क्रांति Raj Valmiki द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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क्रांति

क्रान्ति

राज वाल्मीकि

‘‘आप सभी साथियों को जयभीम! मेरा नाम क्रान्ति है। मैं उन्नीस साल की लड़की हूं। दिल्ली की एक स्लम बस्ती में वंचित वर्ग के बीच रहती हूं। इस बारे में मेरा कहना है कि-हम वंचित समाज के लोग हैं। हमें सदियों से हमारे अधिकारों, हमारी सभ्यता, हमारे धर्म-संस्कृति आदि से वंचित रखा गया है। यहां मैं यह स्पश्ट कर दूं कि धर्म-संस्कृति से मेरा तात्पर्य पूजा-पाठ, देवी-देवताओं से नहीं है। धर्म-संस्कृति एवं ईष्वर के नाम पर पंडे-पुजारियों से लुटना मूर्खता है। धर्म-संस्कृति से मेरा मतलब वंचित वर्ग की मानवतावादी धर्म-संस्कृति से है। जिसे हिन्दुत्ववादी षक्यिों ने नश्ट कर दिया है। उसकी पुनःस्थापना करना कोई बच्चों का खेल नहीं है। जैसे होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस, बैसाखी, पोंगल आदि अनेक त्योहार मनाये जाते हैं। वैसे ही अम्बेडकर जयन्ती, बुद्ध पूर्णिमा को वंचित वर्ग के बुद्धिजीवियों तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए बल्कि वंचित तबके के जन-जन का त्योहार बनाया जाना चाहिए। साबित्रीबाई फुले की जयन्ती को होली जैसा लोकप्रिय बनायें। ज्योतिबा फुले, कबीर, रैदास आदि वंचित वर्ग के जो महापुरूश हुए हैं, झलकारी बाई जैसी महानायिका हुई हैं, उनका जन-जन तक प्रचार-प्रसार करें। वंचित वर्ग को कनविंस करें कि स्वतन्त्रता,समता, बंधुता जैसे मूल्यों पर आधारित प्रथाएं ही वंचित वर्ग की धर्म-संस्कृति है। लेकिन यह सब कहना आसान है, इसे कार्यान्वित करना मुष्किल। लेकिन मेरा मानना है कि यह मुष्किल तो है-पर नामुमकिन नहीं। हमें ठोस पहल करते हुए वंचित वर्ग के द्वार-द्वार पर दस्तक देनी चाहिए। इस योजना को कार्यरूप देने हेतु मैं आपके साथ घर-घर जाने को तैयार हूं।...’’

अभी आपने इस युवा लड़की की बातें सुनीं। अरे, मैं आपका इस गोश्ठी में स्वागत करना तो भूल ही गया। आइए हमारी इस साप्ताहिक गोश्ठी में आपका स्वागत है। हर संडे को हमारी यह गोश्ठी आयोजित की जाती है। हम सभी स्वरोजगारकर्ता अथवा नौकरी पेषा लोग हैं। इतवार का दिन ही हमारे अनुकूल रहता है। पहले मैं इस गोश्ठी के सदस्यों से आपका परिचय करा दूं। हम पांच लोग हैं। नहीं-नहीं, अब छह कहिए। नयी-नयी जुड़ने वाली क्रान्ति भी तो हमारे साथ है। हम लोग सामाजिक-साहित्यिक रूचि के लोग हैं। संदीप जी एम.सी.डी. में कार्यरत हैं। रमेष जी एक निजी कम्पनी में काम करते हैं। महेष जी ट्रेवेल एजेंसी चलाते हैं। डाॅ. सन्तराम आर्य का अपना क्लीनिक है। वे आयुर्वेद के डाॅक्टर हैं। राज वाल्मीकि यानी मैं एक एन.जी.ओ. में काम करता हूं। डाॅक्टर साहब को छोड़कर हम सभी थर्टी प्लस एज ग्रूप के हैं। डाॅक्टर साहब सिक्सटी प्लस में हैं। हम सभी दलित हैं। सोषल वर्क करने में हम सभी की रूचि है। एक बार हमने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि हमारे दलित समाज में वाल्मीकि समुदाय के लोग षैक्षिक रूप से बहुत पिछड़े हैं। क्यों न उन्हें षिक्षित किया जाए।

