हुक्म और हसरत - 7 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत - 7

🌷🌷🌷✨हुक्म और हसरत 🌷🌷🌷✨

 

सुबह

सिया दर्पण के सामने अपने बाल समेट रही थी।

 

पीठ पर लंबे खुले बाल, आँखों में नींद की नमी और होंठों पर एक छोटी सी मुस्कान…

 

रोशनी ने मज़ाक किया —

“दीदी, आज आप सपना देखकर मुस्कुरा रही थीं।"

 

"के..क्या?"सिया ने चौंकते हुए कहा,

“कुछ... याद नहीं।”

 

मगर उसका चेहरा कुछ और कह रहा था —

उसने किसी को छुआ था… किसी को महसूस किया था। शायद अर्जुन को…

 

सिया तकिए पर सिर रख चुकी थी, मगर नींद उससे कोसों दूर थी।

 

धीरे-धीरे आँखें बंद हुईं…

 

...और सपना शुरू हुआ।

 

घना जंगल, बारिश की फुहारें, और एक छोटा सा मंदिर।

सिया अकेली खड़ी थी — ठंडी हवा में कांपती हुई।पीछे से अर्जुन आया— गीले कपड़ों में, आँखों में पिघली आग लिए।

उसने सिया का चेहरा थामा…

 

लबों को लबों पे सजाओ

क्या हो तुम, मुझे अब बताओ

 

लबों को लबों पे सजाओ..

क्या हो तुम, मुझे अब बताओ

धीरे से उसकी पलकों पर उंगलियाँ फिराईं… फिर उसकी पीठ पर हाथ रखकर उसे पास खींच लिया।

 

तोड़ दो ख़ुद को तुम

बाहों में मेरी, बाहों में मेरी

 

बाहों में मेरी, बाहों में...

बाहों में मेरी, बाहों में मेरी

 

बाहों में मेरी, बाहों में...

 

“तुम्हारी ये हँसी मेरी कमजोरी बन गई है, गुलमोहर।”

 

"मेरी मोह..!"सिया अंदर तक कांप गई।

 

“तुम कांप रही हो…”

“क्योंकि तुम पास हो…”सिया ने कांपते होंठ से कहा।

 

अर्जुन ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया — और धीमे से उसके माथे पर होंठ रख दिए।

 

फिर उसकी उँगलियाँ सिया की गर्दन से होती हुई उसकी पीठ पर फिसलीं।

 

तेरे एहसासों में, भीगे लम्हातों में

मुझको डूबा, तिश्नगी सी है

 

तेरी अदाओं से, दिलकश ख़ताओं से

इन लम्हों में ज़िंदगी सी है

 

हया को ज़रा भूल जाओ

मेरी ही तरह पेश आओ

 

खो भी दो ख़ुद को तुम

रातों में मेरी, रातों में मेरी

 

रातों में मेरी, रातों में...

 

सिया ने कांपते स्वर में कहा —

“क्या ये सपना है?”

 

“अगर है… तो मैं जागना नहीं चाहता,” अर्जुन ने कहा।

सिया ने उसकी आँखों में देखा,

 

लबों को लबों पे सजाओ

क्या हो तुम, मुझे अब बताओ

 

तेरे जज़्बातों में, महकी सी साँसों में

ये जो महक संदली सी है

 

दिल की पनाहों में, बिखरी सी आहों में

सोने की ख़्वाहिश जागी सी है।

फिर अनजाने में उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।

 

चेहरे से चेहरा छुपाओ

सीने की धड़कन सुनाओ

 

देख लो ख़ुद को तुम

आँखों में मेरी, आँखों में मेरी

 

उनके होंठ धीरे से मिले — नर्म, डरे हुए, मगर पूरी तरह सच्चे।धीमा, धीमा चुंबन। मगर ऐसा जैसे समय ठहर गया हो।

 

लबों को लबों पे सजाओ

क्या हो तुम, मुझे अब बताओ(my fav. Song by k.

k.,whose fav. Song is this?tell me in comments)

 

सिया झटके से उठी।

 

उसकी सांसें तेज़ थीं, होंठ काँप रहे थे, माथे पर पसीना, होंठों पर कंपन… और चेहरा गर्म।

“ये सिर्फ़ सपना था… या दिल की कोई ख्वाहिश?”

 

उसने पास पड़ी गुलमोहर की पंखुड़ी को देख कहा।

 

"मैम..!"

"मैम..आप सुन रही है?..

"दी..!"

