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Jeeney ki Raah

जीने की राह

(सच्ची घटनाओं पर आधारित कहानी संग्रह)

लेखिका

डॉ0कविता रायज़ादा

एम0ए0,एम0कॉम0,पी—एच0डी0(हिन्दी)

अर्पण

परम श्रद्धेय पूज्यनीय, अर्चनीय, स्नहेमय, मेरे हृदय के अति निकट मेरे पिता श्रद्धेय स्व0 डॉ0 बाबूलाल वत्स जिनके प्यार दुलार में मेरा बचपन बीता, जिनकी उॅगली पकड़ मैंने चलना सीखा ।

उनकी स्मृतियों को शत—शत नमन करते हुए सामाजिक सुगंध से भरा गुलदस्ता कहानियों के रूप में बड़ी ही विनम्रता से समर्पित कर रही हॅू जिसकी सुखद अनुभूति मेरे साथ—साथ आपको भी होगी।

जीवन परिचय

नाम डॉ0 कविता रायज़ादा

पिता का नाम डॉ0 बाबूलाल वत्स

माता का नाम श्रीमती चन्द्रकान्ता वत्स

पति का नामश्री आर0 पी0 रायज़ादा

जन्म तिथि 5 अप्रैल 1968

शैक्षिक योग्यता एम0कॉम0,एम0ए0, हिन्दी,पी—एच0डी0

व्यवसाय डी0ई0आई0,डीम्ड विश्वविद्यालय,दयालबाग

282005 में लगभग 23 वर्षो से

पता 37 सी,श्यामजी विहार,सरलाबाग

एक्सटेंशन रोड

दयालबाग,आगरा — 282005

ई मेल तंप्रंकंणंअपजं5/हउंपसण्बवउ

दूरभाष नं0 09319769552, 09897062222

रेडियो आगरा आकाशवाणी में सन्‌ 1988 से

2005 तक उद्‌घोषक एवं लगभग 500

विषयों पर महिला संसार एवं युववाणी

कार्यक्रम में वार्ता। साथ ही समय—समय पर

कहानी काव्य पाठ हास्य वार्ता एवं गीतों

भरी कहानी का वाचन ।

नाटक बी ग्रेड कलाकार में चयन,ं

‘कसक जिन्दगी की‘ एवं ‘नागमती‘

नाटक में सहभागिता

सम्मान : 50 राष्ट्र्‌ीय एवं 7 अन्तरराष्ट्र्‌ीय सम्मान

नामांकन : पदम श्री सम्मान हेतु 2014 में नामांकन

गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा।

: वूमेन ऑफ द ईयर सम्मान हेतु 2003 में

नामांकित ,अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीट्‌यूट,

इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ रिसर्च द्वारा।

दूरदर्शन : आगरा के इन टी0वी0 चैनल पर सन्‌

2000 से 2003 तक समाचार

उद्‌घोषिका ।

: सावधान इण्डिया‘लाइफ ओके चैनल पर

12—11—12 को प्रसारित होने वाले एपीसोड में

डीआईजी वाइफ का रोल अदा किया ।

सामाचार संपादक : चित्रांश जागृति ,आगरा में समाचार

स्ांपादिका

म्ांच संचालन : राष्ट्र्‌ीय एवं अन्तर्राष्ट्र्‌ीय स्तर पर

लगभग 100 बार मंच संचालन ।

ताशकंद, समरकन्द दुबई, आबू धाबी,

जोहेनिस्बर्ग, केप टाउन,कोलंबो, श्री

लंका, ताज महोत्सव,संगम कला ग्रुप,

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा

,चित्रगुप्त परिषद्‌,इंटरनेशनल इंस्टीट्‌यूट

ऑफ फैशन टैक्नोलॉजी,ऑल इंडिया

प्रकृति डांस एकेडमी,ए0आई0पी0सी0

सदस्य : अध्यक्ष,कायस्थ महापरिषद्‌ ्‌,ब्रज खण्ड,

जयपुर ।

: अध्यक्ष, अखिल भारतीय कायस्थ

महासभा, महिला शाखा, आगरा ।

: उपाध्यक्ष, चित्रगुप्त परिषद्‌, आगरा ।

: सदस्य, सिस्टम सोसायटी ऑफ इण्डिया,

तिरूवनन्तपुरम ।

: सदस्य, महानगर लेखिका समिति, आगरा ।

: सदस्य,उ0प्र0 लेखिका मंच, आगरा ।

समाचार संपादक ‘चित्रांश जागृति‘, मासिक, आगरा ।

संपादक : यशस्विनी 2006

: स्पंदन 2009

नाटक लेखन 10 नाटको का निर्देशन एवं मंचन ।

समीक्षा 5 किताबों की समीक्षा ।

समाज सेवा सर्दियों में गरीबों को ऊनी कपड़े बॉटना

रक्तदान शिविर लगाना ।

ऑखों के ऑपरेशन का शिविर लगाना

विशिष्ट उपलब्धि 21 वीं सदी की 101 महिलाओं में नाम दर्ज ।

एस0आर0एस0 मेमौरियल शिक्षा

शोधसंस्थान,आगरा में कार्यकारी निदेशक

स्काउट गाइड में विशेष ड्‌यूटी अधिकारी

रचनायें पं0 श्री राम शर्मा आचार्य की सांस्कृतिक

सामाजिक चेतना, ‘कृति ‘।

प्रकाशित पत्र राष्ट्र्‌ीय एवं अन्तरराष्ट्र्‌ीय स्तर पर

विभिन्न पत्र — पत्रिकाओं में पत्र प्रकाशित ।

शोध पत्र प्रकाशित 11 शोध पत्र प्रकाशित ।

स्ांगोष्ठी 16 स्ांगोष्ठियों में राष्ट्र्‌ीय एवं

अन्तरराष्ट्र्‌ीय स्तर पर शिरकत ।

संदर्भ ग्रंथ : साहित्यकार निर्देशिका, देहरादून, क्रम संख्या 474

पृष्ठ संख्या 94 ।

: गौरव डायरी ,वर्धा, क्रम संख्या 01,पृष्ठ संख्या 01

: साहित्यकार निर्देशिका, जालंधर, क्रम संख्या 19,

पृष्ठ संख्या 08 ।

: ए0आई0पी0सी0 स्टैप्स, ताशकंद, समरकन्द क्रम

संख्या 06, पृष्ठ संख्या 04 ।

: ए0आई0पी0सी0 स्टैप्स ,दुबई और आबू धाबी,

क्रम संख्या 14,पृष्ठ संख्या 15 ।

: ए0आई0पी0सी0 स्टैप्स, साउथ अफ्रीका ।

: ए0आई0पी0सी0 स्टैप्स, श्रीलंका ।

पुरस्कार

राष्ट्र्‌ीय स्तर

1 — सुलोचनी लेखिका पुरस्कार ,भुसावल, 2001

2 — डॉ0 दीपक भट्रट मेमोरियल यंग साइंटीस्ट एवार्ड, रोहतक,

2002

3 — विवेक चेतना सम्मान,तलेन, 2003

4 — डिस्टिंग्यूज्ड सर्विस एवार्ड,आगरा, 2004

5 — कायस्थ गौरव सम्मान,आगरा, 2005

6 — मानव भूषण पुरस्कार,महाराष्ट्र्‌, 2008

7 — बैस्ट सोशल वर्कर एवार्ड,आगरा, 2008

8 — लिटरेसी एवार्ड,आगरा, 2009

9 — प्रेमचन्द कथा साहित्य सम्मान,जयपुर, 2009

10 — विशिष्ट नागरिक सम्मान,आगरा, 2009

11 — ज्वैल ऑफ इंडिया एवार्ड,वर्धा, 2009

12 — कुल गौरव सम्मान,आगरा, 2009

13 — साहित्यकार सम्मान,आगरा, 2009

14 — अग्रवाल आयडिल पुस्तक सम्मान,वर्धा, 2009

15 — साहित्य रत्न सम्मान,दुर्ग, 2010

16 — लोक रत्न राष्ट्र्‌ीय पुरस्कार,सेवाग्राम, 2010

17 — आगरा गौरव सम्मान,आगरा, 2011

18 — भारत भारती साहित्य सम्मान, छत्तीसगढ, 2011

19 — कबीर अलंकरणसाहित्याचार्य सम्मान,दुर्ग, 2011

20 — जय जगत केसरी रत्न सम्मान, सेवाग्राम, 2011

21 — महज़बीन मीना कुमारी पुरस्कार,हुबली, 2012

22 — हिन्दी सेवी सम्मान,मुरैना, 2012

23 — साहित्य भूषण सम्मान,जिन्द, 2012

24 — अशोक काव्य भूषण,आगरा,2012

25 —काव्य सौरभ सम्मान,छत्तीसगढ, 2012

26 — काव्य गौरव सम्मान, कर्नाटक, 2012

27 — लॉर्ड बेडन पावेल नेशनल एवार्ड,पटना, 2012

28 — मन की आवाज साहित्य सम्मान,दुर्ग, 2012

29 — काव्य शिरोमणि सम्मान,पठानकोट, 2012

30 — साहित्य कला रत्न सम्मान, 2012