इसी सिलसिले में हमने स्लम बस्ती में सर्वे किया। सर्वे के दौरान यह लड़की हमें मिली। क्रान्ति ने हमें विषेश रूप से प्रभावित किया। उस ने अभी बारहवीं की परीक्षा दी है। रिजल्ट दो महीने बाद आएगा। तब तक वह बस्ती के लोगों विषेश कर महिलाओं को जागरूक करने में लगी हुई है। टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा से मिलता-जुलता चेहरा। गेहुंआ रंग एवं सामान्य कद-काठी। यौवन की दहलीज पर खड़ी इस लड़की में एक विषेश आर्कशण है। तेज बोलने वाली-यह रेडिकल लड़की-सबको अपनी बातों से सम्मोहित कर लेती है। इसी कारण यह अपनी बस्ती की अघोशित नेत्री है। जब हम पांचो लोग षिक्षा हेतु जरूरतमंद बच्चों का सर्वे करने गये तो बस्ती वालों ने सबसे पहले इसी लड़़की से मिलवाया। हमें स्वयं भी ऐसी लड़़की की तलाष थी जो बच्चों को षिक्षित करने में हमारा सहयोग कर सके। पहले तो इस लड़की ने तरह-तरह के प्रष्न पूछ कर हमें जांचन-परखने की कोषिष की। यह कि हम अपने किसी मतलब से तो नहीं आए हैं। हम से हमारी पहचान के सबूत मांगे। जब हमने सबूत पेष किये और विस्तार से उसे समझाया कि हमारा एकमात्र उद्देष्य वाल्मीकि समुदाय के बच्चों को षिक्षित करना है तो कुछ कनविंस हुईं और हमारा सहयोग करने को तैयार हुई।

वैसे हम लोग सिर्फ वाल्मीकि समुदाय तक सीमित नहीं हैं। दलित षब्द के अन्तर्गत जो भी जातियां आती हैं-हम सब के उत्थान की बात करते हैं। और न सिर्फ बात करते हैं बल्कि उनके उत्थान का कार्य करते हैं। जो दलित जागरूक नहीं हैं-उन्हें जागरूक करने का प्रयास करते हैं। बाबा साहब के विचारो की रोषनी से उनके मन का अज्ञान-अंधकार दूर करते हैं। किन्तु षिक्षा के बारे में हमें वाल्मीकि समुदाय सबसे पिछड़ा लगा। अतः उसे षिक्षित करने की हमने पहल की।

इसी दौरान क्रांति से मुलाकात हुई। अब हम क्रांति को भी अपनी गोश्ठी में बुलाने लगे। इस नवयुवा लड़की के विचारों में भी नयापन होता है। वह ‘दलित’ षब्द पर भी आपत्ति करती है। उसका कहना है कि दलित षब्द का षाब्दिक अर्थ तो आप लोग जानते ही होंगे। फिर हम स्वयं को दलित क्यों कहें? जब हम स्वयं ही दलित कहना पसन्द करेंगे तो अन्य लोग तो हमें दलित कहेंगे ही। हम मनुश्य हैं तो हमें मनुश्य के रूप में ही जाना जाए।

क्रांति की लेखन में भी रूचि है। वह कविताएं और लेख लिखती है। उस की कविताएं पढ़कर आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल की याद आना स्वाभाविक है। उसे ‘दलित साहित्य’ पर भी आपत्ति है। उसने हमें ‘अपेक्षा’ के संपादक डाॅ. तेज सिंह एवं उप संपादक ईष गंगानिया का स्मरण दिलाते हुए कहा कि वे दलित साहित्य की बजाय अम्बेडकरी अथवा अम्बेडकरवादी साहित्य षब्द को प्रमुखता देते हैं। और सही देते हैं। अम्बेडकर की विचारधारा और विमर्ष से उपजे साहित्य को अम्बेडकरवादी साहित्य ही कहा जाना चाहिए। आज जब हम सब गोश्ठी में दलित धर्म की अवधारणा एवं दलित संस्कृति की बात कर रहे थे तो क्रांति ने धर्म-संस्कृति पर जो विचार रखे वो आपने षुरू में पढ़ ही लिए हैं।

