सुबह के साढ़े सात बजे थे। रीना ने अदरक वाली चाय बनाकर रवि को थमाई और बहुत हिम्मत जुटाकर बोली, "सुनो, मुझे एक छोटी सी अलमारी चाहिए। मेरा कॉस्मेटिक का सामान, क्रीम-पाउडर, पर्स सब बेड पर इधर-उधर बिखरे रहते हैं। एक छोटी सी दराज वाली अलमारी आ जाएगी तो सब संभल जाएगा।"
रवि ने अखबार से नजर हटाए बिना ही जवाब दिया, "कोई अलमारी-वलमारी नहीं आएगी। पैसे क्या पेड़ पर उग रहे हैं? तुम तो बस खर्चा करना जानती हो, पैसा कमाने की तो कभी सोचती नहीं। जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो।"
कहकर वह जूते पहनकर ऑफिस चला गया। दरवाजे के बंद होने की आवाज रीना के सीने में जाकर लगी।
वह चुपचाप सिंक के पास आई और रात के जूठे बर्तन मांजने लगी। नल से पानी बह रहा था और उसकी आंखों से आंसू। मन में एक पुराना हिसाब चलने लगा।
"हम इतने गरीब भी नहीं हैं, जितना मुझे बनाकर रखा गया है। खुद के लिए तो इनके पास सब कुछ है। महंगा परफ्यूम, हेयर जेल, डियो, पाउडर। पिछले महीने ही पांच हजार की शर्ट ली थी। पांचों उंगलियों में महंगी अंगूठियां चमक रही हैं। दोस्तों के साथ होटल में हजारों उड़ा देंगे। लेकिन मेरे लिए एक दो हजार की छोटी अलमारी पैसे की बर्बादी है।"
झाग वाले हाथों से उसने माथे का पसीना पोंछा।
"यह मेरा घर है भी या नहीं? अपनी मर्जी से एक कोना भी नहीं सजा सकती। बाजार जाकर अपनी पसंद की एक साड़ी नहीं खरीद सकती। हर चीज के लिए इजाजत, हर खर्चे का हिसाब। मैं पत्नी हूं या बिना वेतन की नौकरानी? जब इनका मूड अच्छा होता है तो दो मीठे बोल बोल देते हैं, और जब खराब होता है तो घर को कुरुक्षेत्र बना देते हैं। मेरा अपना कोई वजूद, कोई सम्मान ही नहीं बचा।"
रीना पहले नौकरी करती थी। तब वह खुद को आत्मनिर्भर समझती थी। पर सच यह था कि तब भी वह आजाद नहीं थी। वेतन खाते में आता था, पर खर्च करने से पहले पति से पूछना पड़ता था। अपनी मां को सौ रुपये देने के लिए भी उसे दस बार सोचना पड़ता था।
कॉलेज के दिनों में वह कितने क्रांतिकारी विचारों वाली थी। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाली, लड़कियों के हक की बात करने वाली। आज वह खुद उस अन्याय को चुपचाप सह रही थी।
कई बार मन में आता है, छोड़ दूं सब कुछ। अकेली भी अपने बच्चे को पाल सकती हूं। मुझमें हिम्मत भी है, काबिलियत भी। फिर क्यों सह रही हूं?
और तभी समाज का डर उसके पैरों में बेड़ियां डाल देता है।
वह जानती है, इस सामाजिक व्यवस्था में 'शादीशुदा' होना भी एक सुरक्षा कवच है। एक विधवा का दर्द समाज बड़ी सहानुभूति से देखता है। लेकिन एक तलाकशुदा औरत? उसका दर्द सबसे बड़ा होता है। न मायके में उसे इज्जत मिलती है, न समाज में। हर कोई उसे शक की नजर से देखता है। हर रिश्तेदार उसे बोझ समझता है।
और सबसे बड़ी बात, बच्चे को मां-बाप दोनों का प्यार मिलना जरूरी है। मैं अपनी आजादी और आत्मसम्मान के लिए अपने बच्चे से उसके पापा को तो अलग नहीं कर सकती। एक मां होने के नाते यह स्वार्थ वह नहीं कर सकती।
"चलो, बर्तन भी साफ हो गए," उसने खुद से कहा और हाथ धोए।
वह कमरे में आई और बिखरे हुए पर्स, कंघी और क्रीम की डिब्बियों को समेटकर फिर से बिस्तर के कोने में रख दिया। थोड़ी देर के लिए फोन उठाया, ताकि मन बहल जाए।
अलमारी की वह छोटी सी ख्वाहिश मन के किसी अंधेरे कोने में जाकर दफन हो गई, जैसे उसकी न जाने कितनी और ख्वाहिशें, कितने सपने पहले ही दफन हो चुके थे।
उसने लंबी सांस ली और बुदबुदाई, "जैसी चल रही है जिंदगी, चलने देते हैं।"
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली