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Kahani Sangrah Chahat

अर्पण

परम श्रद्धेय पूज्यनीय, अर्चनीय, वन्दनीय, स्नहेमयी, दयामयी, मेरे हृदय के अति निकट मेरी दादी सास श्रद्धेय स्व0श्रीमती गिरजा कुमारी रायज़ादा जिनकी छत्रछाया में विवाहोपरान्त मुझे सम्बल मिला। जिनकी स्मृतियों को शत—शत नमन करते हुए सामाजिक सुगंध से भरा गुलदस्ता कहानियों के रूप में बड़ी ही विनम्रता से समर्पित कर रही हॅू जिसकी सुखद अनुभूति मेरे साथ—साथ आपको भी होगी।

भूमिका

डॉ0 कविता रायज़ादा की नवीन कृति चाहत की समग्र चौदह रचनाएं पढ़कर लेखिका की लेखन क्षमता को मैंने महसूस किया है। उन्हें अपने सृजन पर विश्वास है और उसके द्वारा जो संदेश वो समाज को देना चाहती हैं, उसके लिए वह आशान्वित हैं।

अपनी रचनाओं में समाज में व्याप्त कुरीतियों और समस्याओं पर वह बेचैन दिखाई देती हैं। जिन्हें अपने कथानकों में समेटने का उन्होंने प्रयास भी किया है।

समाज में कन्या—भ्रूण हत्या तथा कन्याओं को हेय दृष्टि से देखना, उनके पालन—पोषण में भेद करना, लेखिका को सालता है, इसीलिए इस प्रसंग को ही कई जगह स्पष्टता देते हुए कन्या की प्राकृतिक सहिष्णुता, करूणा, त्याग और सहनशीलता को कथावस्तु का केन्द्र बिन्दू भी बनाया है। चाहे वह चाहत की सुनयना हो या मनहूस की शीतल।

वृद्धों के साथ हो रहे तिरस्कार को भी उनका संवेदनशील हृदय नहीं स्वीकारता है और हाय बेटा में वह इसी पर कटाक्ष करती दिखती हैंं।

लेखिका के मन को परोपकार और समाज सेवा जीवन के आदर्श प्रतीत होते हैं और उनकी अनुभूति जीने की राह और फैसला इसी को स्पष्टता देने की चेष्टा कही जा सकती है।

कुछ मान्यताएं हर युग में मान्य रही हैं, जैसे जीवन साथी का संयोग विधि का विधान है। किसे कब, कहां और कैसे मिलाना है यह विधाता ही जानता है। फूल जो देर से खिला इसी तथ्य की स्वीकृति लगती है।

सकारात्मक सोच अंधेरों से निकाल कर जीवन में खुशियों का संचार कर सकती हैं, लेखिका ने दूसरा प्यार में यही संदेश प्रेषित किया है।

कमरा नं0 13 और अधूरा स्वप्न उनकी विदेश यात्राओं के स्मृति अंश हैं। जिनमें वहॉ के प्राकृतिक दृश्यों के सजीव चित्रण के साथ जल, थल और नभ के विचरण के रोमांचक क्षण भी सलीके से वर्णित हैं, साथ में भारतीय चरित्र की विदेशों में गिरती छवि पर उनके हृदय की कसक भी साफ दिखी है, 21 वीं सदी में 13 के अंक की अशुभता की मानसिकता पर क्षोभ व्यक्त करते हुए वह ऐसे अंधविश्वासों से उबरने का आग्रह करती भी दिखी हैं।

कुल मिलाकर चाहत डॉ0 कविता रायज़ादा के जीवन की अनुभूतियों की सुंदर अभिव्यक्ति कही जा सकती है। उनके लेखन उत्साह के लिए अनेकानेक शुभकामनाएं प्रेषित हैं।

साहित्य पुरोधा पिता की होनहार संतान साहित्य द्वारा उच्चायाम प्राप्त करे, ऐसी हमारी हार्दिक अभीप्सा है।

डॉ0शैलबाला अग्रवाल

संस्थापिका

आगरा महानगर लेखिका समिति

शुभकामनायें

डॉ0 कविता रायज़ादा की 14 कहानियों का संकलन चाहत पाठकों के हाथ में है, जिसे कविता ने यथार्थ घटनाओं को आधार बनाकर लिखा है। ये कहानियॉ उनके जीवन के अलग—अलग अवसरों पर घटी घटनाऍ हैं, जिसकी वे अधिकांश स्वयं साक्षी हैं अथवा उनकी बहन द्वारा इन सामाजिक स्थितियों से उनका परिचय हुआ। अतः समाज का प्रतिबिम्ब इन कहानियों में दिखलाई देना सहज स्वाभाविक है। हम सब के आस—पास भी नियमित अनेक घटनाऍ घटती हैं, जिन्हें देखने पर प्रत्येक घटना स्वयं में एक कथा समेटी हुई होती है। लेखकीय कल्प शिल्प का प्रयोग कर कहानीकार उन्हें साहित्यिक कथा का रूप दे सकता है। मानव जीवन कड़वे—मीठे यथार्थ का इसी प्रकार साहित्य में रूपान्तरण हो पाता है।

इस संकलन की अधिकांश कहानियॉ स्त्री जीवन को लेकर बुनी गई है। आज समाज में कन्या भ्रूण हत्या, लड़कियों के साथ भेदभाव, साधारण रंग रूप की लड़की के विवाह की अड़चनें,प्रेम विवाह और विवाह में प्रेम,वैवाहिक झंझावतों में बीतता स्त्री जीवन आदि विविध विषयों की कहानियॉ इस संकलन में संकलित है। आशा है इन कहानियों को पाठकों का भरपूर प्यार मिलेगा।

प्रकाशन के इस अवसर पर मैं लेखिका के प्रति अपनी हार्दिक शुभकामनाऍ व्यक्त करती हॅू और आशा करती हॅू कि वह इसी तरह अच्छी—अच्छी कहानियॉ पाठकों को सौंपती रहें। ढ़ेरो शुभकामनाओं सहित।

डॉ0 कविता वाचक्नवी

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी

लंदन

Examiner (Hindi) at University of Cambridge

Consultant: Languages & Arts (CIE) at University

Autor,Poet,Critic,Sociolinguist,Editor Language Tech.Professonal & Human Rights

Activist at Indian Languages & Cultural creative Hindi writing

सफरनामा चाहत का

चाहत के इस खुशनुमा सफर में खट्‌टे—मीठे अनुभव हुये जिनसे शिक्षा लेते हुये यह सफर 46 वर्ष तक अनवरत चलता रहा। कभी खुशी कभी ग़म को अपने दामन में समेटे जो कुछ मेरे व मेरे साथियों के साथ घटित हुआ और जिसको कहीं न कहीं मेरे अन्तर्मन ने छुआ, मुझे कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया तभी अन्तरआत्मा की आवाज को सुनकर सच्ची घटनाओं को कहानी का रूप देने का साहस आया , जिसे मैंने बिना किसी डर के कागज पर उकेर कर आपके समक्ष प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयास किया है। सच्ची घटनाओं पर आधारित इन कहानियों को लिखने का उद्‌देश्य किसी का दिल दुखाना या परेशान करना नहीं है बल्कि समाज को सच्चाई से अवगत कराना है साथ ही यह भी बताना है की वक्त बेवक्त हमारे साथ भी जाने अनजाने इस तरह की घटनायें हो जाती हैं जिनसे हमें सबक लेना चाहिये और दूसरा को भी सचेत करना चाहिये और सावधान रहना चाहिये, मगर हम ऐसा नहीं करते हैं।

यह मेरा पहला कहानी संग्रह है जिसमें 14 कहानियॉ हैं जिसमें से कुछ कहानियॉ पहले प्रकाशित एवं प्रसारित भी हो चुकी हैं और पुरस्कार भी प्राप्त हैं। यदि यह कहानियॉ आपके अन्तस्तल में संवेदनायें जगा सकें, जिनके लिये यह रची गई हैं तो मैं अपना प्रयास सार्थक समझॅूगी।

मेरा यह प्रयास कितना सफल रहा है, यह तो सुधिजन पाठकों की मेधा ही निश्चित करेगी। मुझे इस कार्य में कुछ विशिष्ट लोगों का सहयोग मिला है जिन्होंने समय—समय पर मेरा उत्साहवर्धन किया। फलस्वरूप यह कहानी संग्रह आपके समक्ष प्रस्तुत है।

मैं अपने साथ—साथ उन सभी लोगों की कृतज्ञ हॅू जिनके साथ यह घटनायें घटी और उन्होंने मुझे उसे लिखने की इजाज़त दी भले ही चाहे वह मेरी अन्तरआत्मा की आवाज़ ही क्यों न हो।

मेरे इस संकलन में विशेष रूप से प्रेरणा के स्रोत मेरे जन्मदाता मेरे पिता डॉ0 बाबूलाल वत्स एवं माता श्रीमती चन्द्रकान्ता वत्स रहे हैं। साथ ही मेरी अनुजा श्रीमती अर्चना मालवीय जिसने अपनी आप बीती एवं कुछ वास्तविक घटनाओं से मुझे अवगत कराया और उसे इस कहानी संग्रह में शामिल करने का अनुरोध भी किया।

इस सफर के राही व रचनाधर्मिता के सभी सहभागी, बन्धु—बान्धवो की हृदय से आभारी हॅू जिनका सहयोग मुझे सदैव मिलता रहा।

मैं संचालक, राष्ट्र्‌भाषा ऑफसेट प्रेस, आगरा श्री अतुल चौहान जी की हृदय से आभारी हॅू, जिन्होंने इस कहानी संग्रह को स्वरूप प्रदान किया।

मैं अपने पतिदेव श्री आर0पी0रायज़ादा, दोनों बच्चों जुबली एवं जुबिन की हृदय से आभारी हॅू जिन्होंने इस संकलन को प्रकाशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं। मैं विशेष रूप से आभारी हॅू अपने पिता तुल्य ससुर श्री प्रेम प्रसाद रायज़ादा जी एवं माता तुल्य सास श्रीमती आशा रायज़ादा जी की जिनका सहयोग मुझे हमेशा मिलता है।

मैं अपने इस कहानी संग्रह चाहत के लिये केवल इतना ही कह सकती हॅू, कि आप इससे शिक्षा अवश्य लें जिससे भविष्य में होने वाली घटनाओं से बचा जा सके और विशेष आग्रह कि पढ़ने के बाद किसी दूसरे पाठक तक जरूर पहुॅचा दें जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोग लाभान्वित हो सके।

डॉ0 कविता रायज़ादा

37 सी,श्यामजी विहार,सरलाबाग

एक्सटेंशन रोड,दयालबाग,आगरा—282005

दूरभाष संख्या : 9319769552,05622570098

ई मेल —

कहानी संग्रह

चाहत

मॉ मुझे बचाओ

हाय बेटा

दूसरा प्यार

इकलौती बहू

कमरा नं0

कन्या का जन्म

चाहत

22 नवम्बर 2010 जैसे ही हवाई जहाज ने उड़ान भरी सुनयना को लगा शायद यही वह पल था जिसका बरसों से उसे इंतजार था। वह सोच भी नहीं सकती थी कि यह पल उसके जीवन में कभी आएगा भी। आज वह इतनी खुश थी मानों उसके पंख लग गए हो और वह स्वछन्द आकाश मेें उड़ रही हो। हवाई जहाज में बैठे—बैठे वह अतीत की यादों में खो गयी और उस वक्त में पहुॅच गयी, जब वह 15 वर्ष की थी। एक साधारण से परिवार में पली बढ़ी सुनयना, छः भाई बहनों में सबसे बड़ी थी। पिता शिक्षक थे। जो थोड़ा बहुत कमाते थे उसी से घर का खर्च चल पाता था। यह बात सुनयना बहुत अच्छी तरह से जानती थी, समझती थी ,क्योंकि वह इतनी छोटी भी नहीं थी और परिस्थितियों ने उसे समय से पहले ही बड़ा कर दिया था। घर में सबसे बड़ी होने के कारण वह हरदम यही सोचा करती कि जितनी जल्दी हो सके वह अपनी पढ़ाई पूरी कर ले और छोटी—मोटी कोई नौकरी पकड़ ले, जिससे माता—पिता की कुछ मदद हो सके ,सभी इच्छाओं की पूर्ति हो सके। इसी चिन्ता में वह ढं़ग से पढ़ भी नहीं पाती थी। जब भी पढ़ने बैठती घर की समस्यायें ,परेशानियॉ सामने दिखाई देने लगती थी, फलस्वरुप मेहनत करने के बावजूद भी उसकी बोर्ड परीक्षा में द्वितीय श्रेणी ही आ पाई उस दिन वह खूब रोई थी क्योंकि उसकी वह सहेली जिसको वह पढ़ाया करती थी उसकी भी द्वितीय श्रेणी ही आई थी। खैर जो होता है ईश्वर की मर्जी से ही होता है यह सोचकर उसने तसल्ली कर ली , ओैर फिर, उसका ध्यान केन्द्रित हो गया घर की समस्याओं की तरफ। हालांकि उसके माता—पिता ने यह पता ही नहीं लगने दिया कि वह किस दौर से गुजर रहे हैं। समय बीतता गया दिन, महीने, साल और वह दिन भी आ गया जब सुनयना नौकरी के लिए पहली बार घर से बाहर निकली। तनख्वाह तो सिर्फ पचहत्तर रुपये महीने ही थी लेकिन खुशी इस बात की थी कि थेाड़ी ही सही कुछ तो कमाई होगी। ईश्वर ने शायद उसकी सुन ली थी , तभी तो अभी पन्द्रह दिन भी नहीं बीते थे कि उसे एक सौ पचास रुपये महीने की नौकरी मिल गई लेकिन फिर भी वह खुश न थी ,हरदम यही सोचती थी वह दिन कब आएगा, जब वह खूब सारे पैसे कमा कर लाएगी सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत से । लेकिन जहॉ भी जाती निराशा ही हाथ लगती थी आखिर बी0कॉम पास को अच्छी नौकरी कौन देगा और वह भी अनुभवहीन।मरता क्या न करता कुछ तो है , इंसान धीरे — धीरे ही सही आगे बढ़ता है यह सोचकर वह नौकरी करने लगी। अभी एक माह भी नहीं बीता था कि उसे समाचार मिला कि कहॉ इतने कम पैसों में रगड़ रही हो, संजय प्लेस में एक टाइपिस्ट की जगह खाली है, सुनयना की खुशी का ठिकाना न था। उसने तुरन्त अपनी पहली नौकरी से त्यागपत्र दिया लेकिन जब उसने हिसाब मॉगा तो प्रधानाचार्य ने यह कहकर पचहत्तर रुपये पकड़ाए कि रविवार और छुट्रिटयों के पैसे काटने के बाद इतने ही बनते हैं। शायद ईश्वर को यही मंजूर है , किस्मत में ठोकरें खाना ही लिखा है। यह सोचते—सोचते वह घर की तरफ चली जा रही थी। रास्ते में पडे़ पत्थर पर ठोकर मारते—मारते न जाने कब घर आ गया पता ही नहीं चला। वह सोचने लगी क्या ईश्वर इतना निष्ठुर है ! मेहनत करने वालों की कोई कद्र नही है ! कितने स्वप्न देखे थे , तनख्वाह के पैसे ऐसे खर्च करुॅगी ,वैसे खर्च करुॅगी, ये लाऊॅगी ,वह लाऊॅगी, मगर स्वप्न तो स्वप्न होता है। तभीअचानक उसे याद आया उस नौकरी का जिसमें 300 रुपये मिल सकते थे, बिनादेर किए रोज की तरह वह तैयार हुई और पहुॅच गई इन्टरव्यूह देने। साक्षात्कार के बाद उसे नौकरी मिल तो गयी मगर अब वह शिक्षिका से कार्यालय सहायिका के पद पर आ चुकी थी। पैसे तो ज्यादा थे मगर ऐसा लग रहा था कि शायद वह शिक्षिका कभी नहीं बन पाएगी। यहॉ उसे तनख़्वाह तो अच्छी मिलती थी मगर फिरभी वह खुश न थी जरुरत के आगे वह अपने अरमानों को भूलने का प्रयास भीकर रही थी। बस इसी कोशिश में लगी रहती थी कि ज्यादा से ज्यादा मेहनत करुॅ ,और ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाऊॅ क्योंकि इस वक्त उसे पैसे की सख्त जरुरत थी। देखते — देखते तीन माह बीत गये। एक दिन उसी कार्यालय में उसे पता चला कि एक टाइपिस्ट की जगह खाली है जिसकी तनख्वाह 600 रुपये प्रतिमाह है। उसने बिना वक्त गवाए ईश्वर की दयामयी कृपा दृष्टि मानकर उसी नौकरी को पकड़ लिया। वह प्रसन्न थी कि ईश्वर उसे पचहत्तर रुपये प्रतिमाह से छः सौ रुपये पर तो लाये, शायद यह उसकी मेहनत का ही फल था। इसी बीच घर में उसकी शादी की बातचीत चलनी शुरु हो गयी थी। मगर वह शादी नहीं करना चाहती थी ,चाहती थी तो बस छोटे भाई बहन ढं़ग से पढ—लिख जाए। घर में वह सभी सामान हो जो आज के समय की आवश्यकता है। पता नहीे यह स्वप्नकभी पूरा भी होगा ! सोचते— सोचते कब उसकी नींद लग गयी पता ही नहीं चला। समय बीतता गया ,ठीक एक वर्ष बाद वह समय भी आया जब उसकी सरकारी नौकरी लग गयी। अब तो सुनयना को मानो सारे जहॉ की खुशियॉ ही मिल गयी थी। जो सोचा भी न था वह मिल गया था। आज यह बात अच्छी तरह समझ आ गयी थी, कि जो लोग सच्चे होते हैं, मेहनती होते हैे, ईश्वर हमेशा उनका साथ देते हैं वह यह नहीं जानती थी कि यह अन्त नहीं है, अभी तो उसे बहुत आगे तक जाना है। वह दिन भी आया जब उसकी शादी होनी थी लेकिन उसने अपनी शादी भी तब की जब उसकी अपनी छोटी बहन की शादी हो गयी। समय बीतता गया। धीरे —धीरे घर में खुशियॉ आती ही गयी। पहले कन्या का जन्म ,फिर बेटे का जन्म , घर का मकान, कार ,साथ ही साथ तमाम शोहरत हासिल कर ली थी उसने। आज समाज में उसका नाम है लोग इज्जत करते हैं तमाम पुरस्कार प्राप्त हैं। सभी भाई बहनों की शादी हो चुकी है। सभी सुखी व सम्पन्न हैं। यह शायद उसकी मेहनत उसके माता पिता की ईमानदारी सज्जनता का ही परिणाम है। लेकिन फिर भी आज वह है ,कार्यालय संचालिका ही। जीवन के 45 बसंत और नौकरी के 23 वर्ष बिताने के बाद जीवन की सारी खुशियॉ अपने दामन में समेटे वह खुश तो है लेकिन यह टीस आज भी उसको कचोटती है,आखिर वह शिक्षिका क्यों नहीं बन पायी ! ईश्वर ने सब कुछ तो दिया बल्कि जरुरत से ज्यादा दिया। फिर यह कसक क्यों छोड़ दी। तभी झटका लगा शायद विमान उतरने की तैयारी में था लैण्ड कर चुका था। उसकी तन्द्रा टूट चुकी थी। सामने मोबाइल रखा था। जिसे उसने साइलेन्ट पर कर रखा था, तभी हल्की सी लाइट जली शायद कोई मेसेज आया था। उठाया पढ़ा लिखा था ‘ मनुष्य जो चाहता है वह उसे मिलता नहीं जो मिलता है, वह उसे भाता नहीे और जो भाता है, वह उसके पास रहता नही। शायद यही जीवन की सत्यता है। हर व्यक्ति के साथ यही होता है। लेकिन हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीे होती है। यह सोचकर आज भी सुनयना प्रयासरत है ,बडे़ — बडे़ ऑफर उसे मिल रहे हैं ,लेकिन वह ढूॅढ़ रही है सिर्फ अपनी चाहत और इसी चाहत के सहारे, इसी उम्मीद में, शायद कभी तो चाहत पूरी होगी, इसी चाहत के सहारे आगे बढ़ती ही जा रही है। दिन —दूनी रात चौगनी प्रगति करती ही जा रही है —‘बहुत पा लिया है ,बहुत पा चुकी हॅू, अधिक की नहीं अब चाहत है, चाहत है तो बस एक है ,बढ़ना है, आगे बढ़ते ही जाना है, जिन्दगी का नाम चलना, बस चलते ही जाना है।‘

