टूटी कड़ियाँ RK Agrawal द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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टूटी कड़ियाँ

टूटी कड़ियाँ

मुम्बई की एक व्यस्त सड़क पर फर्राटे से अपनी बाइक दौड़ाते हुए समीर परेशान हुआ जा रहा था. 'आज फिर ऑफिस के लिए देर हो गयी.. पता नही बॉस क्या क्या बातें सुनाएंगे' सोचता हुआ वह अपने ऑफिस की तरफ बढ़ जा रहा था. ऑफिस पहुंचकर बॉस की गाडी न देखकर उसकी जान में जान आई. सोचा 'चलो आज तो बच गए, बॉस अभी तक आये नही हैं'. पर ऑफिस के अंदर कदम रखते ही कुछ सकपका गया. उसके कलीग्स ने बताया कि आज बॉस नही बल्कि उनकी वाइफ आई हैं ऑफिस देखने.
'समीर… वो नेक्स्ट वीक के क्लाइंट वाले प्रोजेक्ट के डिटेल्स तेरे पास हैं न' उसके दोस्त राजीव ने कहा.
''हाँ तो" समीर ने सर हिलाते हुए कहा.
"जा, ऑफिस में मैम बुला रही हैं"


ऑफिस पहुंचकर समीर ने देखा बॉस की वाइफ काफी पीती हुई खिड़की से बाहर के नजारों का लुत्फ़ उठा रही थी. लाल साड़ी में लिपटी हुई, स्टाइलिश अंदाज़ में कंधे तक कटे बाल, हाथो में सोने की पतली चूड़ियां और उँगलियों में डायमंड की नाजुक अंगूठियां देखकर ही कोई भी समझ जाता कि वह किसी संभ्रांत परिवार की महिला है.
"में आई कम इन मेम?" उसकी आवाज सुनकर वह बोली.
"यस कम इन प्लीज" वह बिना किसी भाव के बोली.
पर उसका चेहरा देखकर समीर के सारे हाव भाव ही बदल गए. उसके शरीर का खून जैसे सूख गया था. चेहरा ऐसे सफ़ेद पड़ गया जैसे किसी ने सैंकड़ों लीटर बर्फ का पानी उसके शरीर पर डाल दिया हो.
ये प्रणिता ही है या कोई और. नहीं..मुझसे उसे पहचानने में गलती नही हो सकती. ये मेरी प्रणिता ही है.
समीर सोच में डूबा था. तभी उसे एक कड़क आवाज़ सुनाई दी..
"मिस्टर समीर, आप मुझे नेक्स्ट वीक वाले प्रोजेक्ट की डिटेल्स दिखाएंगे प्लीज" उसके स्वर और चेहरे पर बेरुखी थी.
"ये क्या प्रणिता मुझसे ऐसे तो कभी बात न करती थी" समीर ने मन में सोचा. उसने घबरा कर फाइल आगे बढा दी. इस दौरान उसने प्रणिता के गले पर बाई ओर काले तिल का निशान देखकर इस बात कि पुष्टि कर ली कि ये प्रणिता ही है, वही लड़की, जिसने उसे जीना सिखाया था, प्यार का मतलब समझाया था, जिसके साथ जीने मरने की कसमे खाई थी और जिससे 4 साल पहले उसकी शादी होने वाली थी...पर शादी के दिन ही वह उसे छोड़कर भाग गयी थी. कितनी कोशिशें की थी उसे ढूंढने की, कहाँ कहाँ नही ढूंढा. किस किस मंदिर में उसके वापस आ जाने की प्रार्थना नही की. समीर जैसे पाषाण हो गया था पर लाख कोशिशों के बाद भी प्रणिता उसे नही मिली थी. और अब मिली है तो ऐसे..किसी और के नाम की लाल साड़ी में लिपटी हुई. किसी और के नाम का सिन्दूर माथे पर सजाये.
वह सोच में ही डूबा था कि फिर प्रणिता की एक दिल पर तीर चलती सी आवाज़ उसके कानों पर पड़ी.
"ओके मिस्टर समीर, मैंने डिटेल्स देख लिए हैं. आप प्लीज काम आगे बढाइये" ये कहकर वह टेबल पर पड़ी कुछ दूसरी फाइलों पर गौर करने लगी.
"ये क्या. ये इस तरह क्यों रिएक्ट कर रही है, जैसे ये मुझे जानती ही नही है, जैसे हमारे बीच कभी कुछ नही था, जैसे..जैसे मैं इसका कुछ भी नही हूँ .......या था " ढेरों सवालों से समीर के माथे की नसें दुखती चली जा रही थी. किसी काम में मन नही लग रहा था. वह कुछ सोचने समझने की हालत में नही था. ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर घर आ गया.
"कही मुझसे पहचानने में कोई गलती तो नही हो गयी. कहीं वो कोई और… नहीं नहीं ..ये नही हो सकता. समीर खुद को पहचानने में गलती कर सकता है पर प्रणिता को पहचानने में नही."
घर पहुचते ही वह कुदाली लेकर घर के पीछे वाले बगीचे में पहुँचा. चार साल पहले गुस्से में आकर उसकी सभी यादों को यही पर दफ़न कर दिया था. अब वक़्त आ गया है की मैं लोहे के उस बक्से को वापस निकालूँ जिसमे उसके दिए गिफ्ट्स, ग्रीटिंग कार्ड्स, तस्वीरें, उसके लेटर्स सभी कुछ था. सोचता हुआ समीर बगीचे के एक खास पॉइंट पर जा रुका और तेजी से उस जगह को कुदाली से खोदने लगा. इस दौरान वह इतनी हड़बड़ाहट में ज़मीन को खोदे जा रहा था की उसके पूरे चेहरे पर पसीने की बूंदे छलछला आई थी. पर वह लगातार खोदता रहा जब तक की उसे वह बॉक्स दिखाई नही दे गया.
बक्से को देखते ही वह कुदाली एक तरफ फेककर जमीन पर घुटनो की सहायता से बैठ गया और झटके से बक्से को बाहर निकाल कर उसे खोला. बॉक्स खोलते ही ताजे गुलाब की खुशबु से समाँ महक उठा. हाँ, उसके गिफ्ट किये हुए परफ्यूम की ही खुशबु थी ये. समीर को अच्छी तरह याद है जब उसने ये परफ्यूम देकर कहा था कि मैं रहूँ या न रहूँ, तुम्हारी ज़िन्दगी गुलाबों की तरह महकती रहे.


