हुक्म और हसरत -28 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत -28

🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️

#Arsia
एपिसोड 28 — एक नई शुरुआत 

पिछली रात के बाद पहली बार…

रायगढ़ महल में सब कुछ थोड़ा शांत था।

न कोई चेतावनी।

न कोई आपात स्थिति।

न कोई भाग-दौड़।

बस सुबह की हल्की धूप, महल की खिड़कियों से अंदर आती हुई और उस कमरे में फैलती हुई… जहाँ पिछले कई दिनों से डर ने अपना डेरा जमा रखा था।

सिया धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलती है।

कुछ पल तक वह छत को देखती रहती है।

फिर उसकी नज़र अपने पास रखी कुर्सी पर जाती है।

खाली।

सिया की भौंहें सिकुड़ जाती हैं।

“अर्जुन?”

कोई जवाब नहीं।

वह उठकर बैठती है और तभी कमरे का दरवाज़ा खुलता है।

अर्जुन अंदर आता है।

हाथ में एक फाइल थी और चेहरे पर हमेशा वाली गंभीरता।

सिया उसे देखते ही मुस्कुरा दी।

“आप कहाँ थे?”

अर्जुन ने फाइल मेज़ पर रखी।

“दफ़्तर।”

सिया ने आँखें छोटी कीं।

“सुबह-सुबह?”

“काम था।”

“और मुझे बताया भी नहीं?”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“आप सो रही थीं।”

सिया ने तुरंत अपना चेहरा बनाया।

“तो?”

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह आगे बढ़ा और उसके पास रखा पानी का गिलास उठाकर उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“पहले पानी।”

सिया ने गिलास लिया, लेकिन उसकी नज़र अब भी अर्जुन पर थी।

“आप मुझे नज़रअंदाज़ कर रहे हैं?”

अर्जुन की भौंह हल्की-सी उठी।

“नहीं।”

“तो फिर?”

“आपको आराम चाहिए।”

सिया मुस्कुराई।

“आपको पता है ना… मैं अब ठीक हूँ?”

“पता है।”

“तो आज मैं बाहर जाऊँगी।”

अर्जुन कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर बोला—

“कहाँ?”

“दफ़्तर।”

अर्जुन का चेहरा बिल्कुल शांत रहा।

“नहीं।”

सिया ने तुरंत तकिया उसके ऊपर फेंक दिया।

“आप कौन होते हैं मुझे रोकने वाले?”

अर्जुन ने तकिया हवा में ही पकड़ लिया।

“आपके पति।”

सिया कुछ पल उसे देखती रही।

फिर उसके होंठों पर शरारती मुस्कान आ गई।

“अच्छा…”

अर्जुन ने तकिया वापस रख दिया।

“जी।”

“तो पति होने का फायदा उठा रहे हैं?”

“नहीं।”

“फिर?”

“आपकी हालत देखकर फैसला कर रहा हूँ।”

सिया ने आँखें घुमाईं।

“मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

“डॉक्टर ने कहा है धीरे-धीरे दिनचर्या में लौटिए।”

“तो धीरे-धीरे लौटूँगी।”

“आज नहीं।”

“आज ही।”

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर अर्जुन ने हार मानने जैसा हल्का-सा साँस छोड़ा।

“ठीक है।”

सिया की आँखें चमक उठीं।

“सच?”

“हाँ।”

“मैं दफ़्तर जाऊँगी?”

“हाँ।”

सिया खुशी से उठने लगी।

लेकिन अगले ही पल अर्जुन ने उसका हाथ पकड़कर वापस बैठा दिया।

“लेकिन अकेले नहीं।”

सिया ने उसे घूरा।

“मुझे पता था!”

अर्जुन के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।

“कव्या आपके साथ रहेगी।”

“और?”

“सुरक्षा बाहर रहेगी।”

“और?”

“मैं भी।”

सिया ने तुरंत हँसते हुए कहा—

“वाह! रायगढ़ की सबसे ताकतवर मुख्य अधिकारी खुद मेरी सुरक्षा करने वाली हैं!”

अर्जुन ने उसे घूरा।

“बहुत बोलती हैं आप।”

“और आप बहुत कम बोलते हैं।”

“संतुलन हो जाता है।”

सिया हँस पड़ी।

---

कुछ देर बाद…

सिया ने हल्के रंग का औपचारिक परिधान पहना।

आईने के सामने खड़ी होकर उसने अपने बाल ठीक किए।

काफी दिनों बाद वह फिर से उसी आत्मविश्वास के साथ तैयार हुई थी।

चेहरे पर बीमारी की थकान अब भी थोड़ी थी…

लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक वापस आ चुकी थी।

दरवाज़ा खुला।

कव्या अंदर आई।

उसे देखते ही उसकी आँखें चमक उठीं।

“आखिरकार!”

सिया हँसी।

“क्या?”

“आप वापस अपने पुराने अंदाज़ में आ गईं।”

“कौन-सा अंदाज़?”

कव्या ने हाथ कमर पर रखे।

“मालकिन वाला अंदाज़।”

सिया ने मुस्कुराकर कहा—

“आज से काम शुरू।”

कव्या ने तुरंत फाइलों का एक छोटा ढेर उसके सामने रख दिया।

“तो मालकिन, आपका स्वागत है।”

सिया ने फाइलों को देखा।

फिर कव्या को।

फिर फाइलों को।

“इतना काम?”

“आपने ही कहा था कि काम शुरू करना है।”

“मैंने कहा था… इतना नहीं।”

कव्या हँस पड़ी।

तभी पीछे से अर्जुन की आवाज आई—

“अगर ज्यादा लगे तो वापस आराम कर सकती हैं।”

सिया ने पलटकर देखा।

“आप चुप रहिए।”

कव्या अपनी हँसी रोकने लगी।

अर्जुन ने बिना किसी प्रतिक्रिया के कहा—

“मैंने कुछ नहीं कहा।”

“आपका चेहरा कह रहा है।”

“मेरा चेहरा?”

“हाँ।”

सिया उसके पास गई।

उसने अर्जुन को कुछ सेकंड गौर से देखा।

“आप हमेशा इतने गंभीर क्यों रहते हैं?”

“काम है।”

“और अगर मैं आपको हँसा दूँ?”

“कोशिश कर सकती हैं।”

सिया की आँखों में शरारत उतर आई।

“चुनौती स्वीकार है।”

कव्या ने धीरे से सिर हिलाया।

“आज फिर शुरू हो गए दोनों…”

---

रायगढ़ कार्यालय .....

कार जैसे ही कार्यालय की इमारत के सामने रुकी, सिया ने बाहर देखा।

काफी समय बाद वह इस जगह पर वापस आई थी।

कर्मचारी उसे देखते ही सीधा खड़े होने लगे।

कुछ लोगों के चेहरों पर खुशी थी।

कुछ के चेहरों पर राहत।

और कुछ लोग बस चुपचाप उसे देख रहे थे।

सिया ने गहरी साँस ली।

फिर कार से बाहर निकल गई।

कव्या उसके पीछे थी।

अर्जुन कुछ कदम दूर।

सिया ने कार्यालय की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए एक पल के लिए पीछे देखा।

अर्जुन वहीं खड़ा था।

उसकी नज़र सिया पर थी।

सिया मुस्कुराई।

“चल रहे हैं?”

अर्जुन ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

---

सम्मेलन कक्ष में पहुँचते ही सिया ने सामने रखी फाइल खोली।

“ये नगर विकास परियोजना की फाइल है?”

कव्या ने सिर हिलाया।

“हाँ।”

“सड़क विस्तार?”

“जी।”

सिया ने पन्ने पलटे।

“बजट इतना ज्यादा क्यों है?”

कव्या कुछ कहती, उससे पहले पीछे से अर्जुन की आवाज आई—

“क्योंकि अनुमान पुराना है।”

सिया ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

“तो नया अनुमान?”

“आज मिलेगा।”

सिया ने फाइल बंद की।

“ठीक है। पहले वही देखेंगे।”

कव्या ने मुस्कुराकर कहा—

“आपको पता है, पहले दिन ही सबसे मुश्किल फाइल मिल गई।”

सिया ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा—

“तो?”

“कुछ नहीं।”

सिया ने कलम उठाई।

“अगर मैं नगर का काम संभाल रही हूँ तो मुश्किल फाइलों से भागूँगी नहीं।”

अर्जुन कुछ नहीं बोला।

बस उसे देखता रहा।

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

“फिर ऐसे क्यों देख रहे हैं?”

“बस।”

सिया मुस्कुराई।

“आपको मुझ पर भरोसा है?”

अर्जुन ने बिना किसी झिझक के कहा—

“हाँ।”

बस एक शब्द।

लेकिन सिया कुछ पल चुप हो गई।

उसने नज़रें नीचे कर लीं और फाइल खोल ली।

“ठीक है…”

उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।

---

दोपहर तक सिया लगातार काम करती रही।

नगर की सड़कें…

पानी की व्यवस्था…

स्थानीय बाज़ार की अनुमति…

कुछ राजनीतिक प्रतिनिधियों के अनुरोध…

एक के बाद एक फाइलें उसके सामने आती रहीं।

कभी वह कव्या से पूछती।

कभी अर्जुन से।

लेकिन हर फैसला खुद लेने की कोशिश करती।

एक जगह उसने जल्दबाजी में एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने के लिए कलम उठाई।

अर्जुन ने बिना कुछ कहे उस दस्तावेज़ पर उंगली रख दी।

सिया रुक गई।

“क्या हुआ?”

अर्जुन ने बस एक पंक्ति की तरफ इशारा किया।

सिया ने पढ़ा।

उसकी आँखें थोड़ी बड़ी हो गईं।

“ओह…”

वह धीरे से बोली—

“ये शर्त मैंने देखी ही नहीं।”

अर्जुन ने कहा—

“इसलिए हर दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने से पहले पूरा पढ़िए।”

सिया ने उसे घूरा।

“आप मुझे डाँट रहे हैं?”

“नहीं।”

“तो?”

“सिखा रहा हूँ।”

सिया ने कलम नीचे रखी।

“ठीक है, गुरुजी।”

अर्जुन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

सिया मुस्कुराई।

“वैसे गुरुजी…”

“जी?”

“आपको वेतन कितना दूँ?”

कव्या हँसते-हँसते दूसरी तरफ देखने लगी।

अर्जुन ने बस इतना कहा—

“आपसे कुछ नहीं चाहिए।”

सिया की मुस्कान थोड़ी धीमी हो गई।

दोनों की नज़रें मिलीं।

एक पल के लिए कमरे का बाकी शोर जैसे गायब हो गया।

फिर सिया ने धीरे से कहा—

“अच्छा है…”

और वापस फाइल देखने लगी।

---

शाम होने लगी थी।

सिया ने आखिरी फाइल बंद की।

“बस।”

कव्या ने राहत की साँस ली।

“आज के लिए इतना काफी है।”

सिया कुर्सी से उठी।

लेकिन उठते ही हल्का-सा चक्कर आया।

अर्जुन ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

सिया ने उसकी तरफ देखा।

“मैं ठीक हूँ।”

अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ा नहीं।

“पता है।”

“फिर?”

“बस एक मिनट बैठिए।”

सिया ने उसे देखा।

फिर बिना बहस किए वापस बैठ गई।

कुछ सेकंड बाद उसने धीमे से कहा—

“आप बहुत परेशान करते हैं।”

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

“और आप बहुत परेशान करती हैं।”

सिया हँस दी।

“तो बराबर?”

“शायद।”

कव्या दोनों को देखती रही और फिर चुपचाप बाहर निकल गई।

दरवाज़ा बंद हुआ।

सिया ने अर्जुन को देखा।

“अब एक बात बताइए।”

“क्या?”

“आप पूरे दिन मुझे देख रहे थे ना?”

अर्जुन चुप रहा।

सिया उसके करीब गई।

“बताइए…”

“काम कर रहा था।”

“झूठ।”

“क्यों?”

“क्योंकि आपकी नज़रें बार-बार मेरी तरफ आ रही थीं।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।

“आपको कैसे पता?”

सिया मुस्कुराई।

“क्योंकि मैं भी आपको देख रही थी।”

अर्जुन कुछ नहीं बोला।

सिया ने उसकी टाई सीधी की।

“अब ठीक लग रहे हैं।”

फिर पीछे हटते हुए बोली—

“चलें, श्रीमान गंभीर?”

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

सिया पलटी।

“क्या हुआ?”

अर्जुन ने बस उसका हाथ अपने हाथ में थामे रखा।

“चलते हैं।”

सिया मुस्कुराई।

“जी, चलिए।”

दोनों कार्यालय से बाहर निकल गए।

लेकिन उसी इमारत के दूसरे हिस्से में…

एक बंद कमरे में कोई व्यक्ति सिया की आज की पूरी रिपोर्ट देख रहा था।

उसके सामने सिया के हस्ताक्षर किए हुए दस्तावेज़ रखे थे।

उसने एक दस्तावेज़ पर उंगली रखी।

फिर बहुत हल्की मुस्कान उसके चेहरे पर आई।

“पहला दिन…”

उसने धीमे से कहा।

“और शुरुआत इतनी अच्छी।”

कुछ पल की खामोशी के बाद उसने फाइल बंद कर दी।

“देखते हैं… कितने दिन तक।”

उसे नहीं पता था कि सिया के लिए यह सिर्फ कार्यालय में वापसी नहीं थी।

यह उसकी जिंदगी के एक बिल्कुल नए अध्याय की शुरुआत थी।

और उस अध्याय में…

कुछ चेहरे दोस्त बनकर आएँगे।

कुछ दुश्मन बनकर।

लेकिन असली चेहरा…

अभी पर्दे के पीछे था।

— एपिसोड 28 समाप्त —
जारी रहेगा... 💗✨
© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

Follow me for the next episode…

✨ मेरी रचनाएँ ✨

 1. अनुबंध (Anubandh) — ✅ Completed

 2. वो जो चुपके से देखा करता था — ✅ Completed

3. अनचाही मोहब्बत (Anchahi Mohabbat) — ✅ Completed

4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️ 
Running... 🌸