फिर मिलेंगे Brajesh Prasad द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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फिर मिलेंगे

सितंबर महीने के वो कुछ आखिरी दिन थे. शिलोंग में मानसून खत्म होने को थे और ठंड दस्तक देने को तैयार. पहाड़ो से नीचे उतरते सफ़ेद बादलो का हुजूम|. बारिश की बूंदों से पूरी तरह धुल चुके पत्तो पे पड़ती सूरज की किरणे मन में भ्रम पैदा कर रहे थे. एक ऐसी अलग रहस्यमय दुनिया की जो न जाने कितने रहस्य अपने आप में समेटे हुए हो. आसपास फैले फूलों की रूहानी महक से सारी फ़िज़ा रूमानी हो चुकी थी. निखिल के लिए ये सबकुछ नया नहीं था पिछले एक सालो में शिलोंग के ये खूबसूरत वादियॉ उसके दिलोदिमाग में रच बस चुके थे. स्कूल में फाइनआर्ट्स के टीचर होने के नाते बच्चो को पढ़ाने के बाद जितना वक़्त निखिल के पास बचता वे सारे वक़्त पहाडियों पे बने एक कॉटेज पर बीतता. पहाडों के बीच बीतते वक़्त के साए में निखिल की कल्पनाए उड़ान भरते और वो उन कल्पनाओ को कैनवास पर उतार देता. रंगों से अटी पड़ी निखिल की रंगबिरंगी दुनिया . रोज़ की तरह अपना काम करके निखिल स्कूल से निकला ही था की फ़ोन की घंटी बजी. अननोन नम्बर था. निखिल ने फ़ोन उठाया. हेलो! हेलो निखिल! किसी लड़की का फ़ोन था......... हाँ बोल रहा हूँ.....दूसरी तरफ से आवाज़ आई, मैं मिताली., इतना सुनते ही निखिल के बदन में सिरहन सी फ़ैल गई., निखिल के जबान से कुछ देर तक बोल ही नहीं फूटे. तभी दूसरी तरफ से आई से आवाज़ ने आगे कहा – मैं कल गुवाहाटी आ रही हूँ नार्थईस्ट एक्सप्रेस से | 9 बजे गुवाहाटी पहुंचेगी ट्रेन, मिल जाना....,. और फ़ोन कट गया....., मिताली से मुलाकात हुए निखिल को एक साल हो गए थे. निखिल मिताली को फ़ोन करके पूछना चाहता था की तुम्हे मेरा नंबर किसने दिया? क्यों आ रही हो? कितने दिनों के लिए? और भी तमाम बातें पर उसकी हिम्मत नहीं हुई दोबारा उसे फ़ोन करने की. कही न कही निखिल भी मिताली से मिलाना चाहता था. इन एक सालों में दोनों की राहें भले ही अलग हो गई हो लेकिन निखिल मिताली के लिए जो महसूस करता था वो आज भी बरकरार था ....निखिल को मिताली से हुई आखिरी मुलाकात का मंज़र याद आ गया. दिल्ली का फॅमिली कोर्ट दोनों एक दुसरे के पास बैठे थे...., पास मगर फिर भी बहुत दूर........ आज तलाक़ के लिए फैसला होना था. दोनों पक्षों को सुनने के बाद में जज दोनों के तलाक़ के फैसले पर मुहर लगा दी थी. वो आखिरी बार था जब उसने मिताली को देखा था.....