"कैसी बातें करती हो प्रणिता, हम जियेंगे तो साथ और मरेंगे तो साथ" समीर ने उसे गले लगा लिया था.
मोगरे के फूलों का सूख चूका गजरा, किसी में मेंहगी चॉकलेट का रेपर, छोटे से संगमरमर के टुकड़े पर लिखा हुआ 'प्राण- सम', चमकीली चूड़ियों के टुकड़े, वैलेंटाइन और बर्थडे के ग्रीटिंग कार्ड्स और अनगिनत लेटर्स जिनमे से एक पर लिखा था, “Pranita Weds Samir on 19th July”
हाँ ये उसका आखरी खत था, चार साल पहले जब उन्होंने घर से भागकर उसी गणेश मंदिर में शादी रचाने की डेट फाइनल की थी जहाँ वे अक्सर जाया करते थे.
वह तो शादी के लिए निर्धारित समय पर पहुँच गया था लेकिन प्रणिता नही आई थी. वह सारा दिन मंदिर में विवाह के कपड़ों में बैठा उसका इन्तजार करता रहा था. उसे कई फोन लगाए थे पर प्रणिता का फोन स्विच ऑफ था. हारकर वह शाम को अपने घर वापस आ गया था और घरवालों की हजारों जली कटी बातें सुनी थी.
अगली सुबह प्रणिता के घरवाले शोर शराबा करते हुए उसके घर पहूँच गए थे.
"यहीं रहता है वो कमीना, वही मेरी बेटी को भगा कर ले गया होगा, उसी ने उसे बंदी बनाया होगा" बाहर से इस तरह की बातें सुनकर समीर का दिल धक् से रह गया था. उसने खिड़की से झांककर देखा तो प्रणिता के पापा पुलिस को साथ लिए उसके घर के करीब ही थे. उसकी तो जैसे जान सूख गयी. पुलिस ने दरवाजा खटखटाया तो समीर के पापा ने दरवाजा खोला. पुलिस को देखकर वे चौंक गए.
"मिस्टर ब्रह्मर्षि, हमें खबर मिली है की आपका बेटा इनकी बेटी को भगाकर ले गया है. हमे आपके घर की तलाशी लेनी होगी" समीर के पापा अवाक् रह गए.
"पर मेरा बेटा तो घर पर ही है" उन्होंने होश सम्हालते हुए कहा.
"ओहो, तो मेरी बेटी को अगवा करके ये कमीना अपने घर में रह रहा है, इंस्पेक्टर साब तलाशी लीजिये घर की. मेरी बेटी यही कही छुपाकर रखी गयी होगी" प्रणिता के पापा गुस्से में आग बबूला हुए जा रहे थे.
"लेकिन अंकल हुआ क्या है" समीर ने हिम्मत जुटाते हुए पूछा.
"क्या हुआ है. एक तो मेरी बेटी को किडनैप कर लिया उस पर कहता है कि क्या हुआ है. कल सुबह 10 बजे घर से निकली है वो और अब तक वापस नही आई." समीर की आँखें फटी की फटी रह गयीं.
"सर, हमने घर की तलाशी ले ली है. यहाँ कोई लड़की नही है" हवलदार की बात सुनकर इंस्पेक्टर ने आदेश दिया, "इस लड़के को थाने ले चलो, ये वहीं सच्चाई उगलेगा"
'सर मेरी बात तो सुनिये, वह तो मुझसे कल मिली ही नही है' माँ बाप का उतरा चेहरा देखकर समीर गिड़गिड़ाया, "मेरी कोई गलती नही है सर, प्लीज मुझे थाने लेकर मत चलिए"
"अब तुम्हे जो भी कहना है, जो भी बात करनी है, वहीं करना, ले चलो इसे" इंस्पेक्टर ने कड़क रुख अपनाया.
उसके बाद समीर को थाने में बिताये अपने 3 दिन याद हैं. तरह तरह के पुलिस वालों ने उस से 3 दिन तक तरह तरह के सवाल किये. सारी जांच पड़ताल और पूछताछ के बाद उन्हें स्पष्ट हो गया की प्रणिता के गायब होने में समीर की कोई भूमिका नही है. उसके माँ बाप ने खफा होकर उसे अकोला से मुम्बई, उसकी बुआ के घर भेज दिया था. यहाँ पर बाकी की पढाई पूरी कर, एक अच्छी नौकरी ढूंढ लगन से काम कर रहा था.
पर प्रणिता गयी कहाँ, ये सवाल उसे आज तक खाये जा रहा था. और आज जब वह मिली भी तो कई नए सवाल उसके दिमाग में कौंध रहे थे.
"वह वाकई मुझे नही पहचान पाई या जानकर अनजान बन रही है. मुझपर जान छिडकने वाली लड़की ऐसे रियेक्ट कर रही थी जैसे वह मुझसे पहली बार मिल रही हो. कही ऐसा तो नही कि मेरे बॉस की बीवी होने के रुतबे ने उसे घमंडी बना दिया. पर वह मुझे प्यार करती थी और मुझसे शादी करना चाहती थी तो उसने मेरे बॉस से शादी क्यों की? उसके घरवालों को तो वह उस दिन के बाद मिली ही नही थी जिस दिन वह मुझसे शादी करने गणेश मंदिर आने वाली थी, फिर ये नई कहानी....ओह अब समझा...उस चालाक लड़की ने सबको धोखा दिया है. वह धन दौलत और रुतबे के चक्कर में मेरे बॉस से शादी कर बैठी और आज अचानक मुझे देखकर इसलिए मुझे न पहचानने का नाटक कर रही थी की मैं उसे अपने प्यार की कसमें वादे याद न दिलाऊँ" समीर की सोच कल्पनाओ की उड़ाने भर रही थी. जितना वो सोचता उतना ही डूबता जाता. उसका सर फटा जा रहा था.
अगली सुबह समीर ने ऑफिस जाने का मन तो बनाया था पर रिजाइन लेटर देने के लिए.


