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nishkam karmyogi

निष्काम कर्मयोगी पंडित ब्रह्मदत्त दीक्षित

- उमाशंकर तिवारी

प्रख्यात - स्वतंत्र सेनानी,पूर्व प्रिंसिपल,राजकीय जुबली कॉलेज,लखनऊ और राजकीय पोस्ट ग्रॅज्युएेट टीचर्स ट्रेनिंग कालेज लखनऊ,पूर्व निदेशक, उत्तर प्रदेश हिंदी ग्रन्थ अकादमी,पूर्व सदस्य तथा संयोजक,हिंदी समिति, माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश, पूर्व सचिव, शिक्षा उन्नयन समिति,उत्तर प्रदेश(शिक्षित बेकारी उन्मूलन), पूर्व अध्यक्ष,सरस्वती गल्स इंटर कालेज, लखनऊ, सदस्य उत्तर प्रदेश नई तालीमी समिति,मंत्री उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मलेन,सदस्य उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान निष्काम कर्मयोगी पंडित ब्रह्मदत्त दीक्षित का गत २ जनवरी २००४ को स्वर्गवास हो गया | जनवरी १९१३ गाम निवाड़ी कलो,जिला इटावा, उत्तर प्रदेश में जन्मे पंडित ब्रह्मदत्त दीक्षित के पिता का नाम पंडित शिवशंकर लाला दीक्षित था | और माता का नाम श्रीमती दुलारी दीक्षित था | पंडित जी अपने पीछे अपनी धर्म पत्नी श्रीमती कृष्ण दीक्षित और पुत्रो में सर्वश्री विवेक दीक्षित, राजेश दीक्षित तथा योगेश दीक्षित को छोड़ गए |

पंडित जी के निधन का समाचार पाकर में आवाक रह गया | मेरे लिए बड़े ही गर्व की बात हे की में साहित्य को फटने गलन से बचाकर साहित्यिक जिगनासुओ को उपलब्ध करने और पुस्तकालयों में पहुचने का अभियान वर्षो से चला रहा हु | पंडित जी मेरे इस कार्य से अत्यंत प्रभावित थे | मेरी प्रसंसा में किसी भी पत्र पत्रिका में कोई भी लेख प्रकाशित होता और जब में पंडित जी को दिखता तो पंडित जी गले लगाकर पीठ थपथपा कर मेरा उत्साहवर्धन करते रहते थे | पंडितजी ने ११ फरवरी १९९३ को मुज़े अपनी हस्तलिपि में एक प्रमाण पत्र दिए था जो इस प्रकार हे. :-

' युवा सेवा वृति श्री उमाशंकर तिवारी से मेरा संपर्क यधपि नितान्त नया हे,किन्तु इस उत्साही और साहसी तथा सृजनशील युवकने मुज़े अत्यधिक प्रभावित किया हे |वर्तमान जीवन -संघर्षो से जुज़ते हुए लोग-संग्राही निस्वार्थ सेवा का एक व्रती होकर जिस निष्ठां का परिचय श्री तिवारिने प्रस्तुत किआ हे,वह निश्चित रूप से अनूठा हे | विचारो के धनी,सृजन-शिल्पी,अध्यवसायी, स्वाध्यायशील, बहुआयामी क्षेत्र के सफल सैनिक,पत्रकारिता-प्रवीण,स्व-रचना धर्मी तथा स्वतंत्र चिंतन विशिष्ट चिंतक एवं विवेकपूर्ण व्यवहार को वरीयता प्रदान करने मे समर्थ व्यक्तित्व की अपूर्व ज़लक इन्होने अपनी जीवन-चर्या द्वारा समाज को दी हे | भविष्य की कितनी ही आशाओ एवं संभावनाओ का संगम पस्फ़ुटित होने का सार्थक योगदान इनके चरित में निहित दिखाए पड़ता हे |

मुज़े विश्वास हे की मेरी शुभकामनाये इस युवा- चिन्तक के कृत्यों में,सफल होगी | '