आज निखिल अपने कॉटेज से बहार नहीं निकला..जिन यादों को निखिल ने अपने दिल के घुप अँधेरे कमरे में बंद रखा था..आज वही यादें बाहर आ चुकी थी.. न चाहते हुए भी निखिल इन यादों में बहता जा रहा था किसी बहते अविरल धारा की तरह...बहते बहते ये धारा उसे ले आई थी उस शहर में जहाँ उसने अपनी ज़िन्दगी की खूबसूरत शुरुआत की थी............................, दिल्ली ,........ दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स में एडमिशन मिलने से बहुत खुश था निखिल...वो हमेशा से यहाँ पढ़ना चाहता था.., आज उसकी ख्वाबो ने हकीकत की शक्ल ली थी....आज कॉलेज का पहला दिन था बाकी किसी नए कॉलेज स्टूडेंट की तरह निखिल भी आज बहुत एक्स्साईटेड था.......नए दोस्त, नई जिंदगी...इसी उत्साह के साथ निखिल घर से निकला था.. आधे रास्ते पंहुचा ही था की अचानक मौसम ने करवट ली और तेज बारिश शुरू हो गई.....अचानक शुरू हुई बारिश से राह चलते लोग इससे बचने के लिए यहाँ वहां जगह ढूढने लगे जिसको जहा आसरा मिला वही हो लिया.......बारिश में पूरी तरह भींग चुके निखिल ने भी सामने बनी बस स्टैंड में आश्रय लेना ठीक समझा....निखिल भागता हुआ वहाँ पहुचने की कोशिश करने लगा. तभी अचानक उससे जोर से कोई टकराया और निखिल ठोकर खाकर वही गिर गया...अपने आप को सँभालते हुए आगे की तरफ देखा ही था की उसके सामने एक गुस्से से भरा चेहरा उसे घूर रहा था.. बारिश में पूरी तरह भींग चुकी वह एक खूबसूरत चेहरा.....पानी की बुँदे बालों से होते हुए दोनों आँखों के बीच से रास्ता बनाते हुए गोल नुकीलीदार नाक के कोने से टपक रही थी....तभी एक आवाज़ आई – देखकर नहीं चल सकते?? अंधे हो?? मेरा सारा सामान गिरा दिया...निखिल अभी भी बेसुध उसे देख रहा था.. अब देख क्या रहे हो ? मेरी मदद करो इसे उठाने में.. लड़की ने गुस्सा करते हुए कहा , निखिल हडबडाहट में उठा और वहाँ बिखरे सामानों को समेटने लगा. बिखरे सामान को समेट कर आगे की तरफ बढ़ाते हुए कहा- सॉरी मैंने जल्दबाजी में आपको नहीं देखा और आप से टकरा गया. लड़की ने थोडा तुनकते हुए कहा – रहने दो मैं खूब समझती हूँ तुम जैसे लडको को , इतना कहकर वो आगे की तरफ चल दी.. बारिश भी अब लगभग थम चुकी थी. निखिल जैसे ही आगे बढ़ा था की उसकी नजर सामने पड़ी उस मोबाइल पर पड़ी जो वही ज़मीं पर गिरा पड़ा था.... शायद उसी लड़की का था जिससे वो टकराया था.. मोबाइल उठा कर निखिल ने इधर उधर देखा, शायद उसकी नजर उस लड़की को ढूढ़ रही थी..पर अब वो यहाँ नहीं थी जा चुकी थी..निखिल ने उस मोबाइल को अपने पास ही रखना ठीक समझा...., निखिल किसी तरह भागता भागता अपने कॉलेज पहुंचा.... सारा दिन वही गुस्से से भरा चेहरा निखिल के आँखों के सामने घूमता रहा..., वो गुस्से में डांटता खूबसूरत चेहरा......शायद जिस्मानी चोट से ज्यादा चोट निखिल के दिल पे लगी थी.... काया तो यहाँ था पर उसका साया वही ठहर गया था शायद उसके इंतज़ार में............., तभी निखिल को उस मोबाइल का ख्याल आया जो उसे वहाँ मिला था.... झट से उसने बैग से मोबाइल निकाला और उसे देखने लगा.........,उसे उम्मीद थी की शायद इससे उस लड़की के बारे कुछ पता चल सके..., पर सारी कोशिशे नाकाम साबित हुई... उस वाकये को हुए आज दो हफ्ता बीत गया था निखिल अभी तक उस लड़की का कुछ पता नहीं लगा पाया था.........., पर आज फिर उसकी किस्मत करवट लेने वाली थी और अनचाही मुलाकातों का सिलसिला आज फिर से आगे बढ़ने वाला था……………….आगे कहानी जारी है