"मैं ऐसी दगाबाज लड़की के पति के अंडर काम नही कर सकता. अगर वो मुम्बई में रहती है तो मैं ये शहर छोड़कर चला जाऊंगा. शक्ल नही देखूंगा दुबारा उसकी."
ऑफिस जाते ही उसने बॉस की टेबल पर रिजाइन लेटर रख दिया था. बॉस किसी काम में बिजी थे और उन्होंने कहा की वह जो डॉक्यूमेंट लाया है, वे उसे बाद में चेक कर लेंगे. फिर शाम को बॉस ने उसे अपने केबिन में बुलाया और कहा, "तो तुम अपने जॉब से रिजाइन देना चाहते हो?"
समीर ने हाँ में सर हिलाया.
इस अचानक लिए गए फैसले की कोई खास वजह? बॉस ने प्रश्नवाचक दृष्टि समीर की और फेंकी.
"सर, अकोला में मेरे पापा ज्यादा बीमार रहने लगे हैं, तो मैं अपने होमटाउन जाकर ही कोई काम करना चाहता हूँ" समीर बात करने के मूड में नही था.
"ओके फाइन मिस्टर समीर, मैं आपका रिजाइन लेटर एक्सेप्ट कर लेता हूँ पर मेरी एक शर्त है" बॉस की बातें संदेहास्पद हो चली थीं.


