सिंधी भाषा में राष्ट्रीय चेतना Bhagwan Atlani द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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सिंधी भाषा में राष्ट्रीय चेतना

सिंधी भाषा में राष्ट्रीय चेतना

भगवान अटलानी, डी—183, मालवीय नगर, जयपुर—302017

सहस्त्राब्दियों से सिंध प्रदेश भारत का सीमा प्रहरी रहा है। सिकन्दर हो या मुहम्मद बिन—कासिम, हर एक विदेशी आततायी को सबसे पहले सिन्धी वीरों की तलवार की धार देखनी पड़ी। कौरव—पाण्डव युद्ध में कौरवों के पक्ष में महत्वपूर्ण भमिका निभाने वाले सिंध के राजा जयद्रथ की वीरता और रणकौशल का विशिष्ट स्थान है। महाभारत के उद्योग पर्व में कुन्ती जब श्रीकृष्ण के माध्यम से पांडवों के पास अपनी भावनायें भेजती है तो सिंध की रानी विदुला का उदाहरण देती है। रणभूमि से पीठ दिखाकर आने वाले अपने पुत्र संजय को देश की रक्षा के लिये युद्धभूमि में जाकर प्राणोत्सर्ग करने के लिये ललकारने वाली विदुला को कुन्ती ने अपना आदर्श माना।

सिंध में राष्ट्रीय चेतना की धू—धू जलती अग्नि के पीछे शैक्सपीयर और कालिदास की श्रेणी में माने जाने वाले सिंध के कवि शाह अब्दुल लतीफ (1689—1752) सांई सचल सरमस्त (1739—1829) और किशनचंद बेवस (1885—1947) का देश प्रेम का संदेश देने वाला काव्य था। एक छोर पर शाह अब्दुल लतीफ ने 'उमर मारवी' काव्याख्यान की नायिका मारवी से कहलवाया,

‘सजण ऐं साणीहु, कंहिं अणासीअ विसिरे,

हैफु तिन्हीं खे होइ, वतनु जिनि विसारियो'

अर्थात्‌ स्वजन और आत्मीयजन को कोई मूर्ख ही भुला सकता है। लानत है उनको जो देश को भूल गये हैं।' दूसरे छोर पर किशनचंद बेवस ने लिखा,

‘उहे माउरि भली मुरिकनि, जे बारोतन में लोली दियनि,

त सदिके देश तां तनु—मनु करिण जहिड़ी न बी खिज़िमत'

अर्थात्‌ 'माताएं मुस्कराते हुए पालनों में लेटे बच्चों को लोरी देती हैं कि देश के ऊपर तन—मन बलिदान करने से बड़ी कोई सेवा नहीं होती।'

नौजवानों में जोश फूंकते हुए लिखा,

'अचो नवजवानो हुनर आजमायूं,

छुटियूं गरम गोलियूं जिगर आजमायूं,

परे खां पवनि था फिरंगियुनि जा तिजला,

करे सख्त सीना सुपर आजमायूं,

हली जेलखाने में लोहे जूं शीखूं,

ऐं ऊँचा भितियुनि जा पथर आजमायूं'

राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने की दिशा में दुखायल का योगदान अविस्मरणीय है। दुखायल ने राष्ट्रभक्ति के पांच हज़ार से अधिक गीत लिखे। इतनी संख्या में कौमी गीत किसी भी भारतीय भाषा में किसी एक कवि ने नहीं लिखे हैं। यही कारण है कि उन्हें भारत सरकार ने पद्‌मश्री से नवाज़ा।

देश के लिये शीश देने वाली भावना को किसी पर अहसान नहीं वरन्‌ कर्त्तव्य बताते हुए अर्जुन सिकायल ने लिखा,

'वतन लाइ सिरु जे दिनोसींं त छा थियो?

फिदा तंहिं तां तनु—मनु कयोसीं त छा थियो'?

राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिये काव्य रचना करने वालों में अनेक सिंधी मुसलमान भी थे। इनमें अब्दुल करीम गिदाई, मिर्जा कलीच बेग, आगा सूफी, हाफिज़ मोहम्मद, शेख अयाज, आदि प्रमुख हैं। अब्दुल करीम गदाई ने देश के लिये मर—मिटने वाली भारतीय परम्परा को याद करते हुए लिखा,

यह शेख अयाज़ ही थे जिन्होंने लिखा था,

'भारत जिये असां जे मुआसीं त छा थियो?

सर सब्ज थिए चमन, फूले फले वतन

कंहिं शाख ते असां न हुआसीं त छा थियो?

तुहिंजे करार लाइ थकासीं त छा थियो?'

