हमारा सबकुछ छीन लेगा। हमारा असली धन तो ये ग्रंथ ही हैं।”

गुरुजी की बातें सुनकर शिष्य ने कहा, “गुरुजी, लुटेरा इनग्रंथों को छीनकर क्या करेगा? बल्कि यदि कोई लुटेरा मिल गया तोवह हमारी गरीबी पर तरस करके हमें कुछ दे ही देगा।”

इसके बाद गुरु-शिष्य दोनों ने जंगल में प्रवेश किया। इसभयानक जंगल में वे दोनों बहुत डर रहे थे। तभी एक रोबदार आवाजसुनाई दी। आवाज सुनकर वे दोनों काँपने लगे और उन्हें अपनी मृत्युनजदीक दिखाई देने लगी। गुरु-शिष्य अभी राजा प्रताप सिंह के पासजाने के विषय में सोच ही रहे थे कि डाकू मानसिंह ने कहा, “डाकूमानसिंह के विषय में तुम्हारे क्या विचार हैं? लोगों की नजर में वहराजा तो अच्छा है जो हजारों लोगों को मृत्यु-दंड देता है, फिर हमेंसब बुरा क्यों समझते हैं?”

गुरुजी ने डरते हुए कहा, “डाकू मानसिंह भी अच्छे और नेकव्यक्ति हैं। वे हमेशा गरीबों की मदद करते हैं।”

डाकू मानसिंह ने कहा, “देखो, राजा हमारा शत्रु है। तुम राजाके पास जा रहे हो, इसलिए मैं किसी की भी फालतू बातें सुनना नहींचाहता। मैं ऊँची आवाज में बोलने वालों को कभी भी जीवित नहींछोड़ता। अब तुम मरने से पहले अपने ईश्वर को याद कर लो।”

गुरुजी की जान खतरे में देखकर शिष्य डाकू से रो-रोकरप्रार्थना करने लगा, “मेरे गुरुजी को कृपया जीवनदान दे दीजिए। मैंइनके बिना जीवित नहीं रह सकता।” शिष्य की बात सुनकर डाकूमानसिंह ने कहा कि यदि तुम राजा से एक हजार सोने की मुद्राएँलाकर दोगे तो मैं तुम्हारे गुरुजी को जीवनदान दे सकता हूँ।

शिष्य ने डाकू मानसिंह से शपथ ली कि जब तक वह राजासे एक हजार सोने की मुद्राएँ लेकर नहीं आएगा तब तक उसके गुरुसुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार डाकू से आश्वासन पाकर शिष्य वहाँ सेचला गया। डाकुओं ने गुरुजी को पेड़ से बाँध दिया।

पेड़ से बाँधे जाने के बाद गुरुजी ने सोचा कि इन डाकुओंको छू-मंत्र के विषय में बता दूँ तो शायद ये मेरे बंधन खोलकरआजाद कर देंगे। जब गुरुजी ने डाकुओं से कहा तो उन्होंने गुरुजीको आजाद कर दिया। गुरुजी ने स्नान किया और पेड़ के नीचे छू-मंत्र का जाप करने लगे। तभी वहाँ पर जोर से आँधी-तूफान आयाऔर बादल गरजने लगे। जोर-जोर से बिजली कड़कने लगी औरआसमान से हीरे-मोतियों की वर्षा होने लगी।

डाकू जल्दी से हीरे-मोती समेटने लगे। तभी जोर से आवाजआई कि, “अपनी जगह पर बैठ जाओ। एक भी मोती उठाया तो तुम्हेंमौत के घाट उतार दूँगा।” तभी वहाँ पर डाकू कुंदनसिंह आ गया औरबोला, “यह मेरा इलाका है। यहाँ आने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?

अपने इलाके में चले जाओ, वरना मारे जाओगे।”

डाकू मानसिंह कहने लगा, “मैं किसी की आज्ञा का मोहताजनहीं हूँ कि तुमने कहा और मैं चला जाऊँगा। डाकू मानसिंह जिस धरतीपर खड़ा हो जाता है, वह धरती उसी की हो जाती है।”

कुंदनसिंह कहने लगा, “देखो मानसिंह! लड़ाई-झगड़ा याखून-खराबा करने से कोई लाभ नहीं है। ब्राह्मण पर अत्याचार करनाबुरी बात है। हमारी बात मानकर यहाँ से चले जाओ। चुपचाप आधामाल मुझे दे दो वरना में अपनी तलवार के दम पर आधा माल छीनलूँगा।”

कुंदनसिंह की बात सुनकर डाकू मानसिंह ने कहा, “यह तोसारा माल मेरा है। यदि तुम अमीर बनना चाहते हो तो गुरुजी को लेजाओ, ये तुम्हें भी अमीर बना देंगे।”

इस प्रकार दोनों मित्र गले मिले। गुरुजी यह देखकर भय सेकाँप रहे थे। तभी डाकू कुंदनसिंह ने कहा, “अब तुम मेरे लिए हीरे-मोती की वर्षा करो। यदि तुमने ऐसा नहीं यिा तो मारे जाओगे।”

गुरुजी ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि, “मेरा छू-मंत्र एक वर्ष में केवलएक बार ही हीरे-मोती सी बरसात कर सकता है।”

गुरुजी की बात से क्रोधित होकर डाकू कुंदनसिंह ने उनकोपीटना आरंभ कर दिया। लात-घूसों से पिटने के कारण गुरुजी काजबड़ा बाहर निकल आया। गुरुजी बुरी तरह घायल हो गए।

गुरुजी ने गिड़गिडाकर कहा, “दुष्ट पापी! मुझे मारने से कोईलाभ नहीं होगा। मेरे मरने के बाद ये सभी हीरे-मोती नष्ट हो जाएँगेऔर तुझे कुछ भी नहीं मिलेगा।”

मानसिंह के साथी अवसर मिलते ही हीरे-मोती लेकर भागनेलगे। तभी कुंदनसिंह ने भी उन पर हमला कर दिया। इस प्रकार दोनोंमें खूब झगड़ा हुआ। देखते-ही-देखते उनके सभी साथी मारे गए।

इसके बाद कुंदनसिंह और मानसिंह ने आपस में समझौता कर लियाऔर हीरे-मोतियों को किसी सुरक्षित स्थान पर गाड़ दिया।

इसके बाद कुंदनसिंह वहीं पर रुककर खजाने की देखभालकरने लगा और मानसिंह शहर से भोजन लेने चला गया। दोनों केमन में छल-कपट की भावना आने लगी। कुंदनसिंह ने सोचा कि जबमानसिंह भोजन लेकर आएगा तो मैं उसकी गरदन काटकर मौत के घाटउतार दूँगा। उधर मानसिंह विषयुक्त भओजन लाने की योजना बनानेलगा ताकि भोजन खाते ही कुंदनसिंह मर जाए।

जब मानसिंह भोजन लेकर आया तो कुंदनसिंह ने उसकी गरदनकाटी और स्वयं खाना खाने लगा। खाने में विष होने के कारणकुंदनसिंह के शरीर में विष फैल गया और वह मर गया। इस प्रकारसारा धन जमीन में गड़ा रह गया और किसी को कुछ भी नहीं मिला।

अपने स्वभाव के कारण ही दोनों डाकू लड़कर मर गए लेकिन गुरुजीसे कुछ भी हासिल न कर सके।

गीदड़ की चालाकी

एक बार कुछ लुटेरों ने चोरी करके बहुत-सा धन लूट लिया।

इसी खुशी को प्रकट करने के लिए वे चश्न मना रहे थे। उन्होंने रातमें मदिरा पी और माँस खाया। सभी लुटेरे स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठसाबित करने की सोच रहे थे। धीरे-धीरे उनका माँस समाह्रश्वत हो गया।

लुटेरों के सरदार ने और माँक खाने की इच्छा प्रकट की। किंतु रसोइएने स्पष्ट कह दिया कि अब माँश नहीं है।

लुटेरों के सरदार ने क्रोधित होकर कहा कि, “मुझे और माँसखाना है। कहीं से भी मुझे माँस लाकर दो।” सरदार को क्रोधितदेखकर रसोइए ने एक आदमी को माँश लाने के लिए जंगल में भेजदिया। वह आदमी माँस लेने के लिए जंगल में चला तो गया किंतुउसे इस बात की चिंता थी कि कहीं शेर उसे मारकर न खा जाए।

आधी रात में मुझे माँस कहाँ मिलेगा, यही सोचता हुआ वह शमशानके पास चला गया। उसके एक हाथ में कुल्हाड़ी थी और दूसरे हाथमें मशाल थी।

वह मन-ही-मन योजना बनाने लगा कि यदि मैं साँस रोककरजमीन पर लेट जाऊँ तो गीदड़ मुझे मरा समझकर झाड़ियों से बाहरनिकल आएँगे। फिर मैं उन गीदड़ों पर हमला करके उन्हें मालडालूँगा। वह आदमी तुरंत अपनी साँस रोककर जमीन पर लेट गया।

गीदड़ों ने उसे लेटा हुए देखा तो उसे मृत समझकर खुश होगए और सोचने लगे कि भगवान ने हमें आज तो बैठे-बैठाए ही भोजनदे दिया। गीदड़ों का सरदार बहुत चतुर था। उसने सभी गीदड़ों कोउस आदमी के पास जाने से रोकते हुए कहा, “जल्दी मत करो।

सच्चाई जाने बिना उस आदमी के पास जाना ठीक नहीं है।”

सरदार की बात सुनकर सभी गीदड़ रुक गए। गीदड़ों केसरदार ने सावधानी से उस आदमी के पास जाकर देखा तो उसकीसाँस चल रही थी। सरदार ने यह बात अपने साथियों को भी बतादी, “यह आदमी हमें धोखे से अपना शिकार बनाना चाहता है। इसकेपास कुल्हाड़ी भी है। तुम चिंता मत करो। मैं इसे सबक सिखाकरही रहूँगा।”

इतना कहकर सरदार चुपके से उस आदमी के पास गया औरउसकी कुल्हाड़ी अपने मुँह में दबा ली। उस आदमी ने गीदड़ के मुँहसे कुल्हाड़ी निकालने की बहुत कोशिश की किंतु कोई लाभ नहीं हुआ।

वह आदमी घबकार बैठ गया और अपने सामन काले-काले गीदड़ोंको देखकर डर गया।

उस आदमी ने सोचा कि मैं तो गीदड़ों को अपना शिकारबनाने आया था, लेकिन यहाँ तो गीदड़ ही मुझे अपना शिकार बनालेंगे। उस आदमी ने कुल्हाड़ी गीदड़ों पर मारने की कोशिश की,लेकिन गीदड़ों ने स्वयं को बचाते हुए कुल्हाड़ी पकड़ ली। गीदड़क्रोध से उस आदमी को देखने लगे और उलटकर उस आदमी परकुल्हाड़ी से वार किया।वह आदमी कुल्हाड़ी को अपनी ओर आता देखकर भय सेकाँपने लगा। वह सोचने लगा कि गीदड़ ऐसा कभी नहीं कर सकते,यह अवश्य ही भूत हैं। भूत का विचार मन में आते ही वह भय सेकाँपने लगा और वहाँ से भाग खड़ा हुआ।

उस आदमी को भागते देखकर सभी गीदड़ बहुत प्रसन्न हुएऔर अपने सरदार की बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे। सरदार नेअपनी बुद्धि की चतुराई से सभी गीदड़ों को मरने से बचा लिया।

मेहनत का फल

एक गाँळ में सभी लोग बहुत सुखी और संपन्न थे। किसीको किसी भी प्रकार का कोई दुःख नहीं था। देखते-ही-देखते उस गाँवको किसी की ऐसी नजर लगी कि अधिक वर्षा होने के कारण सबकुछनष्ट हो गया। अधिक वर्षा के कारण कुछ लोग मर गए और कुछ लोगोंका सामान तक पानी में बह गया। कच्चे मकान भी गिर गए। पूरागाँव ही तहस-नहस हो गया।

पूरे गाँव में दाताराम नाम का एक व्यक्ति ही बचा था। वर्षाहोने से पहले तो वह बहुत अमीर था लेकिन उसका भी सबकुछ नष्टहो जाने से वह भी गरीब हो गया। लेकिन भगवान की कृपा से उसकापूरा परिवार सुरक्षित था। धन खोने का उसे बहुत दुःख था, परंतु अपनेपरिवार को कुशलपूर्वक देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसकी पत्नीऔर दो छोटे बच्चे थे, जिन्हें अपने साथ लेकर दाताराम दूसरे शहरचला गया और शहर में किसी सेठ के यहाँ नौकरी कर ली। सेठबहुत दयालू था। उसने दाताराम को रहने के लिए एक मकान भी देदिया। दाताराम और उसका परिवार उस घर में खुशी-खुशी रहने लगा।

दूसरे दिन से ही दाताराम सेठ के पास काम करने चला गया।दोनों पति-पत्नी बहुत समझदार थे। जो कुछ भी उन्हें मासिक वेतनमिलता, वे उसमें से कुछ बचत अवश्य ही करते थे।बहुत दिन बीत जाने पर उन्होंने बचत किए गए रुपयों को देखातो वे बहुत खुश हुए। उन्होंने आशा से अधिक धन जमा कर लियाथा। उन्होंने उस धन से नया कारोबार करने का निश्चय कर लियाताकि आमदनी बढ़ जाए। उन्हें नए कारोबार में बहुत मुनाफा हुआ,जिससे वे फिर से अमीर बन गए। अब उनके परिवार का गुजाराअच्छी तरह से होने लगा। अपनी मेहनत के कारण ही उन्होंने जो कुछभी खोया था, उसे फिर से प्राह्रश्वत कर लिया।

अपनी लगन और मेहनत से ही मनुष्य संसार में सब कुछप्राह्रश्वत करता है। सच्चे मन से सभी कार्य करने चाहिए, तभी मनुष्यअपनी मंजिल प्राह्रश्वत कर सकता है।

जहरीले आम

बहुत पहले एक गाँव में आम का एक पेड़ था, जो बहुत हीपुराना था। उसी गाँव में सुल्तान नाम का एक व्यक्ति था, जो अपनेसमूह का मुखिया था। वह स्वयं अपने साथियों के पेड़ के नीचे बैठारहता और एक-दो साथियों को बाहर बैठा देता था।

बाहर बैठे हुए साथी जब किसी शिकार को फँसा लेते तो पेड़के नीचे बैठे हुए मुखिया को सूचित कर देते थे। एक दिन मुखियाने देखा कि एक सेठ आम खाता हुआ उन्हीं की ओर चला आ रहाथा। सेठ आम खाते-खाते ही बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। तभीसुल्तान के साथी बाहर से आए और सेठ को बेहोश देखकर बहुत खुशहुई। उन्होंने जल्दी-जल्दी सेठ की तलाशी ली और जेब से एक सौसोने की मुद्राएँ निकाल लीं। सुल्तान के पूरे समूह ने इस खुशी मेंमदिरापान किया और सो गए। उधर से आने-जाने वालों को आमखिलाकर लूटना ही सुल्तान और उसके साथियों का काम था। कभीवे उधर से आने-जाने वालों को लूटने में सफल हो जाते, तो कभीअसफल भी हो जाते थे।

फिर कई दिन तक उस रास्ते से कोई आदमी नहीं निकलातो सुल्तान और उसके साथी बहुत दुःखी हो गए। कई दिन बाद उसरास्ते एक दुःखी और बहुत परेसान आदमी गुजरा। उसे गाँव वालों नेभला-बुरा कहकर गाँव से निकाल दिया था।इसी दुःखी आदमी को देखकर सुल्तान और उसके साथी बहुतखुश हुए, क्योंकि वे उसे भी अपने जाल में फँसाना चाहते थे। सुल्तानके आदमियों को यह नहीं मालूम था कि पहले वाला सेठ तो इसीपेड़ के आम खाकर बेहोश हुआ था। लेकिन यह क्या? उस आदमी ने अपना रास्ता बदल दिया।यह सुल्तान के साथियों की तरफ नहीं आया, बल्कि सामने वाली दिशामें चला गया। यह देखकर सुल्तान के साथियों को बहुत दुःख हुआ।

वे अपने भाग्य को कोसने लगे कि आज का तो दिन ही खराब है।थोड़ी देर बाद चार व्यापारी आए और उसी पेड़ के नीचे बैठगए। वे पेड़ के नीचे आराम करना चाहते थे। सुल्तान के साथियों नेदेखा कि वे चारों व्यापारी उस पेड़ के पके हुए आमों को ललचाईआँखों से देख रहे हैं। वे व्यापारी आपस में कहने लगे, “कितने पकेहुए आम हैं? इन्हें देखकर तो खाने का मन कर रहा है?”

