मुर्दा घर Vedant Kana द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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मुर्दा घर

सालों पुराने उस अस्पताल के मुर्दाघर में एक ऐसा रहस्य छिपा था, जिसके बारे में अस्पताल के पुराने कर्मचारियों तक को पूरी सच्चाई मालूम नहीं थी। दिन के समय वहाँ सब कुछ सामान्य दिखाई देता था। डॉक्टर अपने मरीजों का इलाज करते थे, नर्सें अपने काम में लगी रहती थीं और अस्पताल के गलियारों में मरीजों की आवाजाही होती रहती थी। लेकिन रात के बारह बजते ही उस अस्पताल का माहौल पूरी तरह बदल जाता था। गलियारों में अचानक ठंड बढ़ जाती थी, बंद कमरों के भीतर से किसी के कराहने की आवाजें आने लगती थीं और मुर्दाघर के भारी दरवाजे के पीछे से कभी कभी ऐसी दस्तक सुनाई देती थी, जैसे कोई अंदर बंद होकर बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो। अस्पताल में काम करने वाले पुराने कर्मचारियों का मानना था कि मुर्दाघर में रखी लाशों में से कुछ ऐसी थीं, जिनकी मौत के बाद भी उनकी आत्माओं को शांति नहीं मिली थी। इसीलिए कई साल पहले एक तांत्रिक ने मुर्दाघर के दरवाजे पर एक अभिमंत्रित नींबू मिर्ची लटकाई थी। उसने अस्पताल के मालिक और कर्मचारियों को सख्त चेतावनी दी थी कि उस नींबू मिर्ची को कभी अपनी जगह से हटने मत देना। उसका कहना था कि यह कोई साधारण टोटका नहीं था, बल्कि एक ऐसी शक्ति को रोकने का उपाय था, जिसे एक बार बाहर निकलने का रास्ता मिल गया तो उसे वापस बंद करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। लेकिन उस अस्पताल में काम करने वाले किसी भी इंसान को अंदाजा नहीं था कि एक दिन एक छोटी सी लापरवाही के कारण वह सुरक्षा टूट जाएगी और मुर्दाघर में कैद सबसे खतरनाक आत्मा बाहर निकल आएगी।

उस अस्पताल का नाम शिवपुर सिविल अस्पताल था। यह अस्पताल लगभग सत्तर साल पुराना था और शहर के बाहरी इलाके में बना हुआ था। अस्पताल की मुख्य इमारत के पीछे एक लंबा गलियारा था, जिसके आखिरी छोर पर मुर्दाघर स्थित था। उस गलियारे में दिन के समय भी बहुत कम लोग जाते थे। दीवारों पर नमी के निशान थे, छत से जगह जगह प्लास्टर उखड़ा हुआ था और वहाँ लगी पुरानी बत्तियाँ बार बार झपकती रहती थीं। मुर्दाघर का दरवाजा मोटे लोहे का बना था। उसके ऊपर जंग लगी हुई थी और नीचे की तरफ हमेशा काले रंग के कुछ निशान दिखाई देते थे। अस्पताल के पुराने कर्मचारियों का कहना था कि उन निशानों को कई बार साफ किया गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद वे फिर उभर आते थे। रात की ड्यूटी करने वाले कर्मचारी उस रास्ते से गुजरते समय अपनी नजरें नीचे रखकर चलते थे। कोई भी उस दरवाजे के पास रुकना पसंद नहीं करता था।

उसी अस्पताल में रमाकांत नाम का एक बूढ़ा कर्मचारी काम करता था। वह पिछले पच्चीस सालों से मुर्दाघर की देखभाल कर रहा था। उसने अपनी जिंदगी में कई लाशें देखी थीं और मौत को बहुत करीब से समझा था। लेकिन इसके बावजूद वह मुर्दाघर के भीतर अकेले जाने से बचता था। जब भी कोई नया कर्मचारी उससे इसका कारण पूछता, वह केवल इतना कहता कि मुर्दाघर में हर लाश की कहानी एक जैसी नहीं होती। कुछ लोग मरने के बाद चले जाते हैं, लेकिन कुछ अपनी मौत को स्वीकार ही नहीं कर पाते।