हमारी गोश्ठी में एकबार स्त्री-पुरूश समानता का विशय छिड़ गया तो क्रांति का न जाने कब से दबा आक्रोष का ज्वालामुखी फूट पड़ा-‘‘ मत करिये आप लोग स्त्री-पुरूश समानता की बातें! आप लोग दोहरे मापदण्ड अपनाते हैं। घर में कुछ और-बाहर कुछ और! महिलाओं के सामने कुछ और-उनकी पीठ पीछे कुछ और! इस पितृृृसत्तात्मक समाज में सारे अधिकार पुरूशों को ही दिये गये हैं। वंचित वर्ग के पुरूशों ने भी स्त्रियों को उनके अधिकारो से वंचित किया है। विडम्बना यह है कि जागरूक नहीं होने के कारण महिलाओं ने भी पितृृृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की कमान अपने हाथों मेें संभाल रखी है। और इस तरह से अपने पैरों में ही कुल्हाड़ी मार रही हैं। मैं तो बस्ती की महिलाओं से जाकर कहती हूं कि पितृृृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की अफीम के नषे में बेसुध महिलाओं जागो! अपनी अस्मिता को पहचानों। षोशण मुक्त समाज बनाओ।...मैं तो स्पश्ट कहती हूं कि मैं आप जैसे बुद्धिजीवियों पर भी विष्वास नहीं करती। आप लोग कागजों पर क्रांति करते हैं। अपने लेखन-भाशण में कुछ होते हैं-और असली जीवन में कुछ और! सच कहूं तो आप बुद्धिजीवी लोग बहुत घाघ होते हैं-बगुला भगत की तरहस्-जो मौके की तलाष में सन्त बने रहते हैं और मौका देखते ही मछली गप से अपनी चोंच में पकड़ लेते हैं। यूं मैं सभी बुद्धिजीवियों की बात नहीं कर रही हूं। अपवाद हर जगह होते हैं। किन्तु अधिकांष बुद्धिजीवी बहुत ही घाघ होते हैं। वे कहते कुछ हैं-करते कुछ हैं। अब आप अपने साथी दिनकर का ही उदाहरण लें। मैं अपनी मौसी के घर जा रही थी। दिनकर द्वारा बाईक पर लिफ्ट देने का आग्रह करने पर आपलोगों ने ही कहा था कि दिनकर का आॅफिस भी उधर ही है, वह तुम्हें बाईक से ड्राप कर देगा। आपकी बात मानकर मैं उसकी बाईक पर बैठ गई। आधे रास्ते में ही कहने लगा कि भूख लगी है, चलो किसी रेस्तरां में बैठकर कुछ खाते हैं। सुबह का समय था। मुझे भूख नहीं लगी थी। मैंने मना किया लेकिन वो नहीं माना। कहने लगा मुझे भूख लग रही है। मैकडोलैंड में बैठ कर वह विदेषी महिलाआंे, उनके खुलेपन की तारीफ करने लगा। फिर कहने लगा मैं आज आॅफिस की छुट्टी कर लेता हूं। कहीं घूमने चलते हैं। फिल्म देखते हैं। अपने बारे में बताने लगा कि मैं एक राश्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका में संपादक हूं। दिल्ली की अन्य प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों से भी मेरी जान-पहचान है। मुझे आप अपनी रचनाएं दीजिए मैं अपनी पत्रिका में भी छापूंगा और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपवाउंगा। और आप बहुत जल्द राश्ट्रीय स्तर की लेखिका बन जाएंगी। मैंने कहा मुझे छपास रोग नहीं है और न राश्ट्रस्तर की लेखिका बनने की ख्वाहिषमंद हूं। मैं एक सोषल एक्टिविस्ट हूं। मैं इसी कार्य को प्रमुखता देती हूं-यही मेरा लक्ष्य है। मैं समझ गई थी कि वह मुझे दाने डाल रहा है। यानी वह अपनी असलियत पर उतर आया था। षराफत और नारी-सम्मान की बात करने वाला चालीस वर्शीय दिनकर अपनी बेटी की उम्र की लड़की को पटाने पर आमादा था। मैने उसे अच्छी-खासी डांट पिलाई। मन तो कर रहा था उसके गाल पर तमाचा रसीद कर दूं। मैं वहां से उठकर सड़क पर आ गई और बस पकड़ कर मौसी के घर चली गई।’’

क्रांति ने हम से पूछा-‘‘अच्छा, क्या ये आवारा/लफंगा अभी तक कुंआरा है?’’