तभी एक व्यापारी पेड़ पर चढ़ गया और पके हुए आम तोड़-

तोड़कर जमीन पर गिराने लगा। जब वह पेड़ से नीचे उतर आया तोचारों व्यापारियों ने आम खाने शुरू कर दिए। आम का रस पेट मेंजाते ही बे सब बेहोश होने लगे। सुल्तान और उसके साथी व्यापारियोंको बेहोश होते देखकर प्रसन्न हो रहे थे। उन्होंने उन व्यापारियों केसारे रुपये निकाल लिए। ऐसे न जाने कितने लोग थे जो उस पेड़के आम खाकर बेहोश हो जाते थे।

कुछ लोग इस पेड़ की सच्चाई के विषय में जानते थे। गाँववालों ने एक पंचायत की और यह फैसला किया कि इस पेड़ कोजला देना ही उचित होगा क्योंकि इस पेड़ के आम खाकर मरने वालोंकी संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।

पंचायत के इस फैसले से सुल्तान के साथी बहुत दुःखी हुए।

उन्होंने पेड़ को जलाने की बात का विरोध भी किया, लेकिन पंचायतके सामने उनकी एक न चली। सभी गाँव वालों का पेड़ को जलानेका अटल निश्चय देखकर सुल्तान के साथियों को भी उन्हीं का साथदेना पड़ा। इस प्रकार उनके अरमानों का नाश हो गया।

ईमानदारी

बहुत पहले की बात है, किसी गाँव में श्रवण नाम का एकबहुत ही गरीब व्यक्ति रहता था। उसके पास रहने के लिए घर भीनहीं था। कोई छोटा-मोटा काम करके ही वह अपना गुजारा करता था।

ऐसी स्थिति में भी उसे किसी ने कभी भी दुःखी नहीं देखा था। वहहमेशा खुश रहता था। वह सच्चा और ईमानदार व्यक्ति था। वह कभीकिसी से झूठ नहीं बोलता था।

श्रवण स्वयं भी खुश रहता था और औरों को भी खुश देखनाचाहता था। कभी भी वह किसी का बुरा नहीं सोचता था। वह सभीसे अच्छी तरह बोलता था। सभी के प्रति उसका व्यवहार एक समानरहता था। वह सबकी सहायता करता था। वह राजा के दरबार में पानीपहुँचाने का काम करता था।

श्रवण अपनी जिंदगी से बहुत खुश था। एक दिन राजा केदरबार में पानी लेकर आते हुए उसे एक चाँदी का सिक्का मिला। उसनेबरतन जमीन पर रखे और वह सिक्का उठा लिया। उसे यकीन हीनहीं था कि उसके पास चाँदी का सिक्का है। सिक्का लेकर वह खुशीसे फूला न समाया। उसने अपने जीवन में पहली बार चाँदी का सिक्कादेखा था। कड़ी मेहनत करने के बाद ही उसे दो वक्त की रोटीमिलतीथी। उसे तो आशा ही नहीं थी कि वह कभी जीवन में चाँदीका सिक्का देख पाएगा। आज चाँदी का सिक्का पाकर उसकी खुशीका ठिकाना नहीं था।

बचपन में ही श्रवण के माता-पिता का देहांत हो चुका था। उसेबचपन से ही मेहनत-मजदूरी करनी पड़ी, ताकि दो वक्त की रोटी खासके। बड़ा होने पर वह भिश्ती का काम करने लगा। भिश्ती का कामकरने पर भी उसे रूखी-सूखी रोटी और फटे-पुराने वस्त्र ही पहनने कोमिलते थे। श्रवण अपनी इसी जिंदगी में खुश था।चाँदी का सिक्का मिलने से श्रवण नए-नए सपने देखने लगा।

अब उसे यह चिंता सताने लगी कि उसकी तो झोंपड़ी भी टूटी-फूटीहै, वह इस सिक्के को कहाँ रखे ताकि कोई चुरा न सके। सिक्के कोसुरक्षित रखने के लिए श्रवम बहुत ही चिंतित और परेशान था। अंतमें उसने सिक्के को राजदरबार के किले के पास वाले किले में छिपानेका निश्चय कर लिया। सिक्के को छिपाने के लिए उसे इससे सुरक्षितजगह दूसरी नहीं दिखी। इसलिए वह राजदरबार के पास वाले किलेमें पहुँच गया।

बहुत देर तक सोचने के बाद श्रवण ने दीवार में से एक इर्ँटनिकाली और सिक्का रखने के बाद इर्ंट को पहले के समान ही लगादिया ताकि किसी को कोई संदेह नहीं हो। इसके बाद श्रवण ने इर्ंटोंको गिनकर दीवार पर एक छोटा-सा निशान बना दिया ताकि जरूरतपड़ने पर वह उस सिक्के को निकाल सके। इसके बाद श्रवण किलेसे बाहर आया और उस दीवार का चित्र अपने दिमाग में अच्छी तरहसे बिठा लिया ताकि जीवन-भर कभी न भूल सके।

चाँदी का सिक्का मिलते ही श्रवण अपनी शादी के सपने देखनेलगा। वह सोचने लगा कि अब मैं गरीब नहीं हूँ, मेरे पास भी खजानाहै। मेरे साथ तो कोई भी अपनी पुत्री का विवाह कर देगा। सिक्के केमिलते ही उसे सारी खुशियाँ मिल गइर्ं। वह यही सोचता रहा कि एकसुंदर सी लड़की से विवाह करूँगा और हम दोनों सुख में रहेंगे। मेरीपत्नी मेरा बहुत ध्यान रखेगी और मेरा सारा काम करेगी। विवाह काविचार आते ही श्रवण की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

एक बार श्रवण के दोस्त ने उससे शादी की बात कही थी।बस फिर क्या था, श्रवण ने अपना काम पूरा किया और अपने दोस्तके घर चला गया। श्रवण ने अपने मित्र से दुआ-सलाम की ओरविवाह की चरचा आरंभ कर दी। श्रवण ने कहा, “मित्र! आपकी बातमेरी समझ में आ गई है। अकेले जिंदगी बिताना बहुत कठिन है। मैंनेशादी करने का निश्चय कर लिया है।”

श्रवण के दोस्त ने कहा, “मित्र! मैं कल ही तुम्हारे विवाह कीबात करने जाऊँगा और तुम्हारा रिश्ता पक्का करके ही लौटूँगा। तुमअपने विवाह की बात पक्की समझो।”

इस प्रकार श्रवण विवाह की बात पक्की करके अपने घर लौटआया। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। श्रवण को आज अपनेसारे सपने पूरे होते हुए नजर आ रहे थे। उसके मन में तो खुशी केलड्‌डू फूट रहे थे। तभी श्रवण के मित्र ने वहाँ आकर उसे गले लगायाऔर कहा कि एक सह्रश्वताह बाद उसकी शादी निश्चित कर दी है। श्रवणकी शादी की खबर धीरे-धीरे पूरे गाँव में फैल गई।

सबने श्रवण के विवाह में बहुत आनंद लिया और प्रेम सेउसकी सहायता भी की। गाँव वालों ने श्रवण को बहुत सारे उपहारभी दिए। पूरा गाँव उसकी शादी से बहुत खुश था। शादी के बादसभी रिश्तेदार अपने-अपने घर को चले गए। श्रवण की पत्नी उसेहर तरह से खुश रखने की कोशिश करती। पति-पत्नी अपनी नईदुनिया में बहुत खुश थे। दोनों आनंदपूर्वक अपना जीवन बिताने लगे।

श्रवण अपनी पत्नी पर बहुत भरोसा करता था। उसने चाँदी केसिक्के वाली बात अपनी पत्नी को बता दी। उसने अपनी पत्नी को यहभी बता दिया कि सिक्का उसने कहाँ छिपाया है। श्रवण की पत्नी ने कहा,“स्वामी! चाँदी का एक सिक्का मेरे पास है। आप भी अपना सिक्कानिकाल लाओ। हमारे पास अब दो चाँदी के सिक्के हो जाएँगे। दो सिक्केकम नहीं होते। हम भी अमीर हो गए हैं। अब हम हँसी-खुशी से रहेंगेऔर मौज-मस्ती करेंगे। घूमेंगे-फिरेंगे तो जीवन का मजा लेंगे। घर कासामान खरीदने के साथ-साथ कपड़े और गहने भी खरीद लेंगे।”

श्रवण ने अपनी पत्नी से कहा, “तुम जल्दी से तैयार हो जाओऔर मैं किले से अपना सिक्का लेकर आता हूँ। तुम किसी बात कीचिंता मत करना। मैं अभी गया और अभी आया।” इसके बाद श्रवणकिले की ओर चल दिया।अपना सिक्का लेने की धुन में वह तेजी से भागा जा रहा था।

यदि रास्ते में कोई मिल जाता तो उसे वह अनकेखा करता जा रहाथा। गरमी का मौसम था। उसका शरीर पसीने से भीग रहा था। वहसिक्का ही तो श्रवण का जीवन था। सिक्का लाने की जल्दी में वहकिसी से बात भी नहीं करना चाहता था।

उस राज्य के राजा ने तपती दोपहर में श्रवण को तेजी सेभागते हुए देख लिया। राजा को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। राजाने अपने दो सैनिकों को बुलाकर कहा, “जाओ, और इस लड़के कोशीघ्र पकड़कर लाओ। हम जानना चाहते हैं कि आखिर यह लड़काइतनी तेजी से क्यों भाग रहा है।”

राजा का आदेश पाते ही सैनिकों ने तेजी से दौड़ते हुए श्रवणको पकड़ लिया और बोले, “अरे युवक! हमारे साथ चलो। महाराजने तुम्हें बुलाया है।” सैनिकों से श्रवण ने कहा, “मैं बहुत मजबूर हूँ।

मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारे साथ इस समय नहीं चल सकता। मेरीओर से तुम महाराज से क्षमा माँग लेना।”

सैनिक श्रवण को डाँटते हुए बोले, “राजा की आज्ञा काउल्लंघन करने में तुम्हें तनिक भी भय नहीं लगता। अपने भविष्य केविषय में सोचो। महाराज यदि क्रोधित हो गए तो तुम्हें मृत्यु-दंड देदेंगे। हमारे बार-बार कहने पर भी तुम रुकने का नाम नहीं ले रहे।”

इतना कहकर सैनिक श्रवण को राजमहल में ले आए। श्रवण सारे रास्तेयही सोचता रहा कि मैं बेकार ही राजा और सैनिकों के बीच में फँसगया। वहाँ मेरी पत्नी सज-सँवरकर मेरा इंतजार कर रही होगी। हमेंजल्दी ही घूमने भी जाना है। फिर वह सोचने लगा कि कहीं मेरीशिकायत किसी ने राजा से तो नहीं करदी या मुझसे कोई गलती तोनहीं हो गई, जो राजा ने मुझे बुलाने के लिए सैनिक भेज दिए। श्रवणके मन में पूरे रास्ते तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे।

श्रवण ने राजदरबार में पहुंचते ही महाराजा को झुककर प्रणामकिया और कहा, “महाराज की जय हो।” इसके बाद राजा ने श्रवणका अभिवादन स्वीकार करके कहा, “तुम्हारा क्या नाम है और क्याकाम करते हो? हम जानना चाहते हैं कि इतनी तेज धूप में तुम क्योंभागे जा रहे थे?”

श्रवण ने डरते-डरते कहा, “महाराज! मेरा नाम श्रवण है। मैंएक भिश्ती का काम करता हूँ। राजमहल में भी मैं ही पानी पहुँचानेका काम करता हूँ। मैं अपने किसी निजी काम से भागा जा रहा था।

मैं भी आपकी प्रजा हूँ। मुझसे यदि कोई गलती हो गई हो तु मुझेमाफ कर दें?”

राजा ने श्रवण को समझाते हुए कहा, “तुमने कोई अपराध नहींकिया। तुम्हें धूप में तेजी से भागते देखकर हमने सोचा कि कही तुमकिसी मुसीबत में तो नहीं हो। राजा होने के कारण तुम्हारे दुःख कोदूर करना मेरा धर्म है। यदि तुम्हें कोई कष्ट है तो साफ-साफ बतादो। हम तुम्हारे दुःख को अवश्य ही दूर करने के कोशिश करेंगे।”

राजा के पूछने पर श्रवण ने कहा, “महाराज! किले की दीवारमें मैंने कुछ पैसे छिपाए थे। मैं उन्हीं पैसों को लेने के लिए जा रहाथा कि आपके सैनिक मुझे यहाँ पकड़ लाए। घर पर मेरी पत्नी मेराइंतजार कर रही होगी। कृपया बहुत देर हो गई है, अब मुझे जानेदीजिए।”

राजा ने कहा, “हम जानना चाहते हैं कि तुम्हारे पास कितनाखजाना है - लाख, दो लाख या फिर दस लाख।” श्रवण ने कहा,“महाराज! नहीं, मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है। आपको बतानेमें मुझे शरम आ रही है कि, कहीं आप रुपयों की संख्या सुनकर मुझेजंड न दे दें।”

राजा ने समझाते हुए कहा, “श्रवण! हम तुम्हें वचन देते हैंकि हम न तो क्रोध करेंगे और न ही तुम्हें दंड देंगे। तुम्हें डरने कीआवश्यकता नहीं है। केवल हम सच्चाई जानना चाहते हैं।” श्रवण नेडरते-डरते कहा, “महाराज! मेरे पास सिर्फ एक रुपया था। मैं उसीरुपये को लेने जा रहा था। कृपया आप मुझ पर यकीन कीजिए, मैंसच कह रहा हूँ।”

श्रवण के मुख से एक रुपये का नाम सुनते ही महाराजा जोर-जोर से हँसने लगे। श्रवण का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम देखकर राजाको बहुत खुशी हुई। राजा ने कहा, “श्रवण! तुम्हारे जैसे सच्चे औरईमानदार व्यक्ति इस दुनिया में बहुत कम होते हैं। तुम बहुत साहसीऔर बुद्धिमान हो। एक रुपये के प्रति तुम्हारी लगन और मेहनत केबदले हम तुम्हें अवश्य ही कुछ देना चाहते हैं।”

श्रवण ने कहा, “महाराज! पहले मुझे अपना एक रुपया लानेदीजिए। आपसे तो मैं बाद में आकर ले लूँगा।” इतना कहकर श्रवणकिले की दीवार से अपना एक रुपया निकाल लाया और सीधा राजाके पास पहुँच गया। राजा ने श्रवण की ईमानदारी देखकर उसेराजगद्‌दी सौंपने का फैसला कर लिया।

राजा के कोई औलाद नहीं थी। दूसरे दिन राजा ने सभा मेंश्रवण को राजगद्‌दी देने की घोषणा कर दी। यह सुनकर सभी दरबारीहैरान रह गए। राजा श्रवण को अपनी संतान के समान ही प्रेम करनेलगे थे। दरबारियों की नजरें श्रवण के चेहरे पर टिकी थीं। प्रजा मेंतरह-तरह की अफवाहें फैल चुकी थीं। उधर श्रवण भी अपने सपनोंमें खोया था।

तभी श्रवण ने राजा से आज्ञा ली और अपनी पत्नी से मिलनेचला गया। श्रवण ने अपनी पत्नी को सारी बातें बताते हुए कहा, “अबमैं कोई मामूली इनसान नहीं रहा। अब मैं राजा बन गया हूँ। चलोबाजार घूमने चलते हैं। राजा ने मुझे कुछ रुपये भी दिए हैं।”

इसके बाद श्रवण और उसकी पत्नी बाजार चले गए। दूसरेदिन श्रवण दरबारियों के साथ राजदरबार में हाजिर हो गया। राजा नेसबके सामने श्रवण को आधा राज्य देने का ऐसान कर दिया। तभीश्रवण ने कहा, “महाराज! राज्य के उ्रूद्गारी भाग में किला है, उसी किलेमें मेरा एक रुपया रखा था। मैं चाहता हूँ कि आप मुझे राज्य का उ्रूद्गारीभाग दे दीजिए।”

श्रवण की बात सुनकर महाराजा और सभी राजदरबारी जोर-जोर से हँसने लगे। राजा को खुशी इस बात की थी कि उन्होंने एकनेक और ईमानदार व्यक्ति को ही अपने राज्य का उ्रूद्गाराधिकारी चुनाथा, जिसे रुपयों का कोई लोभ नहीं था और वह राज्य की देखभालपूरी मेहनत, लगन और ईमानदारी से कर सकता था।

राजा बनने के बाद श्रवण और उसकी पत्नी सुखपूर्वक अपनाजीवन बिताने लगे। श्रवण को राज्य का संचालन करते देखकर राजाको बहुत ही खुशी होती थी।

पेड़ों की बुद्धिमानी

बहुत पहले की बात है कि एक बड़ा भयानक जंगल था। उसजंगल में लताएँ, झाड़ियाँ और बड़े-बड़े पेड़-पौधे थे। इस जंगल मेंएक स्थान पर दो बड़े-बड़े पेड़ थे। शेर, तेदुंआ, बाघ, चीता आदिइन पेड़ों की रक्षा करते थे।

जो शिकारी इनका शिकार करने आते तो ये जानवर उनकाही शिकार कर डालते थे। बाद में ये जानवर इन्हीं पेड़ों के नीचे बैठजाते और आराम से माँस खाते थे। बची हुई हड्डियों को ये जानवरइन्हीं पेड़ों के नीचे छोड़ देते थे। बाद में हड्डियाँ पड़ी-पड़ी सड़ जातीथीं और दुर्गंध आने लगती थी।

जंगली जानवरों को ऐसा करते देखकर दोनों पेड़ों को बहुतदुःख होता था। उन्होंने सोचा कि ऐसा करने से तो यहाँ का वातावरणही खराब हो जाएगा। उन दोनों पेड़ों ने आपस में बात करके यहनिर्णय लिया कि किसी तरह इन जानवरों को यहाँ से भगाना चाहिए।

अब यहाँ पर शुद्ध वायु भी नहीं मिल पाती। यदि ये जानवर यहाँसे चले गए तो हमें कम-से-कम शुद्ध वायु तो मिलेगी और यहाँ कावातावरण भी शुद्ध हो जाएगा।

उन दोनों पेड़ों ने जंगली जानवरों को भगाने का निश्चय करलिया। उन पेड़ों को इस बात का भी डर था कि जानवरों का पीछाकरते-करते मनुष्य का समूह यहाँ आ सकता है और हमें काट भी देगा।

पेड़ों ने सोचा कि वे इन जंगली जानवरों से नहीं डरेंगे, और उन्हेंयहाँ से भगाकर ही हम लेंगे।

तभी वहाँ पर बहुत तेज आँधी आई और दोनों पेड़ बहुत तेजहिलने-डुलने लगे। पेड़ों को हिलते देखखर सारे जानवर वहाँ से भागगए। जानवरों ने इससे पहले पेड़ों को कभी हिलते नहीं देखा था।