रमाकांत की इस बात पर कोई ध्यान नहीं देता था। अस्पताल के अधिकतर कर्मचारी उसकी बातों को बूढ़े आदमी का डर समझकर टाल देते थे। लेकिन अस्पताल का एक कर्मचारी ऐसा भी था, जिसे रमाकांत की बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था। उसका नाम महेश था। महेश लगभग तीस साल का था और कुछ महीने पहले ही इस अस्पताल में कंपाउंडर की नौकरी पर लगा था। वह मेहनती था, लेकिन स्वभाव से लापरवाह और जिद्दी था। उसे भूत प्रेत की कहानियाँ सुनना अच्छा लगता था, मगर वह उन्हें सच नहीं मानता था। उसका मानना था कि इंसान की मौत के बाद कुछ भी नहीं बचता और डर केवल कमजोर दिमाग की उपज है।

एक रात महेश की ड्यूटी देर तक चल रही थी। अस्पताल में उस दिन मरीजों की संख्या अधिक थी। डॉक्टरों की मदद करते करते उसे रात के लगभग ग्यारह बज गए। जब वह दवाइयों का सामान लेकर पिछले गलियारे से गुजर रहा था, तभी उसकी नजर मुर्दाघर के दरवाजे पर लटकी नींबू मिर्ची पर पड़ी। वह कई दिनों से वहाँ लटकी हुई थी। सूख चुके नींबू का रंग काला पड़ गया था और मिर्चियाँ सिकुड़कर छोटी हो गई थीं।

महेश ने उसे देखकर नाक सिकोड़ ली।

उसने पास खड़े रमाकांत से कहा, "बाबा, अस्पताल में इतने पढ़े लिखे डॉक्टर काम करते हैं और तुम लोग अभी तक इन चीजों पर विश्वास करते हो? इस नींबू मिर्ची से भूत कैसे रुक सकता है?"

रमाकांत ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

"महेश, मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ। इस चीज को हाथ मत लगाना। तुम्हें जो समझना है समझो, लेकिन इसे अपनी जगह से मत हटाना।"

महेश हँस पड़ा।

"अगर इसमें इतनी शक्ति है, तो इसे देखकर भूत डरते क्यों हैं? आज तक किसी ने उस भूत को देखा भी है?"

रमाकांत कुछ पल चुप रहा। फिर उसने धीमी आवाज में कहा, "जिस चीज का नाम लेकर भी लोग डरते हों, उसे देखने की जिद नहीं करनी चाहिए।"

महेश ने उसकी बात अनसुनी कर दी। वह आगे बढ़ने लगा, लेकिन तभी उसके जूते का किनारा दरवाजे के पास पड़े एक लोहे के स्टैंड से टकरा गया। स्टैंड हिलकर गिर पड़ा और उसके साथ नींबू मिर्ची भी नीचे आ गिरी। धागा टूट गया और नींबू फर्श पर लुढ़कता हुआ दरवाजे से दूर जा गिरा।

महेश ने झुककर नींबू उठाया और उसे पास की खिड़की के नीचे रख दिया।

"लो बाबा, अब खुश? मैंने इसे फेंका नहीं है, बस यहाँ रख दिया है।"

रमाकांत के चेहरे का रंग उड़ चुका था।

उसने तुरंत महेश का हाथ पकड़ लिया और लगभग चिल्लाते हुए कहा, "इसे वापस दरवाजे पर रखो। अभी के अभी!"

महेश ने अपना हाथ छुड़ाया।

"कल सुबह लगा दूँगा। अभी मुझे घर जाना है।"

इतना कहकर वह वहाँ से चला गया।

रमाकांत कुछ देर तक टूटे हुए धागे और जमीन पर पड़ी मिर्चियों को देखता रहा। फिर उसने मुर्दाघर के दरवाजे की तरफ देखा। उसे लगा जैसे दरवाजे के पीछे कोई बहुत धीरे धीरे हँस रहा हो।

उसने काँपते हाथों से दरवाजे पर लगी छोटी सी खिड़की में झाँकने की कोशिश की। अंदर अंधेरा था। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी भीतर से तीन जोरदार दस्तक सुनाई दीं।

ठक। ठक। ठक।

रमाकांत पीछे हट गया।

अगले ही पल दरवाजे के नीचे की पतली दरार से काले रंग का धुआँ बाहर निकलने लगा। वह धुआँ जमीन पर फैलता हुआ धीरे धीरे गलियारे के दूसरे छोर तक पहुँच गया। कुछ सेकंड बाद वहाँ फिर से सन्नाटा छा गया।

रमाकांत ने तुरंत अपने कमरे का दरवाजा बंद किया और पूरी रात बाहर नहीं निकला।

अगली सुबह अस्पताल में सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था। महेश समय पर ड्यूटी पर आया और अपने काम में लग गया। उसे पिछली रात की घटना याद भी नहीं थी। उसने सोचा कि रमाकांत बेकार में डर रहा था। लेकिन उस दिन दोपहर में एक अजीब घटना हुई।

अस्पताल के वार्ड नंबर सात में भर्ती एक बुजुर्ग मरीज की हालत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टरों ने उसे बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई। उसकी लाश को मुर्दाघर में भेज दिया गया।

महेश भी लाश को अंदर रखने में मदद करने गया था। जब वह बाहर निकला, तो उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने पीछे से उसका नाम पुकारा हो।

"महेश..."

वह तुरंत पलटा।

पीछे कोई नहीं था।

उसने सोचा कि शायद रमाकांत ने आवाज दी होगी। वह वापस गलियारे में आ गया और अपने काम में लग गया।

लेकिन शाम होते होते अस्पताल में एक और अजीब घटना हुई। वार्ड नंबर चार में भर्ती एक मरीज अचानक अपनी बिस्तर से उठ बैठा। वह पिछले तीन दिनों से बेहोश था। डॉक्टरों के अनुसार उसकी हालत में अभी सुधार होने की कोई उम्मीद नहीं थी।

उस मरीज ने अपनी आँखें खोलीं और कमरे के दरवाजे की तरफ देखने लगा।

फिर उसने अपने हाथ से इशारा किया, जैसे कोई उसे बुला रहा हो।

वहाँ मौजूद कर्मचारी ने उससे पूछा, "क्या हुआ? तुम्हें कुछ चाहिए?"

मरीज ने कोई जवाब नहीं दिया। वह धीरे धीरे बिस्तर से नीचे उतरा और नंगे पैर दरवाजे की तरफ चलने लगा। उसके हाथ में लगी सुई निकल गई, लेकिन उसे दर्द का एहसास तक नहीं हुआ। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। उसकी आँखें खुली हुई थीं, मगर ऐसा लगता था जैसे वह किसी गहरी नींद में चल रहा हो।

कर्मचारी ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन मरीज ने इतनी ताकत से उसे धक्का दिया कि वह दीवार से जा टकराया।

इसके बाद वह मरीज गलियारे से होता हुआ सीधे मुर्दाघर की तरफ चला गया।

जब तक बाकी कर्मचारी वहाँ पहुँचे, वह दरवाजा खोलकर अंदर जा चुका था।

उन्होंने तुरंत दरवाजा बंद करने की कोशिश की, लेकिन भीतर से किसी ने उसे खींचकर बंद कर दिया। अगले कुछ मिनटों तक अंदर से चीखने की आवाजें आती रहीं। फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया।

डॉक्टरों और कर्मचारियों ने मिलकर दरवाजा खोला।

मुर्दाघर के अंदर कई लाशें रखी थीं। ठंडक बढ़ाने वाली मशीन चल रही थी। लोहे की ट्रॉलियाँ अपनी जगह पर थीं। लेकिन वह मरीज कहीं नहीं था।

कर्मचारियों ने पूरा कमरा खोज डाला। उन्होंने अलमारियों के पीछे देखा, ठंडे कमरों की जाँच की और हर कोने में उसे ढूँढ़ा। मगर उसका कोई निशान नहीं मिला।

केवल फर्श पर उसके पैरों के गीले निशान दिखाई दे रहे थे। वे निशान कमरे के बीच से शुरू होकर दीवार तक जाते थे और फिर अचानक गायब हो जाते थे।