"कैसी शर्त सर" समीर ने बेमन से कहा था.


"तुम मेरे ऑफिस के एक होनहार वर्कर रहे हो. मैं चाहता हूँ कि काम छोड़ने से पहले तुम एक दिन मेरे घर आकर मेरे साथ डिनर करो" यह अप्रत्याशित प्रस्ताव समीर को परेशान कर गया. बॉस के घर पर तो प्रणिता... नही, नही, मैं कैसे जा सकता हूँ. ये सोचकर समीर ने बॉस से कुछ कहना चाहा, तभी बॉस ने कहा, "मुझे नही लगता कि तुम्हे मेरे घर आकर डिनर करने में कोई आपत्ति होगी. तो फिर कल शाम 8 बजे, मैं ऑफिस के बाद पार्किंग में तुम्हारा इन्तजार करूँगा", इस से पहले कि समीर बॉस से कुछ कहता, वे तेजी से बाहर निकल गए. उसे बॉस का ये व्यवहार बदला हुआ लग रहा था. इस से पहले कभी उसने बॉस को किसी से इतना दोस्ताना व्यवहार करते हुए नही देखा था.


दूसरे दिन शाम को तयशुदा समय पर समीर बॉस को मिला और उनकी कार में बैठकर उनके घर की ओर बढ़ा. सारे रास्ते उसके और बॉस के बीच में एक दो औपचारिक बातों के अलावा कोई बात नही हुई. करीब 15 मिनट ड्राइव करने के बाद बॉस का बँगलानुमा घर आ गया था. करीब ढाई तीन साल कि एक प्यारी सी बच्ची दौड़ती हुई बॉस से आ लिपटी.
"पापा, पापा, आप आ गए, मेले लिए तोकलेत लाये?" बॉस ने उसे गोद में उठाकर दुलार किया और पॉकेट से निकाल कर एक चॉकलेट उसके हाथ में रख दी. शक्ल से बच्ची बिलकुल प्रणिता कि तरह मासूम और खूबसूरत लग रही थी.
"आ गए आप" प्रणिता मुस्कुराती हुई बाहर आई और बच्ची को बॉस कि गोद से लेते हुए बोली,
'वेलकम मिस्टर समीर, चलिए डिनर रेडी है'
समीर के दिल पर जैसे हजारों पत्थर बरसा दिए गए हों. 'क्या चालाक लड़की है, ऐसे बिहेव कर रही है जैसे मुझे जानती ही न हो' समीर का मन जलता हुआ लावा हुआ जा रहा था.