जानवरों के चले जाने के बाद पेड़ों ने चैन की साँस ली।

कुछ दिन के बाद वहाँ से दुर्गंध भी चली गई। अब पेड़ों केपास स्वच्छ वायु और अच्छा वातावरण हो गया। इस प्रकार पेड़ों नेअपनी बुद्धि से काम लेकर अपने आस-पास का सारा वातावरण अच्छाकर दिया।

यदि वे दोनों पेड़ अपनी बुद्धि का प्रयोग करके जोर-जोर सेन हिलते तो जंगली जानवर वहाँ से कभी न जाते और वहाँ पर दुर्गंधबनी रहती। पेड़ों को हमेशा इसी बात का खतरा बना रहता कि मनुष्यकभी यहाँ आकर हमें काट न ले।

मनुष्य हो या पशु-पक्षी हो, सभी को अपनी बुद्धि का प्रयोगजरूर करना चाहिए। बुद्धि का प्रयोग करके सभी बड़ी-से-बड़ी मुसीबतसे बच सकते हैं। हाथ पर हाथ रखकर खाली बैठने से कोई भी कार्यसफल नहीं होता।

पेड़ों ने जो अपनी बुद्धिमानी का परिचय दिया, उसी के कारणसारे जानवर डर गए और उन्हें वहाँ से भागने के लिए मजबूर होनापड़ा। पेड़ों की हिम्मत और बुद्धिमानी के कारण ही उन्हें स्वच्छ वायुऔर अच्छा वातावरण मिला।

मृत्युदायी फल

प्राचीन काल में किसी गाँव के बाहर मुख्य मार्ग पर एकविशाल वृक्ष था। उस वृक्ष पर लाल, गुलाबी तथा पीले रंग के बहुतही सुंदर फल आते थे। साथ ही वे थे भी बहुत स्वादिष्ट। लेकिन वेजहरीले थे, जो कोई भी उन्हें खाता, एक घंटे के अंदर ही मर जाताथा। इसलिए गांव वाले उधर से निकलते भी नहीं थे। उसी गांव मेंचार ठग भी रहते थे। उस मार्ग से जाने वाला कोई मुसाफिर उस पेड़के फलों को खाता और रास्ते में ही मर जाता तो वे ठग उसका माललेकर भाग जाते थे।

एक दिन उसी मार्ग से कुछ बैलगाड़ियों का काफिला निकला।उनका मालिक एक चतुर व्यापारी था। पहली बैलगाड़ी में बैठे चालकऔर कर्मचारियों ने उन रसीले फलों से लदे पेड़ को देखा और बहुतप्रसन्न हुए। एक कर्मचारी ने तो एक फल तोड़कर खा लिया जो उसेबहुत ही स्वादिष्ट लगा। उसके बाद वाली गाड़ी वालों ने भी उसकाअनुकरण किया।

उन गाड़ियों के बीच में एक बैलगाड़ी पर व्यापारीस्वयं भी सफर कर रहा था। व्यापारी ने जब आगे की बैलगाड़ी वालेको फल खाते देखा तो उसने चिल्लाकर कहा कि इन फलों को मतखाओ क्योंकि ये फल जहरीले हैं। उसने अपने अंगरक्षक को भी उन्हेंफल खाने से रोकने के लिए भेजा और कहा कि जिसने फल खालिए हैं, वे तुरंत मुँह में अँगुली डालकर उल्टी कर दें। सबने उसकीआज्ञा का पालन किया, लेकिन सबसे आगे वाली बैलगाड़ी वाले नेसबसे पहले फल खा लिया था, उसकी हालत खराब हो रही थी।

पेटमें मरोड़ उठ रहे थे तथा सिर चकरा रहा था।व्यापारी द्वारा सतर्क करने तथा उल्टी कराने से उसकी जानबच गई। लोगों ने व्यापारी से शिकायत की कि पता होने पर भीउन्होंने पहले क्यों नहीं बताया। व्यापारी बोला, “मुझे भी पहले नहींपता था क्योंकि मैं भी इस रास्ते पर पहली बार यात्रा कर रहा हूँ।

मैंने देखा फल रसीले तथा मीठे हैं। पास के गाँळ के लोग ऐसे पेड़ोंके फल कच्चे ही खा लेते हैं। मैंने इस प्रकार यह निष्कर्ष निकालाकि अवश्य ही ये फल जहरीले हैं।”

उस चतुर व्यापारी ने उस पेड़ को कटवा दिया जिससे कोईमुसाफिर धोखा न खाए।

परीक्षा

आयुर्वेद के सबसे बड़े ज्ञाता का नाम चरक है। हर वर्षसैंकड़ों छात्र उनसे आयुर्वेद का ज्ञान प्राह्रश्वत करने आते थे। वे पूर्णिमाकी रात में अपने शिष्यों के साथ जंगल में घूमते और उनको उनजड़ी-बूटियों को दिखाते थे जो केवल चांदनी रात में ही पहचानी जासकती थी। कुछ छात्र तो डरकर शिक्षा ही छोड़कर भाग जाते थे। चरकका मानना था कि मौत से डरने वाला वैद्य नहीं बन सकता।

क्योंकिवैद्यों का तो काम ही मौत से लड़ना और उस पर विजय प्राह्रश्वत करनाहै। उनकी परीक्षा इतनी कठिन होती थी कि बहुत कम छात्र ही उ्रूद्गाीर्णहो पाते थे। जो छात्र उ्रूद्गाीर्ण हो जाते उसका यश चारों और फैलताथा। लोगों को रोगों से मुक्ति दिलाते थे। एक बार आचार्य चरक नेअपने शिष्यों से कहा कि वह उन्हें एक महीने का समय दे रहे हैं।

इस समय उन्हें सारे जंगलों को छानकर उन वनस्पतियों को लाना थाजिनका आयुर्वेद में उपयोग नहीं होता है।सभी शिष्य चारों दिशाओं की ओर चल दिए, कुछ शिष्यों कोघास-फूस और कंटीली झाड़ियाँ मिलीं, वे उन्हें अपनी झोली में भरकरले आए। कुछ शिष्य वृक्षों की छाल और पि्रूद्गायाँ ले आए, तो कुछविद्यार्थी जहरीली फलियाँ व तने लाए, जिनके खाने से जीवों की मृत्युहो जाती थी। बीस दिन के बाद विद्यार्थियों ने अपनी लाई हुई वनस्पतिआचार्य चरक को दिखाई। लेकिन, आचार्य के चेहरे पर कोई भावनहीं आए। कुछ विद्यार्थियों को उन्होंने बताया कि अमुक चीज सेअमुक दवा बनती है।

उनतीसवें दिन तक आचार्य के सभी शिष्य वापस आ गए।केवल एक शिष्य रह गया था। अंतिम शिष्य तीसवें दिन खाली हाथवापस लौटा। वह एक भी वनस्पति न ला पाया था। उसे देखकर सभीशिष्य हंसने लगे। आचार्य ने उसकी ओर प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा।

वह बहुत विनम्रता से बोला, “गुरुदेव! सारे जंगल में मुझे कोई भीवनस्पति ऐसी नहीं मिली जो बेकार हो या आयुर्वेद के किसी कामन आती हो।” यह सुनकर आचार्य चरक ने घोषणा की, “इस वर्षबस यही विद्यार्थी उ्रूद्गाीर्ण हुआ है।

सबसे बड़ी मुसीबत

एक दिन किसी चोर एक धन सेठ के घर चोरी के इरादे सेगया। लेकिन उस समय तक सेठ-सेठानी जाग रहे थे और आपस मेंबातें कर रहे थे। चोर उनकी बातें सुनने लगा।

सेठ कह रहा था, “अधिक धन भी दुख का कारण होता है।

मन की शांति भी समाह्रश्वत हो जाती है।” सेठानी भी उसके विचारों सेसहमत थी और बोली, “चलो! यह सब छोड़कर काशी चलते हैं।”

सेठ ने कहा, “पर इस धन-संपि्रूद्गा का क्या करे? किसे दें?”

सेठानी ने सलाह दी, “ऐसा करते हैं कि कल नगर के गुरुकुल मेंचलते हैं। वहाँ जो विद्यार्थी सबसे पहले खड़ा मिलेगा, उसी को अपनीसंपि्रूद्गा सौंप देंगे।” सेठ को उसकी सलाह उचित लगी और वह सहमतहो गया। फिर वे दोनों सो गए। चोर ने सोचा कि अब चोरी करनाबेकार है। सेठ और सेठानी वैसे ही अपना धन देने वाले हैं। कलविद्यार्थी का वेश बनाकर सबसे आगे खड़ा हो जाऊँगा। सेठ-सेठानीमुझे ही अपनी संपि्रूद्गा दे देंगे।

दूसरे दिन विद्यार्थी का वेश बनाकर वह गुरुकुल के द्वार परसबसे पहले खड़ा हो गया। उसके बाद और विद्यार्थी आकर उसकेपीछे खड़े होते गए। तभी सेठ-सेठानी आए और उन्होंने उल्टी ओरसे विद्यार्थियों से पूछना शुरू किया।

सेठ-सेठानी ने पहले विद्यार्थी से उसका नाम पूछा और अपनापरिचय दिया।

फिर सेठ बोला, “मैं अपनी सारी संपि्रूद्गा तुम्हें देना चाहता हूँ।”

विद्यार्थी ने पूछा, “आप अपनी संपि्रूद्गा मुझे क्यों देना चाहते हैं?”

सेठजी ने उ्रूद्गार दिया, “हम जब अपना जीवन भजन-कीर्तनमें बिताना चाहते हैं। यह धन-दौलत मुसीबतों का जड़ है।” विद्यार्थीने चिढ़कर उ्रूद्गार दिया, “आप मुसीबतों की जड़ को मेरे गले में क्योंडालना चाहते हैं। आपको मैं ही मूर्ख नजर आया क्या?”

सेठ-सेठानी को सब विद्यार्थी यही उ्रूद्गार देते चले गए। अंतमें चोर की बारी आई उसने सेठ से कहा, “अगर आपने अपनी संपि्रूद्गा

सबसे पहले मुझे देने का प्रयत्न किया होता तो मैं तुरंत ले लेता। परअब मुझे समझ आ गई है। अब इस मुसीबत की जड़ को मैं भी

क्यों लूँ।” उस दिन से चोर ने चोरी का काम छोड़ दिया और उसगुरुकुल में ही भरती हो गया।

भविष्यवाणी

प्राचीन काल में एक ज्योतिषी था। जिसका नाम जगन्नाथ था।

सेनापति ने जगन्नाथ की प्रशंसा सुनी तो वह अपना हाथ दिखाने उसकेपास आया। जगन्नाथ ने हाथ देखकर गंभीरता से कहा, “सेनापति,

आपकी आयु तो केवल एक सह्रश्वताह शेष है।”

सेनापति यह सुनकर घबरा गया। उसने अपना हाथराजज्योतिषी गजानन को दिखाया और जगन्नाथ की भविष्यवाणी केविषय में बताया। गजानन बहुत ही धूर्त था। उसे ज्योतिष विद्या काबिलकुल भी ज्ञान नहीं था। हाथ देखने का नाटक करते हुए उसनेसेनापति से कहा, “जगन्नाथ की बात तो ठीक है पर मेरे पास मृत्युको टालने वाली सिद्धि है, तुम इसके विषय में किसी को मतबताना।”

गजानन ने सोचा कि यदि सेनापति मर जाता है तो भविष्यवाणीकी बात किसी को पता नही चलेगी। यदि नहीं मरता तो मेरी जय-जयकार होगी और जगन्नाथ को सजा मिलेगी। इस घटना के सातवेंदिन सेनापति की मृत्यु हो गई। जगन्नाथ यह देखकर परेशान हो गया।

उसने सोचा कि जगन्नाथ राजज्योतिषी बने, उससे पहले ही उसे रास्तेसे हटा देना चाहिए। गजानन राजा के पास जाकर बोला, “महाराज!हमारे राज्य में जगन्नाथ नाम का एक दुष्ट रहता है। वह ऐसा दुष्ट हैकि जो अशुभ बात मुँह से निकाल देता है, वह सच हो जाती है।

सेनापति की मृत्यु भी उसके अशुभ वचनों के कारण हुई है।”

राजा ने तुरंत जगन्नाथ को बुलाकर पूछा, “दुष्ट ज्योतिषी, अपनाहाथ देख और बता कि तेरी मृत्यु कहां और कब लिखी है?”

जगन्नाथ जान गया था कि राजा उसकी भविष्यवाणी गलतसाबित करना चाहता है। जगननाथ चतुर था। उसने अपना हाथ देखनेका नाटक करते हुए कहा, ‘महाराज! आश्चर्य है कि मेरी मृत्यु आपकीमृत्यु से एक दिन पहले होगी।”

राजा का क्रोध शांत हो गया। जगन्थ की चतुराई देखकरगजानन वहाँ से हट गया और राज्य छोड़कर चला गया। राजा ने जगन्थको ही राजज्योतिषी घोषित कर दिया।

भगवान की इच्छा

एक राजा के दरबार में तलवार लेकर एक कारीगर आया।

तलवार की तेज धार से राजा की अंगुली कट गई। राजा की अंगुलीसे खून बहने लगा। उन्होंने मंत्री से वैद्य बुलाने को कहा। मंत्री बोला,“भगवान जो भी करता है अच्छा करता है।” राजा को बहुत क्रोधआया और उन्होंने उसे दरबार से निकाल दिया।

अंगुली का जख्म भर जाने के बाद राजा एक दिन शिकारखेलने गये। दुर्भाग्य से वह अपने मंत्रियों से बिछुड़ गए और जंगलमें भटकने लगे।

उसी जंगल में एक डाकू रहता था। उसका नाम कर्काणसिंहथा। वह काली माँ का बहुत बड़ा उपासक था। राजा को एकेले घूमतेदेख उसके साथी उन्हें पकड़कर सरदार के पास ले गए।

डाकू ने घोषणा कि मैं कई दिनों से काली माँ को नर-बलिदेना चाहता था। आज इस राजा की बलि दी जाएगी। डाकुओं केपुजारी ने काली मंदिर में पूजा की। राजा को बलि देने के लिए वहांलाया गया। और एक पेड़ से बांध दिया।

अचानक पुजारी ने बताया, “इस व्यक्ति की अंगुली कटी हुईहै अतः इसकी बलि नहीं दी जा सकती।”

इस प्रकार राजा को बलि के अयोग्य समझकर छोड़ दियागया।

राजा ने दरबार में आकर तुरंत मंत्री को ढूंढकर लाने काआदेश दिया। मंत्री को ढूँढकर लाया गया। राजा ने उससे क्षमा माँगी।

राजा ने उससे पूछा, “तुम्हें दरबार से निकालने पर तुम्हारा क्या अच्छाहुआ?”

मंत्री ने कहा, “यदि आपने मुझे दरबार से नहीं निकालात होतातो मुझे ही आपके साथ शिकार पर जाना होता और मेरी ही बलि दीजाती। क्योंकि मेंरे सभी अंग पूरे हैं।”

राजा व सभी दरबारी उसकी बात सुनकर चकित हो गए।

भिखारी की पहेलियाँ

एक दिन महल के द्वार पर एक बूढ़ा भिखारी आया औरद्वारपाल से बोला, “राजा से जाकर कहो कि तुम्हारा भाई मिलने आयाहै।”

भिखारी की बात सुनकर द्वारपाल को बहुत आश्चर्य हुआ।फिर सोचा शायद कोई दूर के रिश्ते का भाई हो। यह सोचकर द्वारपाल

ने राजा को सूचना दे दी। राजा ने सुना और सोच में पड़ गया। उसेलगा कि भिखारी पहेली लेकर आया होगा। उसने भिखारी को दरबार

में बुला लिया। उसके बैठने के बाद राजा ने पूछा, “कहिए भ्राता, क्याहाल है?” भिखारी बोला, “हाल ठीक नहीं है। जिस महल में रहता

हूँ वह पुराना हो गया है कभी भी टूटकर गिर सकता है। मेरे ब्रूद्गाीसनौकर थे, वे भी एक-एक कर चले गए। पांच रानियां है, वे भी बूढ़ी

हो चुकी हैं जो मेरी सेवा नहीं कर पाती। मेरी कुछ सहायता कीजिए।”राजा ने मंत्री को बुलाकर सौ सिक्के देने को कहा। भिखारी

बोला, “सौ सिक्के तो बहुत कम हैं। मैं आपके पास बड़ी आशा लेकरआया हूँ।”

राजा बोला, “इस बार राज्य में सूखा पडड गया। उससेअधिक नहीं दे पाऊँगा।”

जब भिखारी रुपये लेकर चला गया तो दरबारियों ने राजा सेउसकी बातों का अर्थ पूछा। राजा ने बताया कि भिखारी बहुत चालाकथा। उसने सिक्के के दो पहलुओं के समान अनपे आप को मेरा भाईबताया। जिस महल में वह रहता है वह उसका शरीर है जो पुरानाहो गया है। कभी भी मृत्यु हो सकती है। उसके ब्रूद्गाीस नौकर उसकेदाँत थे जो सभी टूट चुके हैं। पाँच रानियां उसकी इंद्रियां है जोकमजोर हो चुकी हैं।

इस प्रकार राजा ने उस भिखारी की पहेलियों को सुलझाकरसभी दरबारियों व मंत्रियों को संतुष्ट कर दिया।

चिंता का रोग

किसी राजा के राज्य में अकाल पड़ गया। उस वर्ष उसकोलगान भी बहुत ही कम मिला। उसने कुछ मंत्रियों को भी अपने विरुद्धषड्यंत्र रचते सुना। इन सभी चिंताओं के कारण राजा को भूख नहींलगती थी और रात को नींद नहीं आती थी।

एक दिन उसके दरबार में उसके कुलगुरु (ऋषि) आए। राजाने कुलगुरु के सामने अपनी समस्या रखकर हल सुझाने के लिए कहा।

गुरु ने उसे समझाया, “बेटास यह सब राज-पाट की चिंता है। राज-पाट की चिंता छोड़ देने परतुम्हारी नींद और भूख दोनों वापस आजाएंगी।”

राजा को गुरु जी का यह सुझाव बहुत पसंद आया। उसनेअपना संपूर्ण राज-पाट कुलगुरु को सौंप दिया और स्वयं उस बंधनसे मुक्त हो गए। गुरु ने राजा से पूछा, “हे राजा! अब तुम क्याकरोगे?”