उस रात अस्पताल में काम करने वाले किसी भी कर्मचारी को नींद नहीं आई।

अगले दिन अस्पताल के मालिक ने पुलिस को बुलाया। पुलिस ने पूरे परिसर की तलाशी ली। अस्पताल की छत, सीढ़ियाँ, स्टोर रूम और बाहर का मैदान सब जगह जाँच की गई। लेकिन मरीज का कोई पता नहीं चला।

डॉक्टरों ने यह मानने से इनकार कर दिया कि एक मरीज बंद कमरे से गायब हो सकता है। उन्होंने कहा कि शायद वह किसी तरह बाहर निकल गया होगा। लेकिन अस्पताल के मुख्य दरवाजे पर तैनात चौकीदार ने साफ बताया कि उस रात कोई भी व्यक्ति बाहर नहीं गया था।

पुलिस के जाने के बाद अस्पताल के पुराने कर्मचारी रमाकांत ने मालिक से एक बात कही।

"साहब, यह सब उस नींबू मिर्ची के हटने के बाद शुरू हुआ है। मैंने आपको पहले भी बताया था कि इस मुर्दाघर में कुछ ऐसा बंद है, जिसे बाहर नहीं आने देना चाहिए।"

मालिक ने उसे डाँट दिया।

"तुम्हारी इन बेकार की बातों की वजह से अस्पताल की बदनामी हो रही है। आगे से ऐसी बातें किसी के सामने मत करना।"

रमाकांत चुप हो गया। लेकिन उसके मन में एक डर बैठ चुका था। वह जानता था कि यह केवल शुरुआत थी।

अगली दो रातों में दो और मरीज गायब हो गए। दोनों की हालत गंभीर थी। दोनों रात के लगभग बारह बजे अपने बिस्तर से उठे और बिना किसी से बात किए मुर्दाघर की तरफ चले गए। दोनों को रोकने की कोशिश की गई, लेकिन वे किसी अनजान शक्ति के प्रभाव में थे। उनकी आँखें खुली थीं, शरीर चल रहा था, मगर उनके भीतर जैसे कोई और मौजूद था।

और हर बार जब मुर्दाघर का दरवाजा खोला गया, अंदर से एक लाश गायब मिलती थी।

अस्पताल के कर्मचारी अब रात की ड्यूटी करने से डरने लगे थे। कोई भी पिछले गलियारे में अकेले नहीं जाता था। कुछ कर्मचारियों ने नौकरी छोड़ने की बात भी शुरू कर दी थी।

इसी बीच महेश को अपने शरीर में कुछ बदलाव महसूस होने लगे।

पहले उसे रात के समय बहुत ठंड लगने लगी। फिर उसे बार बार ऐसा महसूस होने लगा कि कोई उसके पीछे खड़ा है। जब भी वह अचानक पीछे मुड़ता, वहाँ कोई नहीं होता।

एक रात वह अपने कमरे में सो रहा था। आधी रात के आसपास उसकी आँख खुली। उसे ऐसा लगा जैसे कमरे के बाहर कोई धीमी आवाज में कुछ बोल रहा हो।

"महेश... दरवाजा खोल..."

उसने उठकर दरवाजा देखा। बाहर कोई नहीं था।

वह वापस बिस्तर पर लेट गया, लेकिन कुछ ही देर बाद वही आवाज फिर सुनाई दी।

"महेश... मुझे बाहर निकाल..."

इस बार आवाज उसके कमरे के अंदर से आई थी।

महेश का शरीर ठंडा पड़ गया। उसने कमरे की बत्ती जलाई और चारों तरफ देखा। सब कुछ सामान्य था। फिर उसकी नजर कमरे के कोने में रखे पुराने आईने पर पड़ी।

आईने में उसका चेहरा दिखाई दे रहा था, लेकिन उसके पीछे एक दूसरा चेहरा भी था।

वह चेहरा किसी मरे हुए इंसान का था। उसकी त्वचा काली पड़ चुकी थी, आँखों की जगह दो गहरे गड्ढे थे और मुँह इतना खुला हुआ था कि उसके अंदर के काले दाँत दिखाई दे रहे थे।

महेश पलटकर पीछे देखने लगा।

वहाँ कोई नहीं था।

उसने फिर आईने की तरफ देखा। अब उसमें केवल उसका चेहरा था।

महेश ने उसी समय आईने पर कपड़ा डाल दिया और पूरी रात कमरे से बाहर नहीं निकला।

सुबह होते ही वह अस्पताल पहुँचा और रमाकांत को सारी बात बताई।

रमाकांत ने उसकी बात सुनकर सिर पकड़ लिया।

"मैंने तुमसे कहा था कि उस चीज को हाथ मत लगाना। अब उसने तुम्हें देख लिया है।"

महेश ने घबराकर पूछा, "कौन है वह? क्या सच में कोई आत्मा है?"

