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पत्थर के खेत

कथा-कहानी

पत्थर के खेत

एक समय, एक गांव मे एक किसान रहता था । उसके पास पुरखों की बहुत सारी खेती बारी थी । वह पूरी ज़मीन पर खेती नहीं कर पाता । फ़िर भी वह बहुत सम्पन्न था । लेकिन उसे एक बात खटक रही थी । उसके पुरखों के समय से ही खेती का एक टुकड़ा बिल्कुल अनुपयोगी और बंजर पड़ा था । बंजर इस लिये था, क्योंकि ज़मीन के उस हिस्से मे सिर्फ़ पत्थर ही पत्थर थे । और पत्थर भी अजीब से थे । एक तो वे आम पत्थर से अलग रेतीले पत्थरो जैसे दिखते और पूरे खेत मे बिखरे पड़े थे । हल चलाओ तो पत्थर ही पत्थर निकलते । किसान ने सोंचा अगर इस खेत के पत्थर निकल जायें तो यहां भी खेती होने लगेगी जिससे उसकी कमाई बढ़ जायेगी ।

उसी गांव मे दो गरीब नौजवान भाई रहा करते थे, भोलू और गोलू । वे दोनो भूमिहीन थे । बस गांव मे मेहनत मजूरी करके किसी तरह दिन काट रहे थे । आज कल उनके पास कोई क्जाम धंधा नहीं था । खेती बाड़ी का काम भी अभी शुरू नही हुआ था ; सो भूखो मरने की नौबत थी । किसान ने सोंचा क्यों न इन दोनो की हालत का फ़ायदा उठाया जाये ।

किसान उनके पास पहुंचा और शर्त रखी कि उसकी खेती मे से सारे पत्थर निकाल दें तो वह वे सारे पत्थर उन्हे दे देगा जिसे शहर मे बेच कर वे कुछ पैसा कमा सकते हैं । मगर शर्त है कि वे सारे पत्थर निकालेंगे और उन्हे उठाकर ले जायेंगे । वहां कुछ भी छोड़ कर नही जायेंगे ।

मरता क्या न करता । उन दोनो ने शर्त कबूल कर ली । दोनो ने कयी दिनो मेहनत की । हल चलाया, खुदाई की, हर जतन किया और पत्थर का एक एक टुकड़ा बाहर निकाला और चूंकि उनके पास कोई गाड़ी न थी ; बोरे मे भर भर कर सारे पत्थर लेजाकर अपने टूटे फ़ूटे घर मे जमा किया । नतीजतन किसान के पीढ़ियों से बन्जर पड़े वे खेत उपजाऊ हो गये । किसान ने अपनी होशियारी से बिना एक पैसा खर्च किये खेत को उपजाऊ बना लिया । वह अपनी होशियारी पर बड़ा प्रसन्न था । गांव मे भी सब लोग उसकी इस होशियारी की प्रशंसा कर रहे थे । देखो कितनी होशियारी से दोनो का काम बन गया । किसान का काम भी बन गया और दोनो भाईयों की भी कुछ कमाई हो गयी ।

दोनो भाई बड़े परेशान थे । उन्हे पत्थरों का कोयी खरीदार नही मिल्र रहा था । उन्होने किसान से मदद मांगी । चाचा कुछ उधार ही देदो पत्थर बिक जयेंगे तो चुका देंगे । किसान ने दो टूक कहा “जो अपने मेहनताने मे पत्थर स्वीकार करें ऐसे बेवकूफ़ों की मदद करके मै क्यों अपना नुकसान करूं ।“

दोनो भाई बहुत निराश हुये । उनके दिल को बड़ी ठेस लगी थी । दोनो ने गांव छोड़ दिया ।

वे धीरे-धीरे करके अपने सारे पत्थर साथ ले गये । वे उनकी किस्मत के पत्थर थे । गांव मे उन्होने किसी से बात नहीं की । कुछ दिनो चर्चा रही कि दोनो गांव मे कहीं मेहनत मजूरी करके अपने दिन काट रहे हैं । फ़िर धीरे धीरे लोग उन्हे भूल गये ।

किसान के खेत सोना उगलने लगे । किसान जानता था कि यह उन दोनो भाईयों की मेहनत रंग लाई थी । किसान और उसकी खेती का दूर दूर तक नाम होने लगा । उसकी होशियारी के चर्चे भी ज़रूर होते । अब उस गांव और आस पास के गांव के लोग भी उसकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा किया करते ।