संदीप ने कहा-‘‘ क्रांतिजी, हम आपसे क्षमा चाहते हैं कि हमारा एक साथी आपके साथ इस तरह पेष आया। यों तो दिनकर हमारी गोश्ठी का सदस्य नहीं है। पर वह लेखक-संपादक है। हम लोग भी साहित्यिक रूचि के लोग हैं। इसलिए हमारी उससे मित्रता है। वैसे दिनकर षादी-षुदा है। उसके दो बच्चे भी हैं। पर वह लड़कियों को फ्लर्ट करता रहता है। हमें ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वह आपके साथ बदतमीजी से पेष आएगा।’’

‘‘ अगर मुझे पहले पता होता तो सैंडिल उतार के उसके वहीं बजा देती। उसकी वो गत करती कि लड़कियों को फ्लर्ट करना भूल जाता। मुझ से कह रहा था कि-‘मैं कुंआरा हूं। कोई अच्छी लड़की ही नहीं मिली। कोई आप जैसी लड़की मिल जाती तो षादी कर लेता...।’ ऐसी हरकतों से ही मेरा पुरूशों से विष्वास उठ गया है। हालांकि मैं मानती हूं कि सब पुरूश ऐसे नहीं होते। पर अधिकांष ऐसे ही होते हैं। ...वैसे कोई भी पुरूश मेरी मर्जी के खिलाफ मुझे भोग नहीं सकता। मैं चाहूं तो किसी मंदबुद्धि और कुरूप युवक के साथ भी सो सकती हूं और न चाहूं तो कोई फिल्मी हीरो जैसे स्मार्ट-हैंडसम बुद्धिजीवी युवक भी मुझे हाथ नहीं लगा सकता।’’

क्रांति की बात सुनकर इस से मिलता-जुलता रमणिका गुप्ता का कहीं पढ़ा हुआ संवाद दिमाग में कांैध गया। लगा कि बन्दी ये बिन्दास है।

क्रांति ने बातचीत में कहा था कि इस गोश्ठी के माध्यम से दिनकर जैसे लोगों के कटु अनुभव हुए हैं तो अनिता दीदी जैसी मार्गदर्षिका भी मिली हैं। मैं राज जी की आभारी हूं कि उन्होंने अनिता दीदी से मेरा परिचय कराया। अनिता दीदी से उसका तात्पर्य अनिता भारती से था। अनिता जी की दलित समाज में अच्छी पहचान है। वे सर्वोदय विद्यालय में वरिश्ठ अध्यापिका हैं। समाज-सेविका व लेखिका हैं।

हम अपनी साप्ताहिक गोश्ठी में समसामयिक दलित मुद्दों पर भी चर्चा करते रहते हैं। जैसे कानपुुर में बाबा साहब की मूर्ति तोड़े जाने पर या खैरलांजी कांड पर या हरियाणा के सालवन गांव में दलितों के घर जलाए जाने पर। क्रांति हमारी गोश्ठी मंे सक्रिय भागीदारी करती है। वह अपने विचार गोश्ठी में रखती है। वह पुरूशों पर आरोप लगाती है कि वंचित वर्ग के पुरूश भी सिर्फ पुरूश मुद्दांे को ही उठाते हैं स्त्री विशय पर विषेश तबज्जो नहीं देते। वह दलित समुदाय मंे व्याप्त अंधविष्वासों पर चर्चा करती है। उसका कहना है कि रूढ़िवादी एवं अंधविष्वासो में जकड़े होने के कारण वंचित समाज महिलाओं को जादू-टोना करने वाली डायन आदि करार देकर उन्हें