राजा ने उ्रूद्गार दिया कि वह अब व्यापार करेगा। उसने कुलगुरुसे राजकोष से व्यापार करने के लिए पचास हजार मुद्राएँ मँगवाई।

गुरु बोले, “राजा अभ यह राज और राजकोष मेरा है। तुमइसमें से धन नहीं ले सकते। मैं तुम्हें उसमें एक पैसा भी नहीं दूँगा।”

अब राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ। राजा ने कहा,“वह किसी दूसरे राज्य में जाकर नौकरी करेगा।” इस पर गुरु ने कहा,

“जब नौकरी ही करनी है तो दूसरे राज्य में क्यों मेरे राज्य में ही करो।

इस राज्य को चलाने के लिए मुझे एक नौकर चाहिए। तुम महलों मेंरहकर पहले के समान गद्‌दी पर बैठकर शासन चलाओ।” राजा नेयह शर्त मान ली। गुरु आश्रम चले गए। अब वह जिम्मेदारियों औरचिंताओं से घिरा राजा न होकर एक नौकर था। कुछ महनों बाद गुरुफिर आए। राजा ने गुरु के पैर छुए और आदर के साथ खड़ा रहा।

उसने गुरु जी को बताया कि वह खूब सोता है और खूब खाता है।

अब राजा को किसी बात की चिंता नहीं थी। गुरु जी बहुतप्रसन्न हुए। इसके बाद उन्होंने राजा को उसका राज्य सौंप दिया औरअपने आश्रम चले गए।

बलिदान

नदी के किनारे एक आम का पेड़ था। उस पर बंदरों कीएक टोली रहती थी। टोली का मुखिया बहुत ही समझदार था। आमका मौसम आते ही वह नदी के ऊपर की टहनियों के सारे बौर नष्टकरवा देता था, ताकि उन आमों का स्वाद कोई और न ले सके। एकवर्ष नदी के ऊपर फैली टहनियों में कुछ बौर रह गए जिनसे आमबन गए। जो आम लगे उन्हें मछुयारों ने खाया। इतने मीठे, स्वादिष्टऔर सुगंधित आम उन्होंने पहले नहीं खाए थे। उनका मुखिया कुछआम राजा के लिए ले गया। जो राजा को बहुत पसंद आए। मुखियाने बताया कि ये आम नदी के किनारे वाले पेड़ के हैं। राजा अपनेसैनिकों को लेकर उस पेड़ की खोज में चल दिया।

रात को पेड़ पर रहने वाले बंदर शोर मचाने लगे। जिससेराजा को बहुत गुस्सा आया और अपने सैनिकों को बंदरों को मारनेका आदेश दिया। वानरराज ने राजा की आज्ञा सुनी और बंदरों से कहाकि हमें सुबह ही इस पेड़ को छोड़कर कहीं सुरक्षित स्थान पर ाजनाहै। उसने नदी पार करने का हल भी सोच लिया। वह बंदरों को नदीकिनारे के एक पेड़ पर ले गया। वानरराज ने एक लंबी और मजबूतबेल को पेड़ की टहनी से बांधी और दूसरा सिरा अपने पैर से बाँधकरवानरराज ने छलांग लगाकर अंजीर की डाल पकड़ ली। लेकिनबेलछोटी रह गई। बेल तन गई। वानरराज का शरीर भी तन गया।

एक-एक करके सारे बंदर लता व वानरराज के शरीर से होकर नदीके पार उतरने लगे। वानरराज सारी पीड़ा सहता रहा। अंत में एकदुष्ट बंदर जो वानरराज को हटाकर खुद मुखिया बनना चाहता था उसनेबानरराज को एक जोर की लात मारी जिससे वानरराज के हाथ सेडाली छूट गई और वह एक पत्थर पर गिर गया। राजा यह दृश्यदेखकर तुरंद नदी पार करके प्राण त्यागते वानरराज के पास पहुँचा औरउसे अपनी गोद में उठाकर बोला, “हे वानरराज! तुम धन्य हो, तुमनेदूसरे बंदरों के लिए अपने प्राण त्याग दिए।” इस घटना से प्रभावितहोकर राजा ने शिकार करना छोड़ दिया और अपनी प्रजा की भलाईमें लग गया।

पंडित का मंत्र

एक समय की बात है कि एक गाँव में एक पंडित रहता था।

उसके पास धन-संपि्रूद्गा तो कोई नहीं थी। गाँव के कुछ बच्चों कोपढ़ाकर उनके माँ-बाप जो छोड़ा बहुत दे दें, उससे अपना गुजाराचलाता था। इस प्रकार वह गरीबी में जीवन बिता रहा था। हाँ, उसेवैदर्भ मंत्र आता था। वह मंत्र ऐसा चमत्कारी था कि उसे पढ़ने परआकाश से हीरे-मोती आदि जवाहरातों की वर्षा हो सकती थी। परवह मंत्र तभी पढ़ा जा सकता था, जब नक्षत्र, चाँद व सितारों का खासयोग बनता और वह योग वर्ष में केवल एक बार ही कुछ मिनटों केलिए बनता था। यह बताना कठिन है कि किस घड़ी में वह योगबनेगा, इसलिे बेचारा पंडित ऐसा चमत्कारी मंत्र जानते हुए भी उसकाफायदा न उठा पा रहा था। उस योग को पकड़ने के लिए कौन वर्ष-भर रात में आकाश को देखता रहता?

गरीबी से तंग आकर उसने शहर जाने का फैसला कर लिया।

उसके साथ उसका एक प्रिय शिष्य भी चल पड़ा। वह शिष्य अनाथथा, जो पंडित के साथ ही रहता था। गाँवसे काफी दूर आने पर पंडितऔर उसके चेले को एक घने जंगल में से गुजरना पड़ा। उस जंगलमें डाकुों के गिरोह रहते थे, जो मैका पाते ही उधर से जाने वालेयात्रियों को लूट लेते थे एक डाकू दल की नजर जंगल में जाते पंडितऔर चेले पर पड़ी। बस क्या था, डाकू उन दोनों पर टूट पड़े औरउनकी पोटलियाँ खोल डालीं। उसमे स्रूद्गाू के सिवा कुछ नहीं था।

डाकुओं ने दोनों की तलाशी ली। उन्हें एक फूटी कौड़ी भी नहींमिली। पंडित बोला, “डाकू सरदार जी! हमारे पास कुछ नहीं है। हमेंजाने दीजिए।”

सरदार बड़ा क्रूर था। उसने पंडित को एक पेड़ से बाँध दियाऔर बोला, “मेरा नाम फूँगासिंह है। मैं पत्थरों से तेल निकाल लेताहूँ। मैं तेरे घर वालों से पैसे वसूल करूँगा। अगर जिंदा रहना चाहताहै तो अपने चेले को गाँव भेजकर पाँच सौ रुपये मँगवा ले।”

पंडित बेचारा डरकर थर-थर काँपने लगा। चेले ने उसे धैर्यबँधाया, “गुरु जी! मैं गाँव जाकर कुेछ-न-कुछ इंतजाम कर ही लूँगा। आप चिंता न करो, एक-दो दिन में लौट आऊँगा। पर आप वैदर्भमंत्र के बारे में मत बताना। वरना डाकू आपको सदा के लिए बंदीबना लेंगे।”

चेला चला गया। रात आई। सरदियों के दिन थे, ठंड बढ़नेलगी। पंडित ठंड से ठिठुरने लगा।

भगवान से मदद माँगने के लिए पंडित ने आकाश की ओरदेखा तो चौंक उठा। आकाश में चाँऎद, सितारों व नक्षत्रों का वहमहायोग बन रहा था, जिसमें वैदर्भ मंत्र पढ़ जा सकता था। अपनी जानछुड़ाने के उतावलेपन में वह चेले की चेतावनी भूल गया। पंडित बोला,“सरदार! अगर मैं आकाश से जवाहरात की वर्षा कर दूँ, तो मुझे छोड़देंगे? मुझे वैदर्भ मंत्र आता है?”

पहले तो डाकू सरदार ने सोचा कि ठंड के मारे पंडित कादिमाग खराब हो गया है, फिर उसने सोचा कि इसकी बात आजमानेमें हर्ज क्या है। पंडित को खोल दिया गया। पंडित ने स्नान कियाऔर मंत्र पढने लगा। मंत्र समाह्रश्वत होते ही आकाश से प्रकाश की धारा-सी नीचे आई। उसी धारा के साथ जगमगाते हीरे, मोती, नीलम वमणियों की बौछार आ गिरी। डाकू खुशी से उछल पड़े। सरदार केआदेश पर डाकू जवाहरात चुनने लगे।

सारे जवाहरात चुनकर चद्‌दर में लपेटकर पोटली बाँधी हीजाने वाली थी कि एक और डाकू दल वहाँ आ धमका। दूसरे दलसे सरदार ने हवा में गोली चलाते हुए कहा, “यह सब जवाहरात हमारेहवाले कर दो।”

डाकू फूँगासिंह बोला, “भाई मोहरसिंह! इस पंडित को लेजाओ न। इसे वह मंत्र आता है, जिससे आसमान से हीरे-मोती कीवर्षा होती है। इसी ने तो यह वर्षा करवाई है।”

डाकू मोहरसिंह ने पंडित को दबोचा, ‘पंडित चल, हमारे लिएवर्षा करवा।”

पंडित हकलाया, “अब वर्षा नहीं हो सकती। मुहूर्त निकलगया है।”

क्रोधित मोहरसिंह ने अपनी तलवार पंडित की छाती में घुसेड़दी। उसके साथ ही दोनों डाकू दलों में युद्ध छिड़ गया। कई घंटे मारकाट चली। सभी डाकू मारे गए। केवल दोनों सरदार बचे जो आपसमें लड़ते रहे। दोनों बराबर की टक्कर के थे। दोनों बहुत थक गएतो हाँफता हुआ फूँगा बोला, “भाई मोहर! अब लड़ने का कोई फायदानहीं। सब मारे गए हैं। हम दो ही तो बचे हैं। आधा-आधा बाँट लेतेहैं।”

मोहरसिंह को भी यह बात जँच गई। वह मान गया। दोनोंडाकुओं ने सारे जवाहरात पोटली में बाँध लिए। उन्हें बहुत जोर कीभूख लग रही थी। थकान ने भूख और बढ़ा दी थी। उन्होंने फैसलाकिया कि पहले कुछ खाया जाए, फिर इत्मीनान से बैठकर जवाहरातका बंटवारा करेंगे। एक जवाहरात की पहरेदारी करेगा, दूसरा निकटकी बस्ती में जाकर खाना लाएगा। खाना लाने कौन जाएगा, इसकाफैसला सिक्का उछालकर हुआ। उन्होंने जवाहरात वाली पोटली एकपेड़ की खोह में छिपा दी। निकट ही मोहरसिंह मोरचा बाँधकर पहरेपर बैठ गया। फूँगासिंह खाना लाने चला गया। फूँगासिंह के जाते ही

मोहरसिंह ने सोचा, “फूँगासिंह को रास्ते से हटाकर सारे जवाहरात परअकेले कब्जा किया जा सकता है। मैं क्यों इसे हिस्सा दूँ। मैं घातलगाकर बैठूँगा। जैसे ही वह खाना लेकर लौटेगा, पीछे से हमला करकेएक ही वार में उसका काम-तमाम कर दूँगा।”

बस ऐसा निर्णय कर मोहरसिंह लौटने के रास्ते में एक बड़ेपत्थर के पीछे छिपकर प्रतीक्षा करने लगा। उधर बस्ती की ओर जाताफूँगासिंह सोचने लगा कि मोहरसिंह को यमलोक भेजकर सारे जवाहरातको हड़पा जा सकता है। आखिर मोहरसिंह का हक क्या है? वह दाल-भात में मूसलचंद की तरह आ कूदा था। फूँगे ने बस्ती में पहुँचकरखूब हलवा-पूरी खाई फिर मोहरसिंह के लिए हलवा-पूरी लेकर उसनेउसमें जहर मिला दिया और पोटली बाँधकर वापस लौटने लगा। जैसेही फूँगासिंह बड़े पत्थर के पास से गुजरा, उसके छिपे पीछे मोहरसिंहने पीठ की ओर से उसे भाला मारा। भाला दिल को चीरता हुआ छातीसे बाहर निकला। फूँगा वहीं ढेर हो गया। मोहरसिंह ने ठहाका लगाया,फिर वह फूँगासिंह का लाया खाना खाने बैठ गया। खाना खाते हीमोहरसिंह का सरीर ऐंठने लगा और वह तड़प-तड़पकर मर गया। जबपंडित का चेला वापस लौटा तो उसे वहाँ पंडित और डाकुों की लाशेंबिछी मिलीं। उसने माथा पीटा, “गुरु जी! तुमने डाकुों को मंत्र कीबात बताने की मूर्खता कर ही डाली। हाय!”

सोने का मृग

किसी समय बनारस नगर में एक अमीर व्यापारी रहता था।

उसका बेटा महाधनक अधिक लाड़-ह्रश्वयार के कारण बिगड़ गया औरनिकम्मा हो गया। कभी उसने काम सीखने का प्रयत्न नहीं किया। शादीके बाद सुधर जाएगा, यह सोचकर पिता ने उसका विवाह कर दिया,पर वह और भी निकम्मा हो गया। वह मौज-मस्ती में ही डूबा रहता।

व्यापारी की अचानक मृत्यु हो गई। सारे कारोबार का बोझमहाध नक पर आ पड़ा। उसे तो कुछ आता ही नहीं था। जमा-जमायाव्यापार नष्ट होने लगा। लोगों का पैसा डूब गया, घर खाली हो गया।

बीवी तंग आकर अपने पिता के पास चलीगई। लेनदारों ने तगादे करनाशुरू किया। कुछ समय महाधनक ने बहाने बनाकर उनको टाला। परकब तक? एक दिन सब लेनदारों ने उसे आ घेरा। उसने और कुछसमय की मोहलत माँगी। एक लेनदार, जिसने सबसे ज्यादा कर्द देरखा था, महाधनक का गिरेबान पकड़कर बोला, “सीधी तरह मेरे पैसेनिकाल वरना तेरा गला घोंट दूँगा। नालायक, झूठा कहीं का। कितनीबार मोहलत माँगेगा?”

कुछ दूसरे व्यापारी बोले, “हाँ, मारो-मारो बेईमान को।”

बूढ़ा व्यापारी, जो महाधनक के पिता का मित्र था, बोला,“देखो भाई, इसको मारने से पैसा डूब ही जाएगा। इससे पक्का वायदाले लो। सुनो, यह क्या कहता है।”

महाधनक को लज्जा तो आई ही थी, उसे गुस्सा भी आ गयाथा। वह नाटक करने लगा, “तुम्हारा पैसा मैं अभी चुकाता हूँ। सबहिसाब लगा लो कि किसने कितना पैसा लेना है और मेरे-पीछे-पीछेजाओ।”

अब जुलूस-सा चल पड़ा। आगे-आगे महाधनक और उसकेपीछे-पीछे दर्जनों लेनदार। वह शहर से बाहर आ गए तो एक ने पूछा,

“भई, तू हमें कहाँ ले जा रहा है।”

“नदी किनारे। वहाँ मैंने नदी के तल में खजाना छिपा रखाहै।” महाधनक ने उ्रूद्गार दिया।

सब नदी किनारे पहुँचे। वहाँ महाधनक ने सबको बताया किवह खजाना लेकर आएगा, किनारे खड़े होकर प्रतीक्षा करें। ऐसा कहकरवह नदी में कूद गया। धार में जाकर उसने पानी से सिर निकालकरआवाज दी, “भाईयों! अब मैं अगले जन्म में ही मिलूँगा। वहीं अपनेबही-खाते लेकर आना।”

वास्तव में तंग आखर महाधनक आत्महत्या कर रहा था। सारेलेनदार माथा पीटते हुए लौट गए। पर आत्महत्या करना इतना आसानथोड़े ही है, जो महाधनक जैसे कायर व निकम्मे के बस की तो थीही नहीं। गहरे पानी में पहुँचकर वह हाथ-पैर मारने लगा और बचाओ बचाओ चिल्लाने लगा। नदी के दूसरे किनारे पर साल के पेड़ों काघना वन था। उसमें रुरु नामक एक अलौकिक सोने का मृग रहताथा। उसका दिल भी सोने की तरह था, एकदम खरा। उसने किसीआदमी की सहायता के लिए पुकार सुनी तो नदी की ओर दोड़ पड़ा।

एक आदमी को डूबते देख वह पानी में कूद पड़ा और तैरता हुआउस तक पहुँचा और बोला, “मानव! घबरा मत। मैं आ गया हूँ। मेरीपीठ पर लद जा।”

महाधनक उसकी पीठ पर लद गया। स्वर्ण-मृग ने उसे किनारेलाकर उतारा। फेफड़ों से पानी निकल जाने पर महाधनक बोला, “हेसोने के मृग! मुझे बचाने के लिए अति धन्यवाद। मैं कैसे इसकाउपकार का बदला चुकाऊँ?”

सोने के मृग ने कहा, “बस यही उपकार करना कि मेरे बारेमें किसी को मत बताना। मानवों की दुनिया भोली है।”

महाधनक ने अपनी जिव्हा रुरु मृग के बारे में न खोलने कावचन दिया।

महाधनकनदी के पार के राज्य के एक कस्बे में जाकर रहनेलगा। उस राज्य की रानी बड़ी धर्मपरायण थी। एक रात उसने स्वह्रश्वनदेखा कि एक स्वर्ण मृग उसे बहुत अच्छे धार्मिक उपदेश दे रहा है।

आँख खुलते ही उसने राजा को जगाया और बोली, “महाराज! अभीमैंने एक विचित्र सपना देखा। एक स्वर्म-मृग मुझे उपदेश रहा था। क्याऐसे मृग वास्तव में होते हैं?”

राजा ने उ्रूद्गार दिया, “रानी! पूर्वजों को कहते सुना है कि ऐसेमृग होते हैं, पर कभी साक्षात्‌ नहीं देखा और न ही कोई ऐसा व्यक्तिमिला जिसने देखा हो।” रानी ने विनती की, “महाराज! अगर ऐसेमृग होते हैं तो ढूँढवाइये न। मैं चाहती हूँ कि ऐसे अलौकिक मृग केउपदेश सुनूँ।”

राजा ने आश्वासन दिया, “प्रिय! मैं पूरी कोशिश करूँगा।

यदि ऐसा कोई मृग है तो मेरी रानी को उपदेश देने उसे अवश्य आनापड़ेगा।”

बस, राजा के आदेश की देर थी कि सारे राज्य में मुनादीकरवा दी गई कि यदि कोई स्वर्ण-मृग के बारे में कुछ भी जानताहै तो उसे बहुत बड़ा पुरस्कार मिलेगा।’’ महाधनक ने यह घोषणा सुनीतो उसका बेईमान दिल डोल गया।

महाधनक राजा के पास जाकर बोला, “महाराज! मैं उस स्वर्णमृग को जानता हूँ। मैं आपको उसका पता बता सकता हूँ।”

राजा स्वयं महाधनक के साथ नदी के किनारे उस साल केवन के निकट गया। सैनिकों ने सारा वन घेर लिया और हाँक लगानेलगे। सैनिकों का हो-हल्ला सुनकर सोने का मृग वन से निकला औरराजा के पास आकर बोला, “राजा! अपने सैनिकों का हो-हल्ला बंदकरवाइए। इससे वन की शांति भंग हो रही है। दूसरे, मुझे यह बताइएकि आपको मेरा पता किसने बताया?”

मनुष्यों की तरह बोलते हिरण को देखकर राजा चकित रहगया। राजा ने अपनी बगल में खड़े महाधनक की ओर इशारा कियाकि पता इसने बताया है। तब राजा को हिरण ने सारी कहानी सुनाईकि कैसे महाधनक ने विश्वासघात किया है। राजा वहीं नीच महाधनकको मारने लगा तो हिरण ने रोका, “मैं इसकी हत्या का कारण नहींबनना चाहता। बस पहचान लीजिए, कभी इस पर विश्वास न करना।”

राजा ने हाथ जोड़कर रुरु से महल चलकर रानी को उपदेशदेने की प्रार्थना की। रुरु बोला, “मैं चलूँगा महाराज, पर एक शर्त पर।

अब से तुम्हारे राज्य में किसी जीव की हत्या नहीं होगी।”

राजा तुरंत मान गया। रुरु ने महल में जाकर रानी को अच्छी-अच्छी बातें बताइर्ं। राजा ने अपने राज्य में जीव-हत्या पर पूरी तरहसे रोक लगा दी। महाधनक को कोई पुरस्कार नहीं मिला।

वशीकरण मंत्र

प्राचीन समय की बात है, बनारस नगर में राजा ब्रह्मद्रूद्गा काराज्य था। उसी राजा का पुरोहित बहुत तंत्र-मंत्र जानता था। पर वहवशीकरण मंत्र अभी सिद्ध नहीं कर पाया था। एक दिन उसने वह मंत्रभी सिद्ध करने की ठान ली ताकि राजा भी उसके वश में रहे।

पुरोहित बनारस के पास एक घने जंगल में गया। वहाँ उसनेएक बड़े वृक्ष के समीप मृगछाला बिछाकर आसन लगाया और आँखेंमूँदकर मंत्र का जाप करने लगा। एक गीदड़ उसे देख रहा था। गीदड़को आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगा कि यह आदमी जंगल में इस तरहबैठकर क्या बड़बड़ा रहा है।

गीदड़ दबे पाँव ध्यानमग्न पुरोहित के निकट आया। उसनेपुरोहित का वशीकरण मंत्र सुना। बार-बार वही मंत्र दोहराया जा रहाथा। बार-बार सुनकर गीदड़ को भी वह मंत्र याद हो गया। वह भीपेड़ के दूसरी ओर जाकर वैसे ही बैठकर मंत्र जपने लगा। गीदड़देखना चाहता था कि ैसा करने पर होता क्या है। आखिर आदमी बिनाकिसी मतलब के कोई काम नहीं करता, कुछ-न-कुछ कारण जरूरहोगा। बस यही क्रम रोज चलने लगा। उधर पुरोहित आकर आसनपर बैठकर मंत्र जपना शुरू करता, इधर पेड़ के दूसरी ओर गीदड़उसी की नकल उतारता हुआ मंत्र जपता।

इक्कीसवें दिन जब पुरोहित ने १००८ वीं बार मंत्र पढ़ा तोअजीब घटना हुई। वायु में गड़गड़ाहट-सी हुई और प्रकाश चमका। एक देवता प्रकट हुए और बोले, “जाओ, तुम्हें सिद्धि मिल गई।”

फिर वह लुह्रश्वत हो गए। पुरोहित खुशी से नाचने लगा, “आहा! अब मैं वशीकरण मंत्र-सिद्ध बन गया। सब मेर इशारों पर नाचेंगे।” तब गीदड़ को पता लगा कि वह वशीकरण मंत्र था। पुरोहिततो चला गया। गीदड़ बोला, “भाई! जब देवता ने आशीर्वाद दियाथा तो उनका हाथ मेरी ओर भी उठा थ। मैं भी सिद्ध तो नहीं बनगया।” तभी वहाँ से उसे एक चीता जाता दिखाई दिया। गीदड़ नेमंत्र पढ़कर कहा, “ऐ चीते! वापस मुड़ और भाग।” उसके आश्चर्यका ठिकाना न रहा जब चीता मुड़ा और दुम दबाकर दौड़ गया। गीदड़नाचने लगा। अब वह वशीकरण मंत्र के बल परसभी जानवरों को वशमें करके राजा बन सकता था।

उसी समय वहाँ से एक अति सुंदर गीदड़ी गुजरी। गीदड़उससे बोला, “हसीना! मुझसे विवाह कर ले। मैं इस जंगल का होनेवाला राजा हूँ। रानी बनेगी तू। पता है मुझे वशीकरण मंत्र आता है।”

ऐसा कहकर उसने एक खरगोश को पंजों में जकड़े हवा मेंऊपर उड़ती चील से मंत्र पढ़कर कहा, “ऐ चील! यह खरगोश मेरेचरणों में डाल दे।” चील पर मंत्र का असर हुआ। वह मुड़ी औरउसने आकर खरगोश गीदड़ के पैरों में डाल दिया। गीदड़ी तोभौंचक्की रह गई। वह तुरंत उससे शादी के लिए राजी हो गई।

बस आनन-फानन में सारे जंगल में गीदड़ के मंत्र की बातफैल गई। सब उससे डरने लगे। किसी ने उसका विरोध किया तोउसने मंत्र पढ़कर उसे खरगोश बना दिया। अब सबके पास गीज़ड़को राजा स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं था। गीदड़ राजाबन गया और गीदड़ी रानी। दोनों जानवरों पर मनमाने हुक्म चलानेलगे।

जंगल का राजा बनने के बाद गीदड़ के दिल में और बड़ेअरमान उठने लगे। एक दिन उसने घोषणा की, “प्रजाजनों! इनसानने हमें बहुत सताया है। अभ हमारी बारी है। मेरे जैसा पराक्रमी राजाजंगल में आज तक पैदा नहीं हुआ, इसलिए अब हम मानवों को गुलामबनाएँगे।”

गीदड़ ने पहले बनारस नगर पर कब्जा करने का फैसलाकिया। बस गीदड़ की सेना चल पड़ी। बड़ी निराली शान थी। जंगलके सबसे बड़े हाथी पर शेर खड़ा हो गया। शेर की पीठ पर गीदड़और उसके पीछे गीदड़ी बैठी। इस प्रकार वह सेना के बीच में अगलही नजर आते थे। उनके आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ शेर, बाध, चीते वभेड़ियों की टोलियाँ थीं।

उनके पीछे गैंडे, जंगली सूअर, जंगली बैलऔर भैंसे थे। और पीछे जंगल के दूसरे जानवरों की बड़ी विशालसेना थी। रास्ते में उन्होंने कई गाँव उजाड़ दिए। खबर पाकर बनारसमें भगदड़ मच गई। नगर खाली हो गया। सब राजा के साथ किलेमें बंद होकर बैठ गए।

जंगली सेना किले के द्वार तक पहुँची। गीदड़ ‘हूँ-हूँ’ करकेललकारने लगा। राजा चिंतित हो गया। उसे समझ में नहीं आ रहाथा कि क्या किया जाए? क्या वह आत्मसमर्पण कर दे? पुरोहित कोखबर मिली तो वह राजा के पास गया। उसने राजा को कुछ उपायकरने का आश्वासन दिया। पुरोहित बहुत चतुर था।

पुरोहित किले के परकोटे पर आया। गीदड़ को देखते हीउसका माथा ठनका। उसे लगा कि उसे कहीं देखा है। गीदड़ नेचिल्लाकर कहा, “अपने राजा से आत्मसमर्पण के लिए कहो वरना हमकिले के अंदर घुसकर सबको मार डालेंगे।”

पुरोहित ने पूछा, “गीदड़ राजा! हम किले का द्वार नहीं खोलेंगेतो किले के भीतर कैसे घुस पाओगे?”

गीदड़ भभककर बोला, “मैं शेरों को दहाड़ने का आदेश दूँगा।

उनकी दहाड़ों से किलों की दीवारें भरभरा जाएँघी। फिर हाथी औरगैंडे टक्कर मारकर दीवारें गिरा देंगे।”

धमकी खतरनाक थी। पुरोहित ने सोचा कि इनमें फूट डालकरही बात बन सकती है। इसलिए उसने जानबूझकर गीदड़ को उकसाया,“लेकिन शेर और हाथी तो बहुत श्रेष्ठ जानवर हैं, वे एक तुच्छ गीदड़का आदेश क्यों मानेंगे?”

गीदड़ चिल्लाया, “मूर्ख! यह सब मेरे गुलाम हैं। मुझेवशीकरण मंत्र आता है। मैं जो आदेश दूँगा वह सबको मानना पड़ेगा।”

चालाक पुरोहित ने और उकसाने के लिए कहा, “यकीन नहींआता। अच्छा, जिस शेर पर आप बैठे हो, उसे दहाड़ने का आदेशदेकर दिखाओ।”

गीदड़ फीं फीं फीं करके हँसा और बोला, “अभी देख।”

गीदड़ ने आदेश दिया, “शेर! दहाड़ो।”

आदेश पाते ही शेर दहाड़ पड़ा। दहाड़ सुनते ही सब जानवरोंका स्वभाव जाग उठा। वशीकरण मंत्र का असर उड़ गया। नीचे वालाहाथी घबराकर बहक गया। वह भी चिंघाड़ उठा। उसके बहकते हीगीदड़ और गीदड़ी धड़ाम से नीचे गिरे, साथ ही शेर नीचे कूदा। बाकीशेरों से भी चुप नहीं रहा गया। वे सब भी दहाड़ उठे। जवाब में हाथीचिंघाड़े। चारों और भगदड़ मच गई।

बाघ, चीते व लकड़बघ्घे भी घबराकर गुर्राते हुए इधर-उथर,जिसकाजिधर सींग समाया, भागने लगे। इससे चारों ओर खलबली मचगई। छोटे जानवर बड़े जानवरों के पैरों के नीचे कुचले जाने लगे।

कुछ ही समय में हजारों जानवर मारे गए। बाकी जान बचाकर जंगलकी ओर भागे और अपनी जान की खैर मनाने लगे।

गीदड़ राजा तो हाथी के पैरं के नीचे आकर बुरी तरहकुचलकर मारा गया। गीदड़ी शेर को हवा में छलाँग मारते देख डरके मारे ही मर गई थी। राजा ब्रह्मद्रूद्गा, पुरोहित व दूसरे लोग यह सबतमाशा किले की प्राचीर से देखते रहे।

भाग्य और बुद्धि

एक दिन एक स्थान पर भाग्य व बुद्धि की मुलाकात हो गई।

दोनों बैठकर बातें करने लगे। बातें करते-करते उनमें बहस छिड़ गई।

भाग्य ने कहा, “मैं बड़ा हूँ। अगर मैं साथ न दूँ तो आदमी कुछ नहीं कर सकता। मैं जिसका साथ देता हूँ, उसकी जिंदगी बदल जाती है, उसके पास बुद्धइ हो या न हो।”

बुद्धि ने कहा, “उशके बिना किसी का काम नहीं चल सकता।

बुद्धि न हो तो केवल भाग्य से कुछ नहीं बनता।” आखिर में उन दोनों ने फैसला किया कि खाली बहस करने की बजाय अपनी-अपनी शक्ति का प्रयोग करके देखते हैं। पता लग जाएगा कि कौन बड़ा है।

वे दोनों एक किसान के पास गए। किसान गरीब था। वह अपनी कुटिया के बाहर बैठा अपनी किस्मत को रो रहा था। भाग्य ने कहा, “देखो, इस किसान के पास बुद्धि नहीं है। मैं इसका भाग्य बदलता हूँ। यह खुशहाल और सुखी हो जाएगा। तुम्हारी जरूरत ही नहीं पड़ेगी।”

किसान की कुटिया के साथ ही उसका एकमात्र खेत था। उसमें ज्वार बो रखी थी, जिसमें बालियाँ आ रही थीं।

इस बार उसने बालियों को निकट से देखा। बालियों में ज्वारके स्थान पर भाग्य के प्रताप से मोती लगे थे।

बुद्धिहीन किसान ने अपना माथा पीटा, “अरे इस बार तोसत्यानाश हो गया। ज्वार के स्थान पर ये पत्थर-कंकड़ से भला क्याउगर आए हैं।”

वह रोह ही रहा था कि उधर से उस राज्य का राजा औरउनका मंत्री गुजरे। उन्होंने दूर से ही ज्वार की वह खेती देखी। मोतियोंकी चमक देखते ही वे पहचान गए। दोनों बग्घी से उतरे और निकटसे देखा। वे तो सचमुच के मोती थे। दोनों बोले कि यह कितना धनीकिसान है, जिसके खेत में मोती ही मोती उगते हैं। मंत्री ने कहा,“भाई, हम एक बाली तोड़कर ले जाएँ?”

किसान बोला, “एक क्या सौ-पचास उखाड़ लो। पत्थर हीपत्थर तो लगे हैं इनमें।”

राजा ने मंत्री को कोहनी मारकर कान में कहा, “देखो, कितनाविनम्र है यह। अपने मोतियों को पत्थर कह रहा है।”

मंत्री ने कहा, “और दिल भी विशाल! हमने एक माँगा औरयह सौ पचास ले जाने के लिए कह रहा है।”

वे दो बालियाँ तोड़कर ले गए। बग्घी में बैठे राजा ने मोतियोंको हाथ में तोलते हुए कहा, “मंत्री! हम राजकुमारी के लिए योग्यवर ढूंढ रहे थे न। दूर क्यों जाएँ? यह किसान जवान है, धनी हैऔर कितना बड़ा दिल है इसका। मोतियों को पत्थर कहता है, क्याख्याल है?”