'बस आज आखिरी बार बर्दाश्त कर रहा हूँ, आज के बाद इसकी शक्ल भी नही देखनी पड़ेगी'
सोचता हुआ समीर घर के अंदर गया.
घर बड़े ही करीने और चाव से सजाया गया था मगर उसमे उस प्रणिता की पसंद के कोई रंग नही थे जिस प्रणिता को वह जानता था. थीम भी बिलकुल अलग ही रखी गयी थी. यह देखकर उसे कुछ अटपटा सा लगा, क्या उसके साथ साथ प्रणिता अपनी पुरानी सारी आदतों, पसंद और तौर तरीकों को भी धोखा दे रही है. आज उसे थोड़ा ध्यान से देखा तो महसूस किया कि पुरानी वाली प्रणिता के साड़ी पहनने का ढंग और इस प्रणिता के सारी लपेटने के स्टाइल में भी जमीन आसमान का फर्क है.


फिर उसने खुद को देखा, वह नीली डेनिम कि फुल बाहों कि शर्ट के साथ महँगी फॉर्मल टाई बांधे हुए था. 'ये मैं क्या क्या सोच रहा हूँ, मैं भी तो कितना बदल गया हूँ. वह अक्सर मेरी आधी बाँहों वाली शर्ट्स की ही तो तारीफ किया करती थी. 4 सालों में अगर वो बदली है तो मैं भी तो कितना बदला हूँ. बस फर्क इतना है कि वो मेरी मोहब्बत भूल गयी और मैं उसकी दगाबाजी न भूल पाया' समीर ख्वाबों में ही डूबा था. तभी बॉस की आवाज़ से उसकी तन्द्रा टूटी.


"डिनर इज रेडी समीर, लैट्स स्टार्ट" बॉस ने गर्मजोशी से उसका स्वागत किया.
"हम्म" इतना कहकर वह बॉस के पीछे डाइनिंग रूम की तरफ बढ़ गया.
खाने में एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजनों का संग्रह डाइनिंग टेबल को सुशोभित कर रहा था. एक यही बात उसे अपनी पुरानी प्रणिता से मेल खाती लग रही थी. उसके हाथ के खाने की खुशबु वह दूर से ही पहचान सकता था. इसका मतलब ये वही प्रणिता है.. उसकी ज़िन्दगी में सब कुछ वैसा ही है बस 'समीर' नाम का पन्ना गायब है.


खाने की टेबल पर बातों और व्यवहार से बॉस का रवैया समीर को बॉस वाला कम, दोस्ताना ज्यादा लगा. प्रणिता बच्ची को सुलाने ऊपर वाले फ्लोर पर चली गयी थी. बॉस ने समीर से पूछा, "खाना कैसा बना है"
समीर ने जवाब में कहा, "स्वादिष्ट है, मटर पनीर, फुल्के, स्टफ्ड टोमेटो, शाही पुलाव, हर चीज बहुत करीने से बनाई गयी थी"
बॉस मुस्कुरा दिए. उन्होंने कहा, 'प्रणिता में बात ही कुछ ऐसी है. उसकी हर चीज में कलात्मकता है. जो भी उसे देखता है, तारीफ किये बिना नही रह पाता'
समीर सकपका गया. बॉस उस से प्रणिता के बारे में क्यों बात कर रहे हैं.