तिरस्कृत करता है।

सरे आम उनका अपमान करता है। उन्हें नग्न करके गांव में घुमाता है। दूसरी ओर वंचित वर्ग की महिलाएं सवर्णों की आसान षिकार होती हैं। उनसे बलात्कार करना सवर्ण अपना जन्मजात अधिकार समझते हैं। अगर वे विरोध करें तो उन्हें नग्नावस्था में गांव में घुमाया जाता है। उन पर तरह-तरह से अत्याचार किये जाते हैं। उन्हें जिन्दा जला दिया जाता है। उड़ीसा में एक लड़की को साईकिल पर चढ़ने नहीं दिया गया। वह साईकिल पर सवार होकर स्कूल जाती थी। हरियाणा में वंचित वर्ग की बारहवीं में पढ़ने वाली लड़की के साथ दबंग जाति के लोगों ने सिर्फ इसलिए बलात्कार किया और उसकी हत्या कर दी क्योंकि मना करने के बावजूद उसने पढ़ाई जारी रखी। वह अपने गांव में सर्वाधिक पढ़ी-लिखी लड़की थी। हमेषा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होती थी।

ऐसी घटनाआंें से स्पश्ट होता है कि दबंग जाति समुदाय को वंचितों का आगे बढ़ना सहन नहीं हो रहा है। उसे बर्दाष्त नहीं हो रहा है कि कल तक हमारी गुलामी करने वाले, हमारे इषारों पर चलने वाले आज पढ़-लिख कर हम से आगे बढ़ें। हमारी गुलामी करने से इन्कार करें।

स्पश्ट है कि क्रांति काफी जागरूक लड़की है। हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखती है। सच कहूं तो क्रांति ने मुझे इम्प्रेस्ड कर दिया था। मैंने क्रांति को षाम को अपने घर खाने पर बुलाया। उसने आना स्वीकार किया। दरअसल क्रांति के विचारों ने मेरे अन्दर जिज्ञासा पैदा कर दी थी। मैं उसके बारे में और अधिक जानना चाहता था।

षाम को क्रांति हमारे घर आई। मैंने पत्नी को क्रांति के बारे में पहले ही बता दिया था। अतः वह भी उस से मिलने को उत्सुक थी। उसके बारे में जानना चाहती थी। पत्नी ने उसके लिए भोजन तैयार किया।

औपचारिक अभिवादन के पश्चात् मैंने क्रांति को बैठने का संकेत करते हुए कहा-‘‘क्रांति तुम्हारे सामाजिक विचारों से तो कुछ-कुछ अवगत हूं। हम पति-पत्नी चाहते हैं कि तुम अपने निजी जीवन, परिवार आदि के बारे में बताओ।’’

‘‘देखिए राज जी, उन्नीस सौ अठासी ;1988द्ध में मेरा जन्म एक साधारण वाल्मीकि परिवार में दिल्ली में हुआ। मेरे पापा एम.सी.डी. में फोर्थ क्लास कर्मचारी थे। जब मैं सात-आठ साल की हुई तब से मम्मी-पापा को लड़ते-झगड़ते देखा था। दरअसल पापा बहुत दारू पीते थे और अन्य महिलाओं से अवैध संबंध रखते थे जो कि मेरी मां को पसन्द नहीं था। इसी विशय में घर में लड़ाई-झगड़े होते रहते थे। मेरे मम्मी-पापा ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। मम्मी-पांचवी छठी तक तथा पापा सातवीं या आठवीं तक पढ़े थे। मुझ पर उनके लड़ाई-झगड़े का बुरा पं्रभाव न पड़े इस लिए मम्मी ने मुझे गांव में नानी के पास भेज दिया था। गांव में नानी के अलावा मामा-मामी थे। नानाजी गुजर चुके थे। मामा-मामी नानी को दो रोटी भी टाईम पर नहीं देते थे। अतः नानी को गांव में पाखाने कमाने का कार्य करना पड़ता था। मामा को कभी गांव में मजदूरी मिल गई तो कर ली नहीं तो यों ही आवारा घूमते रहते या लोगों के साथ ताष खेलते रहते। मामी भैंस पालती थीं। उसका दूध बेच कर घर-खर्च चलातीं थीं...।’’

इस बीच पत्नी ने खाना तैयार कर लिया था। वे खाना लेकर आ गईं। हम तीनों खाना खाने लगे।