31 — राष्ट्र्‌ भाषागौरव सम्मान, इलाहाबाद, 2012

32 — ए0आई0पी0सी0 विशिष्ट सम्मान,जबलपुर, 2013

33 — इंटरनेशनल वूमेन सेल्यूट एवार्ड, आगरा, 2013

34 — लॉर्ड बेडन पावेल नेशनल एवार्ड,आगरा, 2013

35 — विश्व कायस्थ शिरोमणि सम्मान,लखनऊ,जून, 2013

36 — हिन्दी मनस्वी सम्मान, हरप्रसाद व्यवहार संस्थान, 5 सितम्बर, 2013

37 — शुभ प्रभात सम्मान, मध्य प्रदेश, 8 जनवरी, 2014

38 — साहित्य रत्न सम्मान,हिन्दी सेवा समिति, मध्य प्रदेश, 27 फरवरी,

2014

39 — शब्द श्री अखिल भारतीय साहित्य सम्मान,शब्द प्रवाह,उज्जैन,मध्य

प्रदेश, 30 मार्च 2014

45 — राष्ट्र्‌ीय काव्य अलंकरण पुरस्कार,निर्दलीय प्रकाशन, भोपाल 6

अक्टूबर 14

46— साहित्यायन सम्मान, ग्वालियर, 1 नवम्बर, 2014

अन्तर्राष्ट्र्‌ीय सम्मान

1 — वूमैन ऑफ द ईस्ट,ताशकंद, उजबेकिस्तान ,2010

2 — द ईव ऑफ द इरा, दुबई, 2011

3 — लेडी ऑफ होप,जोहन्सबर्ग,साउथ अफ्रीका, 2012

4 — मिसेज केप टाउन, केप टाउन, साउथ अफ्रीका, 2012

5 — संघमित्रा ऑफ द एज, कैंडी, श्रीलंका, 2012

6 — ज्ीम ठसमेेमक श्रनदव, पटाया, थाईलैण्ड, 2013

7— डपेे च्वचनसंत, बैंकॉक, थाईलैण्ड, 2013

अपनी बात

सच्ची घटनाओं पर आधारित इन कहानियों को लिखने का उद्‌देश्य किसी का दिल दुखाना या परेशान करना नहीं है बल्कि समाज को सच्चाई से अवगत कराना है साथ ही यह भी बताना है की वक्त बेवक्त हमारे साथ भी जाने अनजाने इस तरह की घटनायें हो जाती हैं जिनसे हमें सबक लेना चाहिये और दूसरा को भी सचेत करना चाहिये और सावधान रहना चाहिये, मगर हम ऐसा नहीं करते हैं।

यह मेरा दूसरा कहानी संग्रह है जिसमें सात कहानियॉ हैं जिसमें से कुछ कहानियॉ पहले प्रकाशित एवं प्रसारित भी हो चुकी हैं और पुरस्कार भी प्राप्त हैं। यदि यह कहानियॉ आपके अन्तस्तल में संवेदनायें जगा सकें, जिनके लिये यह रची गई हैं तो मैं अपना प्रयास सार्थक समझॅूगी।

जीने की राह के इस खुशनुमा सफर में खट्‌टे—मीठे अनुभव हुये जिनसे शिक्षा लेते हुये यह सफर 46 वर्ष तक अनवरत चलता रहा। कभी खुशी कभी ग़म को अपने दामन में समेटे जो कुछ मेरे व मेरे साथियों के साथ घटित हुआ और जिसको कहीं न कहीं मेरे अन्तर्मन ने छुआ, मुझे कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया तभी अन्तरआत्मा की आवाज को सुनकर सच्ची घटनाओं को कहानी का रूप देने का साहस आया , जिसे मैंने बिना किसी डर के कागज पर उकेर कर आपके समक्ष प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयास किया है।

मेरा यह प्रयास कितना सफल रहा है, यह तो सुधिजन पाठकों की मेधा ही निश्चित करेगी। मुझे इस कार्य में कुछ विशिष्ट लोगों का सहयोग मिला है जिन्होंने समय—समय पर मेरा उत्साहवर्धन किया। फलस्वरूप यह कहानी संग्रह आपके समक्ष प्रस्तुत है।

मैं अपने साथ—साथ उन सभी लोगों की कृतज्ञ हॅू जिनके साथ यह घटनायें घटी और उन्होंने मुझे उसे लिखने की इजाज़त दी भले ही चाहे वह मेरी अन्तरआत्मा की आवाज़ ही क्यों न हो।

मेरे इस संकलन में विशेष रूप से प्रेरणा के स्रोत मेरे जन्मदाता मेरे पिता डॉ0 बाबूलाल वत्स एवं माता श्रीमती चन्द्रकान्ता वत्स रहे हैं। साथ ही मेरी अनुजा श्रीमती अर्चना मालवीय जिसने अपनी आप बीती एवं कुछ वास्तविक घटनाओं से मुझे अवगत कराया और उसे इस कहानी संग्रह में शामिल करने का अनुरोध भी किया।

इस सफर के राही व रचनाधर्मिता के सभी सहभागी, बन्धु—बान्धवो की हृदय से आभारी हॅू जिनका सहयोग मुझे सदैव मिलता रहा।

मैं अपने पतिदेव श्री आर0पी0रायज़ादा, दोनों बच्चों जुबली एवं जुबिन की हृदय से आभारी हॅू जिन्होंने इस संकलन को प्रकाशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं। मैं विशेष रूप से आभारी हॅू अपने पिता तुल्य ससुर श्री प्रेम प्रसाद रायज़ादा जी एवं माता तुल्य सास श्रीमती आशा रायज़ादा जी की जिनका सहयोग मुझे हमेशा मिलता है।

मैं अपने इस कहानी संग्रह जीने की राह के लिये केवल इतना ही कह सकती हॅू, कि आप इससे शिक्षा अवश्य लें जिससे भविष्य में होने वाली घटनाओं से बचा जा सके और विशेष आग्रह कि पढ़ने के बाद किसी दूसरे पाठक तक जरूर पहुॅचा दें जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोग लाभान्वित हो सके।

डॉ0 कविता रायज़ादा

37 सी,श्यामजी विहार,सरलाबाग

एक्सटेंशन रोड,दयालबाग,आगरा—282005

दूरभाष संख्या : 9319769552, 05622570098

ई मेल तंप्रंकंणंअपजं5/हउंपसण्बवउ

भूमिका

डॉ0 कविता रायज़ादा की नवीन कृति जीने की राह की समग्र सात रचनाएं पढ़कर लेखिका की लेखन क्षमता को मैंने महसूस किया है। उन्हें अपने सृजन पर विश्वास है और उसके द्वारा जो संदेश वो समाज को देना चाहती हैं, उसके लिए वह आशान्वित हैं।

अपनी रचनाओं में समाज में व्याप्त कुरीतियों और समस्याओं पर वह बेचैन दिखाई देती हैं। जिन्हें अपने कथानकों में समेटने का उन्होंने प्रयास भी किया है।

समाज में कन्या—भ्रूण हत्या तथा कन्याओं को हेय दृष्टि से देखना, उनके पालन—पोषण में भेद करना, लेखिका को सालता है, इसीलिए इस प्रसंग को ही कई जगह स्पष्टता देते हुए कन्या की प्राकृतिक सहिष्णुता, करूणा, त्याग और सहनशीलता को कथावस्तु का केन्द्र बिन्दू भी बनाया है। चाहे वह जीने की राह की सुनयना हो या मनहूस की शीतल।

लेखिका के मन को परोपकार और समाज सेवा जीवन के आदर्श प्रतीत होते हैं और उनकी अनुभूति जीने की राह इसी को स्पष्टता देने की चेष्टा कही जा सकती है।

कुछ मान्यताएं हर युग में मान्य रही हैं, जैसे जीवन साथी का संयोग विधि का विधान है। किसे कब, कहां और कैसे मिलाना है यह विधाता ही जानता है। फूल जो देर से खिला इसी तथ्य की स्वीकृति लगती है।

कुल मिलाकर जीने की राह डॉ0 कविता रायज़ादा के जीवन की अनुभूतियों की सुंदर अभिव्यक्ति कही जा सकती है। उनके लेखन उत्साह के लिए अनेकानेक शुभकामनाएं प्रेषित हैं।

साहित्य पुरोधा पिता की होनहार संतान साहित्य द्वारा उच्चायाम प्राप्त करे, ऐसी हमारी हार्दिक अभीप्सा है।