1952 में भारत—चीन युद्ध के दौरान वाराणसी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक 'गांडीव' में अपने स्तम्भ 'जाग मछंदर गोरख आया' में शंखनाद करते हुए अजीज किशोर ने लिखा,

खणी सुदर्शन किरिशिन आयो

राम धनुष ते बाणु चढायो

गुटन—गुटन, गुट—गुट—गुटन

थी गांडीव जी टनकार

चरक—चरक—चर चीनीअ जो थियो

कंधु कुल्हनि खां धार

खड़क—खड़क, खड़—खड़—खड़क

खड़की आ तलवार

राष्ट्रीय चेतना को संजीवनी प्रदान करने वाले अन्य प्रमुख सिंधी कवि रहे हैं हरि दिल्लविट, खीभलदास फारी, नारायण श्याम, लेखराज अजीज, आशा दुर्गापुरी, चेतनदेव शर्मा, निर्मल जीवताणी, राम पंजवाणी, गौतम शिकारपुरी, बलदेव गाजरा, जादूगर हासानन्द, अर्जुन शाद, सुगन आहूजा, प्रभु वफा, महाराज विष्णु शर्मा, कन्हैयालाल ठाकुर, लक्ष्मीचंद प्रेम, साधू टी0 एल0 वासवाणी, परसराम जिया, रामचन्द मोटवाणी, खानचंद खेराणी, विश्वामित्र वासवाणी, वासदेव निर्मल, डा0 मोती प्रकाश, होतू सिन्ध्ूा प्यासी, इत्यादि। कवयित्रियों नूरी और पोपटी हीरानंदाणी ने नारी सुलभ सीमाओं के बावजूद राष्ट्रीय चेतना फैलाने में भरपूर योगदान दिया। पोपटी हीरानंदानी ने भारत छोड़ो आंदोलन के समय लिखा,

'जिति किथि खूब लगनि था नारा, तव्हीं गोरा असीं कारा,

नीच तव्हां ज़ालिम हत्यारा, असीं राम जा आहियूं प्यारा,

कुइट इंडिया— कुइट इंडिया'

लंदन स्थित ब्रिटिश आर्काइब्ज़ में सूरक्षित दस्तावेज़ों के अनुसार अंग्रेजों ने भारत में सिंधी में प्रकाशित 21 पुस्तकों और एक पोस्टर को प्रतिबंधित किया था। इनमें से ग्यारह पुस्तकें कविताओं की हैं।

आज़ादी की लड़ाई के दौरान सिंधी पत्र पत्रिकाओं ने ऐसी भूमिका निभाई, जिसका उदाहरण भारतीय भाषाओं में ही नहीं, अंग्रेजी पत्रकारिता में भी संभवतः नहीं मिलेगा। असहयोग आन्दोलन के दौरान सन्‌ 1921—22 में 'हिन्दू' के आठ सम्पादक गिरफ्तार कर जेल भेजे गये थे। इनमें से एक को तीन साल, दो को दो साल, दो को डेढ साल और तीन को तीन माह की कैद हुई। इस समाचार पत्र का घोषणा पत्र रद्द किया गया। प्रेस जब्त किया गया। कर्मचारियों पर हर तरह का दबाव डाला गया। फिर भी छिप—छिपकर अखबार प्रकाशित किया जाता रहा। 'हिन्दू' का ही अगस्त 1931 में प्रकाशित 'तिलक विशेषांक' प्रतिबन्धित किया गया था।

तत्कालीन स्थितियों के मद्देनज़र जेठमल ने 'हिन्दवासी' में शाह अब्दुल लतीफ के कलाम की एक पंक्ति को शीर्षक बनाकर सम्पादकीय लिखा, 'कलालिके हट, कुसण जो कोपु वहे।' इसका अर्थ था ,'कलाल की हाट पर कत्ले आम का कोप जारी है।' केवल इस सम्पादकीय के आधार पर जेठमल को गिरफ्तार करके मुकदमा चलाया गया और दो साल कैद की सज़ा दी गई। देश माता सिंध सेवक, सदा—ए—सिंध हिन्दू जाति, शक्ति, वतन, स्वराज दैनिक, आज़ाद, आज़ादी साप्ताहिक, भारतमाता साप्ताहिक तथा स्वराज अन्य प्रमुख पत्र थे जिन्होंने राष्ट्रीय चेतना के विस्फोट में सिंध में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

मंघाराम मलकानी ने विभाजन पूर्व की सिंधी कहानी को छह हिस्सों में बांटते हुए छठा दौर मुख्यतः राष्ट्रीय चेतना की कहानियों का माना है। मेमण अब्दुल मजीद सिन्धी ने 'सिन्धी अदब जो तारीखी जाइज़ो' में, लीलो रुचंदानी ने 'स्वतन्त्रता के बाद सिंधी साहित्य जो इतिहास 'में और लालसिंह अजवानी ने अपने—अपने ढंग से राष्ट्रीय चेतना की तरह कहानियों की चर्चा की है।