बह्मदत दीक्षित जी की प्रारम्भिक शिक्षा निवाड़ी कलो अहेरी पूरी कक्षा ६,७,८ तक हुए | दीक्षित जी ने देश की सेवा का व्रत ले कर स्वतंत्रता संग्राम में श्रध्ध्ये महात्मा ग़ांधी की प्रेरणा से विद्यार्थी जीवन से ही कांग्रेस के द्वार आयोजित आंदोलन में भाग लेना प्रारम्भ कर दिए था | दो अभियोगों में पंडित जी को १३ माह की सजा भी काटनी पड़ी |ब्रिटिश सरकारने इन्हे गिरफ्तार कर लिए | इटावा जेल से लखनऊ जेलमे स्थान्तर भी हुआ |फिर ग़ांधीजी के डार्विन फैक्ट में मुक्त हुए | जैसे रिहा होने के पश्चात आपने पुन: अध्ययन का प्रयास प्रारम्भ किया और ब्रिटिश शाशन ने आपकी पढ़ाई में अवरोध करते हुए काशी विद्यापीठ में उनके शिक्षा काल की पढ़ाई तक जब्त कर लिया| कांग्रेस के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण उन्हें उत्तर प्रदेश से निष्काषित कर दिया |

पंडितजी माध्यमिक शिक्षा राजस्थान प्रदेश स्थित महाराणा इंटर कालेज उदयपुर में छदम-भेषी होकर कक्षा ९,१०,११ एवं १२ को द्रितीय श्रेणिओ में उत्तीर्ण किया | आगरा विश्वविद्यालय से बी.ए किया | औपनिवेशिक स्वराज के अंतर्गत राजकीय बेसिक ट्रेनिंग कालेज, इलहाबाद से एल.टी पास किया | इस कालेज की स्थापना ग़ांधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा पद्धति पर हुए थी | उत्तर प्रदेश शिक्षा विभागमे बेसिक शिक्षक की सेवामे रहते हुए आगरा से एम.ए और इलहाबाद विश्वविद्यालय से एम.एड. पास (शिक्षा शास्त्र विषय) लेकर किआ | इस प्रकार बी.ऐ.एल.टी , एम.ए , एम.एड. तक की शिक्षा पूर्ण हुए | जीवन का यह प्रथम सोपान था | प्रथम संघर्ष पूर्ण हुआ |

स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही होते हुए दीक्षित जी ने शिक्षा आगे बढ़ा कर शिक्षक से अपना जीवन पारमभ किआ और शिक्षको को प्रशिक्षण देने का कार्य प्रारम्भ किया | जिन-जिन शिक्षा संस्थानों से पंडितजी सम्बंधित थे उसमे प्रमुख नाम इस प्रकार हे

१२ वर्ष - लेक्चरर बेसिक तथा कन्स्ट्रकिटव कालेज,वाराणसी,इलहाबाद, लखनऊ | ३ वर्ष - लेक्चरर सेरेमिक सेंटर, इलहाबाद | ३ वर्ष - रिसर्च प्रोफ़ेसर, पोस्ट ग्रेज्युएट टीचर्स ट्रेनिग कालेज लखनऊ,वाराणसी |२ वर्ष प्रधानाचार्य - राजकीय है स्कुल फरीदाबाद | 7 वर्ष प्रधानाचार्य - राजकीय जुबिली इंटर कालेज,लखनऊ | ३ वर्ष क्वार्डिनेटर एज्युकेशन -डेप्युटेशन पर ऑल इंडिया सेकेण्डरी एज्युकेशन काउंसेलर भारत सरकार | ३ वर्ष प्रधानाचार्य, राजकीय पोस्ट ग्रेज्युएट टीचर्स ट्रेनिग कालेज (रचनात्मक -शिल्प प्रधान - लखनऊ,उत्तर प्रदेश) |