मॉ मुझे बचाओ

मॉं—मॉं जल्दी आओ, देखो न मैंने अपनी पूरी कक्षा में टॉप किया है। ज्योति की आवाज सुनते ही मॉ दौड़ पडी। बेटी को गले से लगाया, खुशी से चूम लिया।ऑखों से टप —टप ऑसू टपकने लगे ,दरअसल यह ऑसू खुशी के थे, जिन्हें वह संभाल नहीे पा रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करें ! ज्योति कि सफलता को वह अपने जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मान रही थी। सचमुच आज उसे गर्व हो रहा था कि वह ऐसी बेटी की मॉ है जो हर क्षे़त्र में अव्वल है। वह सोचने लगी यह वही बेटी है जिसके गर्भ में होने की खबर मात्र से घर में मानो मातम सा छा गया था। घर का प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता था कि उसके जन्म से पहले ही उसे मार दिया जाय। एक वही थी जो सबसे अकेले लड़ रही थी, अपनी अजन्मी संतान को बचाने के लिए। एक वही तो थी जिसने उसे महसूस किया, उसकी आवाज सुनी थी। मॉ—मॉ मुझे इस संसार में आना है , मुझे खुली हवा में सांस लेनी है ,मॉ मॉ मुझे बचा लो में भी यह संसार देखना चाहती हॅू। आखिर मेरा क्या कसूर है ! क्या मैं आपके शरीर का हिस्सा नहीं ! उसे अपने अन्दर धड़कती धड़कनों की आवाज सुनाई दे रही थी — मॉ सिर्फ एक बार, मुझे इस संसार में आने दो, मुझे गर्भ में मत मारो ,आखिर एक दिन मैं भी तुम्हारी तरह मॉ बनकर सृष्टि सृजन में सहायक बनूॅगी। यही सोचते — सोचते न जाने कब उसकी नींद लग गयी और जब तन्द्रा टूटी तो देखा कि ज्योति की दादी उसके सामने मिठाई लिए खड़ी थी। बडे प्यार से वह बोली — बेटा मुॅह मीठा करो आज हमारी ज्योति ने सबका नाम रोशन कर दिया है। देखो—देखो कैसी खुशी से झूम रही है। अरे ! क्यों न झूमे आखिर बेटी किसकी है ! उसके पापा ने कहा , अरे! अब तो उसे स्कॉलरशिप भी मिलेगी। उसके पापा फिर बोले। आज ईश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली। देखो शिना आज मैं बहुत खुश हॅू। मेरा स्वप्न साकार हुआ। मैं तो यही चाहता हॅू कि मेरी दोनों बेटियॉ खूब नाम कमाए ,यश कमाए और मैं गर्व से सिर ऊॅचा रख सकॅू कि मैं होनहार बेटियों का पिता हॅू। मगर शीना तो अतीत में खो चुकी थी, वह सोचने लगी क्या यह वही पिता व दादी हैं जिन्होंने ज्योति के जन्म से पूर्व ही उसे खत्म करने पर दबाव डाला था। उसे आज भी याद है वह दिन, जब ज्योति का जन्म हुआ था। उसकी सास तो उसे देखने तक नहीं आयी थी लेकिन उसके पति ने तब तक अपने आप को मानसिक रुप से तैयार कर लिया था। अभी भी ज्योति ऑपरेशन टेबिल पर पड़ी थी ,उसकी ऑखों से ऑसुओं की धारा बह रही थी मगर कोई नहीं जानता था कि ये ऑसू दर्द के हैं, खुशी के हैं ,या फिर आगे आने वाली परेशानियों के हैं। सिर्फ वही जानती थी की आज से ही उसकी परेशानियों के दिन प्रारम्भ हो चुके हैं क्योंकि वह मॉ बनी थी वह भी दूसरी बेटी की। जबकि उसी घर में उसकी देवरानी के दो—दो बेटे थे। इसीलिए सास का सारा ध्यान बेटों की ओर ही रहता था सारा झुकाव लाड़—प्यार बेटों पर ही न्यौछावर था। सास उसके व उसकी बेटियों के प्रति बहुत भेदभाव करती थी। बच्चों के मध्य किया जाने वाला पक्षपातपूर्ण व्यवहार उसे अन्दर ही अन्दर घायल कर देता था। उसका अन्तर्मन चीत्कार कर उठता था। कभी—कभी तो उसका मन करता कि वह चीख—चीख कर सबको सच्चाई से अवगत करा दे ,फिर सोचती उसकी सुनेगा ही कौन ? प्यार तो उसे कभी मिला ही नहीं था। क्या कभी इन बच्चियों को भी प्यार मिल पाएगा या नहीं जिसकी वह हकदार हैं ,इसी चिन्ता से ग्रस्त वह अकेले में रो—रोकर जी हल्का कर लेती थी और मन को समझा लेती थी। श्याम भी सास बहू के मामले में हस्तक्षेप नहीं करता था , वह तो शीना की बातें एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता था। एक समय वह भी आया जब शीना ने अपने पति से कुछ कहना सुनना भी छोड़ दिया। वह यह भी जानती थी कि ऐसानहीं है कि वह मजबूर है। अपनी बेटियों के साथ होते दुराभाव को देखकर भी चुप है। दरअसल वह चाहती थी कि घर में शान्ति का माहौल रहे। कभी—कभी तो बहुत छोटी—छोटी बातों में लड़का लड़की का भेदभाव सामने आ जाता था। श्याम यह सब कुछ देखकर भी चुप्पी लगाये रहता। मॉ के सामने बोलने की उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी ,और यदि कभी वह हिम्मत जुटाता भी था ,बोलने की कोशिश करता था तो घर में तूफान खड़ा हो जाता था ,क्योंकि घर में शुरु से ही सासू मॉ का दबदबा था। उनकी मर्जी के खिलाफ घर में पत्ता तक नहीं हिलता था। बेटे बहुओं की बात तो छोड़ों ,उनकी मर्जी के बिना कुछ भी करने की ससुर जी तक की हिम्मत नहीं होती थी। लेकिन वह यह बात भी अच्छी तरह से जानती थी कि पापाजी दोनों बच्चों को बहुत प्यार देते थे, हमेशा ख़्याल रखते थे। उनका मन तो एकदम साफ था। लेकिन शीना के लिए तो उसकी दोनों ही बेटियों की परवरिश और वह भी अच्छी परवरिश जीवन का ध्येय बन चुका था। तभी बड़ी बेटी श्रद्धा की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी। अतीत की यादों से बाहर शीना बोली, क्या हुआ बेटा ! श्रद्धा बोली मॉ मॉ देखो न चाची रो रही हैं , देखिए न उन्हें क्या हुआ ! शीना अपने को सॅभालती हुई जल्दी से उठी और देवरानी के कमरे में पहॅुची तो पता लगा कि उसके दोनों ही बेटे चोरी में पकडे गए हैं। पुलिस दरवाजे पर खडी थी। एक बेटा पुलिस की गिरफ्‌त से भाग गया था, इसलिए पूछताछ हेतु पुलिस आई थी और उसके पिता यानि देवर को पकडकर ले जा रही थी। दादी फिर भी बार—बार यही कह रही थी कि मेरे पोते ऐसे नहीं हो सकते, वह ऐसे नहीं है , जरुर तुमसे कोई गलती हुई है। मगर सारी असलियत जानने के बाद वह भी फूट—फूट कर रोने लगी। बार—बार यही कह रही थी अरे इससे अच्छा तो यह नालायक पैदा होते ही मर जाते। अरे दो बेटियॉ ही और हो जाती कम से कम यह दिन तो नहीं देखना पड़ता। अरे जिसे मेवे खिला—खिलाकर इतना बड़ा किया ,उसी ने सिर शर्म से झुका दिया। देवरानी रोए जा रही थी अरे हमारी तो सारी इज्जत धूल मेें मिल गयी। अब क्या होगा। शीना ने सबको समझाया और मन ही मन सोचने लगी चलो इतने समय बाद ही सही इनको मेरी बेटियो की अहमियत तो नजर आई। आज उसे बेटे के न होने का कोई रंज न था क्योंकि उसकी बेटियॉ बेटों से बढ़कर थीं। ये वही बेटियॉ हैं जिन्हें जन्म लेने से पूर्व ही मार दिया जाता है और वे चिल्ला—चिल्लाकर कहती है, हमें बचाओ, हमें बचाओ। लेकिन उनकी इस आवाज को सुनने वाला कोई नही होता है। लेकिन आज हमें उनकी यह आवाज सुननी ही होगी। कन्या भ्रूण हत्या महापाप है यह समझना ही होगा। यह गाड़ी का वही पहिया है जिसके बिना जीवन रुपी गाड़ी चल नहीं सकती। आज से और अभी से यह प्रण करना होगा। कन्या को बचाना होगा, कन्या को बचाना ही होगा।

