यात्राएँ कभी-कभी जीवन को देखने की दृष्टि बदल देती हैं।
मेरी यह यात्रा भी आरंभ में ऐसी नहीं थी। यह तो बस एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने की साधारण-सी यात्रा थी।
इस मार्ग से मेरा परिचय नया नहीं था। बचपन से लेकर आज तक मेरी सबसे अधिक यात्राएँ इसी रास्ते की बसों में बीती थीं। यहाँ के दृश्य मेरे लिए परिचित थे—भीड़, प्रतीक्षा, धक्का-मुक्की और सीट पाने की व्याकुलता भी। इसलिए उस दिन की यात्रा में कुछ असाधारण होने की मैंने कोई अपेक्षा नहीं की थी।
पर कभी-कभी सबसे परिचित रास्ते ही हमें सबसे अप्रत्याशित अनुभव दे जाते हैं।
उस दिन भी बस हमेशा की तरह यात्रियों से भरी हुई थी। कुछ लोग सीटों पर बैठे थे, कुछ गलियारे में खड़े थे और कुछ अपने सामान को संभालते हुए जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे। खिड़कियों से आती हवा धूल और खेतों की मिली-जुली गंध अपने साथ ला रही थी। बस हर छोटे-बड़े पड़ाव पर रुकती, कुछ यात्री उतरते और उससे अधिक चढ़ जाते।
मैं अपनी सीट पर बैठी बाहर के परिचित दृश्यों को देख रही थी। खेत, पेड़, कच्चे रास्ते और बीच-बीच में दिखाई देते छोटे-छोटे घर—सब कुछ वैसा ही था जैसा अनगिनत यात्राओं में पहले भी देखा था।
इस मार्ग की बसों में सीट मिलना संयोग कम और युक्ति अधिक हुआ करता था। मैं भी उससे अलग नहीं थी। कई बार केवल बैठकर सफ़र करने के लिए लगभग चार किलोमीटर दूर बस-अड्डे तक ऑटो से जाती, जबकि वही बस कुछ देर बाद मेरे घर के पास वाले स्टॉप पर भी रुकती और सवारियाँ बिठाती थी। अतिरिक्त समय और अतिरिक्त किराया—दोनों खर्च होते थे, पर बदले में बैठने की सुविधा मिल जाती थी। तब यह मुझे बिल्कुल स्वाभाविक लगता था।
उस दिन भी मैंने यही युक्ति अपनाई थी।
यात्रा सामान्य गति से चल रही थी कि तभी एक पड़ाव पर बस रुकी और कुछ नए यात्री उसमें सवार हुए। उन्हीं यात्रियों के साथ इस यात्रा की दिशा भी अनायास बदलने वाली थी।
बस आगे बढ़ती रही। रास्ते में पड़ने वाले गाँवों पर यात्री उतरते और चढ़ते रहे। जैसे ही कोई सीट खाली होती, अगले ही क्षण कोई न कोई लपककर उस पर बैठ जाता। यह दृश्य इस मार्ग की बसों में इतना सामान्य था कि शायद ही किसी का ध्यान उसकी ओर जाता हो।
मेरा भी नहीं जाता, यदि उस दिन बस में एक व्यक्ति ऐसा न होता जो इस पूरी हलचल से मानो अप्रभावित था।
वह गलियारे तक भरी हुई बस में चढ़ा और द्वार के पास ही खड़ा हो गया। न आगे बढ़कर सीट खोजने की कोई कोशिश, न ही खड़े होने के लिए किसी बेहतर जगह की तलाश।
जब भी बस में ब्रेक लगता और यात्री चढ़ते-उतरते, अनायास ही ध्यान द्वार की ओर चला जाता। शायद इसी कारण वह बार-बार नज़र में आ जाता था। कई बार सीटें खाली हुईं, कई बार उसके बैठने की संभावना भी बनी; पर उसकी दृष्टि कभी उस ओर गई हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। माना कि सफ़र बहुत लंबा नहीं था, पर बस में खड़े लगभग सभी लोग किसी न किसी क्षण बैठने का अवसर तलाश ही रहे थे। ऐसे में उसका इस सारी उठापटक से अप्रभावित रहना मुझे भीतर तक उलझाने लगा था।
ऐसा लगता था जैसे गलियारे में खड़े अधिकांश यात्री अपने शरीर का भार अपने पैरों पर नहीं, बल्कि आसपास की सीटों और खंभों पर लादे हुए खड़े थे। फिर भी उनकी दृष्टि हर खाली होती सीट की तलाश में भटक रही थी।
और एक वह था।
वह केवल ऊपर लगी रॉड को पकड़े पूरी गरिमा के साथ खड़ा था। द्वार के पास खड़े होने पर भी किसी क्षण ऐसा नहीं लगा कि वह किसी के मार्ग में बाधा हो।
उसे देखकर कभी नहीं लगा कि उसका अपना ही शरीर उसके लिए बोझ हो।
अब मेरे लिए उस पर से नज़रें हटाना कठिन हो गया था।
उसके इस व्यवहार को समझने की उत्सुकता में न जाने कब मैंने उसे पढ़ना शुरू कर दिया था।
उसका पहनावा साधारण था—सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, कुछ पुराना-सा, पर एकदम स्वच्छ। पाँव में पुराने ज़माने की-सी लगने वाली काली जूतियाँ। उसके पहनावे में कोई दिखावा नहीं था; वही सादगी उसके खड़े रहने के ढंग में भी दिखाई देती थी। उसके पूरी तरह पके हुए बाल उसकी उम्र छिपाने का कोई प्रयास नहीं कर रहे थे।
उम्र की गहरी रेखाएँ उसके चेहरे से हाथों तक उतर आई थीं। हाथों की नसें उभरी हुई थीं। झुर्रियाँ ऐसी प्रतीत होती थीं मानो वर्षों की धूप और वर्षा ने मिलकर उन्हें उकेरा हो। फिर भी चेहरे पर शिकायत, निराशा या क्रोध का कोई चिह्न नहीं था।
रॉड पर उसकी पकड़ आश्चर्यजनक रूप से दृढ़ थी। बस झटके खाती, अचानक ब्रेक लगाती, तीखे मोड़ काटती, पर उसकी पकड़ और संतुलन में कोई अंतर नहीं आता था।
उसे देखते-देखते अनायास ही मन में प्रश्न उमड़ने लगे।
एक गतिशील बस में उसकी गति दिखाई क्यों नहीं देती? वह इतना सहज कैसे है? उसके खड़े रहने में जरा भी प्रयास क्यों नहीं दिखता, जबकि मैं आराम से बैठने के बाद भी अपनी यात्रा को ढो रही थी।
ऐसा लगता था मानो समय उसके शरीर पर अपने पूरे प्रभाव के साथ अंकित था, पर जीवन अब भी उसकी मुट्ठी में था।
यात्रा अपने समापन के निकट थी। बस कुछ क्षणों के लिए एक पड़ाव पर रुकी। वह उतरा और भीड़ में गुम हो गया।
मैं भी कुछ ही देर बाद अपने गंतव्य पर उतर गई।
पर उस दिन बस से मैं अकेली नहीं उतरी थी।
वह हिमालय बनकर मेरे मन में ठहर गया था।