हुक्म और हसरत -35 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत -35

🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia
एपिसोड 35 — एक फैसला, एक एहसास 🌸

सुबह से ही रायगढ़ कार्यालय में असामान्य हलचल थी।

नगर के बाहरी इलाके में पानी की समस्या सुलझने के बाद सिया को लगा था कि मामला खत्म हो गया।

लेकिन सुबह उसकी मेज़ पर रखी नई फाइल ने पूरी तस्वीर बदल दी।

काव्या ने फाइल उसके सामने रखते हुए कहा—

“राजकुमारी जी, ये कल रात आई है।”

सिया ने फाइल खोली।

“क्या है?”

“नगर के पुराने सामुदायिक भवन की मरम्मत का प्रस्ताव।”

सिया ने कुछ पन्ने पढ़े।

“इतना बड़ा बजट?”

“जी।”

सिया ने अगला पन्ना पलटा।

“और यहाँ लिखा है कि काम अगले महीने तक पूरा करना जरूरी है।”

“हाँ।”

सिया ने कुछ पल फाइल को देखा।

“लेकिन इसकी जरूरत अभी इतनी ज्यादा क्यों है?”

काव्या ने कंधे उचकाए।

“यही समझ नहीं आ रहा।”

सिया ने फाइल बंद कर दी।

“तो पहले समझते हैं।”

उसी समय दरवाज़ा खुला।

अर्जुन अंदर आया।

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“खड़ूस जी।”

अर्जुन वहीं रुक गया।

उसने सिया को देखा।

“जी, राजकुमारी?”

सिया मुस्कुरा दी।

“आज बहुत जल्दी आ गए।”

“काम था।”

“आपके पास हर सवाल का यही जवाब क्यों होता है?”

“क्योंकि हर बार काम ही होता है।”

सिया ने काव्या की तरफ देखा।

“देखा?”

काव्या ने हँसी दबाते हुए कहा—

“मैं कुछ नहीं कह रही।”

अर्जुन की नजर फाइल पर गई।

“क्या मामला है?”

काव्या ने उसे पूरी बात बता दी।

अर्जुन ने फाइल उठाई और कुछ पन्ने देखने लगा।

कुछ देर बाद उसने पूछा—

“जगह देखी है?”

सिया ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

“तो पहले जगह देखिए।”

सिया ने तुरंत कहा—

“यही तो मैं सोच रही थी।”

अर्जुन ने फाइल वापस रख दी।

“फिर चलिए।”

सिया ने मुस्कुराकर कहा—

“आपको हर जगह मेरे साथ चलना जरूरी है क्या?”

“जब तक आपकी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है।”

सिया ने आँखें घुमाईं।

“खड़ूस।”

अर्जुन ने बिना किसी प्रतिक्रिया के कहा—

“राजकुमारी।”

काव्या दोनों को देखकर मुस्कुरा दी।

“आप दोनों का ये नामों वाला खेल कभी खत्म होगा?”

सिया ने तुरंत कहा—

“नहीं।”

अर्जुन ने बस फाइल उठा ली।

“चलते हैं।”

---

कुछ देर बाद तीनों पुराने सामुदायिक भवन के सामने खड़े थे।

इमारत काफी पुरानी थी।

दीवारों पर जगह-जगह दरारें थीं।

छत का एक हिस्सा भी कमजोर दिखाई दे रहा था।

सिया धीरे-धीरे अंदर गई।

उसने चारों तरफ देखा।

“यहाँ सच में मरम्मत की जरूरत है।”

काव्या ने कहा—

“जी।”

सिया ने फाइल में दिए गए अनुमान को देखा।

“लेकिन इतना खर्च?”

तभी वहाँ मौजूद एक कर्मचारी आगे आया।

“राजकुमारी जी, मरम्मत के साथ पूरा ढाँचा बदलने की योजना है।”

सिया ने पूछा—

“क्यों?”

“पुराना है।”

“पुराना है, इसलिए पूरा तोड़ना जरूरी है?”

कर्मचारी चुप हो गया।

सिया ने दीवार पर हाथ रखा।

फिर अर्जुन की तरफ देखा।

“आपको क्या लगता है?”

अर्जुन ने सीधे जवाब नहीं दिया।

“आपको क्या लगता है?”

सिया ने हल्की झुंझलाहट से कहा—

“फिर से वही।”

“क्या?”

“हर बार सवाल का जवाब सवाल से देते हैं।”

“क्योंकि फैसला आपको करना है।”

सिया कुछ पल चुप रही।

फिर उसने चारों तरफ ध्यान से देखा।

“अगर सिर्फ कमजोर हिस्सों की मरम्मत हो सकती है… तो पूरी इमारत गिराने की जरूरत नहीं है।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“संभव है।”

सिया ने तुरंत काव्या की तरफ देखा।

“दो अलग-अलग अनुमान बनवाओ।”

“एक पूरी इमारत बदलने का और दूसरा सिर्फ जरूरी मरम्मत का?”

“हाँ।”

काव्या ने लिख लिया।

सिया ने फिर उस कर्मचारी की तरफ देखा।

“और पुराने भवन का उपयोग कौन-कौन करता है?”

“स्थानीय लोग… बच्चों की कक्षाएँ भी होती हैं।”

सिया कुछ पल चुप रही।

“तो काम के दौरान उन बच्चों के लिए दूसरी जगह की व्यवस्था भी करनी होगी।”

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

“ठीक है।”

सिया ने फाइल बंद कर दी।

“काम सिर्फ इमारत का नहीं है। लोगों का भी है।”

अर्जुन कुछ कदम पीछे खड़ा उसे देख रहा था।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी आँखों में एक क्षण के लिए संतोष की हल्की झलक आई।

सिया ने उसे देख लिया।

“क्या?”