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हाय बेटा

ट्रि्‌न ट्रि्‌न ट्रि्‌न फोन की घंटी बजते ही रूपाली दौड़ पड़ी जैसे वह फोन का ही इंतजार कर रही थी। फोन उठाते ही वह जोर से चीख पडी, क्या ! सही में, उसकी चीख सुनते ही मॉ दादी सभी दौड़ पडे़। अरे ! क्या हो गया। मॉ के पूछने पर जब उसने बताया कि उसने कक्षा में टॉप किया है तो मॉ ने तो खुशी सेउसका माथा ही चूम लिया। वह खुशी के मारे उछलने लगी। अभी वह यह खुशी ढ़ंग से जाहिर भी नही ंकर पाई थी, कि दादी की कड़क आवाज से सहम गई। अरे ! टॉप किया है तो कौन सा अहसान किया है। न काम की न काज की दुश्मन अनाज की। जब देखो पढ़ाई—पढ़ाई, न जाने कहॉ की कलक्टर बनेगी यह लड़की। अरे ! मैं तो कहती हॅू लड़कियों को यह सब शोभा नहीं देता मगर मेरी सुनता ही कौन है। अरे चौका चूल्हा में ध्यान दे ,यही काम आएगा और तू, तू क्यों सारा काम—धाम छोड़कर भटर —भटर कर रही है ,ऑखे तरेरती हुई दादी बहू को डांट लगाती है। अरे है तो यह पराया धन ही न। मैंने लाख बार कहा है थोड़ा ध्यान मेरे लाडेसवर पर भी लगा। उसे बड़ा आदमी बनाना है कि नहीं ! मगर बनाएगी कैसे तेरा तो सारा ध्यान अपनी लड़की पर ही लगा रहता है, अरे वंश तो बेटा ही चलाता है ,बुढापे में ध्यान भी वही रखता है ,मगर तू तेरी बुद्धि पर तो जैसे पत्थर ही पड़ गए हैं। यही थी रोज कि दिनचर्या। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब रूपाली और उसकी मॉ जया को ताने न सुनने को मिलते हों। मॉ ही थी जो उसे हमेशा आगे बढ़ने का आशीर्वाद देती रहती थी। हमेशा उसका साथ देती थी। रूपाली यह बात अच्छी तरह से जानती थी कि जो मुकाम पढ़ने लिखने के बावजूद उसकी मॉ हासिल न कर पाई वह चाहती है कि वह मुकामउसकी बेटी हासिल करे। दूसरी तरफ उसका भाई श्याम जिसका पढ़ाई में मन ही नहीें लगता था। हरदम खेल—खेल। जब पढाई का नाम लो , उसे तो जैसे आफत ही आ जाती थी। मगर फिर भी दादी, बाबा, पापा ,मम्मी सभी की ऑखोंका तारा था वह। सारा परिवार उसी के पीछे लगा रहता था। उसकी एक आवाज निकली नही कि फरमाइश पूरी हुई नही। दिन बीतते गये। रूपाली अपनीमेहनत के बल पर आगे बढ़ती ही गयी और वह दिन भी आ गया जब वह इंजीनियर बन गई। मॉ को तो जैसे पंख लग गये हो खुशी के मारे उसकी आखों से ऑसू बहने लगे, लेकिन घर वालों को तो जैसे सॉप सूंघ गया था। पिता तो बार—बार यही कह रहे थे अच्छी बात है लेकिन यदि इतना ध्यान तुम तेरे बेटे पर देती तो वह भी इंजीनियर होता। दादी—बाबा खुश तो थे लेकिन वह खुशी चेहरे पर कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थी क्योंकि साथ में एक दर्द भी था कि बेटा इंजीनियर क्यों न बन पाया ! कुछ समय बाद रूपाली की शादी हो गयी। हॅसी— खुशी वह अपने ससुराल भी चली गई और इधर श्याम नौकरी की तलाश में इधर—उधर धक्के खाता रहा ,मगर सब बेकार। अब उसे लगने लगा था कि काश ! उस समय यदि वह ध्यान लगाकर पढ़ लेता तो शायद आज यह दिन न देखने को मिलता। इसमें कोई शक नहीं की मेहनत तो उसने भी की थी, उसकी बु़िद्ध भीतेज थी मगर लाड़—प्यार ने उसे आलसी बना दिया था। कुछ भी हो आखिर बेटा तो बेटा ही होता है उसे कैसे दुखी देख सकते थे दादी, बाबा और माता—पिता। जैसे—तैसे पिता ने अपनी सारी कमाई रिश्वत में देकर उसकी एक अच्छी सी कम्पनी में नौकरी लगवा दी। अच्छी नौकरी पाते ही श्याम भूल गया कि यहमुकाम भी उसे अपने माता पिता के रहमो करम पर ही हासिल हुआ है । धीरे —धीरे उसका व्यवहार बदलने लगा ,बात—बात पर चिल्लाना, झल्लाना,चिड़चिड़ाना शायद उसके अन्दर यह बात घर कर गई थी कि आज जो स्थिति है उसका जिम्मेदार वह स्वयं ही है। उसकी चिड़चिड़ाहट का कारण दूर करने के लिए माता—पिता ने सोचा क्यों न उसकी शादी कर दी जाए। घर में बहू आ जाएगी तो शायद सब कुछ ठीक हो जाएगा। दादी—बाबा तो अब इस दुनिया में रहे नही। एक दिन अच्छी सी लड़की जो कि श्याम की ही कम्पनी में कार्य करती थी, का जैसे ही प्रस्ताव आया, बातचीत चली और चट मंगनी पट ब्याह हो गया। दोनों हंसी खुशी रहने भी लगे। ठीक एक साल बाद घर में बेटा हुआ। घर खुशियों से भर गया। दादी बाबा का तो जैसे खुशी का ठिकाना ही न था मगर यह खुशी शायद ज्यादा समय तक उसके दामन में नही ंथी। एक दिन श्याम ने एलान कर दिया मॉ में, अब हम दो से तीन हो गये हैं ,खर्चे भी बहुत बढ़ गये हैं अब मैं आप लोगों का खर्च उठाने में समर्थ नही हूॅ इसलिए मैंने आप दोनों का अलग से इंतजाम कर दिया है। मॉ कुछ समझ पाती बोल पाती कि क्या कह रहा है उनका अपना ही खून जिसके लिए उन्होंने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। यह सोचने का मौका ही कहा दिया उसने ,तब तक तो कार का हार्न सुनाई दिया, शायद दरवाजे पर गाड़ी आ चुकी थी ,श्याम ने जल्दी—जल्दी उनका सामान बॉधा और चल दिया वृद्धाश्रम की ओर। माता—पिता दोनों की ऑखों से झर—झर ऑसू बह रहे थे। वह समझ ही नही पा रहे थे कि क्या कहें ,क्या न कहें ,क्योंकि सारी पॅूजी तो वह अपने इसी लाडले बेटे पर गंवा चुके थे यह सोचकर कि बुढ़ापे में वही तो एक सहारा है। मगर अब तो कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं था बस चुप रहने में ही भलाई थी वह तो स्तब्ध थे श्याम के इस फैसले से। धीरे—धीरे समय बीतता गया। वृद्धाश्रम में रहते—रहते आज उन्हेें पूरा एक वर्ष हो गया था उन्हें अच्छी तरह याद था आज का महत्वपूर्ण दिन क्योंकि आज उनके बेटे का जन्मदिन था, यह वही दिन था जिस दिन हर वर्ष उनके घर बहुत भीड़ भाड़ हुआ करती थी। जोरदार पार्टी होती थी उनके घर। लेकिन आज वह बिल्कुल अकेले थे पोता बहू तो छोड़ो उनका खुद का बेटा भी आज उनके साथ न था। बेटे के साथ—साथ उन्हें अपने पोते की बहुत याद आ रही थी। मगर वह कर भी क्या सकते थे। तब उन्होंने अपने बेटे के जन्मदिन पर उसको एक चिट्रठी लिखी जो इस प्रकार थी —‘बेटा श्याम खुश रहो, सुखी रहो, सम्पन्न रहो, कामयाबी तुम्हारे चरण चूमे। बस यही कामना करते हैं हम अपने पोते के जन्मदिन पर। हमारी शुभकामनाएं हैं कि जैसे हमने तुम्हें पढ़ाया, लिखाया ,बडा आदमी बनाया। तुम भी हमारे पोते को इसी तरह पढ़ाना, लिखाना, बड़ा आदमी बनाना । मगर इतना बड़ा मत बनाना कि जैसे तुमने हमें वृद्धाश्रम भेज दिया वैसे ही बुढ़ापे में एक दिन वह भी तुम्हें वृद्धाश्रम भेज दें।‘ वह चिट्रठी हाथ में आते ही जब श्याम ने उसे पढ़ा ,तो ऑखे खुली की खुली रह गयी ,उसकी ऑखो से ऑसू टप—टप टपकने लगे ,वह तो रूकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। आज वह यह बात अच्छी तरह से समझ चुका था कि उसने क्या खोया, क्या पाया। गलती का सुधार जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है ,वरना कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाए और इसी गलती की पुनरावृत्ति दोबारा हो जाए। कहीं यह गलती पीढ़ी दर पीढ़ी न चले। यही सोचकर उसने गाड़ी निकाली और चल दिया वृद्धाश्रम की ओर। गाड़ी तेज रफ्‌तार से भागी चली जा रही थी और श्याम की ऑखों से पश्चाताप के ऑसू बहते जा रहे थे । वह सोच रहा था यह मैंने क्या कर दिया ! क्यूॅ कर दिया! कैसे कर दिया ?