मंत्री बोला, “महाराज! आपने मेरे मुँह की बात छीन ली।”

मंत्री बग्घी से उतरकर किसान के पास आया। उसने किसानके हाथ पर एक अशरफी रखकर कहा, “युवक! हम तुम्हारा विवाहराजकुमारी से तय कर रहे हैं।”

किसान घबराया, “न...नहीं मालिक! मैं एक निर्धन किसानऔर...।”

मंत्री समझा कि विनम्रता के कारण ही वह ऐसा कह रहा है।

उन्होंने उसकी पीठ थपथपाकर उसे चुप करा दिया।

राजा के जाने के बाद किसान ने लोगों को बताया कि उसकीशादी राजकुमारी से तय हो गई है। सब हँसे। एक ने कहा, “अरेबेवकूफ! यह शायद तुझे मरवाने की चाल है। हम तो तेरे साथ नहींचलने के, कहीं हम भी न मारे जाएँ। अकेले अपनी बारात लेजाइयो।”

किसान को अकेले ही जाना पड़ा। राजा ने इसका बुरा नहींमाना। मंत्री ने उसे अपने घर ठहराया। वहीं से उसकी बारात गई औरधूमधाम से राजकुमारी के साथ उसकी शादी हो गई।

शादी हो जाने के बाद राजा ने दामाद को महल का ही एकभाग दे दिया। राजा के कोई पुत्र नहीं था, अतः वह दामाद को अपनेपास ही रखना चाहता था ताकि राजसिंहासन भी बाद में से सौंप सके।

राज-परिवार की परंपरा के अनुसार राजकुमारी वधू के वेश में सज-घजकर खाना लेकर रात को अपने पति के कक्ष में गई।

किसान ने इतनी सुंदरता से सजी और आभूषण से लदी कन्यासपने में भी नहीं देखी थी। वह डर गया। उसके मूर्ख दिमाग में अपनीदादी की बताई कहानी कौंध गई, जिसमें एक राक्षसी सुंदरी का वेशबनाकर गहनों से सजी-धजी पुरुषों को खा जाती थी। उसने सोचा कियह भी कोई राक्षसी है, जो उसे खाने के लिए आई है।

वह उठा और राजकुमारी को धक्का देकर गिराता हुआचिल्लाता बाहर की ओर भागा। भागता-भागता वह सीधे नदी के किनारेपहुँचा और पानी में कूद गया। उसने सोचा कि राक्षसी का पति होकरजीने से अच्छा मर जाना होगा।

राजकुमारी के अपमान की बात जान राजा आगबबूला हो गया।

राजा के सिपाहियों ने किसान दूल्हे को डूबने से पहले ही बचा लिया।

उधर राजा ने आदेश जारी कर दिया कि दूसरे दिन उसे मृत्यु-दंडदिया जाएगा।

बुद्धि ने भाग्य से कहा, “देखा, तेरा भाग्यवान बुद्धि के बिनामारा जाने वाला है। अब देख मैं इसे कैसे बचाती हूँ।” इतना कहबुद्धि ने किसान में प्रवेश किया। किसान को राजा के सामने पेश कियागया तो किसान बोला, “नरेश! आप किस अपराध में मुझे मृत्यु-दंडदेने चले हैं। मेरे कुल में मान्यता है कि विवाह के पश्चात पहली रातको यदि वर-वधू की जानकारी में कोई व्यक्ति नदी में डूब मरे तोवधू या तो विधवा हो जाती है या संतानहीन रह जाती है। जब मेरीपत्नी मेरे कक्ष में आई तो नदी की ओर से मुझे ‘बचाओ-बचाओ’की पुकार सुनाई दी। मैं अपनी रानी पर किसी अनिष्ट की आशंकासे ही काँप उठा और उठकर डूबने वाले को बचो के लिए भागा।

आप मुझे कोई भी दंड दें, मैं अपनी पत्नी के लिए कुछ भी करूँगा।”

उसकी बात सुनते ही राजा ने उठकर किसान को गले से लगा लिया।

पिता-पुत्री ने लज्जित होकर किसान से अपने असंगत व्यवहार के लिएमाफी माँगी। फिर बुद्धि ने मुसकराकर खिसियाए भाग्य की ओर देखा।

सेर को सवा सेर

एक गाँव में तीन भाई रहते थे। लंबी-चौड़ी हाँकने में उनकाजवाब नहीं था। बात से बात निकालना और गह्रश्वपें लड़ाना उनका कामथा। इस काम में तीनों गपोड़ी अपने को सबका गुरु मानते। एक बारतीनों भाई यात्रा पर निकले। रास्ते में वे एक सराय में ठहरे। उसीसराय में एक राजकुमार भी आ ठहरा। उसने कीमती वस्त्र तथा बहुमूल्यआभूषण पहन रखे थे। गपोड़ियों ने राजकुमार को अपने जाल मेंफँसाकर उसके वस्त्र-आभूषण लूटने की योजना बनाई।

उनमें से एक गपोड़ी राजकुमार से बोला, “महाशय! समयकाटने के लिए कुछ खेल-पहेली हो जाए तो कैसा रहेगा?”

राजकुमार राजी हो गया। दूसरे गपोड़ी ने सुझाया, “ऐसा करतेहैं कि हम बारी-बारी से गह्रश्वपें हाँकते हैं। किसी बी गह्रश्वप पर दूसराकोई विश्वास न करे तो विश्वास न करने वाला हारा माना जाए। उसेगह्रश्वप कहने वाले की गुलामी करनी पड़ेगी।”

राजकुमार शर्त मान गया।

गपोड़ी बहुत खुश हुए। उन्हें पूरा विश्वास ता कि वे ऐसीबेतुकी गह्रश्वप मारेंगे कि राजकुमार को विश्वास न करने पर मजबूर होनापड़ेगा। उसके मुँह से, ‘यह कैसे हो सकता है’, निकलवाकर रहेंगे।

उन्होंने सराय के मालिक को पंच बनने के लिए मना लिया।

बस महफिल जम गई। मुकाबला शुरू हुआ। पहले गपोड़ी ने गह्रश्वपमारी, “बचपन में हम लुका-छिपी खेल रहे थे कि मैं छिपने के लिएएक ताड़ के पेड़ पर चढ़ गया। वह ताड़ का पेड़ कम से कम सौमील ऊँचा था। मैं दौड़कर उसकी चोटी के प्रूद्गाों के बीच छिपकर बैठगया। मुझे वहीं नींद आ गई। जब आँख खुली तो देखा कि पेड़ इसबीच पचास मील और उग चुका है। नीचे उतरने की हिम्मत नहीं हुई।

मैं सोच ही रहा था कि पास से बादल का टुकड़ा गुजरा। मैं उसीमें घुस गया। जब उस बादल से पानी बरसने लगा तब जाकर पानीकी धार को रस्ती की तरह पकड़कर नीचे उतरा।”

राजकुमार केवल मुसकराया। गपोड़ी निराश हो गया। उसे पूरायकीन था कि राजकुमार विश्वास नहीं करेगा।

दूसरा गपोड़ी बोला, “एक बार मेरी गेंद एक झाड़ी में जागिरी। मैं अपनी गेंद ढूँढने झाड़ियों में घुसा, लेकिन मुझे अपनी गेंदकहीं नजर नहीं आई। बस एक जगह एक चूके का बिलमुझे दिखा।

मैं उसके भीतर चला गया तो क्या देखता हूँ कि वहाँ सैंकड़ों हाथी

बँधे पड़े हैं। उस बिल में रहे वाला चूहा हाथी-चोर था। मैंने उनहाथियों को मुक्त कराने का फैसला कर लिया।

हाथियों को पकड़कर अपनी जेबों में भरने के सिवाय सारेहाथी जेबों में आ गए तो मैं बाहर की ओर भागा। तभी हाथी-चोरचूहे ने मुझे देख लिया। वह तलवार लेकर मेरे पीछे आया। बिल सेबाहर आकर चूहे से पचने के लिए मैं उछलकर एक टिड्‌़डे की पीठपर सवार हो गया और उसे चाबुक मारी। टिड्‌डे ने आठ-दस लंबी-लंबी छलांगे मारीं और चूहा हाथ मलता रह गया।’’

राजकुमार ने सहमति के लिए सिर हिलाया, “हाँ, मैंने भी तुम्हेंटिड्‌डे पर जाते देखा था।”

दूसरा गपोड़ी भी असफल हो गया।

अब बारी तीसरे गपोड़ी की थी। वह बोला, “एक बार मैं नदीकिनारे घूम रहा था। वहाँ सारे मछुआरे इकट्‌ठे होकर रो रहे थे। मैंनेकारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नदी में एक भी मछली नहीं रहीहै। वे भूखों मर रहे हैं।

मैं इसका कारण जानने नदी में उतरा। पानी के भीतर मैं क्यादेखता हूँ कि एक व्हेल मछली सारी मछलियों को खा रही है। उसेदेखकर मुखे इतना गुस्सा आया कि मेरे गुस्से की गरमी से नदी कापानी गरम होने लगा। पानी गरम होने से व्हेल छटपटने लगी और पानीके ऊपर आकर हवा में उड़ गई। उसके उड़ने से पहले ही मैंने उसकीपूँछ पकड़ ली।

हम दोनों हवा में उड़ने लगे। व्हेल ने मुझे गिराने कीकोशिश की पर मैंने पूँछ नहीं छोड़ी। तभी मुझे एक बहुत बड़ी चट्‌़टानहवा में तैरती नजर आई। मैंने अपने पैर उस पर टिकाए और पूँछसे पकड़कर व्हेल को खूब घुमाकर समुद्र की ओर फेंक दिया। इसप्रकार मैंने उस व्हेल से मछुरारों को निजात दिलाई।’’

राजकुमार ने ताली बजाई, “तुमने बहुत बहादुरी का कामकिया।”

तीनो गपोड़ी असफल हो गए थे। उनके मुँह उतर गए। पंचने कहा, “राजकुमार, अब तुम अपनी गह्रश्वप सुनाओ।”

राजकुमार ने कहा, “ठीक है। अब मेरी कहानी सुनो। मैं एकदेश का राजकुमार हूँ। मेरे पास तीन गुलाम हैं। मैंने उन्हें महँगे दामदेकर खरीदा था। एक दिन वे तीनों मुझे धोखा देकर भाग निकले।

तब से मैं घूम-घूमकर उन्हें तलाश कर रहा हूँ। आज फिर वे मुझेलिए गए।”

एक गपोड़ी ने पूछा, “कैन हैं वे?”

राजकुमार मुसकराया, “तुम तीनों ही तो वे गुलाम हो।”

अब गपोड़ी फँस गए। अगर राजकुमार की बात नहीं मानतेतो शर्त हार जाते हैं और राजकुमार के गुलाम बन जाते हैं। अगरराजकुमार की गह्रश्वप स्वीकार करते हैं तो गुलाम हैं ही।

पंच ने निर्णय दिया कि गपोड़ी भाई हार गई हैं और वे अबराजकुमार के गुलाम होंगे। गपोड़ी बहुत सिटपिटाए और राजकुमार सेक्षमा-याचना करने लगे। अंत में राजकुमार ने कहा, “मैं तुम्हें एक शर्तपर मुक्त करता हूँ, वह यह कि आगे से ऊलजलूल बातें बनाकर गाँववालों को न उठाना।”

गपोड़ी भाइयों को वचन देना पड़ा।

निर्दयी सास

एक सास थी, स्वभाव की बहुत दुष्ट। उसकी बहू बहुत सुशीलव नेक थी। सास ने उसका जीना हराम कर रखा था। वह उसकीहर बात में दोष निकालती। भोर से आधी रात तक वह बहू से गुलामोंकी तरह काम करवाती, एक मिनट के लिए साँस तक न लेने देती।

बहू काम कर रही होती तो वह उसके ऊपर खड़ी होकर लगातार तानेकसती रहती। वह खटते-खटते यही सोचती कि जाने किन पापों केफलस्वरूप ऐसी निर्दयी सास उसे मिली है।

एक दिन बहू ने झाडू लगाना व बरतन माँजना समाह्रश्वत ही कियाथा कि सास बोली, “मैं मंदिर जा रही हूँ। तू आराम करने न बैठजाना, कामचोर कहीं की। मेरे आने तक खाना तैयार मिलना चाहिए।

और हाँ, खाना हिसाब से बनाना, फालतू नहीं। यहाँ तेरे बाप का मालनहीं है।”

सास चली गई। बहू तुरंत खाना बनाने बैठ गई। अगर सासको लैटने पर खाना तैयार न मिलता तो वह आसमान सिर पर उठालेती, बहू की सात पुश्तों को कोस डालती। वह खाना बनाकर निवृ्रूद्गाही हुई थी कि एक साधु आया और खाना माँगने लगा। बहू के मायकेमें कभी किसी साधु-महात्मा को खिलाए-पिलाए बिना नहीं लौटायाजाता था। उसने सोचा कि साधु को अपने हिस्से का खाना दे देतीहूँ। मैं भूखी रह लूँगी और क्या। ऐसा विचार कर उसने साधु को

बिठाया और खाना परोसा। साधु ने खाना आरंभ ही किया था कि सासलौट आई। साधु को खाना खाते देखकर वह आगबबूला हो गई औरबोली, “अहा! मैं इधर-उधर हुई नहीं और तूने भूखों को खानाखिलाकर अनाज बरबाद करना शुरू कर दिया। हमारे घर में हराम कामाल नहीं है।”

बहू ने विनती की, “माँ जी! ऐसा न कहिए। साधु महाराजको मैं अपने हिस्से का खाना दे रही दूँ। मैं नहीं खाउँगी। कोई अनाजबरबाद नहीं होगा।” सास गरजी, “बड़ी आई हिस्से वाली।” फिर वहसाधु से बोली, “भुक्खड्‌़, भाग यहाँ से। कोई और लंगर देख।” साधुखाना छोड़कर चला गया। साधु के जाने के बाद सास ने बहू को घरसे निकाल दिया।

बेचारी बहू ने सास से बहूत विनती की, हाथ जोड़े औरगिड़गिड़ाई, पर दुष्टा सास का दिल नहीं पसीजा। उसने दरवाजा नहींखोला। जब दरवाजा पीट-पीटकर बहू थक गई तो वह एक ओरलड़खड़ाती रोती हुई चल दी।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि किधरजाए। उसे मायके पहुँछने में कई दिन लगने थे, लेकिन वह उसी रास्तेचल दी, और क्या करती? तभी जोरों की वर्षा होने लगी। बहू वर्षासे भीगने से बचने के लिए एक बड़े वृक्ष के कोटर में घुसकर बैठगई। उस पेड़ पर दो राक्षसियाँ रहती थीं। कुछ ही देर बाद वे वृक्षपर लौटीं। एक बोली, “हर्‌र्र! यहाँ तो बड़ी वर्षा हो रही है। हमेंजुकाम न हो जाए।” दूसरी बोली, “तो चल स्वर्मद्वीप चलते हैं, वहाँधूप खिली होगी।” उनके जादुई मंत्र पढ़ते ही वृक्ष हवा में उड़ने लगा।

बहू ने वृक्ष को उड़ते देखा तो घबरा गई। ऊपर टहनियों पर राक्षसियोंको बैठे देख तो उसकी सिट्टी-पिट्टी ही हुम हो गई। उसने कोटर मेंदुबककर बैठे रहने में ही अपनी भलाई समझी। कुछ देर बाद पेड़ उनसबको लेकर स्वर्मद्वीप पहुँच गया।

राक्षसियाँ तो सैर करने के लिए हवा में उड़ती हुई वृक्षछोड़कर चली गइर्ं। बहू ने कोटर से बाहर झाँककर देखा तो दंग रहगई। सारा द्वीप सुनहरी जगमगाहट से चमक रहा था। वह बाहरनिकलआई और उसने रेत उठाकर देखा। रेत सोने की थी। उसनेअपने आँचल में जितनी सोने की रेत उठाई जा सकती थी, बाँधी औरकोटर में बैठ गई। कुछ दिन बाद राक्षसियाँ लौट आई और वे पेड़को उड़ाकर वहीं ले आई, जहाँ से वे चलीं थी।

राक्षसियों के जाने के बाद वह बाहर आई और अपने घर कीओर दोड़ी। उसे पूरा विश्वास था कि सोना देखकर सास ललचा जोगऔर उसे दोबारा अपना लेगी। घर पहुँचकर उसने सास को सारीकहानी सुनाई और आँचल खोलकर सोने की रेत दिखाई। सास ने हाथोंमें लेकर रेत को देखा, फिर बहू को कोसने लगी, “अरी कामचोर,बस इतना सा सोना उठाकर लाई? जब मौका मिला ही था तो ढेरसारा ढोकर लाती। अकल हो तब न। बोझ उठाते ही नानी मरती हैतेरी।”

फिर सास ने तीन-चार बोरियाँ उठाई और बोली, “मैं दिखातीहूँ तुझे कि सोना कैसे लाया जाता है। जरा मुझे बता, वह पेड़ कहाँहै?”

बहू ने ले जाकर सास को वह पेड़ दिखा दिया। सास बोरियाँलेकर वृक्ष के कोटर में बैठ गई। कुछ देर बाद राक्षसियाँ सैर करकेअपने पेड़ पर लौटीं। एक राक्षसी ने कहा, “आज मछली खाने काबड़ा जी कर रहा है, चल मछली-द्वीप चलें।” दूसरी राक्षसी ने मंत्रपढ़ा और पेड़ उड़ चला। कुछ ही देर में पेड़ मछली-द्वीप पहुँचा।

मछली द्वीप में चारों ओर मछलियाँ ही मछलियाँ थीं। राक्षसियाँ तोमछलियाँ खाने द्वीप के दूसरे इलाके में चली गइर्ं। सास कोटर से बाहरआई। बाहर पैर रखते ही मछलियों पर से उसका पैर फिसला औरवह गिर पड़ी। मछलियों की बदबू से उसका सिर चकरा गया। किसीतरह वह गिरती-पड़ती और राक्षसियों को कोसती वापस कोटर में आबैठी। कहाँ तो वह सोना बटोरने आई थी और कहाँ उसे खोटा सिक्काभी नसीब नहीं हुआ। राक्षसियों के उड़कर आने की आवाज आई तोसास कोटर से सिर निकालकर चिल्लाने लगी, “अरी निकम्मीराक्षसियों! तुम यहाँ क्यों आइर्ं? अभी जल्दी से स्वर्णद्वीप चलो। मुझेसोना बटोरना है।”

सास की बात सुनकर राक्षसियाँ क्रोधित हो गइर्ं। एक बोली,“एक तो यह दुष्ट औरत हमारे पेड़ की सवारी करके हमें धोखा देकरयहाँ आई, दूसरे ऊपर से हमें बुरा-भला कह रही है।”

दूसरी बोली, “चलो, अग्निद्वीप चलकर इसे सबक सिखातेहैं।”

उनके मंत्र पढ़ते ही पेड़ अग्निद्वीप की ओर उड़ चला। कुछही देर में व एक ऐसे द्वीप के ऊपर उड़ने लसगीं, जहाँ नीचे आगही आग थी। राक्षसियों ने पेड़ को उलटा-सीधा करना शुरू कियाताकि सास नीचे गिर जाए। जब राक्षसियों ने पेड़ को उलटा कर दियातो निर्दयी सास कोटर के नीचे आग की लपटों में चिल्लाती हुई जागिरी। राक्षसियों ने अट्‌टहास लगाया।

समय बड़ा बलवान

काशी नगरी एक बहुत ही सुंदर नगरी थी। उसी में सुखरामनाम का एक सेठ रहा करता था। वह बहुत कम खर्च करना पसंदकरता था। वह महाकंसूज किस्म का व्यक्ति था। उसका उसूल था,“चमड़ी जाए, लेकिन दमड़ी न जाए।”

उसे जितना मोह, माया से था काया से न था। उसके पासकाफी दैलत ती। उसके जीवन में किसी चीज का अभाव न था। घरसे बाहर जाते समय भी सेठ जी को धन-दौलत की ही चिंता सतातीरहती। वे सोचते, “घर में रखे धन का क्या होगा? कोई उसे चुरातो न लेगा? घर वालों ने कहीं खर्च कर दिया, तो क्या करूँगा?