"दी..कहां खोई हो?..रोशनी और काव्या सिया को शीशे में एक टक देखते हुए ओर मुस्कुराते देख उसे कंधे से हिलाने लगे।

 

सिया को जैसे होश आया हो।सिया के चेहरे से मुस्कुराहट जा चुकीं थीं।

"वो..ये क्या सोच रही है?..कैसे सोच सकती हैं?..

वो एक भावी रानी है,और एक रानी और अंगरक्षक एक नही हो सकते...!

,सपने में भी नहीं..!"

 

"कुछ नही....बस कुछ पुराना याद आ गया।

---

 

अर्जुन अकेले अपने कमरे में बैठा था। सामने सिया की वो तस्वीर जिसमें वो गुलमोहर के नीचे बैठी थी।

“तुम्हें छूना... खुद को तोड़ना जैसा है।

लेकिन फिर भी... ये सबसे सुकूनदेह तकलीफ़ है।”

 

“तुम्हें बचाऊँ… या खुद से दूर रखूँ?”

 

तभी सिक्योरिटी इंचार्ज विवेक अंदर आया।

 

“सर, वो कैमरा दुबई से ऑर्डर हुआ था — और जो नाम सामने आया है… वो चौंकाने वाला है।”

 

अर्जुन ने फाइल देखी —

"Prince Zayan – Former Crown Rival – Exiled."

“तो अब खेल असली शुरू हुआ है…”

 

“और इस बार… मैं गुलमोहर को मुरझाने नहीं दूँगा।”

**

 

कॉलेज कैफ़े में आरव और रोशनी साथ बैठे थे।

 

रोशनी की एक दोस्त आयी और आरव को गुलाब दिया,

“हमारे क्लास के सबसे क्यूट लड़के के लिए…”

 

रोशनी का चेहरा एकदम सख़्त हो गया।

 

“तुम ले लोगे उसका फूल?”

उसने तंज भरे स्वर में पूछा।

 

आरव मुस्कराया,

 

“अगर कोई और देता, तो ले लेता।

लेकिन मेरी नज़रें वहाँ रुकती हैं… जहाँ कोई आवाज़ नहीं देती, सिर्फ़ दिल सुनता है।”

 

रोशनी ने नजरें झुका लीं… और पहली बार, उसके होंठों पर “आरव” चुपचाप खिल गया।

 

---

 

राज्यसभा भवन में एक प्रेस मीटिंग थी।

 

मीरा और विक्रांत आमने-सामने बैठे थे —

बात बहस की नहीं,

नज़रों की जंग थी। बाकी सब उन दोनो को एक दूसरे को देख सांस लेना ही भूल गए थे।

 

मीरा ने दस्तावेज़ टेबल पर फेंके।

“आप हमेशा कहते हैं कि मैं सख़्त हूँ,

लेकिन क्या कभी ये पूछा… कि मुझे सख़्त बनना क्यों पड़ा?”

 

विक्रांत ने धीरे से जवाब दिया,

 

“क्योंकि आपने कभी किसी को अपनी कमज़ोरी बनने नहीं दिया।”

 

मीरा पल भर को चुप रही,

 

“और आपने… कभी खुद को किसी के क़ाबिल समझा नहीं।”कुछ तो था इन दोनो के बीच शायद कोई अतीत।

**

 

अर्जुन बाहर खड़ा था — सिगार जलाए बिना, सिर्फ़ हाथ में थामे हुए।

 

सिया खिड़की से उसे देख रही थी।

 

“जिससे नफ़रत करने की कसम खाई थी…

क्या वही अब दिल के करीब आने लगा है?”

सिया उसे एक टक देखती रही कुछ देर ।

 

✨😘सपनों में छुए जो होंठ, वो सच नहीं थे शायद, 

मगर वो एहसास... दिल ने झुठलाया भी नहीं। 

अगर ये आग मोहब्बत की है तो बुझाना मुश्किल है, 

क्योंकि ये सिर्फ़ छुअन नहीं, इक सज़ा सी सही।✨🌷

**

 

“राजा साहब, विक्रांत सिंह आज दोपहर बाद पहुँचेंगे,”

रघुनाथ, प्रमुख सेवक ने सूचित किया।

 

राजमहल में हर कोना चमकाया जा रहा था — दीवारें पोंछी जा रही थीं, फूल सजाए जा रहे थे, और दालान की चमक से लगता था जैसे समय पलट कर इतिहास में लौट आया हो।

 

राजा साहब अपनी राजसी कुर्सी पर बैठकर शांत मुद्रा में बोले —

 