एक दिन शहर से एक बड़े हीरे के व्यापारी का आदमी किसान के पास आया । उसने बताया कि उसके खेतों की प्रशंसा उसके सेठ तक भी पहुंची है और वे उसके सारे खेत दुगने दाम पर खरीदने के लिये तैयार हैं ।

किसान बहुत चालाक था । उसने मोल भाव किया और तिगुने दाम मे सौदा कर लिया ।

अब उसके पास तीन गुने खेत थे । हर कोई उस किसान की बुद्धिमत्ता की तारीफ़ कर रहा था ।

खेत खरीद लेने के कुछ समय बाद, वह हीरे के व्यापारी का परिवार भी गांव मे आ गया । गांव मे वह जगह जो बरसो से उपेक्षित पड़ी थी, यानि गोलू और भोलू का टूटा फ़ूटा घर और उसके आस पास की ज़मीन को विकसित कर वहां बहुत बड़ी हवेली बन गई । वह हवेली इतनी ऊंची थी कि गांव के हर कोने से दिखाई दे जाती । अब हर जगह उस हवेली के चर्चे होने लगे । यह बात उस होशियार किसान को अखरने लगी । वह सोंचता- ‘इसमे तारीफ़ की ऐसी क्या बात है ? पैसे थे, तो हवेली बना ली । पुरखों की कमाई हुई दौलत होगी । कोई मेरी तरह अक्लमंदी से तरक्की करके दिखाये तो जानूं । और यह तो बिल्कुल साफ़ है कि अक्ल से उनका दूर-दूर तक का कोई रिश्ता नहीं वर्ना कोई खेतों को तीन गुना दाम मे खरीदता भला ?’

एक दिन वह अपनी होशियारी के अभिमान के साथ, उसका खेत खरीदने वाले हीरे के व्यापारी के घर चला गया । वहां उसे पता चला कि खेत खरीदने वाला दो भाईयों का परिवार है । जो कम उम्र लेकिन बेहिसाब दौलत के मालिक हैं । वह किसान समझ गया कि उसका अनुमान इनके बारे मे बिल्कुल सही निकला । किसान ने उनसे कहा “लगता है आप लोगों की कम उम्र का हि यह दोष है, या फ़िर यह दौलत अपको विरासत मे मिली हुई दौलत है । अथवा आपने यह दौलत ज़मीन मे गड़ी हुई पा ली है, इसी लिये आपको इसकी कीमत नही मालूम । वर्ना तीन गुना दाम देकर खेत खरीदने के पीछे और कोई कारण नहीं हो सकता ।“

दोनो व्यापारी भाईयों ने उससे विनम्रता दिखाते हुये कहा- “चाचा लगता है , आपने हमे पहचाना नहीं । मै भोलू हूं और ये है मेरा भाई गोलू । हां, हमे तो यह दौलत ज़मीन मे गड़ी हुयी ही मिली है । हमे मजूरी मे जो पत्थर मिले थे , उसमे बड़ी मात्रा मे कच्चे हीरे थे । चाचा, हमने आपके खेत नहीं हीरे की खदाने खरीदी हैं ।“

इसके बाद उस किसान ने अपने नये खेत भी बेच दिये और गांव से चला गया । फ़िर उसे किसी ने नहीं देखा । हां, उसके बारे मे कई अफ़वाहें सुनने को मिली जैसे- कुछ लोग कहते हैं कि, नये खेतों की बिक्री से उसने दस गुना मुनाफ़ा कमाया और विदेश मे जाकर बस गया । अब वहां वह ऐश से जीवन गुज़ार रहा है । कुछ लोग कहते हैं कि उसने हीरे की खदाने खरीद ली है और अब नाम बदलकर बड़े-बड़े लोगों के समाज मे सम्मान के साथ जीवन बिता रहा है ।

एक दिन गांव का एक व्यक्ति बहुत दूर की यात्रा करके आया । वहां उसने बताया कि उस किसान जैसे दिखने वाले एक पागल व्यक्ति को उसने सड़कों पर भटकते देखा है । उसकी बात को किसी ने भी सच नहीं माना ।

लेखक_ मिर्ज़ा हफ़ीज़

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