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दूसरा प्यार

चारों तरफ रेगिस्तान ही रेगिस्तान और उस रेगिस्तान में दौड़ती लैण्ड कू्रजर गाड़ी । कभी ऊॅची पहाड़ी पर, तो कभी गहरी खाइयों में। हर पल लगता था कि गाड़ी पलट जायेगी, डर के मारे सभी की चीख निकल रही थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तभी हमें रेगिस्तानी पशु ‘गेजल‘ दिखा, जो देखने में बिल्कुल हिरन जैसा लगता है। जैसे ही हमारी उससे ऑखे चार हुयी ,वह भाग खड़ा हुआ। मगर इन सब बातों से बेखबर ड्र्‌ाइवर गाड़ी चलाने में मस्त था। नाम पूछने पर पता चला कि वह मुल्तान का है और नाम है राशिद अल्‌ मुल्तानी। वह इतना खुशमिजाज़ था कि शायद मैंने तो अपने जीवन में ऐसा कोई शख्स नहीं देखा था। पता ही नहीं चला दो घंटे कब बीत गये। उसके बाद हमने रेगिस्तान में ही रात का खाना खाया, वहीं हमने वहॉ का खास तरह का पारंपरिक नृत्य भी देखा। अंधेरा हो रहा था। चारों तरफ रेगिस्तान ही रेगिस्तान दिखाई दे रहा था, समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर हम जाये तो जाये कहॉ, हमें कहीं भी रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। पूछने पर पता चला की सूरज कि रोशनी से दिशा का ज्ञान होता है। हमने पूछा, फिर तो सूरज डूब जाने पर रास्ता भटकने का डर रहता होगा, किन्तु ड्र्‌ाइवर ने बताया कि ऐसा नहीं है सभी अनुभवी है ऐसा कभी होता नहीं है। ड्र्‌ाइवर की मजे़दार बातों में समय व्यतीत होता गया हमें पता ही नहीं चला।

बातों ही बातों में जब हमने उसकी खुशहाली का राज़ जानने का प्रयास किया तो पता चला कि उस खुशहाली का नाम है उसकी बेग़म ज़ुबैदा। जो उसका दूसरा प्यार था। सुनकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि व्यक्ति दूसरा प्यार भी कर सकता है ! और यदि करता भी है तो इतना खुश। तभी फोन की घण्टी बजी , वह शायद उसी का फोन था गाड़ी चलाते—चलाते उसने फोन उठाया और बड़ी प्रसन्न मुद्रा में बोला —‘हाय ज़ुबैदा ,कैसी हो —— बस तुम्हारी ही यादों में चला जा रहा हॅू और हॉ सुनो हिन्दुस्तान की सात हॅसीनायें मेरे साथ है तो सफर और भी खुशनुमा हो गया है बस एक ही कमी है और वह है तुम्हारा साथ। मगर तुम चिन्ता न करो जल्दी ही घर पहुॅचने की कोशिश करता हॅू। मैं सोचने लगी क्या कोई पति अपनी पत्नी से इतना प्यार कर सकता है कि बार—बार उसकी यादाें में खो जाता है। फिर क्या था दिल के तार छेड़े तो शुरू हो गयी जुबैदा की कहानी राशिद की जुबानी।

रेहाना जो कि राशिद का पहला प्यार थी। वह रहती थी पाकिस्तान में और राशिद निवासी था दुबई का। मगर प्यार तो प्यार होता है जब परवान चढ़ता है तो ऊॅची ऊॅची दिवारें भी लॉध देता है। रेहाना को वह इस कद़र प्यार करता था कि उसके बिना जीने की तो सोच भी नहीं सकता, मगर घर वाले उसको नहीं चाहते थे इस बात का पता जब राशिद को चला तो वह सीधे उसके मुल्क पहॅुच गया और वही उसके घर के पास रहने लगा। इधर राशिद के घर वाले परेशान, आखिर बेटा चला कहॉ गया ! समाचार पत्र में निकलवाया, बेटा घर आ जाओ तुम जहॉ चाहोगे वही हम तुम्हारी शादी करवा देगें, तुम्हारी मॉ बहुत बीमार है, जल्दी घर आ जाओ, तुम जो चाहोग,े जैसा चाहोगे, हम वही करेगेें। समाचार पत्र पढ़कर राशिद के जीवन में आशा की किरन जाग उठी ,शायद अब उसकी शादी रेहाना से हो जायेगी मगर वह यह नहीं जानता था कि वह एक जाल है जो सिर्फ उसे घर बुलाने के लिये बिछाया जा रहा है। खुशी—खुशी वह घर पहॅुचा, मगर यह क्या , घर आते ही वह सारा माजरा समझ चुका था ,इतनी जल्दी वह वापस उसके मुल्क जा भी नहीं सकता था । अब तो पत्र और फोन का ही आसरा था उसके पास। एक दिन उसे रेहाना का ख़त मिला जिसमें लिखा था राशिद यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारी रेहाना सिर्फ तुम्हारी ही रहे तो जल्दी से आ जाओ। मेरे घर वाले मेरा निकाह किसी और से कर रहे हैं राशिद ख़त पढ़ते ही परेशान हो उठा उसने रेहाना से बात करने की बहुत कोशिश की मगर बार—बार असफलता ही हाथ लगी। बड़ी मुश्किल से उसकी एक सहेली से बात हुई काफी अनुनय विनय करने पर पता चला कि रेहाना राशिद से न तो बात करना चाहती है और न ही मिलना। यह सुनकर राशिद स्तब्ध रह गया उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था आखिर ऐसा क्या हो गया मेरे प्यार में क्या कमी रह गयी पूछताछ करने पर पता चला कि रेहाना की शादी बहुत बड़े घराने में हो रही है लड़का इंजीनियर है तो उसे लगा मैं तो कुछ भी नहीं करता शायद रेहाना ने इसीलिये उससे मुॅह फेर लिया। मैं भला उसे कैसे खुश रख सकता था। वह टूट चुका था उसकी तो जैसे दुनिया ही उजड़ गयी थी। वह तो पागल सा हो गया था। समय बीतता गया कहते है न वक्त सारे घाव भर देता है वह भी रेहाना को भूलने का प्रयास कर रहा था जब रेहाना ही उसे भूल गयी तो वह क्यों याद करें अब तो वह किसी और की हो चुकी होगी। लेकिन एक दिन उसके एक दोस्त ने बताया कि रेहाना की सहेली ने जो बात उसे बतायी थी वह बिल्कुल गलत थी। जब उसे पता चला कि रेहाना ने तो अन्तिम पलों तक राशिद का इंतज़ार किया उसकी ऑखे तो सिर्फ राशिद को ढूॅढती रही वह तो बार—बार यही कहती रही कि मेरा राशिद जरूर आयेगा जब उसका इंतजार जवाब दे गया तो उसने अपना जीवन खत्म करने का प्रयास किया मगर फिर भी बच गयी आखिरकार उसे अपने अब्बू की मर्जी के आगे सिर झुकाना पड़ा वह भी इसलिये क्योंकि उसे यह बताया गया कि तुम्हारे राशिद ने तो तुम्हें छोड़ने की मोटी रकम ले ली है वह अब कभी नहीं आयेगा वह तुम से नहीं तुम्हारे पैसों से प्यार करता है आखिर मजबूर होकर उसने निकाह के लिये हॉ कर दी। सारी बात जानने के बाद राशिद अपने को अपराधी समझने लगा उसे लगा कि सारा दोष उसका ही है उसे स्वयं को सज़ा देनी चाहिये ,प्रायश्चित करना चाहिये, उसी दिन से उसने अपना जीवन खत्म करने का हर पल प्रयास किया ,मरने की कोशिश की मगर हर बार वह बच जाता, एक बार तो उसने अपने आप को करंट भी लगाया डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था कि काफी समय लगेगा, अस्पताल में भर्ती भी रहा सारे बाल उड़ गये मगर फिर भी बच गया। अस्पताल में ही एक दिन एक दोस्त की बहन उसे देखने आई उसकी इतनी सेवा की कि उसे दो साल की जगह एक साल में ही बिस्तर से खड़ा कर दिया। ताज्जुब तो उसे तब हुआ जब उस लड़की जिसका नाम जु़बैदा था ने उसके आगे शादी का प्रस्ताव रखा कुछ देर के लिये तो राशिद चुपचाप हो गया मगर कुछ दिन का वक्त मॉगा। एक दिन फिर जब जुबैदा उसके सामने आई मानो उससे फिर पूछ रही हो क्या मुझसे शादी करोगे। उस दिन उसने जुबैदा को अपने पास बिठाया और उसको अपने पहले प्यार रेहाना के बारे में बताया और कहा कि मैं तुम्हें वो प्यार नहीं दे पाऊॅगा जो प्यार मैंने रेहाना से किया है वही मेरा पहला प्यार था, है और रहेगा यदि अब भी तुम मुझसे शादी करना चाहती हो तो मैं राजी हॅू। जुबैदा तो जैसे हर शर्त पर तैयार थी उसने तो यहॉ तक कह दिया कि मै तुम्हारा दूसरा प्यार बनकर रहना चाहती हॅू। कुछ ही दिनो में बहुत ही सादा तरीके से जुबैदा और राशिद की शादी हो गयी। कुछ समय तो वह रेहाना की यादों में डूबा, मगर ज़ुबैदा ने अपने प्यार से उसको जीत लिया। राशिद को उसके दुखों से बाहर निकाल लिया था उसने। यह वही राशिद था जिसने रेहाना के बिना न रहने की कसम खायी थी, अब वह ज़ुबैदा के प्यार में पागल था। आज यह साबित हो गया था कि प्यार, प्यार होता है उसमें इतनी शक्ति होती है कि वह जानवर को भी इंसान बना दे और पत्थर में भी जान डाल दे।

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इकलौती बहू

घर में खुशियों का माहौल जोर—शोर से शादी की तैयारियॉ चल रही थी आखिर खानदान की इकलौती बहू जो आने वाली थी। घर का हर व्यक्ति अपनी—अपनी तैयारी में मशगूल था। ननद बार—बार अपनी मम्मी से लान्चा खरीदने की जिद कर रही थी मगर मम्मी पैसे ज्यादा न खर्च हो इसलिये सस्ते में काम चलाना चाह रही थी और देवर एक कोट खरीदने के बावजूद एक और कोट खरीदना चाहता था बार—बार यही कह रहा था आखिर रिसेप्शन में क्या पहनूॅगा, मम्मी बात को समझा करो आप का जमाना नहीं है एक साड़ी में पूरी शादी कर ली। आखिर शादी का वह दिन भी आ गया जिसका सबको बेसब्री से इंतज़ार था खूब धूमधाम से शादी हुई घर की इकलौती बहू घर आ गयी देखने में वह ज्यादा सुंदर तो नहीं थी मगर बोलती बहुत मीठा थी। गरीब मॉ—बाप की बेटी थी वह पिता पुलिस में थे मगर कुछ वर्ष पहले ही उनकी मृत्यु हो गई थी। पिता की नौकरी भाई को मिल गयी थी इसलिये शादी का खर्च भाई ने ही उठाया था। घर के सभी लोग उससे बहुत प्यार करते थे। सास—ससुर, चाची—चाचा, मामा—मामी, मौसी—मौसा सभी की ऑखो का तारा थी वह, दादी सास और ददिया ससुर को तो वह जान से भी ज्यादा प्यारी थी वह तो उसकी सूरत ही निहारते रहते थे। समय हॅसी—खुशी कट रहा था। घर में सभी बहुत खुश थे मगर विधाता को कुछ और ही मंजूर था वह खुशी कुछ ही दिन रह पाई लगता था किसी की नज़र लग गयी। एक दिन पता चला की घर के सभी लोग बाहर गये हुये थे घर में बहू अकेली थी किसी ने दरवाजा खटखटाया जब उसने दरवाजा खोला और पूछा ? क्या काम है किससे मिलना है तो उस व्यक्ति ने उसको धक्का देते हुये घर के अन्दर धकेल दिया वह चीखी—चिल्लायी मगर वहॉ सुनने वाला कौन था अकेले ही उससे मुकाबला किया इस जद्‌दोजहद्‌ में कहीं—कहीं चाकू लग गया खून भी निकल आया जैसे—तैसे उसने अपनी जान बचाई और उसको भगाने में सफल भी हो गयी पता नहीं उस वक्त कहॉ से शक्ति आ गयी थी उसमें मगर वह बहुत डर गयी थी। इस घटनामें कौन शामिल था पता ही नहीं चल पाया। घर में सभी इसी सोच में थे कि आखिर ऐसा कौन था ?उसकी क्या दुश्मनी थी ? किसने यह हिम्मत की ? धीरे—धीरे वक्त गुजरता गया। सभी उस घटना को भूलने का प्रयास करने लगे। लेकिन यह क्या ? अभी इस घटना को बीते एक महीना भी नहीं हुआ था कि इससे भी बड़ी घटना घटित हो गयी। दोपहर के 1.00 बजे थे सभी अपने—अपने स्कूल कॉलेज में काम में मशगूल थे तभी फोन की घंटी बजी। फोन पर जैसे ही सुना की जल्दी से घर आ जाओ तो सभी रिश्तेदार दौड़कर घर पहॅुच गये ,लेकिन जब वहॉ का दृश्य देखा तो रूह कॉप गयी घर की इकलौती बहू एक कौने में बैठी रो रही थी उसके दोनों हाथ जगह—जगह से जले हुये थे, बाल कटे हुये थे और उसके बैडरूम के कमरे के शीशे पर लाल रंग की लिपिस्टक से लिखा था — ‘तूने मुझे एक साल रूलाया, अब तू रोयेगा‘ वहॉ दृश्य बहुत ही वीभत्स था। थोड़ी ही देर में शहर की तमाम मीडिया और पुलिस आ गयी। तरह—तरह के सवाल हो रहे थे कोई कुछ कह रहा था तो कोई कुछ। अगली सुबह शहर के सभी समाचार पत्रों में यह खबर छप गयी थी मीडिया ने तो नमक मिर्च लगाकर खबर को और चटपटा करने का प्रयास करते हुये सारा दोष लड़के पर ही लगा दिया था। वास्तव में लड़की का भोलापन देखकर तो ऐसा ही लग रहा था सबकी सहानुभूति लड़की के साथ ही थी आखिर बिना बाप की बेटी जो थी वह। शहर के हर शख़्स की जुबान पर यही खबर थी कोई कह रहा था शायद लड़के की कोई पूर्व प्रेमिका होगी तो कोई कह रहा था कि कहीं लड़की का किसी से चक्कर तो नहीं था। मगर असलियत किसी को भी नहीं पता थी। यह घाव भरना इतना सरल नहीं था परेशान होकर सास ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और निर्णय लिया कि अब हमेशा बहू के साथ ही रहेगी। कभी उसे अकेला नहीं छोड़ेगी। मगर फिर भी इतनी बड़ी घटना का भेद जानना बहुत जरूरी था पुलिस भी पीछे लगी रही मगर भेद नहीं खुला। सिर्फ और सिर्फ अटकलें ही लगाई जा रही थी। पहले लड़के से पूछा जब उसने कहा की विश्वास कीजिए मेरा किसी से कोई लेना देना नहीे है तो फिर सबने लड़की से बड़े प्यार से पूछा की बेटा कहीं तुम्हारे पीछे तो कोई नहीं लगा था, कहीं एक तरफा प्यार का चक्कर तो नहीं है लेकिन उसने भी मना कर दिया। जब कुछ भी पता नहीं चला तो किसी ने कहा की कहीं किसी प्रेतात्मा का चक्कर तो नहीं है। मगर आज के इस युग में इस पर कौन विश्वास करता है। मगर इतना तो विश्वास हो गया है की कोई तो शक्ति है जो यह सब उससे करा रही थी प्रश्न फिर भी रह गया क्या आज भी भूत—प्रेत होते हैं आिाखर इसमें कितनी सच्चाई है ? मनोवैज्ञानिक से पूछा तो उसने कहा की किसी—किसी व्यक्ति में यह बीमारी होती है वह दूरदर्शन पर सच्ची घटनाओं पर आधारित आने वाले रूपान्तरित नाटकों को जब देखते हैं तो अपने ऊपर घटित कर लेते हैं उस दौरान मरीज को पता नहीे होता की वह क्या कर रहा है। ऐसी घटना को अंजाम देने के बाद वह भूल जाता है। जब दिमाग पर ज्यादा जोर दिया जाता है तो उसे सारा वाक्या याद आने लगता है। ऐसी स्थिति में मरीज को कभी भी अकेले नहीं छोड़ना चाहिये और न ही उन बातों को बार—बार दोहराना चाहिये। यह सब सुनकर लगा की कही यह बात तो सही नहीं है जो भी,जैसा भी है। समझ नहीं आया ऐसा क्ॅयू हुआ ? किसने किया ? क्योंकि वही बहू आज अपने परिवार के बीच हॅसी—खुशी रह रही है और एक बच्चे की मॉ भी बन गयी है। उसकी हॅसती खेलती जिन्दगी को देखकर लगता है कि इसी प्रकार खुशियॉ उसके दामन में भरी रहे कभी भी दुख का साया उस पर न पड़े। इस कहानी को लिखने का उद्‌देश्य सिर्फ इतना ही है की कब किसके जीवन में वक्त क्या मोड़ ले ले पता नहीं होता है इसलिये हमेशा सावधान रहें, सचेत रहें और सुरक्षित रहें।

