MTNL की घंटी - 37 kalpita द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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MTNL की घंटी - 37

 अभी वो कॉरिडोर की तरफ बढ़ ही रहा था कि बाबा की पत्नी ने अचानक सामने आकर रोक लिया।तेज़ आवाज़ में बोली –“मेरे पति को जलेबी किसने खिलाई थी? कौन था वो?”उसके लहजे में गुस्सा कम और शक ज़्यादा था।डॉक्टर प्रकाश मुस्कुराने की कोशिश करता हुआ बोला –“अच्छा... चलो, मैं मिलवा देता हूँ आपको उससे, जिसने बाबा को जलेबी खिलाई थी।”मन ही मन सोचते हुए  उसके माथे पर पसीना छलक आया।सोचने लगा – “अब अनन्या को सुनना ही पड़ेगा... तभी समझेगी कि ड्यूटी पर भावुकता दिखाने का अंजाम क्या होता है।”प्रकाश उन्हे ले कर डीन के कमरे की तरफ मुड़ गया। रुद्र भी पीछे पीछे चलने लगा।डीन के कमरे मे जाते ही अनन्या और डीन बूढ़ी औरत को देख कर चुप हो गये।प्रकाश ने बड़ी कड़वाहट के साथ कहा की अम्मा यह डॉक्टर अनन्या है इसी ने ही बाबा को जलेबी खिलाई थी। बाबा की पत्नी की आँखें नम हो रही थीं। उसने अनन्या की तरफ देखा और धीरे से कहा –“बेटी… तूने मेरे बूढ़े को जलेबी खिलाई थी न?" जी'.बस इतना ही बोल पायी अनन्या।अगर अम्मा गुस्सा भी करेगी तो वो सह लेगी और माफी मांग लेगी।अम्मा बड़े प्यार से बोली:-पता है, उसने बरसों से मीठा नहीं खाया था…उसकी लाश लेने आई थी ,उसके चेहरे को ध्यान से देखा ,आज कितने सालो बार उसके चेहरे पर वो मासूम मुस्कान देखी।”अनन्या सकपका गई, कुछ बोल न पाई।बाबा की पत्नी ने उसका हाथ पकड़ लिया और आशीर्वाद देते हुए बोली –“तेरा हाथ कभी रुके नहीं, भगवान तुझे हर जगह सम्मान दे। तू तो हमारी बेटी जैसी है। अगर मेरे पति के आख़िरी दिन में तूने उन्हें इतनी खुशी दे दी  … तो  समझ ले तूने तेरा इंसान होने का      धर्म निभा दिया।”सबकी आँखें भर आईं।अब जो मन ही मन सोच रहा था कि “अनन्या को सुनना पड़ेगा”, वो चुपचाप खड़ा रह गया।शायद   उसे एहसास हुआ होगा कि भावुकता कभी-कभी ड्यूटी से भी ज़्यादा बड़ी सेवा बन जाती है।आँखों में आँसू चमकते हुए बाबा की पत्नी ने रुँधी आवाज़ में कहा –“वो सिर्फ़ कलु हलवाई की जलेबी नहीं थी… वो तो हमारी पूरी ज़िन्दगी की यादें थीं।वो बूढ़ा जब बच्चा था तो उसके बाप के पास इतने पैसे नही होते थे की टॉफी, चॉकलेट या बर्फी खिला दे...वो दो जलेबी उसे स्कूल से लाते समय ले देते थे।बाल मन तभी तृप्त हो जाता था।बड़ा हुआ तो मीठे के नाम पर जलेबी ही सब कुछ थी।आज भी याद है मुझे… हमारी सुहागरात पर, बड़े संकोच से उन्होंने अख़बार में लपेटी हुई जलेबी मेरे हाथ में दी थी।शरमाते हुए बोले थे – ‘ये तुम्हारे लिए लाया हूँ।’उस की शर्म,उसकी झिझक उसका भोलापन सब उस जलेबी मे था। उस जलेबी के साथ हमारी बातें शुरू हुईं… और फिर एक उम्र का सफ़र निकल गया। जलेबी जैसा..गोल गोल पर मिठास भरा।अम्मा जैसे सब को साथ ले कर पुराने दिनों मे चली गयी हो।जब बच्चे हुए, जब पोते–पोतियाँ आए… हर खुशी, हर जश्न में मिठाई के नाम पर हमेशा जलेबी ही आई।वो जलेबी… हमारी मोहब्बत के साथ साथ स्नेह का भी प्रतीक बन गई।”उनकी आवाज़ कांप रही थी, पर चेहरा गर्व और अपनापन से दमक रहा था।