डॉ0शैलबाला अग्रवाल

संस्थापिका

आगरा महानगर लेखिका समिति

अनुक्रमणिका

1.विधि का विधान

2.जो बोएगा वही पाएगा

3.सपनों का राजकुमार

4.जीने की राह

5. बलिदान

6.मनहूस

7.फूल जो देर से खिला

विधि का विधान

बी0एड0 का रिजल्ट आते ही जया उछल पड़ी उसके 72 प्रतिशत अंक आये थे। पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन जब अपनी ऑंंंखों से देख लिया तो वह यह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी खुशी का इज़हार करे तो कैसे करे। वह अतीत की यादों में खो गयी और सोचने लगी वह दिन भी क्या थे जब वह अपने तीन भाइयों और माता—पिता के साथ हॅसी खुशी जीवन बिता रही थी। बहुत खुश थी वह अपने छोटे से परिवार में मगर विधि का विधान क्या है कोई नहीं जानता। अचानक एक दिन उसके माता—पिता का देहान्त हो गया। दुखाें का पहाड़ टूट पड़ा था उन चारों भाई बहनों पर। अभी वह उस दुख से उबर भी नहीं पाये थे कि एक दिन दोनों भाई पढ़ने जा रहे थे बस से दुर्घटनाग्रस्त हो गये। मौके पर ही दोनों भाइयों की मृत्यु हो गयी। एक भाई और बहन क्या करते समझ नहीं पा रहे थे। रिश्तेदारों ने ही सहारा दिया। एक भाई और एक बहन कैसे साथ—साथ रहेंगे सोच कर विचार किया कि क्यॅू न बहन की शादी कर दी जाय। कम से कम 15 साल की जवान बहन की जिम्मेदारी तो खत्म होगी। उस समय जया सिर्फ दसवीं पास थी। दुखों की मारी जया क्या करती ? सिर से माता—पिता और दो भाइयों का साया भी छिन चुका था। क्या कहती ? जो कुछ रिश्तेदारों व भाई ने कहा मान लिया क्योंकि उसकी उम्र भी छोटी थी। कुछ निर्णय लेने लायक नहीं थी वह और न ही ऐसी परिस्थिति। वह मात्र सोलह साल की थी उसकी शादी कर दी गयी। माता पिता थे नहीं इसलिये शादी भाई ने ही की थी। शादी के बाद धीरे—धीरे वह वक्त के साथ अपने दुखों को भूलने लगी क्योंकि सारे जहॉ की खुशियॉ उसके दामन में थी। जिस लड़के से उसकी शादी हुई थी वह अपने माता पिता का इकलौता बेटा था। बहुत लाड़ प्यार मिल रहा था उसे अपनी ससुराल में। देखते ही देखते तीन साल में उसके तीन प्यारे—प्यारे बच्चे भी हो गये दो लड़कियॉ और एक लड़का। वह अपने छोटे से परिवार में बहुत खुश थी उसे नहीं पता था कि यह खुशी कुछ ही दिनों की है। अभी दुख खत्म नहीं हुये हैं। मुसीबतों का पहाड़ उस पर टूटने ही वाला है। इन सब बातों से बेखबर उसके पति ने घूमने का कार्यक्रम बनाया और दो परिवार मिलकर निकल पड़े पहाड़ों की सैर पर। छः दिन का समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। घर जाने का तो मन ही नहीं कर रहा था तो सबने सोचा क्यों न नीलकण्ठ और घूम लिया जाये ड्राइवर को इशारा किया और गाड़ी घूम गयी नीलकण्ठ की तरफ। हॅसते गाते अन्त्याक्षरी खेलते कब नीलकण्ठ नजदीक आ गया किसी को पता ही नहीं चला। अचानक ड्राइवर को झपकी लगी और एक पल में ही खेल खत्म हो गया। पहाड़ों पर दौड़ती गाड़ी सीधे खाई में जा गिरी। चीख पुकार मच गयी। वही गॉव के कुछ लोगों ने घायलों को हॉस्पीटल पहॅुचाया मगर जया के परिवार में से तो सिर्फ जया ही बची थी। उसका पति एक बेटा और एक बेटी तीनों अस्पताल पहॅुचते—पहॅुचते ही खत्म हो गये। एक घर से तीन—तीन लाशें बहुत हृदय विदारक दृश्य था। एक बेटी की लाश नहीं मिली थी मगर खोजबीन करने पर एक पेड़ पर उसकी छोटी बेटी पुलिस को मिली उसकी सॉसे चल रही थीं तुरन्त अस्पताल लाया गया उसके सिर से खून बह रहा था। खून इतना ज्यादा बह चुका था कि काफी समय लग गया उसकी हालत सुधरने में। सिर में तो डॉक्टर्स को सत्ताईस टॉके लगाने पड़े। जया को तो होश ही नहीं था।

वह तो पूरे एक महीने अस्पताल में ही भर्ती रही। उसे पता ही नहीं था कि उसका पति, बेटा और बेटी अब इस दुनिया में नहीें हैं। उसका तो संसार ही उजड़ चुका था, उसकी कोख और सेज दोनों ही सूनी हो गयी थीं। जब उसे बताया गया तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ क्योंकि उसने तो अपने होशोहवास में अपने परिवार को हॅसते मुस्कुराते हुए ही देखा था। वह तो आज तक करवा चौथ व्रत रखती है यही सोचकर कि एक न एक दिन उसका पति अवश्य वापस आयेगा।

पन्द्रह साल हो गये लेकिन उसका पति आज तक वापस नहीं आया लेकिन जया ने भी हार नहीं मानी थी। जो 16 साल की लड़की हाईस्कूल पास करके आई थी उसने इन्टरमीडिएट प्रथम श्रेणी के साथ—साथ बी0ए0, एम0ए0 और बी0एड0 कर लिया था। आजीविका चलाने के लिये उसने छोटे—मोटे स्कूल में अध्यापिका की नौकरी करनी शुरू कर दी थी साथ ही घर पर बच्चों को ट्‌यूशन पढ़ाने लगी।

आज वह बहुत खुश थी क्योंकि उसकी एकमात्र बेटी प्रिया जो की उस एक्सीडेन्ट मेंं बच गयी थी उसका आगरा के ही विख्यात विश्वविद्यालय में बी0एस—सी0 में दाखिला हो गया था और वह अपने साथ—साथ अपनी मॉ जया को भी शिक्षा के अनुरूप आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही थी। वह हमेशा अपनी मॉ से कहती —

कर्म ही है जीवन का सार, कर्म ही वेदाें का आधार।

कर्म का ही लेकर नवमं़त्र, पहुॅचना होगा हमको पार।

जो बोयेगा वही पायेगा

ऐशोआराम में पली चारू ने दुख तो कभी देखा ही नहीं था। वह तो यह भी नहीं जानती थी की कष्ट किस चिड़िया का नाम है। उसकी दादी जो उसको बहुत प्यार करती थी उनको ऑखों से दिखाई नहीं देता था लेकिन चारू उनसे बहुत नफरत करती थी जिसका कारण था उसकी दादी का उसकी मॉ के प्रति बुरा व्यवहार। दादी की हालत यह थी की दिखाई न देने के कारण वह घर में जहॉ भी आती—जाती तो टटोल—टटोलकर बैठकर चलती थी और इस दरमियां जब भी वह किसी के रास्ते में आ जाती वह उनको धक्का मार देता कभी चारू की मॉ तो कभी स्वय चारू। कई बार तो वह उनको धक्का मार देती और बुड़बुड़ाती हुई आगे बढ़ जाती ‘इनको चैन नहीं है, यह नहीं की एक जगह बैठी रहे चैन से, जब देखो भटर—भटर करती ही रहती है‘।

एक दिन तो हद ही हो गयी जब चारू घर में लकड़ी के मोटे ब्रश से सफाई कर रही थी। तभी उसको घर के दरवाजे पर खड़ी सहेली ने आवाज दी। वह बोली अन्दर आ जा। मैं भी उसके साथ कमरे में आ गई क्योंकि वह मेरी भी सहेली थी हम दोनों वही कमरे में बैठ गये। तभी न जाने कहॉ से उसकी दादी घिसटते—घिसटते चली आ रही थी। चारू ने आव देखा न ताव गुस्से से तिलमिला गई जोर से वह ब्रुश जो उसके हाथ में था उनको दे मारा। बड़े जोर से कट की आवाज आई क्योंकि बुढ़ापे के शरीर में हड्‌डिया ही हड्‌डिया थी वह कराह उठी उनके मुॅह से आह निकल रही थी।

मै तो सिहर गई उसकी क्रूरता को देखकर। मुझसे रहा ही नहीं गया। भले ही वह मेरी सहेली थी लेकिन उसके इस व्यवहार का मैंने खुलकर विरोध किया। जबकि उस वक्त मेरी उम्र कुल 17 वर्ष ही थी। मैंने तो यहॉ तक कह दिया की यदि भविष्य में मैंने तुम्हें अपनी दादी के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार करते देख लिया तो मेरी दोस्ती उसी दिन खत्म समझना। तब उसने मुझे जो बताया तो मैं आश्चर्यचकित रह गयी।

वह बोली तुझे नहीं पता — ये जो मेरी दादी हैं न बहुत खराब हैं। इन्होंने मेरी मम्मी पर बड़े अत्याचार किये हैं। इनके लिये यह सब बहुत कम है। यही तो हैं जो मेरे पापा से मेरी मॉ को डड्‌डों से पिटवाया करती थी। आज ये जो तुम्हें इतनी सीधी सी और लाचार लग रही हैं दरअसल यह ऐसी हैं नहीं। जब इनका वक्त था तब इन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मैं तो बरसों से, इनके अत्याचार देखती आ रही हॅू इसलिये मेरे हृदय में इनके लिये कोई प्यार—व्यार नहीं है बल्कि नफरत ही नफरत है। उसने तेवर दिखाते हुये मुझे आगाह करते हुये कहा —इन पर तरस—वरस खाने की कोई जरूरत नहीं है।

मैं स्तब्ध खड़ी उसकी सारी बातें सुन रहीं थी। 17 साल की छोटी सी उम्र में ही यह बात मैं अच्छी तरह से समझ गयी थी कि हम जैसा करते हैं, वैसा ही हमारे साथ होता है। फिर अगले ही पल मुझे लगा यदि यह बात सत्य है, तो जैसा व्यवहार चारू और उसकी मॉ कर रही हैं वही उनके साथ भी होना चाहिये। लेकिन यह किसने देखा है, मगर इस वाकया से मैंने तो बस निर्णय कर लिया था की जानते बूझते तो मैं कभी भी किसी का बुरा नहीं करूॅगी। मैं तो बस यही सोच रही थी इंसान ऐसा क्यूॅ करता है ? वह क्यूॅ भूल जाता है की आज हम किसी अपने के साथ बुरा करेंगें तो हमारे साथ भी वैसा ही होगा।

समय बीतता गया। कुछ समय बाद पता चला की चारू की दादी की मृत्यु हो गयी। अब वक्त था घर में खुशियॉ आने का तो वह समय भी आया जब उसके भाई की शादी हुइर्। घर में एक सुन्दर सी बहू आ गयी। कुछ दिन तो बहुत अच्छे गुजरे लेकिन वह वक्त भी आ गया जिसका आभास मुझे पहले ही हो चुका था। उसकी मॉ जिसने अपनी अंधी सास को जो यातनायें दी थी वह उसको भुगतनी थी। जो अत्याचार उसने अपनी सास के साथ किये थे सिर्फ बदला लेने के लिये वही अत्याचार अब उस पर होने लगे थे। यह सब मेरी सोच थी की शायद ऐसा होगा लेकिन वास्तव में ऐसा होते हुये मैंने स्वयं अपनी ऑखों से देख भी लिया था।

