रोशनी की दस्तक - 2 Nisha Choudhary द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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रोशनी की दस्तक - 2

भाग 2: नीम के पेड़ की छाँव
रघुनाथ जी ने उस शाम सोनू को न केवल गणित का वह कठिन अध्याय समझाया, बल्कि उसे यह भी सिखाया कि किसी भी समस्या से डरने की जगह उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर हल करना चाहिए। सोनू उस रात बहुत खुशी-खुशी अपने घर गया। अगले दिन जब गणित की परीक्षा हुई, तो सोनू ने सारे सवाल बिना किसी हिचकिचाहट के हल कर दिए। जब दो दिन बाद परिणाम आया, तो सोनू को कक्षा में सबसे ज्यादा अंक मिले थे।
पूरे स्कूल में सोनू की तारीफ होने लगी। जब उसके दोस्तों ने पूछा कि उसने इतनी जल्दी गणित कैसे सीख लिया, तो सोनू ने गर्व से कहा, "चौपाल वाले रघुनाथ दादाजी तो जादूगर हैं! वे किसी भी कठिन सवाल को खेल-खेल में और सुंदर कहानियों के साथ समझा देते हैं।"
यह खबर गाँव के बच्चों में आग की तरह फैल गई। अगले ही दिन शाम को जब रघुनाथ जी चौपाल पर पहुँचे, तो वहाँ सिर्फ सोनू नहीं था; उसके साथ चार-पांच अन्य बच्चे भी अपनी-अपनी कॉपियाँ लिए उनका इंतज़ार कर रहे थे। रघुनाथ जी का चेहरा खिल उठा। उन्होंने सभी बच्चों को नीम के पेड़ की ठंडी छाँव में बिठाया।
अब यह सिलसिला रोज़ का बन गया। शाम के चार बजते ही चौपाल पर बच्चों की चहक गूँजने लगती। रघुनाथ जी अब सिर्फ गणित, विज्ञान या अंग्रेज़ी ही नहीं पढ़ाते थे, बल्कि हर दिन पढ़ाई ख़त्म होने के बाद बच्चों को 15 मिनट की एक विशेष कहानी सुनाते थे। उन कहानियों में ईमानदारी, बड़ों का सम्मान, प्रकृति की रक्षा और सच्चाई के रास्ते पर चलने के अनमोल संस्कार छिपे होते थे।
गाँव के जो बच्चे पहले शाम को मोबाइल में डूबे रहते थे या गलियों में आवारागर्दी करते थे, वे अब अनुशासन से चौपाल पर बैठकर ज्ञान अर्जित करने लगे थे। रघुनाथ जी के जीवन में भी एक अद्भुत बदलाव आया। जो घर पहले कब्रिस्तान सा ख़ामोश रहता था, अब वहाँ रघुनाथ जी रात को चिराग जलाकर बच्चों के लिए नई-नई पहेलियाँ, गणित के आसान सूत्र और नैतिक कहानियाँ तैयार करते। उनकी लाठी की टेक अब कमज़ोरी की नहीं, बल्कि एक शिक्षक के स्वाभिमान की प्रतीक बन चुकी थी।
लेकिन एक दिन, माहौल अचानक बदल गया। शाम को जब रघुनाथ जी बच्चों को पढ़ा रहे थे, तभी गाँव के सरपंच, कुछ पंच और कई बच्चों के माता-पिता का एक बड़ा समूह चौपाल की तरफ आता दिखाई दिया। उन सभी के चेहरों पर एक अजीब सी गंभीरता थी। बच्चों ने पढ़ना बंद कर दिया और डर के मारे अपने माता-पिता को देखने लगे।
रघुनाथ जी का दिल बैठ गया। उन्हें लगा कि शायद गाँव के बड़े-बुजुर्गों को उनका इस तरह बच्चों को जमा करना और बिना किसी फीस के पढ़ाना पसंद नहीं आया। उन्हें डर था कि कहीं गाँव वाले उन पर कोई झूठा आरोप न लगा दें।
सोनू के पिता भीड़ में से आगे बढ़े और रघुनाथ जी के बिल्कुल सामने आकर खड़े हो गए। उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा, "रघुनाथ जी, हम सब गाँव वाले आपसे एक बहुत ज़रूरी बात करने आए हैं..."

 रघुनाथ जी के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। क्या गाँव वाले उनकी इस ढलती उम्र की आखिरी खुशी को भी छीन लेंगे? क्या चौपाल की यह छोटी सी पाठशाला बंद होने जा रही थी? सरपंच और गाँव वालों का असली इरादा क्या था? पढ़िए कहानी के अंतिम और भावुक भाग में!

क्या गाँव वाले इस पाठशाला को बंद करा देंगे या कहानी में कोई नया मोड़ आएगा? अपनी राय कमेंट में ज़रूर लिखें और भाग 3 के लिए इस कहानी को स्टार (Rating) देना न भूलें!