बॉस बोलते रहे, 'चार साल पहले एक खाई में गिरी कार में दुल्हन के लिबास में मिली थी मुझे वह. भाग्य से मैं उसी खाई के नीचे की तरफ स्थित नदी के दूसरे किनारे पर अपने फोटोग्राफी के शौक को पूरा कर रहा था, प्रणिता नदी में बह गयी थी. मैं तैर कर गया और उसे बचा लाया. हॉस्पिटल में एडमिट करने के बाद वह फिजिकली ठीक हो गयी, पर उसकी याददाश्त चली गयी थी. वह कौन है, कहाँ से आई है, पता नही चला.' समीर के ऊपर जैसे कोई हथोड़े पर हथोड़े पटके जा रहा था. प्रणिता के साथ इतना कुछ हो गया था, और वह उसे गलत समझ रहा था. वह दुल्हन के लिबास में थी मतलब वह उस से शादी करने के लिए घर से निकली थी, पर रास्ते में उस के साथ हादसा हो गया.


अब समीर अपने आप को बहुत गिरा हुआ महसूस कर रहा था, जो उसने अपने प्यार पर शक किया.
बॉस का बोलना ख़त्म नही हुआ था, उन्होंने आगे कहा, 'उसके पर्स से मिले एक लव लेटर से मैं इतना ही जान पाया कि ये और उसका प्रेमी एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे. उसी लेटर से मुझे इसका नाम प्रणिता पता चला और मैंने इसका नाम नही बदला. उसकी देखभाल करते हुए बहुत दिनों तक मैने कोशिश की कि इसकी याददाश्त वापस आ जाये, पर उसे अपने घर, परिवार और प्रेमी के बारे में कुछ भी याद नही आया. तब तक मुझे भी उस से प्रेम हो चुका था और अंतत: मैंने उस से शादी कर ली' समीर की आँखें फटी की फटी रह गयी. सच तो उसके लिए कड़वा था ही पर वह ये भी नही समझ पा रहा था कि बॉस उसे ये सब क्यों बता रहे हैं. क्या उन्हें पता चल गया है कि......


बॉस ने आगे कहा, 'मुझे पता है तुम क्या सोच रहे हो, यही न कि मैं तुम्हे ये सब क्यों बता रहा हूँ. दरअसल कल जब तुम मुझे ऑफिस की फाइल दिखाने आये थे तो तुम्हारी डायरी से ये लेटर गिर गया था. ये प्रणिता के द्वारा तुम्हे लिखा हुआ एक लेटर है जो शायद तुम उसके मुह पर मारने वाले थे. तुम्हे लगा था कि कल भी वह मेरी जगह ऑफिस आयेगी. पर उसे न देखकर, मुझे देखकर तुमने रिजाइन देने का मन बना लिया, और मुझे रिजाइन देने आ गए, है न' समीर अवाक रह गया.
"बॉस ने कहना जारी रखा, "मैं जान गया था कि मेरी प्रणिता के प्रेमी तुम्ही हो. तुम उसे गलत समझ रहे हो. तुम रिजाइन देकर चले जाते तो उसे हमेशा गलत मानते रहते इसलिए सच्चाई तुम्हारे सामने लानी जरुरी थी"
समीर शांत खड़ा था. अब उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे. उसने बॉस के आगे अपने दोनों हाथ जोड़ दिए. "आपने प्रणिता की जान बचाकर, फिर उस से शादी करके उसे सहारा देकर बहुत अच्छा काम किया है सर. इसके लिए मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूँ"


बॉस ने उसके हाथ पकड़ लिए, 'माफ़ी तो मुझे भी तुमसे मांगनी चाहिए, मैंने प्रणिता से शादी कर ली और तुम्हारा प्यार अधूरा रह गया'


'नही सर, मैं खुश हूँ की प्रणिता आपके साथ खुश है. फूल सी प्यारी बच्ची है आप दोनों की. इस से ज्यादा मैं क्या सोच सकता हूँ. अब चलता हूँ सर, गुड नाईट'
समीर तेजी से बॉस के घर से बाहर आ गया. अब तक दिल में धधक रहा लावा, शांत हो गया था और दिल में संतोष की नदी बह रही थी.