लेखक की कलम से-
एक बच्चे की सहज मुस्कान से शुरू होकर वयस्क जीवन के अदृश्य बोझों तक पहुँचता यह ललित निबंध सहजता, स्वीकृति और मानवीय जुड़ाव पर चिंतन करता है।
अदृश्य भार और एक मुस्कान
क्या कभी ऐसा हुआ है आपके साथ?
किसी सार्वजनिक स्थान पर प्रतीक्षा करते हुए अचानक आपकी नज़र एक छोटे बच्चे से मिल जाए। वह अपनी माँ की गोद से झाँककर चमकती आँखों से आपको देख रहा हो, मानो आप दोनों के बीच कोई अनकहा परिचय पहले से मौजूद हो। आप मुस्कुरा दें और वह खिल उठे। फिर बिना किसी भाषा, बिना किसी परिचय और बिना किसी प्रयोजन के एक छोटा-सा खेल शुरू हो जाए।
कभी वह छिप जाए, कभी आपको खोजने लगे। हर बार आपको ढूँढ़ लेने पर उसके चेहरे पर ऐसी खुशी फैल जाए मानो उसने कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो। कुछ क्षणों के लिए आप भी उस खेल का हिस्सा बन जाते हैं।
फिर जैसे यह सब अचानक शुरू हुआ था, वैसे ही समाप्त भी हो जाता है। बच्चा अपनी माँ के साथ आगे बढ़ जाता है और जीवन अपनी सामान्य गति से चल पड़ता है।
लेकिन उसके जाने के बाद भी मन कुछ देर तक वैसा नहीं रहता। एक हल्की-सी मुस्कान भीतर ठहरी रहती है, जैसे कोई अनकहा सुकून मन को छूकर गुज़रा हो। आश्चर्य यह होता है कि वह मुलाक़ात बहुत छोटी थी, फिर भी उसकी गर्माहट अपेक्षा से कहीं अधिक देर तक भीतर बनी रहती है।
आख़िर ऐसा क्यों होता है?
क्या केवल एक बच्चे की हँसी में इतना प्रभाव होता है?
शायद नहीं।
शायद उस क्षण में कुछ ऐसा होता है जिसकी कमी हमें अपने दैनिक जीवन में लगातार खलती रहती है, भले ही हम उसे स्पष्ट रूप से पहचान न पाते हों।
वयस्क होते-होते जीवन केवल जिम्मेदारियों से नहीं भरता, वह प्रस्तुतियों से भी भर जाता है।
हम चाहते हैं कि लोग हमें समझें, स्वीकारें, सराहें और सही ठहराएँ।
हम अपने बारे में एक छवि बनाते हैं और फिर उसे सँभालने में लग जाते हैं। हर जगह अनजाने में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे होते हैं—अपनी समझ, अपनी सफलता, अपने संस्कार, अपने विचार, अपनी उपयोगिता और कभी-कभी तो अपनी खुशी तक को।
शायद इसी कारण हम केवल जीते नहीं, लगातार स्वयं को सिद्ध भी करते रहते हैं। धीरे-धीरे यह प्रयास इतना स्वाभाविक लगने लगता है कि हमें उसके बोझ का अहसास भी नहीं होता।
जैसे लोग हमें परखते हैं, उसी तरह हम भी लगातार दूसरों को पढ़ने, परखने और उनके बारे में निष्कर्ष बनाने में लगे रहते हैं।
इस तरह हम अपने भीतर एक सामाजिक छवि लेकर चलते हैं और दूसरों की छवियाँ भी गढ़ते चलते हैं। इसी सतर्कता में सहजता धीरे-धीरे धुँधली पड़ने लगती है।
ऐसे में जब किसी बच्चे से मुलाक़ात होती है, तो कुछ अलग घटित होता है।
उसे आपके परिचय से कोई सरोकार नहीं होता। वह आपको आपकी पहचान, उपलब्धियों या विचारों के माध्यम से नहीं देखता। वह केवल आपकी उपस्थिति को पहचानता है और उसी सहजता से आपसे जुड़ जाता है, जिस सहजता से एक मुस्कान दूसरी मुस्कान तक पहुँच जाती है।
शायद इसी सहज जुड़ाव में उन क्षणों का सारा सुकून छिपा होता है। कुछ देर के लिए हम उन अदृश्य बोझों से मुक्त हो जाते हैं जिन्हें ढोते-ढोते हमने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मान लिया है।
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कितना दुर्लभ है वह क्षण,
जब मुझे स्वयं को प्रस्तुत न करना पड़े,
और मेरा होना ही पर्याप्त हो।
— शिल्पी
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