नौजवा, खूबसूरत बहू का धीरे—धीरे घर में एक छत्र राज होने लगा। इस वक्त चारू की मॉ का बुढ़ापा था। उसे पेट भरने के लिये बहु से मिन्नत करनी पड़ती थी लेकिन बहू ऐसी की उसको खाना तक नहीं देती थी। आिाखर तमाम बीमारियों ने उसको घेर लिया। बेटा—बहू को तो वह बोझ लगने लगी। बेटा—बहू दोनों मिलकर उस पर अत्याचार करने लगे।

मुझे नहीं पता की उनको उस वक्त अपने द्वारा किये गये कार्यों की याद आयी की नहीं, लेकिन मुझे जरूर आ रही थी। वैसे ही बीमारियों की वजह से कुछ खाना—पीना मना था और जो खा सकती थी वह बहू की दया दृष्टि से नहीं मिल पाता था। जैसी करनी वैसी भरनी साफ दिखाई दे रही थी। लेकिन शायद यह परिवार इस बात को समझ नहीं पा रहा था। इसीलिये यह पुनरावृत्ति बार—बार कर रहा था।

अब चिन्ता थी तो बस अपनी उस सहेली की क्योंकि मेरे हिसाब से अब उसका नम्बर था।

मुझे यही डर बार—बार सता रहा था। मैं मन ही मन मैं प्रार्थना कर रही थी कि हे ! ईश्वर अनजाने में चारू से जो भी गलती हुई है उसे माफ करना। लेकिन शायद उस वक्त ईश्वर ने मेरी भी नहीं सुनी। मुझे उस समय बहुत कष्ट हुआ जब पता चला की चारू का एकमात्र खूबसूरत बेटा जो 12 वीं में पढ रहा था। अचानक टे्रन की चपेट में आ गया और मृत्यु हो गयी। इतना बड़ा दुख कैसे सहन किया उसने, मुझे समझ नहीं आ रहा था। कष्ट यही खत्म नहीं हुये एक दिन पता चला की उसके पति को हार्ट अटैक हो गया। दुखों ने चारों तरफ से घेर लिया था उसे। उसको दुख झेलते—झेलते बीमारियों ने घेर लिया।

मैं सोचने लगी , वाह! रे ईश्वर तेरी माया। देर है पर अंधेर नहीं। मेरी ऑखों के सामने ही सबको उनके किये की सजा मिल चुकी थी। उनके घर की बहू जो इतना सब होने के बाद भी नहीं सुधरी थी। आज उसका इकलौता बेटा 18 साल को हो गया था। वह इतना

बिगड़ गया था की युवावस्था में ही हमेशा नशे में धुत्त रहने लगा। नौबत यहॉ तक आ गयी की जब कभी उसकी मॉ उसको कुछ कहती तो वह उसको गालिया देता। उसका नाबालिग बेटा नशे का आदी हो चुका था। पढ़ाई में तो मन ही नहीं लगता था उसका। बहू ने बहुत कोशिश की बेटा सुधर जाये लेकिन शायद यह भी उसके कर्मो का ही फल था।

कर्मों का भुगतान तीन पीढ़ियों को भुगतते तो मैंने स्वयं अपनी ऑखों से देखा है और चौथी पीढ़ी का तो ईश्वर ही जाने क्या होगा। यदि अब भी सुधार नहीं हुआ तो पीढ़ी दर पीढ़ी वह परिवार यह कष्ट झेलता ही रहेगा। मेरा इस कहानी को लिखने का उद्‌देश्य यही है कि आने वाली पीढ़ी जाग जाये। कर्मों को आज नही ंतो कल भुगतना ही पड़ता है इस बात को कभी न भूले इसलिये हमेशा मदद करने की कोशिश करें ना की किसी को कष्ट पहॅुचाने की।

सपनों का राजकुमार

शादी का जलसा था, लोग आ जा रहे थे। हर तरफ खुशहाली छायी हुई थी। उल्लास और प्रसन्नता के इस माहौल में हर व्यक्ति किसी न किसी काम में व्यस्त था। एक कमरे में हम उम्र लड़के व लड़कियॉ झालरों व फूलों से कमरे को सजा रहे थे यह वही कमरा था जिसमें घर की लक्ष्मी, नई नवेली दुल्हन का रिसेप्शन रखा गया था। तभी सिमरन न जाने कहॉ से आ टपकी। पहले से उपस्थित हम उम्र लड़के लड़कियो को देखकर वह कुछ देर ठिठकी। फिर वही बैठी अपनी छोटी बहन से बोली चल जल्दी मम्मी बुला रही हैं। इससे पहले कि वह कुछ जवाब देती वही बैठा एक खूबसूरत नौजवान रंग गोरा, लम्बाई लगभग छः फुट ऊपर से नीचे तक काले रंग के कपडे़ पहने, चेहरे पर करीने से बनाई गई दाढ़ी जो कि उसकी खूबसूरती में चार चॉद लगा रही थी। तभी वह युवक तुरन्त बोला यह तो अभी नही जाएगी। उसका इस तरह बोलना सिमरन को शायद अच्छा नहीं लगा। अनायास ही उसके मुॅह से निकला आपकी तारीफ, फिर क्या था, वह अनजाना चेहरा, इस शहर के लिए बिल्कुल नया। अपनी तारीफ के पुल बॉधने में मशगूल हो गया। सिमरन जो कि ,मध्यम वर्गीय परिवार की साधारण रंग रुप की लड़की थी, उस खूबसरत नौजवान की बातों को बडे़ गौर से सुनने लगी, ऐसा लगा जैसे वह अपनी बातों़ के माध्यम से अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है। मगर तुरन्त ही सिमरन को ख्याल आया। वह क्या सोच रही है, कहॉ वह और कहॉ मैं। शादी का कार्यक्रम पूर्ण हो जाने के बाद सभी अपने—अपने घर को रवाना हो गये। बचे तो सिर्फ घर के नजदीकी रिश्तेदार। शादी के अगले दिन सभी ने सिकंदरा घूमने का कार्यक्रम बनाया, जिसमें वह नौजवान भी शामिल था। सभी घूमने फिरने खाने—पीने में मशगूल थे, हंसी ठिठोली चल रही थी लेकिन वह नौजवान जिसका वह नाम तक नहीं जानती थी पेड़ के कोने में बैठा शायद कुछ सोच रहा था। जब सबका ध्यान उसकी ओर गया तो छेड़छाड़ शुरु हो गयी। सिमरन अपनी एक डायरी लेकर जिसे वह हमेशा अपने पास रखती थी ,कुछ शेरोशायरी लिखने बैठ गयी। लेकिन कुछ ही देर में सब के आग्रह पर डायरी ,कलम को छोड़ खेलने में मस्त हो गयी। वह इस बात से बिल्कुल बेखबर थी कि वह नौजवान उसकी डायरी अपने कब्जे में ले चुका है और अपने मनोभावों को उसमें उतार रहा है ,अपनी इच्छाओं को शब्दों के माध्यम से जाहिर कर रहा है। सभी अपने—अपने घर चले गये। अगले दिन सिमरन इन सब बातों से बेखबर जल्दी—जल्दी कॉलेज चली जा रही थी ,तभी न जाने वह नौजवान कहॉ से सामने आ गया। उसे देखते ही वह झेंप गयी। वह जितना उससे बचने का प्रयास करती उतना ही घड़ी—घड़ी वह उसके सामने आ जाता। वह अपने को रोकने का बहुत प्रयास करती कि वह इस तरफ ध्यान ही न दें ,मगर उसे ऐसा लग रहा था कि वह उसकी ओर खींचती ही चली जा रही है। आखिर ऐसा क्या है उसमें ? वह समझ ही नहीं पा रही थी। वह यह भी अच्छी तरह से जानती थी कि उसकी शादी उसके साथ कभी नहीं हो सकती ,फिर उसे यह भी तो पता न था कि वह भी उसे चाहता है या यूॅ ही अनायास उसकी भेंट हो जाती है। लेकिन इस समस्या का समाधान भी जल्दी ही हो गया ,जब उसने अपनी वही डायरी खोलकर देखी।वह एक के बाद एक पन्ने पलटती जा रही थी, प्रसन्नता उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी ,क्योंकि हर पन्ने पर उसकी इज़हारे मोहब्बत नज़र आ रही थी साथ ही उस अपरिचित का नाम जिसे वह अभी तक जान तक न पाई थी पहले ही पन्ने पर लिखी उन चार पंक्तियों को वह बार—बार पढ़ रही थी — एक सफर ने हमको नज़दीक ला दिया ,भटक रहे थे हम, मंजिल से मिला दिया ।अब डर हमें है यह, मंजिल छूट न जाये, ऑखों ने जो वादा किया, वह वादा टूट न जाय। वह बार—बार यही सोच रही थी, क्या यह वही राजकुमार तो नहीं जिसे उसने सिर्फ सपनों में देखा था। अब वह सोचने लगी ,क्या यह सच्चा जीवन जीवन साथीसिद्ध होगा! सोचते—सोचते उसने जल्दी जल्दी फिर कुछ पन्ने पलटने शुरूकिए, लिखा था —‘कभी थे अजनबी अब अजनबी नहीं मिले तो हम, दो पल के लिए ही सही अजनबी है जिन्दगी अजनबी हैं रास्ते मुझको एक पहचान दो दोस्ती के वास्ते यह पढ़ते ही उसे लगा ,क्या यह सिर्फ दोस्ती करना ही तो नहीं चाहता ! कहीं यह धोख़ेबाज तो नहीं! यह सोचते ही वह सिहर उठी और मन ही मन सोचने लगी, मुझे इससे दूर रहना होगा, और न जाने कब उसकी नींद लग गयी, जब ऑख खुली तो उत्सुकता और बढ़ी, शायद कुछ और तो नहीं लिखा। पढ़ते ही वह दंग रह गयी। आगे लिखा था —कुछ देर क्या हुई, तुम नाराज हो गयी पर जाते —जाते ऑखों से यह कह गयी हम तो नाराज ही होगें, मना सकते हो तो मना लो हो सके तो हमें अपने मन की कविता बना लो। ‘उसने धड़कते दिल से फिर पन्ना पलटा लिखा था —‘नज़रों को इंतज़ार क्यों हैमन में मीठी झंकार क्यों है तुम आओगी मेरे मन को हरने सिमरन यह एतबार क्यों है !‘फिर क्या था वह निर्णय ले चुकी थी हो न हो यही उसका जीवन साथी है। मगर एक डर बार—बार उसे भयभीत कर रहा था ,क्या उसके घरवाले उसे अपनाएंगे ? या यह कहानी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगी, लेकिन कहते हैं न कि यदि हम सच्चे दिल से ईश्वर से कुछ मॉगते हैं तो वह अवश्य देते हैं बशर्ते कि मन साफ हो। रास्ते में बहुत सारे व्यवधान ,मुसीबतें आने के बावजूद वह दिन भी आ गया ,जिस दिन सबको अपने अपने राजकुमार का इंतज़ार होता है ,लेकिन यदि राजकुमार वही हो जिसे हम सपनो में देखते हैं तो खुशी दोगुनी हो जाती है। ठीक ऐसा ही हुआ सिमरन के साथ भी। वह सोच भी नहीं सकती थी कि एकसाधारण से रंग रूप की लड़की को जिसके पास कुछ भी तो नहीं, सपनों काराजकुमार मिल जाएगा ! 2 दिसम्बर 1990 यह वही दिन था जिस दिन सिमरन को अपना जीवन साथी, अपना राजकुमार मिल गया था। आज वह बहुत खुश थी और ईश्वर को बार—बार धन्यवाद दे रही थी कि उसने उसकी सुन ली। आज वह हर लड़की के लिए यही दुआ कर रही थी की हर लड़की व लड़के का भाग्य मेरे जैसा ही हो सबको अपने—अपने सपनों का राजकुमार मिले।

जीने की राह

रेनू अपने माता—पिता की इकलौती संतान थी। लाड़—प्यार में पली रेनू दुखों से बिल्कुल अनभिज्ञ थी। आज वह पूरे 20 वर्ष की हो गयी थी। अच्छा खानदानी लड़का देखकर मॉ—बाप ने उसकी शादी पक्की कर दी थी। वह भी अपना मनपसंद जीवन साथी पाकर बहुत खुश थी। धीरे—धीरे शादी की तारीख नजदीक आ गयी। आज उसका विवाह का दिन था। वह मन ही मन फूली नहीं समा रही थी। उसे अपने सभी सपने साकार होते नज़र आ रहे थे। वह प्रसन्न थी कि उसे मनचाहा घर—वार मिला राहुल उसे बहुत चाहता था। शादी के माहौल में एक महीना कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। लेकिन यह क्या धीरे—धीरे राहुल का व्यवहार रेनू के प्रति बदलने लगा। वह उसे उतना प्यार नहीं दे पा रहा था जितने की उसने कल्पना की थी। अब वह उससे दूर—दूर सा रहने लगा था। रेनू को उसका व्यवहार बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। वह सारा—सारा दिन सोचती रहती थी। समय बीतता गया। अब तो राहुल ने शराब भी पीना शुरू कर दिया था। यह बुरी लत उसे रेनू से दूर करती जा रही थी। स्थिति यह हो गयी थी कि वह एक—एक पैसे के लिये मोहताज रहने लगी।

परेशान होकर रेनू ने नौकरी करने का फैसला किया और उसे एक फर्म में नौकरी मिल भी गयी। सरकारी नौकरी पाने की चाहत में कम तनख्वाह में भी वह रात दिन मेहनत करती रहती। तीन साल की कठिन तपस्या के बाद उसे आखिर सरकारी नौकरी मिल ही गयी। इन्ही परिस्थितियों से गुजरते उसने एक बच्चे को जन्म दिया। उसने सोचा कि इस बच्चे के सहारे ही वह अपना बाकी जीवन व्यतीत कर लेगी तनख्वाह अधिक न होने पर भी उसने अपने बच्चे का दाखिला अच्छे स्कूल में करा दिया। उसने सोनू को बड़े प्यार से पाला माता—पिता दोनों का प्यार दिया आज वह तीन साल का हो गया था। सोनू बहुत मन लगाकर पढ़ रहा था पहली कक्षा में ही वह प्रथम आया। सोनू धीरे—धीरे बड़ा हो रहा था,उसका बचपन देखकर उसके ही सहारे वह अपने पति के गम को भुला बैठी थी। वह खुश भी रहने लगी थी। कहते है न सुख भी क्षणिक ही होता है इसलिये ज्यादा खुश नहीं होना चाहिये अचानक उसकी जिन्दगी में एक ऐसा भयंकर तूफान आया जिसने उसे हिला कर रख दिया। अचानक उसके पति की मृत्यु हो गयी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करें बच्चे की परवरिश अकेले कैसे करें ? अपने जीवन से तो उसे कोई लगाव ही नहीं रह गया था। उसे तो चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा नज़र आ रहा था। वह एकटक आकाश की ओर ताकती रहती थी। फिर उसने एक दिन निर्णय लिया क्यों न अपने जीवन को ही खत्म कर दिया जाये, मगर उसी पल अपने बच्चे का ख्याल आते ही विचार बदल दिया। सोचा क्यूॅ न अपने आप को समाज सेवा में लगा दॅू। यह विचार आते ही उसने एक दो लोगों से सलाह ली और लग गयी समाज सेवा में, इस काम में जो सुकून मिलता है वह बयॉ नहीं किया जा

सकता। आज भी वह समाज सेवा में लगी है और एक अच्छी समाज सेविका के रूप में प्रसिद्ध है और दुख दर्द में डूबे हर व्यक्ति को यही सलाह देती है कि जियों तो इस तरह कि सुकूॅ हो खुद को और ज़माना याद करे।

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फैसला

धनपतराय की कोठी दुल्हन की तरह सजाई जा रही थी। आज उनकी बेटी रानी की बारात आने वाली थी। रानी के पैर तो खुशी के मारे जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। उसने अपनी शादी के ढ़ेरो सपने जो देखे थे। वे सभी सपने उसे साकार होते नजर आ रहे थे। बडे़ अरमानों से उसने ससुराल की दहलीज पर पहला कदम रखा । मगर यह विवाह शायद उसके लिये अभिशाप था। पहले ही दिन उसके सारे सपने चकनाचूर हो गये जब उसके कानों में जहर घुले शब्द पड़े, बहू दहेज में क्या—क्या लायी है, बस इतना ही, अरे इतना तो कोई गरीब भी अपनी बेटी को दे देता है अरे बनते तो बड़े धन्ना सेठ हैं। गुणों की खान रानी रूप की देवी थी, सौन्दर्य में वह रति को भी मात करती थी। रानी की जहॉ मायके वाले प्रशंसा करते नहीं थकते थे वही ससुराल में वह सास और ननद के ताने सुन सुनकर परेशान हो गई थी, हर पल, हर क्षण उसे यातना के दौर से गुजरना पड़ता था। वह सोचती रहती थी क्या उसे कभी एक क्षण का भी सुख मिल पायेगा। वह तो भगवान से यही दुआ करती थी हे ! मालिक मैंने पूर्व जन्म में ऐसे कौन से पाप किये थे जिसकी तू मुझे इतनी कठोर सजा दे रहा है। क्या इसी का नाम जीवन है, यदि यही जिन्दगी है तो इससे तो मौत ही अच्छी है। शुरू—शुरू में तो उसे मानसिक यातना से भी गुजरना पड़ता था मगर अब तो उसे शारीरिक कष्ट भी दिए जाने लगे थे। हद तो तब हो गयी जब उसे दिन—दिन भर भूखा रखा जाता , पीने के पानी तक के लिए तरस जाती थी वह। भूख प्यास से जब उसका दम निकलने लगता था वह सोचती हे ! मालिक और कितनी कठोर परीक्षा लोगे मेरी। वह तो बस यही सोच कर जीती रही की रात के बाद दिन तो जरूर आता है। कभी तो वह दिन आयेगा जब मेरे दुखों का भी अन्त होगा। वह यह बात अच्छी तरह से जानती थी कि जब दुख अपने चरम पर पहॅुच जाये तो सुख दस्तक देने ही वाला होता है इसलिये ज्यादा दुख आने पर दुखी नहीं होना चाहिये और यदि सुख चरम पर पहुॅच जाये तो दुख आने ही वाला होता है इसलिये बहुत खुश नहीं होना चाहिये मगर इस वक्त तो वह अपनी किस्मत में कॉटें ही कॉटे लिखा कर लायी थी। ऐसा उसे अहसास होने लगा था।मगर आज तो हद ही हो गयी जब उन कसाईयों ने उसके जिस्म का ही सौदा कर डाला। रानी ने चोरी छिपे अपने सास ससुर की बात सुन ली जो वह किसी दलाल से कर रहे थे। आज उसने उस नर्क से निकलने का अन्तिम निर्णय ले ही लिया और पड़ौसियों की मदद से वह उस नर्क से निकलने में कामयाब भी हो गयी । घर से भाग तो आई मगर अब क्या करें कहॉ जाये। अब तो उसके आगे एक ही गहन समस्या थी कि वह अपनी इस पहाड़ जैसी जिन्दगी का क्या करे। समाज तो उसे अकेले इस हाल में जीने नहीं देगा। वह जानती थी की एक अकेली स्त्री का समाज में जीना कितना कठिन काम है यदि पुरूष की चप्पल भी दरवाजे पर रखी होती है तो कोई उंगली नहीं उठा सकता

मगर यहॉ तो वह नितान्त अकेली थी। कभी सोचती इससे अच्छा तो अपना जीवन ही खत्म कर दें सारे कष्टों से निज़ात तो मिलेगी मगर आत्महत्या करना उसे उचित नहीं लगा। मनुष्य जीवन तो भगवान की अमूल्य देन है वह उसे यॅू ही व्यर्थ कैसे कर दे यह ख्याल आते ही उसने आत्महत्या का ख्याल मन से निकाल दिया उसे उसी क्षण मदर टेरेसा का ख्याल आया क्याें न वह भी अपनी जिन्दगी मदर टेरेसा की तरह समाज के नाम कर दे, यह विचार आते ही वह निश्चिंत हो गयी क्योंकि उसे अब जीने की राह मिल गई थी उसने निर्णय कर लिया कि वह अब समाज सेविका के रूप में जीवन यापन करेंगी यही था उसका अन्तिम फैसला जिसने उसका जीवन ही बदल दिया। आज वह शान से एक समाज सेविका के रूप में सम्मान के साथ समाज में सिर उठाकर जी रही है और अपनी तरह कष्ट में जीने वाली महिलाओं को दिशा भी दे रही है।

बलिदान

सोनू रचना की लाश के सामने बैठा फूट—फूट कर रो रहा था कि उसके हाथों यह क्या अनर्थ हो गया उसने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि रचना उसे हमेशा के लिये छोड़कर चली जायेगी । सोनू को रचना अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यारी थी वह उसे जान से भी ज्यादा चाहता था यदि वह दो पल के लिये भी ओझल होती तो वह पागल सा हो जाता था। रचना भी उसे उतना ही प्यार करती थी। मगर उसने कभी भी अपने प्यार को प्रदर्शित नहीं किया वह दिखावे को ढ़ोंग मानती थी उसकी नज़र में सच्चा प्यार वही था जो अन्तरआत्मा से होता है। प्यार का सही अर्थ एक दूसरे की मनोभावना को समझना , एक दूसरे का सुख दुख बॉटना, दूसरे की खुशी को अपनी खुशी समझना लेकिन उसको तो दूसरे को सुखी और खुश देखकर बड़ा आनन्द मिलता था। उसने तो हमेशा दूसरों की खुशियों के लिये अपनी खुशियों का बलिदान किया था। आज उसे दो परिवारों की खुशी के लिये जब अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ा उसने सहर्ष प्राण त्याग दिये।रचना आज ऐसे दोराहे पर खड़ी थी जहॉ एक ओर मायका था तो दूसरी ओर उसका ससुराल। वह सोचते—सोचते पागल हुयी जा रही थी कि किसका साथ दे और किसका नहीं वह तो किसी को भी दुखी देखना नहीं चाहती थी। वह नहीं चाहती थी कि उसके कारण दो परिवारों में से कोई परिवार टूट जाये, क्योंकि दोनों ही परिवार उसे प्रिय थे और वह दोनों ही परिवारों की मजबूरियॉं जानती थी समझती थी।रचना ने मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लिया था। उसकी चार बहनें थी। वह जानती थी की माता पिता ने कितने कष्टों से उन्हें पाला था और इस काबिल बनाया था कि आज वह अपने पैरों पर खड़ी थी। पिता हार्ट के मरीज और माता ब्लडप्रेशर की मरीज हो चुकी थी वह इतनी चिड़चिड़ी हो गयी थी कि जिसको जो मन में आता बोल देती थी। उनमें अब अच्छा समझने की शक्ति ही नहीं थी। सोनू के प्रति भी उनका व्यवहार ठीक न था यह बात रचना अच्छी तरह से जानती थी। रवि को जो स्नेह घरवालों से मिलना चाहिये वह उसे कभी नहीं मिला हमेंशा तिरस्कार ही हुआ था उसका इसलिये वह भी इस कदर टूट गया था की जरा—जरा सी बात पर उत्तेजित हो उठता था और उसके गुस्से का शिकार होना पड़ता था रचना को। कभी—कभी तो वह गुस्से में अपने होश हवाश तक खो बैठता था और रचना को बुरी तरह पीटता था फिर बाद में स्वयं ही पश्चाताप की अग्नि में जलता था वैसे उसने कभी इस उसका बुरा नहीं चाहा था मगर रचना भी तो इंसान थी। धीरे—धीरे सबके तानों और सोनू के व्यवहार से उसका जीना हराम हो गया था। वह अकेले में सोचती काश वह लड़का होती तो बताती की पौरूष अत्याचार के लिये नहीं होता बल्कि नारी की रक्षा के लिये होता है। कभी सोचती वह उसे छोड़ दे मगर बिना किसी सहारे के तो वह और टूट जायेगी, बिखर जायेगी। वह सोचती तो बहुत कुछ थी मगर कर कुछ नही ंपाती थी मुॅह पर तो जैसे ताला लगा था उसके। वह नहीं चाहती थी की उसकी बातों से किसी को भी दुख पहुॅचे। आखिर जब आज उसने यह समझ लिया कि बिना बलिदान के दो परिवारों की खाई पटने वाली नहीं है और झगड़े की जड़ वह स्वयं है तो सहर्ष उसने अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। आज रचना ने यह बलिदान करके स्वयं को तो जीवन से मुक्त कर लिया मगर सोनू को सदा के लिये यादों की अग्नि में जलता छोड़ गयी। मगर रचना को इससे कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि दोनों परिवारों की रिश्तेदारी दुश्मनी में बदल गयी। रचना के मायके वालों ने ससुराल वालों पर मुकदमा दायर कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ की सोनू को उम्र कैद की सजा हो गयी।आज भी रचना की आत्मा तड़प रही है शायद वह यही सोचती है कि क्या ऐसा करना उचित था ? यदि यह उचित था तो बेचारा सोनू उम्र कैद की सजा में जीवन भर क्यॅू तड़प रहा है। फिर रचना ने अपने पति के साथ ऐसा पाप व अन्याय क्यूं किया।आज सोनू सिर्फ रचना की यादों में खोया रहता है । उसे अपने घर परिवार से कोई मतलब नहीं है । वह तो बस एक चकोर की तरह अग्नि में तप रहा है।

