अब तो निपटा दो DR. SHYAM BABU SHARMA द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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अब तो निपटा दो

अब तो निपटा दो

धन्नियों से लटके ललउवा के षव से लिपटा उसका बाप रज्जन कभी बेटे की निकली आंखों और लटकी जीभ की ओर देखता तो कभी गांव के खैरख्वाह जबर बुद्धन सिंह और षंकरदयाल की ओर। आंखों के आंसू सूख चुके थे। बुढ़ापे का चिराग धोखा दे गया था।

पत्नी के साथ रज्जन बेटे के विवाह की तैयारियां कर रहा था। धन से गरीब मगर दिल से राजा देवी सिंह सरीखा खर्चीला स्वभाव।

विपन्न गला काट-काटकर पैसा नहीं इकठ्ठा करते सो उदारमना होते हैं। गाढ़े-संकरे एक-दूसरे की मदद करना इनका सामान्य स्वभाव। ये दिखावे के लिए दान का ढ़िंढोरा नहीं पीटते। जब किसी ने रज्जन को काम के लिए बुलाया हां के सिवा उलट के जवाब न दिया था।

आज विधाता ने जो विपत्ति डाली उसमें कोई उसका हितू नहीं। समस्याएं, परेषानियां तो बड़ों की हैं। उनके साथ संवेदनाओं, सहानुभूतियों की फेहरिष्त है। गरीब का दुख कहां? उसका जनम ही दुखों के लिए, तो काहे की हमदर्दी?

पंच अपना सुविधा षुल्क लिए बिना पंचनामें के लिए तैयार न थे। ललउवा के जेब से तिरासी रुपये निकले जो उसने फांसी लगाने से पहले रिक्षा चलाकर कमाए थे।

रमरतिया के पास तीस बरस पुराना मंगलसूत्र रखा था। जिसको गोद में पाला था उसे गवां देने की पीड़ा वही समझ सकती थी। रज्जन को कोई उपाय नजर न आ रहा था।

’बच्चा तो चले गए, अब किसके लिए मरना-खपना’

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बचनी सोनार के हाथ मंगलसूत्र पांच सौ रुपये में बेचकर उसने पंडित काका और ठाकुर दादा को सौ रुपये देकर पंचनामा कराया।

लाष गांव से निकली ही थी कि चैराहे पर घात लगाये पुलिस वाले पीछे लग लिए। चढ़उका चढ़ाकर ट्राली आगे बढ़ी।

हां हूजूरी और सौ रुपये देने पर भी लाष का पोस्टमार्टम रोक दिया गया।

चीर घर में ललउवा की लाष का पांचवा नम्बर था। सूर्य देव भी साथ देने को तैयार न थे। सूर्यास्त के पष्चात लाष को गंगा में प्रवाहित नहीं किया जा सकता था।

चीर घर का कर्मचारी रज्जन के कान में कुछ फुसफुसा गया।

वह सीधे अंदर जाकर डाॅक्टर के पैरो में सिर रख तीन सौ तिरासी रुपये देते हुए कहने लगा

’..................साहब अब तो निपटा दो।’