हुक्म और हसरत - 36 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत - 36

🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia
एपिसोड 36 — एक रहस्यमयी चेहरा 

रायगढ़ में सुबह बाकी दिनों जैसी ही थी।

महल के बाहर लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी और दफ़्तर में भी कर्मचारी अपने-अपने काम में लग चुके थे।

लेकिन आज सिया के सामने काम की फाइलों से कहीं ज्यादा दिलचस्प एक और चीज़ थी।

शाम को होने वाला बिज़नेस अवॉर्ड समारोह।

सिया अपने कमरे में तैयार हो रही थी, तभी काव्या तेजी से अंदर आई।

“राजकुमारी! आप तैयार हैं?”

सिया ने आईने में खुद को देखते हुए कहा,
“हां… बस यही सोच रही हूं कि वहां जाकर मुझे करना क्या है?”

काव्या ने आंखें घुमाईं।

“आपको कुछ करना नहीं है। बस मुस्कुराना है, लोगों से मिलना है और बहुत ज्यादा गंभीर बनने की कोशिश नहीं करनी है।”

सिया हंस पड़ी।

“और अगर मैं गंभीर हो गई तो?”

“तो अर्जुन सर वैसे भी आपके साथ हैं।”

सिया ने तुरंत पलटकर देखा।

“खड़ूस भी जा रहे हैं?”

काव्या मुस्कुराई।

“जी हां। और उन्होंने पहले ही साफ कह दिया है कि आपको वहां अकेले घूमने की इजाजत नहीं होगी।”

सिया ने हल्का सा मुंह बनाया।

“वो मुझे राजकुमारी समझते हैं या कोई सरकारी दस्तावेज़?”

“दोनों में फर्क क्या है?”

सिया हंसते हुए अपना दुपट्टा ठीक करने लगी।

कुछ ही देर बाद वह नीचे पहुंची।

अर्जुन पहले से वहां मौजूद था।

काले रंग का सूट, बिल्कुल सीधा खड़ा हुआ शरीर और हमेशा की तरह चेहरे पर वही गंभीरता।

सिया उसके पास आकर रुकी।

“खड़ूस जी…”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“जी, राजकुमारी?”

“आज भी इतने गंभीर?”

“मैं अपना काम कर रहा हूं।”

“आज तो अवॉर्ड समारोह है। यहां भी काम?”

“आपकी सुरक्षा मेरा काम है।”

सिया ने आंखें सिकोड़कर उसे देखा।

“आप कभी थोड़ा मुस्कुरा भी लिया कीजिए।”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस गाड़ी की तरफ बढ़ते हुए कहा,

“समय हो गया है, राजकुमारी।”

सिया उसके पीछे चल पड़ी।

“आपसे बात करना सच में मुश्किल है।”

अर्जुन ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।

“फिर भी आप कोशिश करती रहती हैं।”

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर मुस्कुराकर बोली,

“क्योंकि आप खड़ूस हैं।”

अर्जुन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

लेकिन उसके कदम एक पल के लिए जरूर धीमे हुए।

---

शाम तक पूरा शहर रोशनी से जगमगा उठा था।

बिज़नेस अवॉर्ड समारोह का आयोजन शहर के सबसे बड़े सभागार में किया गया था।

बाहर बड़ी-बड़ी गाड़ियां रुक रही थीं।

देश के अलग-अलग हिस्सों से आए उद्योगपति, व्यापारी और बड़े कारोबारी एक-एक करके अंदर जा रहे थे।

सिया जैसे ही वहां पहुंची, कई लोगों ने उसे पहचान लिया।

“राजकुमारी सिया!”

“रायगढ़ परिवार की बेटी…”

“इन्होंने हाल ही में शहर के विकास से जुड़े कई फैसले लिए हैं।”

सिया मुस्कुराते हुए सबसे मिलती रही।

अर्जुन उससे कुछ दूरी पर खड़ा हर तरफ नजर रख रहा था।

काव्या भी उनके साथ थी।

तभी काव्या की नजर सभागार के अंदर लगी एक बड़ी स्क्रीन पर गई।

स्क्रीन पर कुछ देर बाद एक नाम दिखाई दिया।

Mr. S.

बस इतना ही।

न कोई पूरा नाम।

न कोई तस्वीर।

न कंपनी का परिचय।

सिया ने भी स्क्रीन की तरफ देखा।

“ये कौन हैं?”

काव्या ने तुरंत कहा,

“आपने Mr. S. के बारे में नहीं सुना?”

सिया ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

काव्या ने उत्साहित होकर कहा,

“बहुत बड़े कारोबारी हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि कोई भी इनके बारे में ज्यादा नहीं जानता।”

सिया की उत्सुकता बढ़ गई।

“मतलब?”