मनहूस

सूरज डूबता जा रहा था तथा अंधेरा छाने लगा था। उसको देखते—देखते बूढ़ा रामप्रसाद भी अतीत की यादों में डूब गया उसे भी अपना पुराना समय याद आने लगा। रामप्रसाद की शादी को दो वर्ष हुये थे कि उसके घर में एक नन्हें मेहमान का आगमन हुआ। रामप्रसाद और उसकी पत्नी केतकी बहुत खुश थे। बच्चे का नाम उन्होने ‘आदित्य‘ रखा था। लगभग डेढ़ वर्ष बाद केतकी पुनः मॉ बनी मगर पु़त्री को जन्म देते वक्त वह चल बसी। पड़ोस की एक ताई ने ही बच्चों को संभाला। रामप्रसाद इसका जिम्मेदार अपनी पुत्री को ही मानता था उसे लगता था की उसकी पुत्री ही अपनी मॉ को खा गयी। बच्ची के जन्म के वक्त जब उसने सुना कि पत्नी की मृत्यु हो गयी वह तो उसी वक्त उसकी जीवन लीला समाप्त करने जा रहा था मगर एक ताई ही थी जिसने बच्ची को बचाया और पाल—पोस कर बड़ा किया था। विधवा ताई के घर में अपना कोई भी न था वह तो बस अपनी पेंशन से घर का खर्चा चलाती थी लड़की का नाम उसने शीतल रखा था। जैसा नाम था वैसे ही वह शांत भी थी। रामप्रसाद अपने पुत्र के लिए तो खिलौने लाता मगर शीतल उसे एक ऑख नहीं सुहाती थी यदि वह कभी—कभार उसके खिलौने से खेलने लग जाती और शीतल देख लेता तो उसकी मार पड़ जाती थी। इसलिये ताई हमेशा उसे अलग ही रखती थी। देखते—देखते पॉच वर्ष बीत गये रामप्रसाद ने आदित्य का दाखिला शहर के सबसे अच्छे स्कूल में कराया। शीतल का भी पढ़ने का मन करता था जैसे तैसे ताई ने रामप्रसाद से जिद करके चुंगी के स्कूल में शीतल का भी दाखिला करा दिया। आदित्य पढ़ाई में कम लड़ाई झगड़े में ज्यादा रहता था , लेकिन शीतल पढ़ाई में बहुत होशियार थी हमेशा कक्षा में अव्वल रहती आठवीं कक्षा से तो उसे वजीफा भी मिलना शुरू हो गया था। समय बीतता गया 12 वीं में आदित्य के इतने कम अंक आये की उसका कहीं भी दाखिला ही नहीं हो पा रहा था मगर रामप्रसाद चाहता था कि वह इंजीनियरिंग करें। आखिरकार घर को गिरवी रखकर उसने जबरदस्त डोनेशन देकर इंजीनियरिंग में दाखिला करा ही दिया। उधर शीतल अपने वजीफे से पढ़ती जा रही थी। उसने तो 12 वीं में पूरे जिले में टॉप किया। वह खुशखबरी जब ताई ने रामप्रसाद को सुनाई तो उसने कहा ‘मैं क्या करूॅ, मेरा उससे कोई लेना देना नहीं है यह सुनकर बेचारी शीतल अपनी ताई से लिपट गयी और सिसक—सिसक कर रोने लगी। उसकी काबलियत की वजह से उसका दाखिला मेडीकल में हो गया। वजीफा तो उसे मिल ही रहा था जिससे उसका खर्च चल जाता था।वक्त बीतता गया देखते—देखते शीतल, डॉ0 शीतल बन गयी लेकिन रामप्रसाद सदा की तरह आज भी उससे नाराज थे। उधर जैसे तैसे आदित्य सिविल इंजीनियरिंग बन गया। रामप्रसाद की तो खुशी का ठिकाना ही न था। उसके इंजीनियर बनने पर उसने पूरे मोहल्ले में मिठाईयॉ बांटी।अभी पढ़ाई पूरी हुये एक वर्ष भी न हुआ था ,रामप्रसाद अपनी खुशी को लोगों में अच्छी तरह बांट भी न पाया था कि ऐसी घटना घट गयी जिसके बारे में उसने सोचा भी न था। आदित्य अचानक एक दिन दिशा नाम की लड़की से शादी करके उसे घर ले आया। रामप्रसाद के तो सारे सपने ही चकनाचूर हो गये, क्या—क्या सपने देखे थे उसने अपने बेटे आदित्य की शादी के। जैसे—तैसे उसने उन हालात से भी समझौता कर लिया। इधर शीतल भी दक्ष के प्यार में पड़ ़गयी थी। दक्ष उसके बचपन का साथी था। उसके पिता बहुत बड़े व्यवसायी थे । लेकिन इस वक्त दक्ष ही उनका व्यवसाय संभाल रहा था। आज जब दक्ष, शीतल का हाथ मॉगने उसके पिता के पास गया तो उन्होंने साफ—साफ मना कर दिया की शीतल जो चाहे करे मुझे उसकी जिन्दगी से कोई सरोकार नहीं है। उस वक्त ताई ही थी जिसने शीतल को संभाला। उसने दक्ष के पिता से बात कर उसकी शादी करा दी। रामप्रसाद अपनी सगी बेटी तक की शादी में सम्मिलित नहीं हुआ । शीतल को दुख तो बहुत हुआ कि उसके पिता का आशीर्वाद तक उसे नहीं मिला, मगर वह तो इन सब की आदी हो चुकी थी।शीतल बहुत खुश थी कि उसे उसका मनचाहा जीवन साथी मिल गया था दर्द था तो बस यही की उसके पिता की अनदेखी जो उसके दिल में टीस पैदा करती रहती थी। बस यही दुख उसको खाये जा रहा था कि उसके पिता ने जीवन में कभी भी स्नेह से सिर पर हाथ रखकर नहीं पूछा की बेटा कोई परेशानी तो नहीं वह बेचारी तो पिता के प्यार के लिये तरस रही थी मगर रामप्रसाद का रूखा व्यवहार प्यार में नहीं बदल पाया। फिर भी शादी के बाद पहली बार जब वह घर आई तो इस आस के साथ कि अब तो पिता की नाराजगी दूर हो गयी होगी अब तो उसको उनका आशीर्वाद मिलेगा ही है मगर यह क्या उन्होंने तो उससे ढ़ग से बात तक नहीं की। यह नफरत की इन्तहां नही ंतो क्या थी जिसमें विदा होती बेटी के लिये आशीर्वाद के दो शब्द भी न निकले। शीतल रोते हुये अपनी ताई से लिपट गयी और अपना सारा दर्द, सारी टीस ऑसुओं के रूप में ताई के सीने में उड़ेल दिये। ताई ने उसे समझा—बुझाकर इस तरह विदा किया मानो शीतल उसकी खुद की औलाद हो। वास्तव में एक गैर के दिल ने इतना साथ दिया और सगे पिता के मुॅह से आह तक न निकली। इधर आदित्य की शादी को कुछ वर्ष ही बीते थे कि नई बहू ने रंग ढंग दिखाना शुरू कर दिया। बाहर का सारा काम अब रामप्रसाद करता था,, क्योंकि लड़के की शादी हो जाने की खुशी में उन्होंने नौकरी ही छोड़ दी थी कि अब आराम करेगें। मगर नई बहू ने तो उन्हें फिर से काम पर लगा दिया था और उन्हें ताने सुनने पड़ते वह अलग। उन्होंने इस बात को आदित्य से कहने की कोशिश भी की तो उसने कह दिया इसमें मैं क्या कर सकता हॅू वह जो कुछ भी करती है या कहती है इस घर के भले के लिये ही तो करती है। देखते—देखते समय बीतता गया आदित्य के घर में एक सुंदर से बेटे ने जन्म लिया जिसका नाम उन्होंने रखा अनंत। दिशा रामप्रसाद को बच्चे को छूने भी नहीं देती थी क्योंकि एक दिन जब रामप्रसाद बच्चे को खिला रहे थे पता नहीं वह कैसे गिर गया औैर उसे चोट लग गयी तब से दिशा रामप्रसाद को बच्चे के लिये मनहूस समझती थी। रामप्रसाद को यह बात बहुत चुभती थी मगर वह करता भी क्या ? वह सोचता क्या कोई बाबा अपने पोते के लिये मनहूस हो सकते हैं ? उनका मन अपने पोते को खिलाने का बहुत करता था मगर मन मसोस कर रह जाते थे। एक दिन जब उनका मन नहीं माना और दिशा भी घर पर नहीं थी तो उन्होंने अपनी इच्छा पूरी कर डाली मगर यह क्या, पता नहीं कहॉ से दिशा आ गयी और रामप्रसाद को देख लिया। फिर क्या था उसने उनके हाथाें से अनंत को छीना और उन्हें खूब खरी—खोटी सुनाने लगी, तभी आदित्य भी आ गया उसे देखते ही रामप्रसाद को लगा कि आज तो आदित्य दिशा को जरूर सबक सिखायेगा मगर यह क्या वह तो चुपचाप खड़ा तमाशा देखता रहा। इस वाकया से दिशा को बढ़ावा मिल गया और उसने रामप्रसाद को घर छोड़ने का आदेश दे डाला। जिसे सुनकर रामप्रसाद के पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। वह तेजी से दरवाजे की तरफ जाता है मगर जब उसे कोई नहीं रोकता है तो वह भागता हुआ घर से निकल जाता है पता नहीं कहॉ से तेज़ रफ्‌तार से आ रही कार उसे ज़ोर से टक्कर मारती है वह बेहोश होकर गिर जाता है कुछ लोग उसे सरकारी हस्पताल में भर्ती करा देते हैं। शीतल इसी अस्पताल में डॉक्टर है वह अपने पिता को खून से लथपथ बेहोशी की हालत में देखकर घबरा जाती है तुरंत सब चीजों का इंतज़ाम करके वह खुद उनका इलाज करती है लेकिन जब वह खतरे से बाहर हो जाते हैं तो वह वहॉ से चली जाती है क्योंकि वह जानती थी कि उसके पिता उसे वहॉ देखकर नाराज हो जायेगें हो सकता है अपना इलाज भी न कराये इसलिये सारी देखभाल डॉ0 गुप्ता को सौंपकर वह उनका हाल—चाल लेती रहती है। जब शीतल को पता चलता है की उसके भाई ने पिता को बेघर कर दिया है तो उसे बड़ा धक्का लगता है। शीतल डॉ0 गुप्ता के ज़रिए रामप्रसाद को अपनी फैक्ट्र्‌ी में नौकरी दिलवाने की बात करती है जो की उसके ससुर की थी जिनकी मृत्यु के बाद उसका पति दक्ष चला रहा था । शीतल जब सारी बात दक्ष को बताती है तो वह अपने मैनेजर से कह कर रामप्रसाद को नौकरी व रहने के लिये एक मकान का इंतजाम करवा देता है। रामप्रसाद नहीं जानता था कि उस फैक्ट्र्‌ी का मालिक कौन है यदि रामप्रसाद मिलने की कहता तो मैनेजर कह देता की मालिक आपसे स्वयं मिलेगें।इस तरह अपने पिता की अप्रत्यक्ष रूप से सेवा करके शीतल बहुत खुश थी। वह हर तरह से अपने पिता का चोरी छिपे ख्याल रखती रहती थी। आदित्य शीतल वैसे तो सगे भाई बहन थे लेकिन उनका एक दूसरे के प्रति व्यवहार ठीक नहीं था। शीतल भी मॉ बन चुकी थी उसने एक कन्या को जन्म दिया था। जिसका नाम उसने साक्षी रखा था। साक्षी उसे जान से भी ज्यादा प्यारी थी जो प्यार उसके पिता ने उसे कभी नहीं दिया वह सारा प्यार साक्षी को देना चाहती थी।उधर आदित्य और दिशा बहुत खुश थे क्योंकि अनंत का आज नौकरी का प्रथम दिन था। वह भी उसी सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हो गया था जहॉ शीतल पहले से ही मुख्य चिकित्सा अधिकारी थी। जब शीतल पहली बार उससे मिली और उसके माता—पिता के बारे में जानकारी ली तो वह समझ गयी यह और कोई नहीं उसका ही सगा भतीजा है। एक दिन मौका देखकर उसने अनंत को अपने घर बुलाया तथा अपने और रामप्रसाद के रिश्ते के बारे में बताया ,उसे आश्चर्य तब हुआ जब उसको अनंत ने बताया कि मेरे पिता आदित्य ने कभी भी उनके बारे में उसको नहीं बताया, फिर शीतल ने उसको अपनी बेटी साक्षी से मिलवाया वह इस वक्त 12 वीं की छात्रा थी। दोनों भाई बहन एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुये। उसी समय शीतल की ताई जिन्होने उसे पाल पोसकर बड़ा किया था आ गयी जिन्हें शादी के बाद शीतल अपने पास ले आई थी। अनंत से मिलकर ताई जी बहुत खुश हुयीं ।रामप्रसाद कमरे में बैठा एकटक दीवार को देखे जा रहा था, आज ना तो उसके पास उसका बेटा था और न ही उसकी बेटी। बिल्कुल अकेला रह गया था वह, जिस लड़के के लिये उसने इतना कुछ किया वही उसे छोड़कर चला गया था वह भी उस वक्त जब उनको उसकी जरूरत थी। बेटी को तो उसने कभी प्यार से सहलाया भी न था। तभी दरवाजे पर खट—खट होती है शायद कोई आया था। दरवाजा खोला तो पहचान नहीं पाया क्योंकि ऑखें भी कमजोर हो चुकी थी। वह अनंत था , वह आगे बढ़कर दादाजी के पैर छूता है और सारी बात बताता है रामप्रसाद का सिर शर्म से झुक जाता है। वह शीतल से माफी मॉगता है शीतल भी अपने पिता से सिर्फ और सिर्फ प्यार ही चाहती थी। रामप्रसाद शीतल को गले लगा लेता है और सब साथ—साथ रहने लगते हैं। आदित्य को जब पता चलता है की अनंत अब अपनी बुआ और दादाजी के साथ रहने लगा है तो वह भी शीतल के पास आता है और शीतल से माफी मॉगता है। तभी शीतल कहती है अब हुआ तुम्हें दर्द का अहसास, जब बुढ़ापे में तुम्हारी औलाद तुम्हें छोड़कर चली गई। वह भी उस वक्त जब वास्तव में तुम्हें उसकी जरूरत थी। अब सोचो पिताजी को कैसा लगा होगा जब तुमने उन्हें बेघर कर दिया था। दोनों अपने किये पर पछता रहे थे । शीतल के कहने पर रामप्रसाद भी अपने बेटे को माफ कर देता है।आज रामप्रसाद बहुत खुश था। वह कहने लगा जिस लड़की को मैं आज तक मनहूस समझता था आज उसी लड़की की वजह से मेरे घर की मनहूसियत दूर हो गयी। यह कहकर रामप्रसाद शीतल को अपने गले लगा लेता है।

फूल जो देर से खिला

मधुरिमा एम0ए0 पास कर चुकी थी शिक्षा ग्रहण करते समय उसने स्वर्णिम भविष्य के अनगिनत सपने चुने थे। शास्त्रों में विद्यार्जन की बड़ी महिमा गाई गई है। विद्या को अमृतमयी तक कहा गया है। वह पूर्ण मनोयोग से विद्यार्जन करती थी।कॉलेज में होने वाली शायद ही कोई ऐसी प्रतियोगिता हो जिसमें वह भाग न लेती हो उसकी तर्क शक्ति और कल्पना शक्ति बड़ी प्रबल थी। वह बड़ी मेधावी छात्रा थी।उसके पिता सात्विक प्रवृत्ति के थे और मॉ साध्वी। एक छोटा भाई सोनू भी था जो अपनी बहन से बहुत प्यार करता था वह तो उसकी हर बात मानता था । सभी आनन्दपूर्वक जीवन यापन कर रहे थे कि अचानक एक अप्रत्याशित घटना घट गयी मधुरिमा की मॉ का देहान्त हो गया। अभी एक माह भी न बीता था कि पिता का भी देहान्त हो गया। भाई छोटा था और कुछ करता भी था तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी पर आ गयी नौकरी की तलाश में वह बहुत भटकी मगर असफल रही।अन्त में एक प्राइवेट स्कूल में उसकी अध्यापिका की नौकरी लग गयी मगर तनख्वाह इतनी कम थी की उसके पूरे घर का खर्च चलाना बहुत मुश्किल था। मगर करती भी क्या और कोई चारा भी तो न था। लेकिन उसका यौवन नदी के प्रवाह सा कल—कल, छल—छल निनाद कर रहा था।दूसरी थी नौकरी की विवशता। भाई को स्कूल भेजने की उसकी सामर्थ्य न थी तब सोचा क्यों न तिहरी भूमिका अदा की जाय और भाई को स्कूल की जगह घर पर ही पढ़ाया जाय जिम्मेदारियॉ निभाते—निभाते वह इतनी थक चुकी थी कि अपनी शादी के बारे में तो सोचना ही छोड़ दिया। बचपन में देखे रंगीन सपने अब धूमिल होते जा रहे थे। तनख्वाह इतनी कम थी की वह मकान का किराया ही नहीं दे पा रही थी जब छः माह हो गये तो मकान खाली करना पड़ा। अब तो उसका सपना था भाई को अच्छी शिक्षा देना जिससे वह उसकी घर की जिम्मेदारियों में मदद कर सके लेकिन यह क्या ? मुसीबत तो जैसे उसके हाथ धो कर पीछे पड़ी हुई थी अचानक छोटे भाई को बुखार आया उसकी सेवा सुश्रूषा करते—करते जब उसको बार—बार छुट्‌टी लेनी पड़ी तो उसकी नौकरी भी चली गई क्योंकि नौकरी प्राइवेट थी। अब तो जीने का सहारा भी चला गया और भाई भी उसे अकेला इस दुनिया में छोड़ कर चला गया। यह सदमा वह सहन न कर सकी दुनिया में बिल्कुल अकेली, जाय तो कहा और किस पर विश्वास करें अपना दुख दर्द किससे कहे इस जालिम दुनिया में सभी उसे दुश्मन नज़र आ रहे थे।अब वह इस संसार में बिल्कुल अकेली थी मुसीबत के इतने पहाड़ उस पर टूटे थे कि वह विक्षिप्त सी हो गई थी। जीवन से अब उसका कोई मोह नहीं रह गया था । वह हर तरफ से हताश व निराश हो गई थी। यह हताशा उल्लास में कैसे परिवर्तित हो उसे सूझ ही नहीं रहा था। जब उससे कोई सहानुभूति दिखाता तो वह हिचकियॉ ले लेकर रो पड़ती थी उसने अनेक बार सोचा कि इस जीवन से तो मृत्यु भली। अड़ोसी—पड़ोसी भी उसकी किसी प्रकार की सहायता करने की स्थिति में न थे। वह नारी थी और नारी की कुछ सीमायें होती हैं यह बात वह अच्छी तरह से जानती थी। किसी भी तरह का कोई भी आकर्षण उसके जीवन में अब बचा ही नहीं था जिसके लिये वह जिये। आज उसने सोच लिया था की वह जीवन का ही अन्त कर देगी यही सोचकर वह स्टेशन की ओर चली जा रही थी ट्र्‌ेन को दूर से आता देखकर भी वह रूकी नहीं पटरियों पर चली जा रही थी। अचानक कोई अलौकिक शक्ति उसे पटरियों से खींचकर ले जाती है वह देखती है की एक नवयुवक उसके सामने खड़ा है वह चिल्ला पड़ती है आखिर तुमने मुझे क्यू बचाया। मेरा जीवन वेदना का आगार है। मेरे मॉ—बाप भाई बहन सब चिरनिद्रा में लीन हो चुके हैं इस निष्प्रयोजन जीवन को जी कर मैं क्या करूॅगी। वह नवयुवक था विपुल जिसे कभी भी अपने मॉ—बाप का प्यार नहीं मिला था विधाता ने उसके जीवन को नर्क बना दिया था। उसकी भी मंशा जीवन को समाप्त करने की थी उसने अपनी रामकथा उसको सुनाई। फिर पूछा सृजन और विनाश में से ग्राहय क्या है क्या हम दोनों मिलकर सुख का संसार नही बसा सकते हैं। उसने सहमति प्रकट करते हुये सिर हिला दिया। फिर क्या था वेदना की अमावस्या की रात्रि पूर्णिमा के उजाले में परिवर्तित हो गई।

संक्षिप्त जीवन परिचय

नामः डॉ0 कविता रायज़ादा

जन्म तिथिः 5 अप्रैल 1968, आगरा

पिता का नामः स्व0 डॉ0 बाबूलाल वत्स

शिक्षाः एम0ए0,( हिन्दी) एम0कॉम, पी—एच0डी0( हिन्दी)

व्यवसायः नौकरी, दयालबाग एजूकेशनल इंस्टीट्‌यूट,डीम्ड

विश्वविद्यालय,दयालबाग, आगरा—5 (लगभग 25 वषोर्ं से)

साहित्यिक सेवाः विभिन्न पत्र—पत्रिकाओं में सामाजिक मूल्यों पर आधारित

लेख एवं कविताओं का प्रकाशन ।

आकाशवाणीः आकाशवाणी आगरा पर लगभग 16 वर्षो तक कम्पेयर

दूरदर्शनः दूरदर्शन स्थानीय इन केबिल टी0वी0 आगरा पर 2000 से

2003 तक समाचार वाचिका

ः लाइफ ओ0के0 सावधान इण्डिया में उ0प्र0 की सत्य

घटनाओं पर आधारित सीरियल में कार्य, प्रसारण 12

नवम्बर 2012

पुरस्कारः राष्ट्रीय—50, अन्तर्राष्ट्रीय—07

प्रकाशित रचनायेंः पं0श्रीराम शर्मा आचार्य की सांस्कृतिक सामाजिक चेतना

(शेाध ग्रन्थ—2007),

: कृति (अनसोल्वड पेपर)

: अन्तर्ज्वार (काव्य संग्रह—2013),

: चाहत (कहानी संग्रह—2014)

: अन्तरिक्ष के झरोखों से—हिन्दी (ई बुक 2015)

ः सैर धरती, आकाश, पाताल की (यात्रा वृतांत—2015)

नामांकनः वूमेन ऑफ द ईयर सम्मान हेतु 2003 में नामांकित

,अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीट्‌यूट, इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ

रिसर्च द्वारा।

विशिष्ट उपलब्धि : 21 वीं सदी की 111 महिलाओं में नाम दर्ज, द सण्डे

इंडियनस, दिल्ली।

ः एस0आर0एस0 मेमौरियल शिक्षा शोध संस्थान,

आगरा में कार्यकारी निदेशक।

ः स्काउट गाइड में विशेष ड्‌यूटी अधिकारी, आगरा

संपर्क सूत्रः 37 सी, श्यामजी विहार, सरलाबाग एक्सटेंशन रोड,

दयालबाग,आगरा — 282005

ई मेलः raizada.kavita5@gmail.com

मो0 09319769552, 05622570098,09897062222

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