रमाकांत कुछ देर चुप रहा। फिर उसने उसे मुर्दाघर के पुराने इतिहास के बारे में बताना शुरू किया।

लगभग तीस साल पहले इसी अस्पताल में एक आदमी को लाया गया था। उसका नाम देव मिर्जान था। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसके बारे में शहर के लोग तरह तरह की बातें करते थे। कहा जाता था कि उसे मृत्यु के बाद की दुनिया के रहस्यों को जानने का जुनून था। वह कई वर्षों तक श्मशान घाटों और सुनसान जगहों पर भटकता रहा था। वह मानता था कि इंसान की आत्मा को उसके शरीर से अलग होने के बाद भी नियंत्रित किया जा सकता है।

एक दिन उसे अस्पताल लाया गया। उसका शरीर बुरी तरह घायल था। डॉक्टरों ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन कुछ ही घंटों में उसकी मौत हो गई।

उसकी लाश को मुर्दाघर में रख दिया गया।

लेकिन उसी रात मुर्दाघर में काम करने वाले एक कर्मचारी ने दावा किया कि देव मिर्जान की लाश ने अपनी आँखें खोल दी थीं। वह कर्मचारी डरकर बाहर भाग गया। अगली सुबह जब डॉक्टरों ने जाँच की, तो लाश अपनी जगह पर पड़ी थी। उन्होंने इसे कर्मचारी का भ्रम मान लिया।

कुछ दिनों बाद मुर्दाघर में काम करने वाले दो कर्मचारी रहस्यमय तरीके से गायब हो गए। उनके गायब होने से पहले दोनों ने एक ही बात कही थी कि रात में किसी ने उनके नाम पुकारे थे।

जब घटनाएँ बढ़ने लगीं, तो अस्पताल के मालिक ने एक तांत्रिक को बुलाया। तांत्रिक ने मुर्दाघर के भीतर कई घंटों तक पूजा की और फिर बाहर निकलकर बताया कि देव मिर्जान की आत्मा साधारण आत्मा नहीं थी। मरने से पहले उसने अपनी साधना के जरिए अपनी चेतना को शरीर से बाँधने की कोशिश की थी। उसकी मौत के बाद भी वह उसी शरीर और उस स्थान से जुड़ी रह गई थी।

तांत्रिक ने कहा कि वह आत्मा अब किसी जीवित शरीर में प्रवेश करना चाहती थी। उसे एक ऐसा माध्यम चाहिए था, जिसके सहारे वह फिर से इस दुनिया में अपना अस्तित्व बना सके।

इसीलिए तांत्रिक ने मुर्दाघर के दरवाजे पर अभिमंत्रित नींबू मिर्ची बाँधी थी। उसके साथ कुछ विशेष मंत्र भी किए गए थे, ताकि आत्मा मुर्दाघर की सीमा पार न कर सके।

तांत्रिक ने आखिरी चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि यह सुरक्षा टूट गई, तो देव मिर्जान की आत्मा पहले उन लोगों को अपने पास बुलाएगी जिनका शरीर कमजोर होगा। फिर वह उनमें से किसी एक को अपना माध्यम बना लेगी।

रमाकांत की बात सुनकर महेश के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उसने काँपती आवाज में पूछा, "लेकिन अब वह आत्मा बाहर निकल चुकी है। हम उसे रोकेंगे कैसे?"