“मतलब ये कि वो सार्वजनिक जगहों पर बहुत कम दिखाई देते हैं। अपनी पहचान हमेशा छुपाकर रखते हैं।”

सिया ने हैरानी से पूछा,

“इतना बड़ा कारोबारी और फिर भी अपनी पहचान छुपाता है?”

काव्या ने कंधे उचकाए।

“शायद उन्हें प्रसिद्धि पसंद नहीं।”

पीछे खड़ा अर्जुन सब सुन रहा था।

लेकिन उसके चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया।

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“खड़ूस, आपको पता है इनके बारे में?”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा,

“जो जानना जरूरी हो, उतना पता है।”

“और जो जरूरी नहीं?”

“उसकी जरूरत नहीं।”

सिया ने मुंह बनाया।

“आपसे बात करना बेकार है।”

अर्जुन ने सीधे सामने देखते हुए कहा,

“फिर भी आप बात करती हैं।”

काव्या हंसी रोकने लगी।

सिया ने उसे घूरा।

“तुम भी मत हंसो।”

---

कुछ देर बाद मंच पर पुरस्कारों की घोषणा शुरू हुई।

एक-एक करके बड़े नाम पुकारे जा रहे थे।

तालियों की आवाज पूरे सभागार में गूंज रही थी।

फिर अचानक मंच की रोशनी थोड़ी धीमी हुई।

स्क्रीन पर वही नाम दोबारा दिखाई दिया।

Mr. S.

पूरे सभागार में हलचल मच गई।

सिया भी ध्यान से मंच की तरफ देखने लगी।

लेकिन मंच पर Mr. S. खुद नहीं आए।

उनकी जगह एक व्यक्ति काले सूट में मंच पर पहुंचा।

उसने पुरस्कार ग्रहण किया।

फिर माइक के सामने खड़े होकर कहा,

“Mr. S. आज स्वयं यहां उपस्थित नहीं हो सके हैं। लेकिन उन्होंने सभी के लिए एक संदेश भेजा है।”

काव्या ने सिया के कान के पास झुककर कहा,

“अब मजा आएगा।”

सिया मुस्कुरा दी।

अगले ही पल सभागार की सारी लाइटें धीमी हो गईं।

और स्पीकर से एक आवाज गूंजी।

गहरी…

गंभीर…

और इतनी प्रभावशाली कि कुछ ही शब्दों में पूरा सभागार शांत हो गया।

“यह सम्मान केवल मेरा नहीं है।”

सिया के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

उसने ध्यान से आवाज सुनी।

“यह उन लोगों का भी है, जिन्होंने मेरे साथ इस सफर में मेरा साथ दिया।”

सिया की भौंहें हल्की सिकुड़ गईं।

उस आवाज में कुछ था।

कुछ जाना-पहचाना।

लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या।

आवाज आगे बोली,

“कामयाबी तब पूरी होती है, जब उसका फायदा सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं… बल्कि उससे जुड़े लोगों को भी मिले।”

तालियां गूंज उठीं।

लेकिन सिया अब तालियां नहीं बजा रही थी।

वह बस उस आवाज को सुन रही थी।

उसे लग रहा था जैसे उसने यह आवाज कहीं पहले सुनी है।

बहुत करीब से।

लेकिन कहां?

उसकी नजर अनजाने में अर्जुन की तरफ उठी।

अर्जुन बिल्कुल शांत खड़ा था।

चेहरे पर वही भावहीनता।

जैसे इस आवाज से उसका कोई लेना-देना ही न हो।

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर उसने धीरे से पूछा,

“खड़ूस…”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“जी, राजकुमारी?”

सिया ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला…

लेकिन फिर रुक गई।

“कुछ नहीं।”

अर्जुन ने बस सिर हिलाया।

“ठीक है।”

सिया दोबारा मंच की तरफ देखने लगी।

उसके मन में सिर्फ एक सवाल था—

आखिर मैंने ये आवाज पहले कहां सुनी है?

और शायद उसे अभी यह पता नहीं था…

कि आज की रात सिर्फ एक पुरस्कार समारोह नहीं थी।

बल्कि एक ऐसे रहस्य की शुरुआत थी…

जिसकी परछाई बहुत दूर तक जाने वाली थी।

पडते रहिए… “हुक्म और हसरत”। ❤️

जारी रहेगा... 💗✨
© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

Follow me for the next episode…

✨ मेरी रचनाएँ ✨

 1. अनुबंध (Anubandh) — ✅ Completed

 2. वो जो चुपके से देखा करता था — ✅ Completed

3. अनचाही मोहब्बत (Anchahi Mohabbat) — ✅ Completed

4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️ 
Running... 🌸