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कमरा नं0 13

23 नवम्बर 2010 उज़बेकिस्तान एयरवेज के जेट विमान में ताशकंद में उतरने के पहले विमान परिचारिका ने अन्य सूचनाओं के साथ बाहर के तापमान के बारे में जब बताया तो मेरी रूह कांप गयी क्योंकि वहॉ का तापमान माइनस में था। मुझे ठंड भी कुछ ज्यादा ही लगती है। मुझे लगा क्या मैं इतनी ठंड बर्दाश्त कर पाउॅगी ? जैसा सोचा था वैसा हुआ भी। हवाई जहाज से उतरने के बाद हमारा स्वागत असहनीय ठंड ने किया।हवाई अड्‌डे से गाइड बखरम ख़ान हमें बस तक ले गया। पतझड़ का मौसम था, कहीं भी हरियाली नहीं थी ,ऐसा लग रहा था पीली चादर ओढ़े प्रकृति हमारा स्वागत कर रही हो होटल में पहुॅचते ही हमें कमरे की चाभी मिल गई देखा तो पता चला हमें कमरा नं0 13 मिला है सुनते ही पहले तो डर लगा क्योंकि सुन रखा था की नं013 ठीक नहीं होता है। एक तो पहली विदेश यात्रा दूसरा नं0 13 पता नहीं क्या हाेंने वाला है इसी सोच में मैं कमरे की तरफ बढ़ गयी। कमरा तो मिल गया लेकिन जैसे ही अपना सामान रख कर कमरे की चाभी लगाई तो देखा की मेरे कमरे के ठीक सामने वाला कमरा खुला हुआ है और उसमें हट्‌टे—कट्‌टे दो नौजवान बैठे थे बात सिर्फ बैठने तक ही नहीं थी दोबारा मुड़कर देखा तो वह मदिरा पान भी कर रहे थे अब तो डर और बढ़ गया। बिना कुछ सोचे समझे कमरे में प्रवेश किया और अपने आप को ऊनी लिहाफ में ढक लिया, लेकिन तब भी मैं ठंड से सिहर रही थी। थोड़ी देर आराम करने के बाद उठे तब तक समाचार मिला कि तैयार होकर नीचे आ जाये कोच तैयार है। फटाफट तैयार हुये जैसे ही दरवाजा खोला फिर वही लोग दिखाई दिये, मगर हमने उन पर ध्यान न देते हुये कमरे का दरवाजा बन्द किया और चल दिये लिफ्‌ट की ओर। दोपहर का वक्त था हम घूमने निकल पड़े, एक सड़क हमने वहॉ ऐसी देखी जहॉ चित्रकार चित्र बना रहे थे और उन्हें बेच भी रहे थे। हमने जब देखा कि बहुत से लोग सामने बैठकर अपना पोट्र्‌ेट कुछ ही मिनटों में बनवा रहे है तो कीमत पूछी, पता चला एक स्कैच बनाने के बीस हज़ार सूम लगेगें, हम यह मौका चूकना नहीं चाहते थे। हम भी बीस हज़ार सूम खर्च करने को तैयार हो गये और बैठ गये चित्रकार के सामने। कुछ ही मिनटों में हमारी तस्वीर फ्रेम होकर हमारे सामने थी। आज भी जब मैं वह तस्वीर देखती हूॅ तो पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं। तभी आदेश हुआ की सभी कोच में बैठ जाये क्योंकि अब हमें चिमगन पहाड़ जाना था जहॉ ठंड कुछ ज्यादा ही थी सभी को हिदायत दे दी गयी थी कि अपने दस्ताने और ऊनी टोपी लगा लें। पहाड़ पर बर्फ होगी और रास्ता बहुत कठिन। थोड़ी देर बाद हम शायद उस पहाड़ तक पहुॅच गये थे क्योंकि बस रूक गयी थी।चिगमन पहाड़ के नीचे बस से उतरकर, ऊपर की यात्रा हमें रोप वे यानि चेयर कार द्वारा तय करनी थी। लोहे की दो रस्सियों पर दो कुर्सियॉ लगी थी जिनमें बिठा कर ऊपर पहॅुचाया जा रहा था, रस्सियों पर कुर्सियॉ लगातार घूम रहीं थी। नीचे और ऊपर के चबूतरों पर दो—दो रशियन खड़े थे जो की लोगों को उन कुर्सियों पर बैठाने और उतारने का काम कर रहे थे वह इसलिये क्योंकि वह कुर्सी रूकती नहीं थी। यात्रा बहुत खतरनाक थी इससे पहले मैं रोप वे पर तो बैठी थी, वह तो चारों तरफ से बंद होती है लेकिन चेयर कार सब तरफ से खुली थी। लोहे की चिकनी कुर्सी पर पहाड़ी हवा की सर्द मार, पैर नीचे लटकाये करीब आधा घंटा खुले आकाश की वह यात्रा मैं कभी नहीं भूल सकती। ऐसा लग रहा था यह सफर जल्दी खत्म हो क्योंकि ठंड बहुत थी। ऊपर तो बर्फ ही बर्फ थी। वहॉ जाड़े का मौसम दिसम्बर से फरवरी तक होता है। उस समय पहाड़ ही नहीं सड़कें और घर भी बर्फ से ढ़क जाती हैं। कब सूरज ढलने लगा पता ही नहीं चला।

अब हमें होटल लौटना था सभी कोच में बैठ गये आधे घंटे में हम सभी होटल पहुॅच भी गये। थके—मांदे हम अपने कमरे में पहॅुचे तो देखते क्या हैं फिर वही दोनों शख्स अपने कमरे का दरवाज़ा खोलकर मदिरा पान कर रहे हैं। अब तो हमारे होश फाख्ता हो गये क्योंकि रात हो चुकी थी। चौथी मंजिल जिस पर हमारा कमरा नं0 13 था वहॉ सन्नाटा ही सन्नाटा था आस—पास कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था। हमारा डर बढ़ता ही जा रहा था समझ नहीं आ रहा था करें तो क्या करें अपना देश होता तो कहीं फोन करते अपने सगे सम्बन्धियों से सलाह लेते मगर यहॉ तो फोन ने भी काम करना बन्द कर दिया था। इसी दुविधा में फॅसे थोड़ी देर लेटने का प्रयास किया मगर नींद नहीं आ रही थी बार—बार वही दृश्य दिखाई दे रहा था। पता नहीं क्या होने वाला है तभी ख्याल आया क्यूॅ न अपनी समस्या रिसेप्शन पर जाकर बतायी जाय,फिर क्या था उठे तैयार हुये और जैसे ही दरवाजा खोला सामने फिर वही दृश्य दिखाई दिया हमारी तो रूह कांप गयी तुरन्त दरवाजा लॉक किया और पहुॅच गये रिसेप्शन पर, घबराहट में जल्दी—जल्दी बात बताकर समस्या से निज़ात पाने का उपाय बताया कि किसी भी तरह हमारा कमरा बदल दिया जाय। हमें आश्चर्य तब हुआ जब स्वागती ने कहा कि मैडम डोन्ट वरी,यह इण्डिया नही ंउज़बेकिस्तान है। यहॉ इस तरह की घटनायें नहीं होती हैं यहॉ किसी भी व्यक्ति की बिना मर्जी के कोई भी उसे परेशान नहीं करता है। आप बिल्कुल परेशान न हो बेफिक्र होकर जाइये, आराम करिये। मै आश्चर्यचकित थी क्या जैसा हम अखबारों में पढ़ते हैं वह सही है मैं वापस जाकर अपने कमरे में सो गयी, किसी ने भी हमें परेशान नहीं किया बल्कि जब भी जरूरत पड़ी हमारी मदद ही की। देखते—देखते कब पॉच दिन बीत गये पता ही नहीं, बड़े ही सुकून से हॅसते—हॅसाते घूमते फिरते कटे हमारे वे पॉच दिन अब हमें पूरा विश्वास हो गया था कि हम अपने देश से ज्यादा विदेश में सुरक्षित हैं, मगर यह कहानी एक सवाल मेरे जे़हन में छोड़ गई कि आखिर ऐसा क्यॅू है जब हमारी संस्कृति विश्व की महान संस्कृति है तो सुरक्षा के मामले में ऐसा क्यॅू है? आखिर कब हम अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। साथ ही एक अंधविश्वास जो हमेशा लोगों को रहता है की 13 नं0 अपशगुन है वह भी दूर हो गया था, आखिर नं0 तो नं0 है उसमें शगुन—अपशगुन क्या होता है , वह तो बस हमारी सोच है जो हमें गलत राह पर ले जाती है। —————