“विक्रांत का आना सिर्फ़ एक औपचारिक भेंट नहीं, एक परिपक्व परीक्षण भी है।

देखना होगा, कौन क्या छुपा रहा है... मुस्कानों के पीछे।”

---

 

जयगढ़ महल में आज फिर सजीवता थी।

महलों की दीवारों पर नए फूल, दालानों में रेशमी पर्दे और भोजनालय में खास पकवानों की तैयारी।

 

राजा साहब स्वयं देख रहे थे कि अतिथि के स्वागत में कोई कमी न रहे।

 

“विक्रांत सिंह आ रहे हैं,” रानी माँ ने सिया से कहा, “राजनीति में उभरता हुआ चेहरा है। पुराने संबंध भी हैं, थोड़ा आदर दिखाना।”

 

सिया ने हल्का सिर हिलाया —

“आदर तो है, लेकिन… भरोसा नहीं।”

 

शाम के करीब, काली गाड़ी महल के मुख्य द्वार पर आकर रुकी।

 

विक्रांत सिंह एक, आत्मविश्वास से भरा चेहरा, चाल में सत्ता की महक और मुस्कान में शहद भी… और ज़हर भी। वह नीले बंधगला सूट में, काले सनग्लासेज़ उतारते हुए महल की सीढ़ियों पर उतरा।

 

उसकी मुस्कराहट, आत्मविश्वास, और कुछ ऐसा अंदाज़ — जो किसी को भी भ्रमित कर सकता था

 

वो सीधा दरबार हॉल में पहुँचा, जहाँ राजा, रानी माँ, सिया, व्या और कुछ वरिष्ठ सदस्य पहले से उपस्थित थे।

"आपका स्वागत है, विक्रांत जी,”

राजा साहब ने कहा।

 

“जय हो, महाराज।”

“खुश रहो, विक्रांत,” राजा साहब बोले, “पुरानी दोस्ती अब नई दिशा ले रही है।”

“जय जयगढ़,” विक्रांत ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “यह सम्मान मेरे लिए बहुत बड़ा है।”

“जयगढ़ की मिट्टी से रिश्ता है मेरा। और ये रिश्ता मैं तोड़ नहीं सकता,” विक्रांत ने झुककर नम्रता से कहा।

 

रानी माँ ने उसकी ओर देखा,

“राजनीति में दिल कम और दिमाग ज़्यादा चलता है। आशा है तुम्हारा संतुलन अच्छा हो।”

 

“मैं भावनाओं को दिशा देता हूँ, राजमाता… मोहरा नहीं बनाता।”

 

विक्रांत ने सिया को देखकर कहा —जो एक सुंदर अनारकली सूट में खुले बालो और चेहरे पर एक मुस्कान सजाए खड़ी थी।

 

“राजकुमारी, आपकी प्रसिद्धि सिर्फ़ जयगढ़ तक सीमित नहीं रही। दिल्ली तक आपके सौंदर्य और साहस के किस्से सुने हैं।”

 

सिया ने शिष्टता से मुस्कराते हुए कहा —

“कहानियाँ हमेशा थोड़ी बढ़ा-चढ़ाकर सुनाई जाती हैं।”

अर्जुन चुप था, उसकी निगाहें हर क्षण विक्रांत की हर हरकत पर थीं।

**

महल की बालकनी में मीरा सिया के साथ खड़ी थी।

 

“वो आदमी… मोहक है। बोलता कम है, लेकिन जब देखता है — तो जैसे कोई जाल बुनता है।”

 

“विक्रांत?” सिया ने हँसकर पूछा।

 

“हाँ,” मीरा ने गंभीर होकर कहा।

 

“उसकी नज़रों में राजनीति के साथ-साथ एक पर्सनल इंट्रेस्ट भी दिखता है… और ये मुझे पसंद नहीं।”

 

“क्या अर्जुन से पूछूं फिर?”

सिया की आवाज़ में चिढ़ थी।

 

“नहीं,” मीरा मुस्कराई,

 

“पर अपने दिल से ज़रूर पूछो… कि क्या तुम खुद को एक और चाल का हिस्सा बनते देख सकती हो?”

**

अर्जुन, दूर खड़ा सब देख रहा था।

 

विक्रांत की मुस्कान… सिया की हल्की बातचीत… रानी माँ का सौम्य समर्थन…!"