ध्यान देने योग्य बात है कि उपर्युक्त तेरह प्रमुख कहानीकारों में से दो मुसलमान हैं। तीन कथाकार महिलाएं हैं। ये तथ्य प्रमाण हैं कि राष्ट्रीय चेतना के प्रसार की दिशा में हिन्दुओं, मुसलमानों व महिलाओं ने समान रूप से सक्रिय भूमिका निभाई है। इन कहानियों के कथ्य आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं की भूमिका, द्वितीय विश्व युद्ध की परिणतियां, दंगों के दुष्परिणाम, गांधीजी के नेतृत्व में लड़ी जा रही स्वतन्त्रता की लड़ाई, अंग्रेजों के प्रति नफरत की भावना, हिन्दू—मुस्लिम एकता, अन्तर्जातीय विवाह पर आधारित हैं। इनके अतिरिक्त जिन कहानियों को रेखांकित किया जा सकता है, वे हैं अमरलाल हिंगोरानी की कहानी 'अदो अब्दुल रहमान' कीरत बाबानी की कहानी' मुहम्मद राम' आसानन्द मामतोरा की कहानी 'हे प्रेम,' होतू बदलानी की कहानी 'सोशलिस्ट पाकिस्तान', शेख अयाज की कहानियां 'रफीक' और 'पाडे़सिरी', प्रो0 राम पंजवानी की कहानी 'मुहम्मद गादीअ वारो', डा. मोती प्रकाश की कहानी 'जेनी' हरी मोटवानी की कहानियां 'सज़ा' और ‘धरती' लोकनाथ जेटली की कहानी 'गाम जी इज़त में', सुगन आहूजा की कहानी 'पाड़ेसिरी', कीरत महरचन्दानी की कहानियां 'मौलाना लाल जी भाई', ‘मुहम्मद रिक्शा वारो' तथा 'असीं सभु हिकु आहियूं', आनन्द गोलानी की कहानी 'सिन्धू' डा0 कमला गोकलानी की कहानी 'अन्दर जी अदालत', ईश्वर भारती की कहानियां ‘झंगल' और 'दारूं' व ईश्वर चन्दर की कहानी 'फहिलियल दूंहें जे विच मां'। ये सभी कहानियां एकता का संदेश देते हुए राष्ट्रीय चेतना की भावना को मज़बूत करती हैं।

राष्ट्रीय चेतना के उन्नयन में योगदान देने वाले मौलिक सिंधी उपन्यासों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। शेवक भोजराज का उपन्यास 'आशीर्वाद' और गुली सदारंगामी का उपन्यास ‘इतिहाद' स्वतन्त्रता से पूर्व लिखी गयी राष्ट्रीय चेतना की वाहक कृतियां हैं। शेवक भोजराज के उपन्यास 'आशीर्वाद' के प्रभाव को इस तथ्य से पहचाना जा सकता है कि यह रचना गुजराती व हिन्दी में अनूदित हुर्ह थी। उन्हें भारत सरकार ने पद्‌मश्री से भी नवाज़ा था।

स्वतन्त्रता के बाद मोहन कल्पना की कलम से उपन्यास 'मसुंड ऐं कांव' सामने आया।

सिंधी समाज के विभाजन से जुडे़कड़वे अनुभवों को बेबाकी से चित्रित करने के बावजूद यह उपन्यास सिंधी समाज में राष्ट्रीय चेतना मजबूत करता है। सिंधी की साहित्यिक पत्रिका 'कूंज' के सम्पादक हरी मोटवानी का उपन्यास 'अबो' विभाजन के बहुत बाद में प्रकाशित होने के बावजूद विभाजन पूर्व की परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय चेतना को पुष्ट करता है।