कन्या का जन्म

जैसी हम कल्पना करेंगें, वैसा यह संसार रचेंगें। यह पंक्तियॉ मेंरे कानों में गॅूज रही थी और लग रहा था की क्या वाकई ऐसा होता भी है क्योंकि जब हमारे मन मस्तिष्क में कोई बात घर कर जाती है तो हम उसी कल्पना में खो जाते है और वही कार्य करते भी हैं और ऐसा हुआ भी। सरन और विद्या जिनसे हमारे पारीवारिक संबंध हैं। जब भी मेरी विद्या से बात होती वह यही शिकायत करती की पता नहीं मेरे पतिदेव को कौन सा भूत सवार है जो हमेशा समाज सेवा में ही लगे रहते है। बात तो उनकी सही थी। मगर यह बात भी सही है की वह जो भी कर रहे है बहुत अच्छा कर रहे है क्योंकि अपने लिये तो सभी जीते है लेकिन जो दूसरों के लिये जीता है सच्चे अथोर्ं में वही इंसान है। कभी—कभी तो उनकी लगन व मेहनत देखकर मुझे भी ऐसा लगता था की समाज सेवा भी शायद एक जुनून है, लगन है, जो लग गयी तो बस लग गयी। जब देखो तब सरन गरीबों की मदद करता दिखाई दे जाता, अनाथ आश्रम में जरूरत की चीजें देना, वृद्धाश्रम में वृद्धों को सही सलाह देने के साथ आर्थिक मदद करना, दृष्टिहीनों की मदद करना, गरीब कन्या की शादी में धनराशि देना। एक बार हमने उनके साथ घूमने जाने का कार्यक्रम बनाया रास्ते भर विद्या और मैं खूब बातें करते रहे, बातों ही बातों में उसने बताया की मेरी शादी को लगभग दस वर्ष हो गये हैं मगर अभी तक संतान सुख से वंचित हॅू। पतिदेव का कहना है की मेरी इच्छा किसी अनाथ बच्चे को अपना बनाने की है। दुनिया में जो इतने बच्चे हैं और अनाथ हैं उनको मॉ बाप के प्यार की जरूरत है। विद्या ने कहा — जब उन्होंने ऐसा कहा तो मैंने भी कह दिया की मैं तो हर परिस्थिति में आपके साथ हॅू मगर हमारे घर वाले राजी नहीं हैं। वह तो हमारे इस फैसले में बिल्कुल भी हमारे साथ नहीं है। वह सोचते है कि पता नहीं बच्चा किसका खून होगा ? कैसा होगा ? हम तो हरगिस स्वीकार नही करेंगें। उनकी बात सुनकर खुशी भी हुई और दुख भी। फिर लगा की आज के समय में भी लोग ऐसा सोचते हैं। समय बीतता गया, कब एक साल बीत गया पता ही नहीं चला।22 मार्च 2014 मैं किसी काम से अपने एक परिचित के घर गयी तो बैठते ही उन्होंने कहा कि आज बहुत खुशी का दिन है मुझे समझ नहीं आया की ऐसी क्या खुशी है, उनके बच्चे और बच्चों के भी बच्चों की तो शादी हो गयी है फिर ऐसी क्या खुशखबरी है। पूछने पर पता चला की सरन और विद्या जिन्हें वह अपने बेटे बहू की तरह मानती हैं। एक बच्ची के माता—पिता बन गये हैं। बड़ा ताज्जुब हुआ की अचानक ऐसा कैसे हुआ मुझे खुशी तो बहुत हुयी मगर शिकायत भी थी इतनी बड़ी खुशी यदि मैं उनके ही द्वारा सुनती तो खुशी और बढ़ जाती, जो भी हो खुशी तो थी ही इसलिये हमने उनको बधाइयॉ प्रेषित की। फिर क्या था बधाइयॉ मिलते ही उन्होंनेें हमें अपनी परेशानियों से अवगत कराया। तो शुरू हुयी कन्या के जन्म की कहानी।जैसे ही रचना को पता चला की वह मॉ बनने वाली है वह चिन्ता में पड़ गयी क्योंकि पहले से उसके दो बच्चे थे ,अब वह बच्चा नहीं चाहती थी,उसने यह बात जब अपने पति को बताई तो उसने कहा कि बच्चे को खत्म कर दो हम इस स्थिति में नहीं हैं की एक और बच्चे का भार सहन कर पाये। रचना चिन्ता में पड़ गई। मॉ होकर वह अपने बच्चे की हत्या कैसे कर सकती थी, जब उसे कुछ समझ नहीं आया तो उसने समस्या के समाधान हेतु यह बात अपनी सहेली विद्या को बताई विद्या को लगा यह तो बहुत अच्छा अवसर है क्या पता यही ईश्वर की मर्जी तो नहीं। यह सोचकर उसने जब अपने पति सरन को यही बात बताई तो उसे भी अपनी पत्नी का सुझाव अच्छा लगा, और दोनों ने मौका देखकर अपनी बात रचना और उसके पति के सामने रख दी चूॅकि रचना और विद्या दोनों ही पुरानी सहेलियॉ थी और मायके की तरफ से दूर की रिश्तेदार भी लगती थी तो वह इस बात के लिये राजी हो गयी विद्या के पति सरन ने रचना से कहा की आज से बच्चे के जन्म तक आपके ऊपर होने वाले समस्त खर्चों को हम ही वहन करेगें बच्चा चाहे कुछ भी हो लड़का या लड़की। समय बीतता गया रचना पटना में रहती थी और विद्या जयपुर में। विद्या ने सोच रखा था की जब बच्चे के जन्म का समय आयेगा तो पटना जाकर ले आयेगें किसी को इसकी जानकारी भी नहीं होगी। मगर कहते हैं न जो हम चाहते है वह कभी होता नहीं। कुछ ऐसा ही रचना के साथ भी हुआ रचना को सातवॉ महीना चल रहा था वह अपने पति के साथ किसी जरूरी काम से जयपुर आयी, जयपुर आते ही उसकी तबियत खराब होने लगी दर्द शुरू हो गये उसको अस्पताल ले जाने की नौबत आ गयी तब रचना के पति को लगा की सरन को बुला लेना चाहिये क्योंकि डॉक्टर का कहना था की प्रीमेच्योर डीलीवरी करनी पड़ेगी। सरन ने पूरी कोशिश की यदि इसे किसी तरह रोका जा सकता है तो दवाईयों द्वारा रोक दीजिये। मगर लग रहा था की शायद आने वाला बच्चा भी यह जानता है की मेरे माता—पिता जब यहीं है, मुझे भी गुलाबी नगरी जयपुर में ही रहना है तो क्यों न जन्मभूमि भी यही हो। बहुत रोकने पर भी बच्चे का जन्म हो ही गया। अस्पताल में बच्चे के माता—पिता का नाम भी सरन और विद्या ही लिखा गया पता चला लड़की हुयी थी मगर साथ ही साथ उसके पैरो में कमी थी डॉक्टरों ने कहा अभी बच्चा कोमल होता है थोड़ा बड़े होने पर पैरों में प्लास्टर चढ़ा कर इसे सही किया जा सकता है। इस वक्त सबसे ज्यादा दुख तो रचना को हो रहा था वह इसलिये क्योंकि यदि हम किसी को कोई चीज देते हैं तो वह अच्छी होनी चाहिये।ऐसा नहीं की देने के बाद ग्लानि हो। खैर जो भी हो सरन को लगा मुसीबतें खत्म हुयी खुशियों के दिन तो अब आये हैं मगर उसे यह नहीं पता था की यह तो शुरूआत थी। रात का डेढ़ बजा था तभी डॉक्टरों ने कहा की बच्ची के प्लेटलेट्‌स कम है जल्दी ही चढ़ाने पड़ेगें। एक तो यह सब काम चोरी छिपे चल रहा था किसी को बताना नहीं था ऊपर से यह मुसीबत। जैसे—तैसे अपने करीबी दोस्त को बुलाया सारा माजरा समझाया उसे इस कार्य के लिये राजी किया मगर यहॉ भी परीक्षा। उसके प्लेटलेट्‌स कम निकले डॉक्टरों ने मना कर दिया हम इनके नहीं ले सकते हैं। मजबूरी में एक और दोस्त को बुलाया खून टेस्ट हुआ प्लेटलेट्‌स तो खूब थे मगर यह क्या नस ही नहीं मिल रही थी। पूरी रात वह भागता ही रहा था। उधर बहुत कोशिश करने के बाद भी जब नस नहीं मिली तो डॉक्टर ने मना कर दिया और कहा किसी और को लेकर आइये, हमारी सारी कोशिश बेकार हो गयी है। ज्यादा करेगें तो मशीन खराब हो जायेगी। सरन ने ईश्वर को याद किया और डाक्टरों से बहुत मिन्नत की, जैसे भी हो इसी से काम चलाइये, अब तो यही अन्तिम सहारा है। शायद इर्श्वर को भी दया आ गयी नस मिल गयी और बच्ची को बचाने की प्रक्रिया शुरू हो गयी। इधर बच्ची की असली मॉ अलग अस्पताल में पड़ी थी। जहॉ वह अपने किसी रिश्तेदार को बुलस भी नहीं सकते थे, इसलिये उसको देखना, खाना पहॅुचाना, दूसरा बच्ची के पास रहना तीसरा एक और मुसीबत थी वह यह की जिन घर वालों को कुछ नहीं बताया था अब बताने का मौका आ गया था, घर में जब पूरी बात बताई तो मानसिक अशान्ति अलग। क्या करते दोनों,सब तरफ से परेशानियों ने इस कद़र घेरा था कि भगवान के अतिरिक्त कुछ याद नहीं आ रहा था। विद्या तो पूरी—पूरी रात भगवान की मूर्ति के सामने ही बैठी रहती, ईश्वर से यही कहती आखिर कुछ तो भला किया होगा मैंने किसी का। उसी का थोड़ा सा फल मिल जाय। वह दिन भी आ गया जिस दिन वह बच्ची को लेकर घर आ गयी। बच्ची इतनी मोहिनी थी की घर वालों को अपनी ओर आकर्षित कर ही लिया दादी, बुआ सभी की लाडली हो गयी वह, और इधर जैसे—जैसे लोगों को पता चल रहा था उस बच्ची के बारे में वह सरन और विद्या की महानता पर बधाइयॉ दे रहें थे मगर वह दोनों तो इन सब बातों से बेखबर अपने घर आई इस नन्ही कली, देवी स्वरूपा कन्या को पाकर अपने को धन्य महसूस कर रहे हैं। उनकी खुशी देखकर मुझे लगा की संसार में दो तरह के लोग होते है स्वार्थी और परमार्थी। यहॉ दोनों ने परमार्थी कार्य तो किया ही लेकिन उसके साथ उनका स्वार्थ भी जुड़ा था। यही बात जब मैने अपनी अविवाहित सहेली जो की लगभग 60 वर्ष की थी, को बताई तो उसने कहा —बच्चा गोद लेना अच्छी बात है मगर जिम्मेदारियॉ वहन करना बहुत कठिन काम है हम तो नहीं कर सकते। जबकि वह समर्थ थी, कम से कम एक बच्चे का कल्याण करने में, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मुझे तो वह बहुत स्वार्थी लगी जो सिर्फ और सिर्फ अपने लिये जीती हैं। उस स्वार्थी सहेली से अच्छी मुझे वह महिला लगी जो मेरे घर अपनी बच्ची को नृत्य सिखवाने आती है पूछने पर पता चला वह अविवाहित है लेकिन उसने वह बच्ची अनाथ आश्रम से गोद ली है सिर्फ परमार्थ के लिये। मेरी इस सच्ची कहानी के ये पात्र इतने नेक दिल है तो क्या हम और ऐसा महान कार्य घर बैठे नहीं कर सकते जिससे किसी का भला भी हो और आत्मिक शान्ति भी मिले।

1.‘लॉर्ड बेडेन पॉवेल नेशनल एवार्ड‘ लेते हुये

  • द लेडी ऑफ होप एवार्ड‘ केपटाउन,साउथ अफ्रीका में लेते हुये
  • 1.बैंकाक में भारत के राजदूत श्री अनिल वाधवा द्वारा प्रथम काव्य संग्रह ‘अन्तर्ज्वार‘ का विमोचन

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