अर्जुन ने तुरंत नजरें हटा लीं।

“कुछ नहीं, राजकुमारी।”

सिया ने मुस्कुराकर कहा—

“आपके ‘कुछ नहीं’ में बहुत कुछ छिपा होता है।”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

---

दोपहर तक सिया वापस कार्यालय आ गई।

उसने दोनों प्रस्ताव सामने रखवाए।

पहला प्रस्ताव बहुत महँगा था।

दूसरा कम खर्च में काम पूरा कर सकता था।

लेकिन उसमें एक दिक्कत थी।

काम कई चरणों में करना पड़ता।

सिया कुछ देर तक दोनों विकल्प देखती रही।

फिर उसने कलम उठाई।

काव्या ने पूछा—

“आप कौन-सा चुनेंगी?”

सिया ने कहा—

“दूसरा।”

काव्या ने सिर हिलाया।

“लेकिन इसमें समय ज्यादा लगेगा।”

“पता है।”

“और कुछ लोग कहेंगे कि आपने आसान रास्ता नहीं चुना।”

सिया ने मुस्कुराकर कहा—

“आसान रास्ता चुनना मेरा काम नहीं है। सही रास्ता चुनना है।”

तभी दरवाज़े के पास खड़ा अर्जुन बोला—

“सोचकर फैसला कीजिए।”

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“सोच लिया।”

“पक्का?”

“हाँ।”

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

सिया ने दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर कर दिए।

फिर कलम मेज़ पर रख दी।

“हो गया।”

काव्या मुस्कुराई।

“बधाई हो।”

सिया ने अर्जुन की तरफ देखा।

“आप कुछ नहीं कहेंगे?”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—

“अच्छा फैसला है, राजकुमारी।”

सिया के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई।

“बस?”

“जी।”

“थोड़ी तारीफ और कर दीजिए।”

“जरूरत नहीं।”

सिया ने मुँह बनाया।

“खड़ूस।”

अर्जुन ने फाइल उठाते हुए कहा—

“धन्यवाद।”

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर हँस पड़ी।

---

शाम होने लगी थी।

कार्यालय लगभग खाली हो चुका था।

काव्या कुछ दस्तावेज़ लेकर बाहर चली गई।

सिया अपनी मेज़ पर बैठी आखिरी फाइल देख रही थी।

अर्जुन कमरे के दूसरे कोने में खड़ा था।

हमेशा की तरह दूरी बनाए हुए।

सिया ने उसे देखा।

“अर्जुन।”

“जी, राजकुमारी?”

“आप इतने दूर क्यों खड़े हैं?”

“यहीं ठीक है।”

“क्यों?”

“काम देख रहा हूँ।”

सिया ने आँखें घुमाईं।

“आप हमेशा काम का बहाना बनाते हैं।”

अर्जुन चुप रहा।

सिया कुर्सी से उठी और उसकी तरफ बढ़ी।

“आपको पता है…”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“कभी-कभी लगता है कि आप मुझसे डरते हैं।”

अर्जुन की भौंह हल्की-सी उठी।

“मैं आपसे क्यों डरूँगा?”

“क्योंकि मैं आपको परेशान करती हूँ।”

“आप बहुत परेशान करती हैं।”

सिया हँस पड़ी।

“देखा! मान लिया।”

अर्जुन ने हल्की साँस छोड़ी।

“राजकुमारी, घर चलने का समय हो गया है।”

“आप फिर राजकुमारी कह रहे हैं।”

“आप हैं।”

“लेकिन…”

सिया कुछ कहती, उससे पहले अर्जुन ने दरवाज़े की तरफ इशारा किया।

“चलिए।”

सिया ने उसे घूरा।

“खड़ूस।”

अर्जुन के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया।

लेकिन जैसे ही सिया उससे आगे निकलकर दरवाज़े की तरफ बढ़ी…

उसकी नजर कुछ पल के लिए सिया पर ठहर गई।

उसकी चाल में अब पहले जैसी कमजोरी नहीं थी।

आँखों में फिर वही चमक लौट आई थी।

वह उसे देखता रहा।

और जाने क्यों…

बहुत लंबे समय बाद उसके मन में एक पुरानी पुकार अचानक लौट आई।

“मोह…”

अर्जुन की उँगलियाँ हल्के से मुट्ठी में बंध गईं।

उसने तुरंत नजरें हटा लीं।

सिया पीछे मुड़ी।

“क्या हुआ?”

अर्जुन ने खुद को सामान्य किया।

“कुछ नहीं, राजकुमारी।”

सिया ने कुछ पल उसे देखा।

फिर मुस्कुराई।

“चलिए, खड़ूस।”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“जी।”

दोनों बाहर निकल गए।

सिया के लिए वह दिन बस एक और जिम्मेदारी पूरी करने का दिन था।

लेकिन अर्जुन के लिए…

उस एक पल ने उसके भीतर दबे किसी पुराने एहसास को फिर से छू लिया था।

जिस नाम को उसने बहुत समय पहले अपने मन की गहराई में दबा दिया था…

वह आज फिर उसकी खामोशी में लौट आया था।

लेकिन सिया को इसकी खबर नहीं थी।

और अर्जुन…

उसे खबर होने देना भी नहीं चाहता था।

— एपिसोड 35 समाप्त —
जारी रहेगा... 💗✨
© Diksha 

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Running... 🌸