‘‘आपकी पढ़ाई की षुरूआत कैसे हुई?’’ मेरे यह पूछने पर क्रांति ने बताया-‘‘तीसरी कक्षा तक तो मैं दिल्ली में ही पढ़ी। फिर मां ने नानी के यहां भेज दिया। वहां नानी ने चैथी कक्षा में एडमीषन करवा दिया। मेरी नानी बूढ़ी हो चुकी थी। सिर पर मैला ढोने जैसे घृणित कार्य के एवज में नानी को रोटी मिलती थी। यूं यह गन्दा काम मुझे बिलकुल पसन्द नहीं था। पर मैं अपनी बूढ़ी नानी को यह सब करते देखती तो मुझे तरस आता। अपनी नानी की मदद करने के लिए मैं भी मैला साफ करने का कार्य करवाने जाती। फिर जल्दी से तैयार होकर स्कूल जाती। इस तरह दो साल मैंने गांव में रहकर पढ़ाई के साथ-साथ पाखाने साफ करने का कार्य किया। छठी पास करने पर मम्मी ने मुझे पुनः दिल्ली बुलवा लिया। और सातवीं में एडमीषन करा दिया।

इस बीच पापा किसी औरत को लेकर मुम्बई चले गये थे। और उन्होंने वहीं अपना घर बसा लिया था। पापा की एम.सी.डी. की नौकरी करके मम्मी घर का खर्च और मेरी पढ़ाई का खर्च चलाती थीं। गनीमत यह थी कि मकान हमारा अपना था। मैं अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान हूं। यूं सुना है दूसरी मां के भी बच्चे हैं पर मैंने उन्हें देखा नहीं। वे मुम्बई में रहती हैं। पापा जब से उसे लेकर गये तब से आज तक दिल्ली नहीं लौटे। मम्मी ने मुझे एक बेटे की तरह पाला और वो सारी छूट दीं जो हमारे समाज में लड़के को दी जाती हैं। लेकिन मैंने उनका मिसयूज कभी नहीं किया। मैंने अपना खाली समय अध्ययन करने में, लेखन मे, लोगों से मिलने में तथा पैंटिंग में बिताया। समाज सेवा के अलावा पैंटिंग और लेखन मेरा षौक है।

इधर मैं पढ़-लिख कर जागरूक हो रही थी। साथ ही कुछ सामाजिक लोगों से परिचय हुआ। कुछ अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलीं। इस से मेरा मानसिक विकास हुआ। जब मैं दसवीं में थी तब मैंने सरकार का सफाई कर्मचारियों के बारे में 1993 का एक्ट पढ़ा तो मुझे पता चला कि मैला ढोने की प्रथा गैरकानूनी है और इस पर प्रतिबन्ध है। इस कार्य के बदले सरकार की पुनर्वास योजना के बारे में भी पता चला। मुझे नानी का ख्याल आया। मेरी नानी बुढ़ापे में यह कार्य कर रही है। दसवीं की परीक्षा के बाद दो महीनें की छुट्टियों में मैं अपने ननिहाल गई। सरकार के संबंधित विभागों से संपर्क करके तथा काफी भाग-दौड़ करके मैंने सीनियर सिटीजन की उनको सुविधाएं दिलवाईं। सरकार की स्कीमों का लाभ उठाया। उनके दो रोटी आराम से मिलने का प्रबंध कराया। और अपनी नानी का मैला ढोने का कार्य छुड़वाया। इतना ही नहीं ननिहाल में मोहल्ले की अन्य महिलाएं जो मैला ढोने का कार्य कर रहीं थीं। उनको समझाया। उनका पुनर्वास करवाया। आज वे ये काम छोड़ चुकी हैं। पुनर्वास का लाभ लेकर अन्य सम्मानीय कार्य कर रही हैं।