रमाकांत ने कहा, "हमें उस तांत्रिक को ढूँढ़ना होगा। लेकिन मुझे नहीं पता कि वह अभी जीवित भी है या नहीं।"

उसी समय अस्पताल के पिछले गलियारे से जोरदार आवाज आई।

दोनों ने पलटकर देखा।

मुर्दाघर का दरवाजा अपने आप खुल रहा था।

धीरे धीरे लोहे का भारी दरवाजा खुला और उसके पीछे का अंधेरा दिखाई देने लगा। कमरे के अंदर से बर्फ जैसी ठंडी हवा बाहर आई। गलियारे में लगी बत्तियाँ एक साथ बुझ गईं।

अंधेरे में किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

ठक... ठक... ठक...

जैसे कोई नंगे पैर फर्श पर चल रहा हो।

महेश ने रमाकांत का हाथ कसकर पकड़ लिया। दोनों पीछे हटने लगे। तभी अंधेरे में से एक आकृति दिखाई दी।

वह किसी इंसान की तरह खड़ी थी, लेकिन उसका शरीर असामान्य रूप से लंबा था। उसके दोनों हाथ घुटनों से नीचे तक लटक रहे थे। सिर एक तरफ झुका हुआ था और चेहरे पर जली हुई त्वचा के निशान थे।

वह आकृति कुछ कदम आगे बढ़ी।

फिर उसने अपना सिर उठाया।

महेश की साँस रुक गई।

वह वही चेहरा था, जिसे उसने पिछली रात अपने आईने में देखा था।

देव मिर्जान की आत्मा।

रमाकांत ने काँपते हुए धार्मिक मंत्र बोलने शुरू कर दिए। लेकिन उस आकृति पर कोई असर नहीं हुआ। वह बस महेश को देखती रही।

फिर उसके मुँह से एक ऐसी आवाज निकली, जैसे कई लोग एक साथ बोल रहे हों।

"तुमने मुझे बाहर निकाला है, महेश। अब तुम ही मुझे मेरा शरीर दोगे।"

महेश चीखता हुआ वहाँ से भागा। रमाकांत भी उसके पीछे दौड़ा। दोनों किसी तरह मुख्य गलियारे तक पहुँचे। वहाँ कुछ कर्मचारी मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी मुर्दाघर के अंदर झाँकने की हिम्मत नहीं की।

कुछ मिनट बाद अस्पताल में फिर से बिजली आ गई।

जब कर्मचारी मुर्दाघर के पास पहुँचे, तो दरवाजा बंद था। अंदर सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था। देव मिर्जान की लाश भी अपनी जगह पर रखी हुई थी।

लेकिन अब महेश पहले जैसा नहीं था।

वह पूरे दिन चुप रहा। किसी से नजरें नहीं मिलाता था। जब डॉक्टर उससे बात करते, तो वह कुछ सेकंड तक उन्हें घूरता रहता और फिर धीरे से मुस्कराने लगता।

रमाकांत ने उसी दिन अस्पताल छोड़ने का फैसला कर लिया। जाने से पहले उसने महेश को समझाया कि वह रात में अकेला न रहे और किसी भी हालत में मुर्दाघर के पास न जाए।

महेश ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया।

उस रात अस्पताल में एक नया मरीज भर्ती हुआ। उसका नाम राजेश था। वह सड़क दुर्घटना में घायल हुआ था और उसकी हालत गंभीर थी। डॉक्टरों ने उसे वार्ड नंबर सात में रखा।

रात के लगभग बारह बजे राजेश की आँखें खुलीं।

उसने अपने सामने खड़े एक आदमी को देखा। वह आदमी अस्पताल के कर्मचारी की वर्दी पहने हुए था। उसका चेहरा झुका हुआ था, इसलिए राजेश उसे पहचान नहीं पाया।

उस आदमी ने धीमी आवाज में कहा, "चलो, तुम्हें ऐसी जगह ले चलता हूँ जहाँ तुम्हारा दर्द हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।"

राजेश ने उठने की कोशिश की। उसके शरीर में इतनी ताकत नहीं थी कि वह ठीक से बैठ सके। फिर भी वह धीरे धीरे बिस्तर से नीचे उतर गया।

वह आदमी आगे आगे चलने लगा और राजेश उसके पीछे पीछे चलने लगा।

कुछ देर बाद दोनों मुर्दाघर के सामने पहुँच गए।

दरवाजा अपने आप खुल गया।

राजेश अंदर चला गया।

अगली सुबह जब डॉक्टर वार्ड नंबर सात में पहुँचे, तो राजेश का बिस्तर खाली था। उसके शरीर में लगी सभी नलियाँ और पट्टियाँ वहीं पड़ी थीं। लेकिन उसका कोई पता नहीं था।