1920 से 1940 के वर्षों में अन्य भाषाओं में प्रकाशित साहित्य, विशेषकर उपन्यासों के सिंधी में विपुल अनुवाद हुए। टैगोर, शरत, बंकिम, बनफूल आदि का साहित्य बंगाली से, आप्टे, खांडेकर, तेंदुलकर आदि का साहित्य मराठी से, गोरधन राम त्रिपाठी, मेधाणी, मड़िया, उमाशंकर, पन्नालाल, धूमकेतु आदि गुजराती से, मुंशी प्रेमचन्द, भीष्म साहनी, इलाचन्द्र जोशी, अज्ञेय आदि हिन्दी से अनूदित होकर जब सिंधी पाठकों के सम्मुख आये तो उनके सम्मुख राष्ट्रीय चेतना का एक बडा़ क्षितिज खुलता चला गया। अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य को सिंधी में अनूदित करने वालों में प्रमुख हैं लालचन्द अमर दिनोमल, परमानन्द मेवाराम, भेरूमल महरचन्द, जेठमल परसराम, चूहड़मल हिन्दूजा, मंधाराम मलकानी, राम पंजवानी, जगत आडवानी, बिहारी छाबड़िया आदि। हिन्दी, बंगाली और गुजराती से सिंधी में अनूदित कुछ उपन्यासों में राष्ट्रीय चेतना के स्वर इतने प्रभावशाली होकर उभरे थे कि उस दौर में अनेक सिंधी भाषियों ने मूल रचनायें पढ़ने के उद्देश्य से हिन्दी, बंगला या गुजराती भाषाएं सीखीं।

सन्‌ 1894 में पहली बार कराची के डी.जे. सिंध कालेज में धार्मिक नाटक ‘नल दमयंती' का मंचन किया गया। प्रारम्भिक दौर में सिंध में नाटकों की आधारभूमि सुदृढ करने वालों में मिर्जा़ कलीच बेग, दीवान कौड़ोमल चन्दनमल खिलनानी, किशनचन्द बेवस, हून्दराज दुखायल, भेरूमल महरचन्द, खानचन्द दरियाणी, जेठमल परसराम, मंघाराम मलकाणी, राम पंजवाणी, कल्याण आदवाणी, अहमद चागला, लेखराज अजीज़ और हाजी इमाम बख्श प्रमुख थे। स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सिन्ध में ‘रवीन्द्रनाथ लिटरेरी ड्रामेटिक सोसायटी' की नींव रखी। इस नाटक मंडली की ओर से राष्ट्रीय एकता, हिन्दू मुस्लिम भाईचारे और राजपूतों की बहादुरी के अनेक नाटक मंचित किये गये।

आस जी टोली, साधू हीरानन्द अकादमी, अनेक स्कूलों व कालेजों में भी नाटक मंडलियां बनीं। ये मंडलियां सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ वातावरण बनाने वाले नाटकों के साथ स्वतन्त्रता संग्राम से सम्बन्धित नाटक प्रस्तुत करती थीं।

सिंध के विभिन्न नगरों, कस्बों के बड़े मैदानों में सत्य नारायण की कथा, चालीहा साहब (सावन माह में व्रत विशेष का पर्व), चन्द्रोदय का महत्व जैसे विभिन्न धार्मिक आयोजनों के नाम पर दर्शकों को पहले एकत्र करके धार्मिक कार्यक्रम आरम्भ कराया जाता। फिर समय और अवसर देखकर जैसे आजकल टी.वी. कार्यक्रमों में ब्रेक के बाद व्यापारिक विज्ञापन खुले आम दिखाये जाते हैं, उसी तरह सिन्ध में धार्मिक कार्यक्रमों के बीच देशभक्ति पूर्ण भाषण, गीत एवं छोटे—छोटे दृश्यों वाले नाटक दिखाये जाते। सिन्ध में किसी घर की बड़ी सी छत पर विशेष आमन्त्रित दर्शकों के समक्ष वतन परस्ती के उत्सव आयोजित करने की परम्परा रही है। उनके समक्ष पहले राष्ट्रीय गीतों से आरम्भ करके बाद में देशभक्ति पूर्ण नाटक भी प्रस्तुत किये जाते थे। जिन नगरों में ऐसे उत्सव होते उनमें उल्लेखनीय हैं हैदराबाद, कराची, लाड़काणो, शिकारपुर, सक्खर इत्यादि।

उस दौर में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने वाले सोलह नाटकों का और तेरह एकांकियों उल्लेख एवं विवरण प्राप्त होता है, स्पष्ट है कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह सिन्धी भाषा के रचनाकार राष्ट्रीय चेतना जगाने में सदैव आगे रहे हैं। भारतीय भाषाओं के साहित्य में देशभक्ति व देशप्रेम की गूंज में सिन्धी रचनाधर्मी सदैव अपना स्वर सम्मिलित करते रहे हैं। देश की स्वतन्त्रता के लिये घर—बार त्यागकर दर बदर होने का जज़्बा जिस समाज ने दिखाया हो उस भाषा—भाषी समाज का साहित्यकार निश्चय ही सदा—सर्वदा राष्ट्रीय चेतना का अग्रदूत बनकर हासानन्द जादूगर के शब्दों में उद्‌घोष करता रहेगा,

‘रखिजु मानु ऊंचो वतन जो अदा

झंडो झूले पंहिंजे वतन जो सदा'

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भगवान अटलानी, डी—183, मालवीय नगर, जयपुर—302017