 

सिया की वो मुस्कान — जो अब अर्जुन के लिए नहीं, किसी और के लिए खिल रही थी — उसका सीना काटने लगी।

 

वो कुछ नहीं बोला, लेकिन अंदर… कुछ पिघल रहा था।

 

वो हमेशा से खामोश था, लेकिन आज…

उसकी चुप्पी उसके अंदर की हलचल से लड़ रही थी।

उसके अंदर कुछ काँप रहा था —

और ये एहसास उसे परेशान कर रहा था।

वो कभी ईर्ष्यालु नहीं था… लेकिन अब था।

 

“वो सबको जल्दी पसंद आ जाता है,” अर्जुन ने विवेक से कहा।

 

“सिवाय आपके,” विवेक ने धीरे से मुस्कराते हुए कहा।

 

“क्योंकि मैं भावनाओं से फैसले नहीं करता।”

 

“तो सिया… एक फैसला है?”

 

अर्जुन चुप हो गया।

**

शाही भोज में, विक्रांत ने सिया के पास बैठने का आग्रह किया।

 

“आपसे बात करना हमेशा सुखद लगता है,”

उसने कहा।

 

“आपको राजनीति में भी यही लाइन काम में आती होगी,”

सिया ने हल्का मुस्कराकर जवाब दिया। उसकी बात पर राज परिवार मुस्कुरा दिया।

**

अर्जुन दूर से सब देख रहा था — जैसे हर हँसी, हर नज़र, उसकी रगों में आग भर रही हो।

 

रात को सिया अकेले बग़ीचे में टहल रही थी, जब अर्जुन वहाँ पहुँचा।वो अब अर्जुन से कतराने लगी थी — उस सपने के बाद।

 

जिसमें अर्जुन उसका रक्षक नहीं, बर्बादी बन गया था।

 

वो उससे नज़रें चुराती थी, बातें टाल देती थी।

और अर्जुन, जो हमेशा शान्त था, अब हर टालमटोल में खुद को ठुकराया महसूस करता था।

 

“आपको अंदाज़ा है, विक्रांत की पॉलिटिक्स कितनी गंदी है?”

अर्जुन की आवाज़ ठंडी थी।

 

“आपको उससे दिक्कत है या मुझसे?”

सिया पलटी।

 

“मुझे आपकी सुरक्षा से मतलब है।”

 

"हां...तो इतना ही मतलब रखिए ,ज्यादा रखने की कोई आवश्यकता नहीं है आपको,आप हमारे अंगरक्षक है..!"

"बेहतर है,वहीं बन कर रहे..!"सिया ने दांत भींच कर कहा।

सिया के इस व्यवहार से अर्जुन चौंक गया।

 

"जी..!"राजकुमारी जैसी आपकी आज्ञा!"अर्जुन ने अपने जबड़े भींचते हुए कहा। सिया को अपने किए पर अफसोस हुआ, पर अब कुछ किया नही जा सकता।वैसे भी अर्जुन से दूर रहना उसकी मजबूरी है एक भावी रानी के तौर पर।

 

**

अर्जुन अपने कमरे में मौजूद शीशे में एक टक खुद को देख रहा था।

"क्या हुआ?"

“जलन हो रही है… क्योंकि वो उसे देखता है, और तुम बस दूर से घूरते हो।”

 

“तुम उसे ‘गुलमोहर’ कहते हो, अर्जुन। पर जब कोई और उसकी ख़ुशबू महसूस करे — तो तुम्हे जलन होती है, है ना?”

अर्जुन का प्रतिबंब अर्जुन से बोला।

अर्जुन ने गुस्से में शीशे में एक मुक्का मारा,शीशा चर्र की आवाज से टूट गया। अर्जुन के हाथ से खून टपक के नीचे गिर रहा था, उसकी आंखे लाल थी, उसके बाल बिखरे ,चेहरे पर भयंकर गुस्सा।

 

"नही....!

"ये नही हो सकता ...कभी नही..!

टेबल पर रखा वो पेपरवेट — जिसमें एक सूखा गुलमोहर का फूल दबा हुआ था।

 

🌷✨“गुलमोहर…”

“तुम मुस्कराती हो, और मैं हार जाता हूँ।

तुम चुप रहती हो… और मैं टूटने

लगता हूँ।”🌷✨

 

अर्जुन ने दीवार की ओर घूंसा मारा।

 

✨मैं रक्षक हूँ, मगर दिल कहाँ रख दूँ?

तुम अगर डरती हो मुझसे,

तो क्या मेरी भावनाएँ गुनाह हैं?”✨

 

**

एक प्रेमी की… जो कभी रक्षक बना, मगर अब खुद को रोक नहीं पा रहा था।

 

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©Diksha " mis kahani"😙