पत्नी ने गरीबों को दान दे दिया, तो क्या होगा?”

कंजूसी के कारण वह ठीक से खा-पीन नहीं पाता था। भोजनकरते समय भी वह यही सोचता रहता, “उससे लेना है... उसे देनाहै... उससे लेकर हम यह करेंगे... फिर वह करेंगे।”

इस प्रकार सेठ का मन खाने-पीने में कम तथा धन की ओरअधिक लगा रहता था।

एक बार उन्हें किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा। वहकिसी परदेशी से कर्जा वसूलने गए थे। यहाँ भी उन्हें घरकी चिंताखाए जा रही थी। वह तेजी से घर की ओर भागा आ रहा था किमार्ग में एक भिखारी मिला। भिखारी ने सेठ जी को देखकर कहा,“सेठ जी! भगवान के नाम पर कुछ दे दो।... गरीब को कुछ खानेको दे दो। दो दिन से भूखा हूँ सेठ... तुम्हारे बिगड़े काम बनेंगे।...

एक रुपया देगा, एक लाख मिलेगा।” भिखारी सेठ जी के कदमों कोपकड़कर बैठ गया।

सेठ ने कहा, “अरे ओ कंगले! छोड़ मेरे पैर, मुझे जाने दे।”

“सेठ! भगवान के नाम पर कुछ तो दे दे।”

“क्यों, मेरे पास क्या हराम का आ रहा है, जो तुम्हें दे दूँ।”

भिखारी की दृष्टि, सेठ के हाथों में पहनी हीरे की अँगूठीपरथी, जो बहुत चमक रही थी।

“अरे तू क्या देख रहा है?”

“देख रहा हूँ कि आप इतने धनवान हैं, फिर भी दान नहींकरते, जिसके पास धन हो, उसे दान आवश्य करनाचाहिए सेठ जी।

किसी ज्ञानी ने कहा है कि“चिड़ी चोंच भर ले गयी, नदी न घटियों नीर,दान किए धन न घटे, कह गए दास कबीर।’’

“तू मुझे ऐसा पाठ पढ़ा रहा है, जिससे धन जाता है, मुझे तोऐसा पहाड़ा पढ़ा - जिससे कि धन आता रहे... आता ही रहे।”

एक मजबूर और बेबस इनसान कर भी क्या सकता है? वहचुपचाप मुँह लटकाकर बैठ गया और अपने भाग्य पर आँसू बहाने

लगा।

सेठ सुखराम जैसे ही आगे बढ़ा, उसे एक हलवाई की दुकानपर जलेबियाँ बनती नजर आइर्ं। उसने सोचा, “यदि सबके सामनेजलेबी खाता हूँ, तो कोई मिलने वाला देख लेगा, यदि वह मेरी बराबरमें आकर खड़ा हो गया, तो सी भी खिलानी पड़ेगी। घर ले जाकरखाता हूँ, तो बच्चे व बड़े सभी मुझे लिपट जाएँगे और जलेबियाँ माँगनेलगेंगे।”

अंत में उसने हलवाई के नौकर को अपने पास बुलाकर कहा,“देखो भाई! मुझे एक रुपये की जलेबी लाकर दे दो। किसी कोपताल न चले, छिपाकर लाकर मुझे दे दो।”

सेठ जी से रुपया लेकर नौकर जलेबी लेने चला गया। जिससमय सेठ सुखराम जलेबी खाने की अपनी योजना पूरी करने जा रहाथा, ठीक उसी समय उसका हमशक्ल आदमी राजा के दरबार मेंपहुँचा। उसकी शक्ल और सुखराम की शक्ल में कुछभी तो फर्क नहींथा।

यदि दोनों को एक जगह पर खड़ा कर दिया जाता, तो यहीकहना पड़ता कि ये दोनों जुड़वाँ भाई ही हैं। इनकी अलग-अलगपहचान बहुत ही कठिन थी।

राजा के पास आने वाले आदमी ने आते ही सबसे पहले राजाको प्रणाम किया।

राजा ने पूछा, “कैसे आना हुआ सेठ जी?”

“राजन! यदि आप मुझे मेरा थोड़ा-सा धन गरीबों और दीनदुखियों को बाँटने की इजाजत दे दें, तो मेरी आत्मा को शांति मिलजाएगी।”

“यह तुम क्या कह रहे हो सेठ जी? क्या ऐसा भी होता हैकि इस संसार में लोग अपनी खून-पसीने की कमाी को यूँ लुटा दे?”

“जी हाँ महाराज! मेरी हार्दिक इच्छा यही है।”

“देखो सेठ! हमें तो अब भी विश्वास नहीं हो रहा कि कोईअपनी कमाई हुई दौलत को अपने ही हाथों से बाँठना शुरू कर दे।”

इतनी बात कहकर वह आदमी राजदरबार से बाहर निकलगया। वहाँ से निकलकर वह सीधा सुखराम के घर पहुँचा। मालिकको इतने दिनों के बाद घर में आते देखकर सभी नौकर-चाकर औरघरवाले बारी-बारी से प्रणाम करने लगे। सेठ जी हँसकर हाथ जोड़तेहुए उनके इस प्रणाम का उ्रूद्गार दे रहे थे।

वास्तव में वह असली सुखराम नहीं था, बल्कि उससे मिलता-जुलता उसी का दूसरा रूप था, जिसे कोई भी पहचान नहीं पा रहाथा। उसने घर में आते ही नौकर को आवाज दी, “बाबू!”

“जी सेठ जी!” नौकर भागा हुआ आया।

“देखो बाबूराम! हमें अभी-अभी यह सूचना प्राह्रश्वत हुई है किहमारी शक्ल का एक आदमी इस शहर में घुम रहा है।”

“तो फिर, मेरे लिए क्या हुक्म है?”

“तुम्हें उस आदमी का पूरा ध्यान रखना है। कहीं वह भूलेसे हमारे घर में न घुस आए।”

“ऐसा नहीं होगा मालिक! भला कोई हमारे घर में जबरदस्तीकैसे घुस जाएगा?”

नौकर को समझाने के बाद नकली सेठ ने पत्नी को अपनेपास बुलाया। वह बेचारी सदैव की भाँति डरी-सहमी-सी उसके करीबआ गई।

“अरी लक्ष्मी! तुम इतनी डर क्यों रही हो हमसे? हम तुम्हारेपति हैं, कोई शत्रु नहीं?”

“हाँ प्राणनाथ! आप तो मेरे भगवान हैं, नारी का भगवान तोउसका पति ही होता है।”

“अपने भगवान के होते हुए भी यह फटी हुई साड़ी क्यों पहनरखी है? जाओ, कोई अच्छी साड़ी पहनो। यदि घर में नहीं है, तोनौकर को भेजकर बाजार से मँगवा लो।”

“लेकन आप यह...।”

लक्ष्मी आगे कुछ न कह सकी। उसकी समझ में कुछ भी तोनहीं आ रहा था कि उसका पति यूँ बदल जाएगा। उसने आज तकउसके हाथ पर फूटी कौड़ी भी न रखी थी... कभी भूल से भी नहींपूछा था कि तुम्हें कुछ चाहिए। आज तो... सब कुछ बदलकर रह गयाथा।

“लक्ष्मी!”

“जी...।”

“तुम क्या सोच रही हो? क्या तुम्हें मेरी बात बुरी लगी है?”

“नहीं प्रभु! आपकी बात मुझे बुरी क्यों लगेगी? आप तो मेरेदेवता हैं। मगर मैं सोच रही हूँ कि...।”

“मैं बदल कैसे गया हूँ?”

“हाँ...हाँ... मैं यही सोच रही हूँ।”

“लक्ष्मी मुझे एक जंगल में कोई महात्मा मिले थे, उन्होंने मुझेऐसा ज्ञान दिया।”

“मया भरी ना मन भरा, मर-मर गए शरीर,माया तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर।’’

“जब माया मरती ही नहीं, न मन मरते हैं, केवल शरीर हीमरते हैं, तो फिर हम जीवित रहते हुए भी अपनी भावना को कैसेकुचल सकते हैं?”

“वाह-वाह धन्य हो प्रभु... आप धन्य हैं। आप तो बहुत बड़ेज्ञानी हो गए हैं, काश! ऐसे महात्मा जी आपको पहले से ही मिलगए होते।”

“लक्ष्मी! भाग्य से अधिक और वक्त से पहले कुछ नहीं मिलपाता। यह रुपए रख लो, इनसे अपने व बच्चों के कपड़े और आभूषणले आना।” यह कहते हुए नकली सुखराम ने बहुत-से रुपये लक्ष्मीको दे दिए।

लक्ष्मी ने अपनी शादी के बाद आज तक इतने सारे रुपए एकसाथ नहीं देखे थे, न ही उसके पति ने कभी भूले से कहा था कियह रुपए लेकर तुम बच्चों के या अपने वस्त्र खरीद लाओ...। इससेपूर्व जब भी लक्ष्मी कोई फरमाइश करती, तो उ्रूद्गार मिलता कि,“बस...बस खरचे की बातें न किया करो, बचत की सोचो... बचतकरो, धन को सँभालकर रखना चाहिए।” परंतु अब तो यह सब कुछही बदलकर रह गया है। अनहोनी को होनी में कैसे बदल दिया गया?

“लक्ष्मी! आज अपने घर में २१ ब्राह्मणों को भोजन कराओ।

थोड़ा बहुत दान-पुण्य भी करो।”

“हाँ-हाँ... आप ठीक कहते हैं। मैं आज ही ब्राह्मणों को भोजनकराऊँगी। आज आपने मेरी चिर इच्छा पूर्ण करने की अनुमति देकरमेरा मन खुश कर दिया है।”

लक्ष्मी देवी के जीवन में पहली बार खुशी के सुनहरे दिन आएथे। वह बाजार जा रही थी। उसके पास बहुत-सा धन था। बाजार मेंजाकर उसने गरीबों को दान भी दिया। उसने मंदिर में जाकर सवापाँच रुपए का प्रसाद भी चढ़ाया।

गरीब लोगों के साथ-साथ मंदिर का पुजारी भी आज हैरानहो रहा था कि सेठ सुखराम की पत्नी और दान-पुण्य? असंभव...असंभव... आज कैसे संभव हो गया? मगर लक्ष्मीबाई के हाथों में धनकी तैली देखकर तो उन्हें मानना ही पड़ा कि यह कोई सपना न होकर,सच्चाई है।

इधर लक्ष्मी खूब दान कर रही थी। दूसरी ओर उसका नकली पति सुखराम घर में गरीबों कोबुला-बुलाकर दान दे रहा था। जो भी उसके द्वार पर आ रहा था, वहखाली नहीं जा रहा था। भूखे-नंगे भिखारी लोग सब-के-सब सुखरामके घर की ओर भागे आ रहे थे। इन सबके मुँह से यही शब्द सुनाई

दे रहे थे, “अरे भाई! आज तो कोई चमत्कार हो गया चमत्कार।”“दुनिया बदल गयी है।”

“लगता है कलयुग का अंत हो गया है, सतयुग की शुरुआतहो गयी है। दान भी हो रहा था, लंगर भी लगा हुआ था।”

घर भी नए ढंग से सजाया जा रहा था। लक्ष्मी देवी ने बहुतसे नए वस्त्र खरीदे, नए जेवर मँगवाए, घर में सारा सामान नया आरहा था। बाहर खड़ी भीड़ की समझ में नहीं आ रहा था कि सेठसुखराम रातों-रात कैसे बदल गए? जिसने कभी अपने हाथ से फूटीकौड़ी भी खर्च न की हो, उसी के घर पर कल्पना से कहीं अधिकखर्च हो रहा है।

“पता नहीं किसी ने सेठ जी पर जादू कर दिया है अथवाउन्हें कहीं से कोई गुह्रश्वत धन मिल गया है, जिसे वे दोनों हाथों से लुटा

रहे हैं।” बाहर खड़े लोग सेठ सुखराम के ठाट-बाट देख रहे थे औरआश्चर्य से परस्पर बातें कर रहे थे।

लक्ष्मी देवी मन ही मन सोच रही थी, “कहीं यह सब कुछसपना तो नहीं...? कोई धोखा तो नहीं हो रहा... कोई जादूगर जादूतो नहीं कर गया?”

सुखराम ने अपनी पत्नी को इस प्रकार कल्पना के सागर मेंडूबे हुए देखा, तो उसका कोमल हाथ अपने हाथ में लेकर चूमते हुएकहा, “लक्ष्मी! आज तुम उदास क्यौं बैठी हो, जबकि हमारा घर वमन दोनों खुशी मनें डूबे हुए हैं।”

लक्ष्मी देवी के सारे शरीर में मानो बिजली कौंध गई थी।

उसके पति ने आज उसका हाथ चूमते हुए पहली बार ह्रश्वयार के कुछशब्द कहे थे। आज से पूर्व तो वह केवल धन-दौलत से ही प्रेम करताथा।

लेकिन किसी ने ठीक ही कहा है कि, ‘समय बहुत बलवानहै, वक्त बदलते देर नहीं लकती। आज वक्त बदल गया था। कंजूस-मक्खीचूस के घर से धन बरस रहा था,जो भी कोई माँगने वाला द्वारपर आता था, उसे सेठ सुखराम स्वयं दान देते थे।

इसी भीड़ में एक किसान भी आकर खड़ा हो गया था। जबउसने देखा कि सब लोग अपनी-अपनी इच्छाएँ पूरी करके जा रहे हैं,तो उसके मन में वर्षो पुरानी सोई हुई इच्छा जाग उठी।

“एक बैलगाड़ी!”

कितने वर्षों से वह सोच रहा था कि उसे एक बैलगाड़ी मिलजाए, जिसके सहारे वह अपने खेती-बाड़ी के काम को चला सके।

बैल न होने से वह अपनी जमीन में हल तक नहीं चला पाता था,उसकी जमीन बंजर होती जा रही थी। गाड़ी के बिना फसल को शहरनहीं पहुँचाया जा सकता था।

उसने भी हिम्मत करके सेठ सुखराम के पास जाकर, उनकेचरणों में अपना सिर रखते हुए कहा, “सेठ सुखराम की जय हो,दानवीर सुखराम की जय हो।”

“बस... भाई बस! हमारी जय-जयकार करने से आपको क्यामिलेगा? जय-जयकार तो इस संसार के मालिक की करो, जिसने हमेंकुछ करने को प्रेरित किया। बोलो तुम क्या चाहते हो?”

“मै एक निर्धन किसान हूँ माई-बाप!”

“निर्धन हो, तभी तो मेरे यहाँ आए हो, अब बोलो, तुम्हें क्याचाहिए?”

“दो बैलों की जोड़ी और एक गाड़ी, यानी दोनों को मिलाकरबैलगाड़ी बोलते हैं।” किसान ने सकुचाते हुए कहा।

“बस या और कुछ...?”

“जी नहीं, इतनी ही कृपा यदि मुझ पर हो जाए, तो मैं आपकाअसहान कभी नहीं भूलूँगा। इससे मेरे परिवार की दो वक्त की रोटीका प्रबंध हो जाएगा।”

“हाँ...हाँ... ठीक है... चिंता छोड़ो सुख से जियो...। बाहर सेएक बैलगाड़ी ले जाओ। हमने बहुत-सी बैलगाड़ियाँऎ किसानों सेइसलिए चीनकर जब्त कर ली थीं क्योंकि वे हमारा कर्जा नहीं चुकासके थे। लेकिन हम उनकी इन्हीं गाड़ियों को उन्हें वापिस दे रहे हैं,तुम भी ले जाओ य़ यदि दो की जरूरत हो, तो दो गाड़ियाँ ले जासकते हो।”

“नहीं... नहीं... सेठ जी! हमारे लिए एक ही बहुत है। हमारेबच्चे तो इसी से पल जाएँगे।”

“ठीक है, वास्तव में धनी लोग ही लालची होते हैं, निर्धनबेचारे तो उतने में खुश हो जाते हैं, जितने में उनका पेट भर जाताहै।”

“क्या कहा सेठ जी आपने?”