अन्याय एवं षोशण के खिलाफ मेरे मन में एक आक्रोष-एक आग भरी हुई है। जब भी मैं अन्याय-षोशण देखती हूं तो मेरा खून खौलने लगता है। मुझ से रहा नहीं जाता और मैं बीच में कूद पड़ती हूं। हालांकि मुझे परेषानियों का सामना करना पड़ता है। पर मैं हिम्मत हारने वाली नहीं। अभी तो मेरे संघर्श की षुरूआत है। अभी मुझे बहुत पढ़ना है। अपने समाज के लिए बहुत कुछ करना है। अपनी जैसी बहनों को जागरूक करना है। अनपढ़ मां-बहनों का अंधविष्वास दूर करना है। उनके फिजूल के खर्चंे कम कराने हैं। उन्हें षिक्षा का महत्व समझाना है। मेरी बस्ती में महिलाएं पहले लड़का-लड़की में भेदभाव करती थीं। मैंने उन्हें समझाया कि यह गलत है। लड़का-लड़की बराबर हैं। व्यवहार में बेटियां बेटों से ज्यादा वफादार साबित होती हैं। मेरे समझाने का उन पर सकारात्मक असर पढ़ रहा है। अपने वंचित समाज को स्वाभिमान के साथ जीना सिखाना है। यही मेरे जीवन का लक्ष्य है। आप लोगों के साथ भी इसीलिए जुड़ी हुई हूं कि आप वंचित वर्ग के लिए कुछ करना चाहते हैं। आपकी करनी-कथनी में अन्तर नहीं है। आपके इरादे नेक हैं। पर मैंने इस छोटी-सी उमर में ही इतना अन्याय/अत्याचार देखा है कि मेरी जबान बहुत तीखी हो गई है। मैं किसी को बख्स नहीं पाती। आप इसे मेरा जोष भी कह सकते हैं। क्रांति ने घड़ी की ओर देखा। हम लोग खाना खा चुके थे। वह बोली-‘‘अरे घर जाने से पहले मुझे एक जरूरी काम करना है। यह कह कर वह उठ खड़ी हुई। मेरे स्टडीरूम में गई। मेरे दोनों बच्चे हर्श और मिली भी उसके साथ गये। क्रांति ने अपने बैग से मोमबत्ती के कुछ पैकेट्स निकाले। स्टडीरूम में लगे बाबा साहब के चित्र को नमन किया। फिर मोमबत्ती जलाने लगी। मिली बोली-‘‘दीदी ये आप क्या कर रही हैं?’’

‘‘मिली, आज 13 अप्रैल है। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के जन्म की पूर्व संध्या। इसलिए उनके चित्र और इन किताबों वाले कमरे में मोमबत्ती जला रही हूं।’’

हर्श बोला-‘‘दीदी मोमबत्ती क्यों जला रहीं हो?’’

‘‘देखो हर्श, जिस तरह से दो दीवाली होती हैं-एक छोटी दीवाली एक बड़ी दीवाली। ऐसे ही बाबा साहब का जन्म दिन एक त्योहार है-हम सब के लिए। जैसे दीवाली पर दीपक जलाते हैं-क्योंकि वह उजाले का पर्व होता है। उसी तरह बाबा साहब का जन्मदिन भी उजाले का पर्व है। ये पुस्तकें देख रहे हो-ये षिक्षा की प्रतीक हैं। ये इतनी सारी मोमबत्तियां संगठन का प्रतीक हैं। और इन मोमबत्तियों की ज्योतियां कमरे का अंधेरा दूर कर रही हैं-ये संघर्श का प्रतीक है। हमें अज्ञान का अंधेरा अपने अन्दर से मिटाना है। अर्थात् बाबा साहब ने जो तीन मूलमंत्र दिये हैं-‘षिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्श करो।’ उसे अपने जीवन में उतारना है।

इसके बाद क्रांति ने हम सब से विदा लेते हुए कहा-‘‘अच्छा, अब मैं चलती हूं। अपने बस्ती वालों के घर-घर जाकर बाबा साहब के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर बाबा साहब का महत्व समझाना है। आखिर उन्हें भी तो यह त्योहर मनाना है। और पूरे जोष तथा धूमधाम से मनाना हैै।’’ यह कहती हुई क्रांति चली गई। मैं कल्पना कर रहा हूं। क्रांति अपनी बस्ती में घर-घर जाकर मोमबत्तियों के साथ ज्ञान की ज्योति जला रही है। लोंगों के मन का अज्ञान-अंधेरा दूर भगा रही है। उन्हें स्वतन्त्रता, समता, लैंगिक समानता, बंधुता, आत्मसम्मान का पाठ पढ़ा रही है। बस्ती वालों के घरों एवं हृदयों में उजाला भर गया है। इस उजाले में पूरी बस्ती जगमगा रही है। क्रांति इस वंचित समाज में एक नई क्रांति की लहर जगा रही है।