पंडित जी १ मे १९७२ को सेवानिवृत्त हुए | लेकिन माँ शारदे को और भी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में अनेको रचनात्मक कार्य करवाना था | और भारत सरकार ने आपको हिंदी ग्रंथ अकादमी के निर्देशक के कार्य का दायित्व सौंपा आपके कार्यकाल में आचार्य हजारी प्रसाद द्रिवेदी के सानिध्य में अनेको ग्रंथो का प्रदर्शन हुआ | जिसमे प्रमुख ग्रंथो में - ज्योतिष शास्त्र, दर्शन शास्त्र , राजनीती शास्त्र ,हिन्दू धर्म शास्त्र, गणित, वैदिक गणित,खगोल शास्त्र,लेखन कला का इतिहास आदि मानक ग्रन्थो का प्रकाशन तथा अनेको विदेशी भाषाओ के पुस्तको को अनुवाद कराया | १९७२ से १९७८ तक पंडित जी ने भारतीय विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रमों में राष्ट्र- भाषा हिंदी का व्यापक प्रभाव हो और शिक्षा का माध्यम राष्ट्रभाषा बने न की विदेशी भाषा | अपने सेवाकाल में अंतिम समय तक संघर्षशील रहे | इस वर्ष के पश्चात हिंदी ग्रन्थ अकादमी को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान बना दिया गया | सन १९७८ में पंडित जी सेवा निवृत्त हुए |

शैक्षणिक पाठ्यक्रम की रचना में पंडित ब्रह्मदत्त दीक्षित का विशेष योगदान था | आप उत्तर प्रदेश हाईस्कूल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में ग्यारह वर्ष तक सदस्य रहते हुए बोर्ड के पाठ्यक्रम की पुर्नरचना हिंदी भाषा की प्रदेश में प्रचलित ६३ पुस्तको के स्थान पर ग्यारह पुस्तको का प्रणयन करवाया | हिंदी विषय के तीन प्रश्नपत्रो तथा एक संस्कृत प्रश्नपत्र के अध्यनरत प्रचलित हुआ |यह नविन पाठ्यक्रम बोर्ड की विविध विधानों की समिति द्वारा तैयार किया गया था तथा उन्ही के निर्देशन में नविन पुस्तको का भी प्रणयन हुआ | यह पाठ्य पुस्तके पुरे प्रदेश में समान रूप से प्रचलित की गयी | जिससे पुरे प्रदेश का भाषा सम्बंधित मापदंड मान हुआ और खर्चे में भी कमी आई |पंडित जी हिंदी भाषा विषयक समिति के सदा संयोजक रहे |

पंडित जी शिक्षा सेवा में रहते हुए गर्मियों की छुटिओ में अध्यापको का दल नए नए विषयो पर प्रशिक्षण देने के लिए नई-नई विधाओ पर ज्ञानार्जन करने के लिए शिविर लगवाते थे | जिन -जिन स्थानो पर शिविर लगवाया और भ्रमण करवाया उन स्थानो के नाम इस प्रकार हे :- राजकीय जुबली कालेज,लखनऊ, शांति निकेतन, कलकत्ता, कश्मीर, पंजाब, नेपाल, नैनीताल, मंसूरी, बिहार आदि भारत के अनेको स्थानो का दलो को लेकर उन स्थानो की संस्कृति सौंदर्य,रहन-सहन वह की पाकृतिक आदि अनेको विषय पर प्रशिक्षण देते रहते थे और अध्यापको को पूरा ज्ञान तथा मार्ग दर्शन प्राप्त करवाते रहते थे |

पंडित जी को समाज सेवा,शिक्षा में समर्पित जीवन और आपके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना इस बात से प्रमाणित होती हे ,सं १९८६ में केंद्र सरकार की सलाह पर उत्त्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम से संस्कृत विषय हटा दिया गया |यह समाचार मिलते ही संस्कृत भाषा के कालजयी और सर्वगंधा के प्रधान संपादक डॉ .वीरभद्रा मिश्र के संयोजन में अमीनाबाद झंडे वाले पार्क में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया | जिस सभा में पंडित ब्रह्मदत्त दीक्षित जी का विशेष योगदान था |इस सभा में डा.वीरभद्र मिश्र, उनकी धर्म पत्नी अनीता मिश्र,गिरिजा देवी ' निलिप्त' और प्रदेश के अनेको संस्कृत प्रेमिओ की भीड़ इक्कठा होने लगी | प्रशाशन ने दफा ४४ लागु कर दिया | प्रदर्शन करियो ने भीड़ को जुलुस के रूपमे आगे बढ़ने का प्रयास किया,प्रशाशन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया |श्र्ध्ध्येय चन्द्रभान गुप्त जी बहुत दुखी हुए और सभी संस्कृत प्रेमियों को अपने प्रभाव से रिहा करवा दिया |दूसरे दिन प्रमुख समाचार पत्रो में संस्कृत प्रेमियों के आक्रोश का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित हुआ |जिसमे प्रदेश के प्रमुख नगरो कशी,प्रयाग, मथुरा आदि प्रमुख शहरो में 'संस्कृत बचाओ' के लिए बड़ी बड़ी सभाओ का आयोजन किया गया लेकिन सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा | पंडित ब्रह्म दत्त दीक्षित जी संस्कृत हटाओ के विरोधी सदस्य होने के कारण हाईकोर्ट गए वह वकीलों ने राय दी की इस मुद्दे को सर्वोच्च न्यायलय दिल्ली में उठाना जाए तो उत्तम होगा |आप साथियो के साथ दिल्ल्ही गये और वह के सुप्रसिद्ध वकील श्री सिंधवी से मिले और संस्कृत बचाने का पूरा विचार विमर्श किया और फ़ीस पूछा |श्री सिंघवी ने कहा की यह भारतीय समाज का कार्य हे,में इस केस को मुफ्त में लडुंगा |श्री सिंघवी की संस्कृत भाषा पर सबसे बड़ी उदारता हुए | आठवे वर्ष सं १९९४ में सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय हुआ और संस्कृत का विषय यु.पी बोर्ड सर्वत्र शिक्षा पाठ्यक्रम में फिर से लागु किया गया | पंडित ब्रह्म दत्त दीक्षित ने अनेको सामाजिक कार्य किये शिक्षा के प्रचार-प्रसार में अपनी पेंशन से २० पुस्तको का प्रकाशन करवाया और निशुल्क वितरित किया |

पंडित ब्रह्म दत्त दीक्षित जी का एक आदर्श जीवन " स्वांत : सुखाय " था | उन्होंने शिक्षा के लिए,समाज के उत्थान के लिए,देश के लिए जो कुछ भी किया वह अपने सुख के लिए किया,उसके बदले में समाज से कुछ नहीं चाहा |ऐसी स्थिति में पंडित जी को निष्काम कर्मयोगी ही कहा जायेगा |उनकी उन सेवाओ को हमारा देश भुला नहीं पायेगा | पंडित ब्रह्मदत्त दीक्षित ९२ वर्ष तक लम्बी उम्र पाकर अनेको रचनात्मक कार्य किया |जीवन के अंतिम समय में परमपिता परमात्मा से यह प्राथना किया था की - "आपने अपने इस जीव-रूपी खिलोने को विश्व-रूपी म्यूजियम में भेजा था | बालकपन, किशोर -पन,युवापन, में जैसा चाहा खेल खिलाया | खिलौना आपके हाथ में रहा |अब ऐसा प्रतीत हो रहा हे की खिलौना पुराण पड़ गया हे |इस की नवीनता दूर हो चुकी हे |अतएव इस ९२ (बान्नवे वर्षीय) खिलोने को पुन:मिटटी-माता के सुपुदर् कर दे |आपकी सृष्टि तो नित,निरंतरता,नवीनता की निशानी हे |

शत शत नमन ||

उमाशंकर तिवारी

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