डॉक्टरों ने तुरंत अस्पताल के सभी कर्मचारियों को बुलाया।

इस बार रमाकांत वहाँ मौजूद नहीं था। महेश भी अपनी ड्यूटी पर नहीं पहुँचा था।

अस्पताल के मालिक ने उसके कमरे की तलाशी लेने का आदेश दिया। जब कर्मचारी महेश के कमरे में पहुँचे, तो दरवाजा अंदर से बंद था।

काफी देर तक आवाज देने के बाद भी कोई जवाब नहीं मिला।

आखिरकार दरवाजा तोड़ा गया।

कमरे के भीतर महेश जमीन पर बैठा था। उसका चेहरा दीवार की तरफ था और वह लगातार कुछ बुदबुदा रहा था।

कर्मचारियों ने उसे उठाने की कोशिश की, लेकिन वह हिला तक नहीं।

जब उन्होंने उसे पलटकर देखा, तो सभी के मुँह से चीख निकल गई।

महेश की आँखें पूरी तरह काली हो चुकी थीं। उसके होंठों पर एक अजीब मुस्कान थी और उसकी गर्दन पर काले रंग की नसें उभर आई थीं।

उसने धीरे से अपना सिर उठाया और सामने खड़े कर्मचारियों को देखा।

फिर वह हँसने लगा।

"तुम लोग उसे ढूँढ़ रहे हो? वह तो यहीं है।"

एक कर्मचारी ने घबराकर पूछा, "कौन?"

महेश ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

"देव मिर्जान।"

इसके बाद उसका शरीर अचानक अकड़ गया। वह जमीन पर गिर पड़ा और जोर जोर से साँस लेने लगा। डॉक्टरों को बुलाया गया, लेकिन कुछ ही मिनटों में उसकी साँसें बंद हो गईं।

महेश की मौत के बाद उसके शरीर को मुर्दाघर में ले जाया गया।

वहाँ पहले से कई लाशें रखी थीं। कर्मचारियों ने महेश के शरीर को एक खाली ट्रॉली पर रखा और दरवाजा बंद कर दिया।

लेकिन उस रात एक ऐसा सच सामने आया, जिसने पूरे अस्पताल की नींव हिला दी।

सुबह जब मुर्दाघर खोला गया, तो महेश की लाश गायब थी।

उसकी जगह ट्रॉली पर एक पुराना कागज रखा हुआ था। कागज पर काँपते हुए अक्षरों में लिखा था, "एक शरीर समाप्त हुआ। अब दूसरा शरीर मेरा इंतजार कर रहा है।"

कागज के नीचे एक नाम लिखा था।

रमाकांत।

अस्पताल के मालिक ने तुरंत रमाकांत को ढूँढ़ने के लिए लोगों को भेजा। लेकिन उसका घर खाली मिला। पड़ोसियों ने बताया कि वह पिछली रात ही अपना सामान लेकर कहीं चला गया था।

किसी को नहीं पता था कि वह कहाँ गया।

अस्पताल में डर इतना बढ़ गया कि कुछ ही दिनों में कई कर्मचारी नौकरी छोड़कर चले गए। अस्पताल के मालिक ने मुर्दाघर को बंद करने का आदेश दे दिया। दरवाजे पर नया ताला लगाया गया और उसके सामने लोहे की जंजीरें बाँध दी गईं।

लेकिन इससे कुछ नहीं बदला।

हर रात ठीक बारह बजे मुर्दाघर के अंदर से दस्तक सुनाई देती थी।

कभी किसी के हँसने की आवाज आती, तो कभी किसी के रोने की। कुछ कर्मचारियों ने दावा किया कि उन्होंने बंद दरवाजे के नीचे से काले धुएँ को बाहर निकलते देखा था।

फिर एक रात अस्पताल के चौकीदार ने कुछ ऐसा देखा, जिसके बाद उसने हमेशा के लिए नौकरी छोड़ दी।

वह रात की ड्यूटी कर रहा था। लगभग बारह बजकर पाँच मिनट पर उसे पिछले गलियारे में किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

वह टॉर्च लेकर उस तरफ गया।

मुर्दाघर का दरवाजा बंद था, लेकिन उसके सामने एक आदमी खड़ा था। उस आदमी ने अस्पताल के पुराने कर्मचारियों वाली वर्दी पहन रखी थी। उसका चेहरा चौकीदार की तरफ नहीं था।

चौकीदार ने आवाज लगाई, "कौन है वहाँ?"