फिर अनन्या की तरफ देखते हुए उन्होंने उसका हाथ थाम लिया –“बेटी, तूने उन्हें वही खुशी लौटा दी, जो शायद इस जन्म मे अधूरी रह जाती । भगवान तेरा भला करे।”बाबा की पत्नी की आँखों से आँसू बह रहे थे, पर होंठों पर हल्की मुस्कान भी थी।धीरे-धीरे बोली –“वो सिर्फ़ एक जलेबी नहीं थी… वो हमारी पूरी ज़िंदगी का सफ़र थी।सब कहते थे – मीठा मत खाना, तबियत बिगड़ जाएगी।मैं भी उनके लिए सख़्त हो गई थी, पर मन ही मन सोचती थी – कैसे रहेंगे वो बिना जलेबी के…?पर देखो… अंतिम समय पर उन्होंने न पैसा माँगा, न परिवार को पुकारा…सिर्फ़ एक जलेबी का टुकड़ा माँगा।वो टुकड़ा नहीं था… वो उनकी पूरी जीवन भर की यादें थीं।हर खुशी, हर जश्न, हर रिश्ता उसी जलेबी से जुड़ा हुआ था।आज… वो तृप्त होकर चले गए हैं।”बाबा का शरीर शांत पड़ा था, लेकिन उनकी पत्नी के चेहरे पर एक अजीब-सी संतुष्टि झलक रही थी।जैसे वो जान गई हो कि अपने जीवनसाथी की आख़िरी ख्वाहिश पूरी करके एक भले डॉक्टर ने उनका अधूरा सफ़र मुकम्मल कर दिया हो।डॉक्टर अनन्या,डीन , डॉक्टर  रुद्र सबकी ऑंखे भर आई।डॉक्टर प्रकाश की आँखों में भी नमी उतर आई।–-----------------सच है… इंसान पूरी ज़िंदगी अपनी पसंद से जीता है।पर अचानक एक दिन उसे कहा जाता है – ये मत करो, यहां मत जाओ, ये मत खाओ, ये मत पियो…वो मान भी लेता है, क्योंकि उसे ज़िंदगी चाहिए… ताकि अपनों की ज़िम्मेदारी निभा सके।पर irony देखिए… जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी, वो अपनी इच्छा दबा देता है,सिर्फ़ इसलिए कि कहीं उसकी वजह से परिवार परेशान न हो जाए।ये कैसी विडंबना है… कि आख़िरी साँसों में भी इंसान दूसरों के लिए अपनी चाहत छोड़ देता है।”शायद यही वजह है कि उस आख़िरी जलेबी में उन्होंने पूरी उम्र का स्वाद पा लिया।और शायद… इंसानियत भी यही है – किसी की आख़िरी ख़्वाहिश पूरी कर देना।”कितनी अजीब बात थी… कमरे में मौजूद हर किसी को अनन्या की बात बिल्कुल सही और तर्कसंगत लगी।सिर हिलाकर सबने उसकी हामी भी भर दी,लेकिन जाने क्यों डॉक्टर प्रकाश के दिल में एक हल्की-सी चुभन उतर आयी।उन्होंने गर्दन मोड़कर तिरछी नज़र से अनन्या की ओर देखा और होंठों पर मुस्कान ला दी।पर वह मुस्कान उतनी सहज नहीं थी—जैसे किसी अनकहे दर्द पर लगाई हुई पट्टी।अनन्या ने ध्यान से देखा,उनकी आँखें और होंठ जैसे दो अलग-अलग भाषा बोल रहे थे।आँखों में अब भी कटुता की हल्की परछाई थी,जबकि मुस्कान दुनिया को दिखाने के लिए थी।इतना तो अनन्या समझ ही गयी थी कि डॉक्टर प्रकाश की “ego” अभी तक उसके शब्दों को स्वीकार नहीं कर पाई है।बाहरी सहमति के पीछे भीतर का अस्वीकार अब भी जस का तस खड़ा था।अम्मा का बेटा बुलाने आ गया कागज तैयार थे बाबा को घर ले जाने का समय हो गया था।नम आँखों से सबने विदाई दी।सब अपनी अपनी ड्यूटी पर वापिस चले गये।डॉक्टर प्रकाश ऑंखे मुंद कर सामने बेंच पर बैठ गये जैसे किसी तूफान को समेंट रहे हो।डॉक्टर प्रकाश क्या अनन्या को माफ़ कर देंगे?या अंदर ही अंदर कोई साजिश चल रही उसके खिलाफ?.........to be continued 

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