“कुछ नहीं... कुछ नहीं...। जाओ, तुम गाड़ी ले जाओ औरथोड़े से रूपए भी रख लो।” सुखराम ने चाँदी के कुछ सिक्केनिकालकर उस किसान को दे दिए।

“यह तो मैंने नहीं माँगे थे।”

“कोई बात नहीं, ये हम अपनी खुशी से दे रहे हैं। हल, बीजऔर बैलों के चारे के लिए क्या किसी से ब्याज पर रुपया लेतेफिरोगे।”

“यह तो मैंने सोचा ही नहीं था।” किसान बहुत खुश हो गया।

बैलगाड़ी व नकद धन पाकर किसान अपने घर जा रहा था और साथही-साथ खुशी में यह गीत, गाता हुआ जा रहा था-

“सेठ सुखराम, तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हो पचासहजार।”

सेठ सुखराम तुम सदा खुश रहो, सुखराम जी! आप तो देवताहैं।

यही शब्द चारों ओर गूँजते नजर आ रहे थे। चोरी से जलेबीखा रहे सुखराम ने जैसे ही हर एक के मुख से अपनी प्रशंसा सुनी,तो वह बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि इसे पूर्व उसने कभी अपनी प्रशंसाकिसी भी प्राणी के मुख से नहीं सुनी थी।

यही सोचते हुए सुखराम ने जलेबी का आखिरी टुकड़ा अपनेमुँह में डालकर अंगोछे से मुँह साफ किया, फिरउसने गाड़ी पर बैठेजा रहे किसान की ओर देखा, जोकि बहुत तेजी से गाड़ी चलाते हुएबार-बार कह रहा था, “धन्य हो सेठ सुखराम! आप तो मेरे लिएभगवान हैं भगवान...!”

सेठ सुखराम ने उसकी ओर से देखते हुए पूछा, “अरे भाई!

तुम कौन हो?”

“मैं एक गरीब किसान था, लेकिन सेठ सुखराम की क-पासे अब मैं निर्धन नहीं रहा।”

“सुखराम ने ऐसा कौन-सा जादू कर दिया है कि अब आपनिर्धन नहीं रहे?”

“अरे वह इनसान नहीं भगवान है - धरती का भगवान! यानीमहापुरुष! जिसने मुझे बैलगाड़ी दी और साथ में बेशुमार धन भी।”

“यह सब कुछ क्या तुम्हें सेठ सुखराम ने ही दिया है?”

“हाँ...हाँ...! अरे भाई! मुझे तो तुम भी बहुत गरीब लगते हो।

अरे भैया! तुम्हारे इतने फटे कपड़े देखर तो सुखराम तुम्हें बहुत कुछदेगा, जाओ... जाओ... जल्दी चले जाओ।”

सुखराम ने अपने बैलों को पहचान लिया था। उसे इस बातका दुःख था कि वह आदमी उसकी आँखों के समक्ष ही उन्हें ले जारहा था, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकता... जरूर मेरे घर से चोरीकरके लाया होगा। उसने क्रोध में भरकर कहा, “तुम यह बैलगाड़ीचोरी करके लाए हो?”

“अबे ओ कंगले! मुँह सँभालकर बात कर, सेठ जी के दानदिए माल को चोरी का माल बताते हुए तुम्हें शरम नहीं आती। देखोतो सही कैसा जमाना आ गया है, मैंने तो इसे निर्धन समझकर सेठसुखराम के पास जाने की सलाह दी और यह मुझे ही चोर बतानेलगा।”

“बकवास बंद कर अरे दो कौड़ी के किसान! मुझे कंगला बतारहा है, क्या मैं तुझे कंलगा लगता हूँ।”

“तुम तो मुझे कंगलों से भी गिरए हुए लगते हो। इतने गंदेकपड़े तो इस शहर के कंगले भी नहीं पहनते। मैं तुम्हें समझा रहाहूँ कि सेठ सुखराम के पास जाकर नए कपड़े ले लो। कम-से-कमदेखने में अच्छा लगेगा। फिर तुझे कोई निर्धन भी नहीं कहेगा।”

सुखराम की समझ में कुछ-कुछ बात आ रही थी। उसे संदेहहोने लगा कि अवश्य ही कोई-न-कोई गड़हड़ है। मुझे इसे बुरा-भलाकहने की बजाय अपने घर में बैठे उस चोर को देखना चाहिए।

बस यही सोचकर वह तेज-तेज कदम उठाता हुआ अपने घरकी ओर जाने लगा। उसके मन में अनेक आशंकाएँ उभर रही थीं।

वह जैसे ही अपने घर के द्वार पर पहुँचा, तो चौकीदार नेउसे वहीं पर रोक दिया और कड़ककर बोला, “अरे रुक जाओ, कहाँचोरों की तरह घुसे जा रहे हो?”

“ओ वीरसिंह! क्या तुम मुझे रोक रहे हो? अपने मालिक कोही घर के भीतर जाने से रोकना चाहते हो? पापी! नमकहराम कहींके! मैं अभी तुम्हें नौकरी से निकाल दूँगा।”

“वाह!... वाह!... एक कंगला मुझे नौकरी से निकालेगा...!

अरे दुआएँ दो मेरे मालिक को, जो इतना दयालु और शरीफ हो गयाहै। यदि वह पहले स्वभाव का होता, तो कब का तेरी तबियत साफ

कर देता।”

“लेकिन, मैं ही तुम्हारा मालिक हूँ वीरसिंह!” अपनी सफाईपेश करते हुए उसने चौकीदार से कहा।

“रहने दो भाई! रहने दो, यह तो भला हो मेरे स्वामी का,जिसने मुझे पहले ही बता दिया था कि मेरी शक्ल का एक आदमीइस शहर में घूम रहा है। असल में वह बहुत बड़ा धोखेबाज और चोरहै। वह मेरे घर में घुसने का प्रयास करेगा।”

“बकवास बंद कर नमकहराम, कमीने! तू मुझे चोर बताता है।

अरे असली चोर तो वह है जिसने मेरे घर पर कब्जा कर लिया है।”

“तूम मेरे सेठ को चोर कहता है।” यह कहते हुए चौकीदारने उसके सिर पर लाठी दे मारी।

लाठी की मार से सुखराम जख्मी होकर धरती पर गिर पड़ा।

उसके सिर से खून बहने लगा।

धरती पर जख्मी पड़ा सुखराम अपने घर से निकलने वालेउन सभी लोगों को देख रहा था, जो कि दान ले-लेकर जा रहे थे,साथ ह वह अपने भाग्य पर आँसू बहा रहा था, जिसके कारण आजवह घर का मालिक होते हुए भी अंदर नहीं जा सकता था।

“कितना जुल्म हुआ है मेरे साथ...! कितना बड़ा अत्याचारहुआ है।”

“मैं राजा के पास जाकर इनसाफ माँगूँगा। इस आदमी कोफाँसी पर लटकवाकर ही दम लूँगा। मेरा नाम भी सुखराम सेठ है।

इस लुटेरे को मैं छोडूँगा नहीं।”

रोता-रोता सुखराम राजा के पास जा पहुँचा। राजा सेठ सुखरामको अच्छी तरह जानते थे, अतः उन्होंने इस प्रकार रोते हुए देखकरपूछा, “सेठ जी! आप इस प्रकार बच्चों की भाँति क्यों रो रहे हैं?

आप तो इतने बड़े दयालू एवं दानी महापुरूष हैं, आप कल ही तोमुझसे इस बात की इजाजत लेकर गए हो, कि मैं अपनी संपि्रूद्गा को

दान करना चाहता हूँ।”

“महाराज! आप भूल करगए, वह मैं नहीं था।”

“यह क्या कह रहे हो तुम?”

“मैं ठीक कह रहा हूँ महाराज! वह मैं नहीं था, बल्कि मेरीही शक्ल का कोई दूसरा आदमी था-धोखेबाज, चार सौ बीस, ठग!जिसने मेरी उम्र भर की कमाई को दोनों हाथों से लुटा दिया। आपकेराज्य में अंधकार हो गया महाराज! लोग दिनदहाड़े लूटने लगे हैं। मुझेबचा लीजिए महाराज! मैं लुट गया... बरबाद हो गया। मेरी संपि्रूद्गा तोगई ही, उसने तो मेरे बीवी-बच्चों परभी अपना कब्जा जमा लिया।”

यह कहते हुए सुखराम फूट-फूटकर रोने लगा।

“अपने आपको सँभालो सुखराम! हम तुम्हें वचन देते हैं किहम कभी भी तुम्हारे साथ अन्यान नहीं होने देंगे, तुम्हें न्याय मिलेगा”

राजा ने तुरंत सेठ सुखराम को गिरफ्तार करने के आदेश जारीकर दिए। राजा की आज्ञा का पालन किया गया। सिपाही तुरंह सुखरामको पकड़कर ले आए।

राजा ने दोनों को ही पास-पास खड़ा करके देखा, तो वह स्वयंहैरान रह गए कि “इन दोनों में असली कौन है और नकली कौन?

इनसाफ हो तो कैसे? लेशमात्र भी अंतर नहीं है।

पहले वाला सुखराम मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए था। दूसरेने साफ-सुथरे कपड़े पहने हुए थे-लेकिन इन वस्त्रों को देखकर न्यायनहीं किया जा सकता।

अचानक राजा की तेज बुद्धि ने काम किया। उसने सोचा,“सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि सेठ जी की पत्नी को बुलायाजाए, क्योंकि एक नारी तो धोखा नहीं खा सकती।”

तभी राजा ने अपने सिपाहियों ने लक्ष्मीबाई को भी बुलवादिया। लक्ष्मीबाई राजदरबार में आई तो असली सुखराम भी अपनीपत्नी के रंग-रूप को न पहचान सका।

“सुंदर! अति सुंदर!”

इन रेशमी वस्त्रों से सजी-सँवरी लक्ष्मी का रूप तो ऐसे निखरआया था, जैसे बदली से चाँद निकल आता है। इस चोर ने न जानेउस पर क्या जादू कर दिया है, जो रातों-रात निखर उठी है।

राजा ने लक्ष्मीबाई से कहा, “देखो लक्ष्मीबाई! यह दोनोंआदमी स्वयं को तुम्हारा पति बता रहे हैं, अब तुम ही यह फैसलाकरो कि इन दोनों में से कौन-सा तुम्हारा असली पति है?

लक्ष्मी ने उन दोनों की ओर बड़े ध्यान से देखा। काफी देरतक देखने के बाद अंत में लक्ष्मीबाई ने नकली सुखराम की ओरसंकेत करते हुए कहा, “यही है मेरा अशली पति।”

इस पर असली सुखराम क्रोध से भड़क उठा। वह क्रोध सेदाँत पीसता हुआ कहने लगा, “लक्ष्मी! तुम पागल हो गई हो! तुमकिसी वेश्या से कम नहीं हो। कमीनी, कुलटा, एक ही रात में तुमबदल गई। नए वस्त्र धारण करके तुम अपने पति को भी नहीं पहचानसकी हो क्या? यह सब उस धन का चमत्कार है, जोकि इसने तुमपर लुटाया है।”

“देखो, झूठे नकली सुखराम! तुम राजदरबार में किसी भी नारीको गाली नहीं दे सकते। हाँ, यदि तुम्हें भी भी कोई आशंका हो, तो

अपने पक्ष से किसी भी गवाह को बुला लो।”

“हाँ महाराज! मैं गंगू नाई को अपने गवाह के रूप में बुलानाचाहता हूँ।”

राजा ने शीघ्र ही सिपाहियों को भेजकर गंगू नाई को भी बुललालिया।

राजा ने गंगू नाई को देखकर कहा, “देखे गंगूराम! तुमसुखराम के खानदानी नाई हो। नाई होने के नाते तुम इनके घर आते-जाते भी रहते हो, अएतः पहचानकर बताओ कि इन दोनों में असलीसुखराम यानी तुम्हारा मालिक कौन है?”

गंगू नाई भी बेचारा उन दोनों को देखकर चक्कर में पड़ गया,क्योंकि दोनों में कहीं कुछ भी अंतर नहीं था। फिर गंगू को ध्यानआया, सेठ जी के सिर पर एक मस्सा था। उसने झट से उन दोनोंके सिर को टटोलकर देखा, तो उसके आश्चर्य की कोई सीमा न रही,उसने उन दोनों के सिरों में ही मस्से देखे।

तभी गंगू ने राजा से कहा, “महाराज! अब तो मेरे भी वशकी बात नहीं है कि यह बता सकूँ कि इन दोनों में असली कौन हैऔर नकली कौन है? यह फैसला तो अब आप ही कर सकते हैं,अन्य कोई नहीं कर सकता।”

असली सुखराम ने जब यह देखा कि गंगू नाई ने भी उसेपहचानने से इनकार कर दिया, अतः अब तो उसके बचाव के सारेही मार्ग बंद हो चुके हैं। अब तो बीवी-बच्चे, घर-बार, धन-दौलतसभी कुछ चला जाएगा, अब तो सब कुछ गया।

“क्या फायदा हुआ मर-मरकर धन कमाने का। मैंने न ठीकसे खाया-पिया, न ढंग से कपड़ा पहना, न किसी का भला सोचा।

आखिर यह सब कुछ किस काम आया? मुझे क्या मिला?”

“वाह रे नसीब...! मेरा सब कुछ हवा के झोंके की भाँति हीउड़ गया। मैं अकेला कहाँ जाउँ? किधर जाउं?”

“कुछ नहीं रहा... कुछ नहीं बचा... अब किसके लिए जीना...

किसके लिए कुछ करना।” सोचते-सोचते उसके दिमाग में इतनाअधिक बोझ पड़ा कि वह राजदरबार में ही बेहोश होकर गिर पड़ा...।

उसे गिरते देखकर लोगों ने समझा कि यह मर गया है। यहदेखकर उसकी पत्नी व बच्चों को तनिक भी दुःख नहीं हुआ, वे मस्ती

में हँस रहे थे।

शहर के अनेक लोग भी इस विचित्र झगड़े का फैसला सुननेके लिए आए थे... मगर सुखराम से किसी को हमदर्दी नहीं थी।

सबको केवल नकली सुखराम से हमदर्दी थी, जोकि गरीबों की मददकर रहा था। सब लोग कंजूस सुखराम को घृणा की दृष्टि से देख रहे

थे। सबने राजा से कहा, “महाराज! अब तौ फैसला हो चुका, अबआप इस बेहोश सुखराम को दंड देने की कृपा करें।”

“नहीं, अभी फैसला नहीं हुआ। हम पहले वैद्य जी कोबुलाकर इसे होश में लाएँगे, इसके पश्चात्‌ ही फैसला होगा।”

वैद्य जी ने आते ही सुखराम की नब्ज देखी, फिर उसके दिलपर हाथ रखते हुए उसे टटोलकर देखा और राजा से बोले, “महाराज!

इस आदमी के दिल पर भारी ठेस लगी है, इसके इलाज पर काफधन खर्च होगा।”

“वैद्य जी! आप इसकी चिंता न करें, सारा धन मैं खर्चकरूँगा।” नकली सुखराम ने फौरन कहा।

“महान्‌! अति महान... ऐसे इनसान इस संसार में कहाँ मिलपाएँघे, जो अपने शत्रु को भी जीवन देने के लिए तैयार हैं।”

वैद्य जी बेहोश पड़े सुखराम को दवाई देकर होश में लाने काप्रयास कर रहे थे।

होश में आते ही असली सुखराम ने राजा के आगे हाथ जोड़तेहुए कहा, “महाराज! मैं आपके और इन सब भाइयों के सामने अपनी

हार स्वीकार करता हूँ। अब असली सुखराम कोई भी हो, यह विवादनहीं रहा। विवाद तो केवल यह रहा गया है कि अच्छा कौन है और

बुरा कौन है?

‘मुझे इस मामले में कोई संकोच नहीं है कि मैं ही बुरा आदमीथा। मैं यह भी मानता हूँ कि मैंने कभी किसी जरूरतमंद और दीनदु

खी की मदद नहीं की। मैं केवल धन के पीछे पागल हुआ फिरतारहा। उसका परिणाम अब मेर सामने है। अब मेरे अपने भी मुझे अपना

मानने को तैयार नहीं हैं, मैंने जो आपराध किया, उसकी सझा मुझे मिलगई। अब मैं जा रहा हूँ... दूर... बहुत दूर...।” कहते हुए सुखराम वहाँ

से जाने लगा।

उसी वक्त नकली सुखराम ने उसे पीछे से आवाज दी, “ठहरोसुखराम!”

“क्या तुमने मुझे सुखराम कहा? क्या तुम भी मानते हो किमैं ही सुखराम हूँ... यह तुम क्या कह रहे हो?”

“हाँ सुखराम! मैं जानता हूँ कि तुम ही असली सुखराम हो।”

“लेकिन तुम...?”

“मैं तुम्हारा स्वर्गवासी पिता हूँ, जो स्वर्गलोक से तुम्हें यह पाठपढ़ाने आया हूँ कि इस संसार में धन ही जीवन नहीं है। जिस धनके पीछे पागल होकर तुम अपना सब कुछ भूल बैठे हो, उस धन काअंजाम क्या हुआ? पल-भर में ही सब कुछ समाह्रश्वत हो गया, जो तुमनेवर्षों में इकट्‌ठा किया था। जिस धन को पाने के लिए तुमने सबअपनों को भुला दिया, वह सारा धन एक झटके में ही समाह्रश्वत हो गया।

अब तुम खाली हाथ जा रहे हो।”

“हाँ, और क्या करूँ?”

“करना कुछ नहीं, अब तुम नहीं जाओगे, बल्कि मैं जाऊँगा।

मैं तो केवल तुम्हें यह समझाने आया था कि इनसान को जीने हेतुधन की आवश्यकता तो है, लेकिन धन के पीछे अपनों को भी भुलादेना कोई बुद्धि की बात नहीं है।”

“पिताजी आप!”

“हाँ, मैं तुम्हारा पिता हूँ। अब मैं फिर वापिस जा रहा हूँ।

मैं तो प्रभु से यही तीन-चार दिन उधार माँगकर लाया था, ताकि तुम्हेंपथभ्रष्ट होने से बचा लूँ। अब मेरे काम समाह्रश्वत हो गया, मैं जा रहाहूँ।”

“पिताजी!” अपने पिता के गले लगने हेतु जैसे ही वह दौड़ा,तो वे जा चुके थे।

अन्य रसप्रद विकल्प

शेयर करे

NEW REALESED