आदमी धीरे धीरे पलटा।

वह रमाकांत था।

चौकीदार उसे पहचानता था, लेकिन उसके चेहरे पर नजर पड़ते ही उसके हाथ से टॉर्च गिर गई। रमाकांत की आँखें पूरी तरह काली थीं। उसकी त्वचा पर जगह जगह सड़ने के निशान थे और उसके मुँह से काला तरल टपक रहा था।

उसने चौकीदार को देखकर मुस्कराते हुए कहा, "दरवाजा खोल दो। बहुत ठंड लग रही है।"

चौकीदार पीछे हटने लगा।

"तुम तो अस्पताल छोड़कर चले गए थे।"

रमाकांत ने अपना सिर टेढ़ा किया।

"मैं कहाँ जा सकता हूँ? मेरी जगह तो यहीं है।"

इतना कहकर उसने मुर्दाघर के दरवाजे पर हाथ रखा।

लोहे का दरवाजा बिना किसी आवाज के खुल गया।

चौकीदार ने टॉर्च उठाई और रोशनी अंदर डाली। अंदर उसे कई लाशें दिखाई दीं। सभी लाशें अपनी ट्रॉलियों पर सीधी पड़ी थीं। लेकिन सबसे आखिरी ट्रॉली पर एक आदमी बैठा था।

उसने सिर उठाकर चौकीदार को देखा।

वह महेश था।

उसके चेहरे पर वही अजीब मुस्कान थी।

महेश ने अपना हाथ उठाया और चौकीदार को अंदर आने का इशारा किया।

फिर उसके पीछे रखी दूसरी ट्रॉली पर एक और लाश बैठ गई।

उसके बाद तीसरी।

फिर चौथी।

कुछ ही पलों में मुर्दाघर की सारी लाशें एक साथ बैठ गईं। उनकी आँखें खुली हुई थीं और सभी के चेहरे दरवाजे की तरफ थे।

चौकीदार चीखता हुआ वहाँ से भागा। उसने उसी रात अस्पताल छोड़ दिया और फिर कभी वापस नहीं लौटा।

कुछ दिनों बाद अस्पताल को पूरी तरह बंद कर दिया गया। सरकारी जाँच में कई मरीजों के गायब होने का मामला सामने आया, लेकिन किसी को भी इसका कारण पता नहीं चला। मुर्दाघर को लोहे की मोटी चादरों से बंद कर दिया गया और अस्पताल की इमारत को खाली छोड़ दिया गया।

लोगों ने सोचा कि अब सब कुछ खत्म हो चुका है।

लेकिन असली रहस्य तो अभी बाकी था।

अस्पताल बंद होने के लगभग छह महीने बाद शहर के दूसरे हिस्से में एक नए निजी अस्पताल का निर्माण शुरू हुआ। पुराने अस्पताल से कई सामान वहाँ लाए गए। उनमें कुछ लोहे की ट्रॉलियाँ और एक पुरानी लकड़ी की मेज भी थी, जिन्हें कबाड़ समझकर सस्ते में खरीद लिया गया था।

नए अस्पताल के कर्मचारियों ने शुरुआत में किसी अजीब घटना पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन अस्पताल खुलने के कुछ दिनों बाद रात की ड्यूटी करने वाले एक कर्मचारी ने शिकायत की कि बेसमेंट से हर रात किसी के चलने की आवाज आती है।

पहले किसी ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया।

फिर एक रात बेसमेंट में लगे पुराने निगरानी कक्ष के बाहर तैनात कर्मचारी ने देखा कि वहाँ रखा एक खाली स्ट्रेचर अपने आप आगे बढ़ रहा था। उस पर कोई मरीज नहीं था, फिर भी उसके पहिए धीरे धीरे घूम