रोशनी की दस्तक - 1 Nisha Choudhary द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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रोशनी की दस्तक - 1

भाग 1: अनदेखा दीया
रघुनाथ जी की हवेलीनुमा पुरानी हवेली की दीवारें अब सिर्फ ख़ामोशी की गवाही देती थीं। ढलती शाम के साथ जब गाँव की गलियों में चिड़ियों का शोर थमता, तब रघुनाथ जी के घर में पसरा सन्नाटा और गहरा हो जाता। दो विशाल कमरे, एक ढलवां छत वाला पुराना वेरांडा और दीवारों पर टंगी कुछ पुरानी तस्वीरें—यही उनकी कुल दुनिया बन चुकी थी। तस्वीरों में मुस्कुराते चेहरे उनके दोनों बेटों के थे, जो सालों पहले शहर जाकर बड़े साहब बन चुके थे। अब तो वे विदेशी उड़ानों और ऊंचे ओहदों में इतने व्यस्त थे कि रघुनाथ जी का हाल-चाल लेने के लिए हफ्ते में बमुश्किल एक-दो मिनट का फोन आता था।
रघुनाथ जी का मन घर में नहीं लगता था। इसलिए वे रोज़ शाम को गाँव की कच्ची चौपाल के पास रखे एक पुराने लकड़ी के तख्त पर जाकर बैठ जाते थे। वहाँ से गुज़रते राहगीरों, बकरियों के पीछे भागते बच्चों और खेत से लौटते किसानों को देखकर वे अपनी तन्हाई बहलाने की कोशिश करते। उनके पास ज़िंदगी भर के अनुभवों की एक बहुत बड़ी तिजोरी थी। उनके पास किस्से थे, इतिहास की बातें थीं, और ज़िंदगी को सही ढंग से जीने के अनमोल तजुर्बे थे। लेकिन अफसोस, उन बातों को सुनने वाला गाँव में कोई नहीं था। गाँव के बच्चे भी आजकल के डिजिटल ज़माने में ढल चुके थे—स्कूल से आते ही मोबाइल गेम्स या टीवी स्क्रीन में खो जाते।
एक दिन शाम को जब हवा में हल्की सी ठंडक थी, रघुनाथ जी चौपाल पर बैठे नीम की सूखी पत्तियाँ बटोर रहे थे। तभी अचानक उनकी नज़र 10 साल के सोनू पर पड़ी। सोनू गाँव के ही एक सरकारी स्कूल में पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था। वह अपनी फटी हुई गणित की कॉपी को सीने से चिपकाए, ज़ोर-ज़ोर से सिसकियाँ भरता हुआ चौपाल की तरफ आ रहा था।
रघुनाथ जी ने अपनी लाठी को ज़मीन पर टिकाया और धीमी लेकिन आत्मीय आवाज़ में पुकारा, "सोनू बेटा! क्या हुआ? ऐसे क्यों रो रहे हो?"
सोनू रुक गया। उसने अपनी लाल होती आँखों को पोंछा और सिसकते हुए बोला, "दादाजी, कल मेरी गणित की छमाही परीक्षा है। गुरुजी ने जो सवाल दिए हैं, वे मुझे ज़रा भी समझ नहीं आ रहे। माँ-पापा सुबह से खेत पर काम करने गए हैं, घर पर कोई बताने वाला नहीं है। अगर कल मैं फेल हो गया तो गुरुजी बहुत मारेंगे।"
रघुनाथ जी की बुझती हुई आँखों में अचानक एक नई चमक कौंध गई। उन्होंने सोनू को अपने पास तख्त पर बिठाया, उसकी कॉपी हाथ में ली और बोले, "बस इतनी सी बात? ज़रा मुझे दिखाओ, कौन सा सवाल तुम्हें डरा रहा है।"
रघुनाथ जी ने बहुत ही सरल भाषा में, ज़मीन पर लकड़ी से आकृतियाँ बनाकर, गणित के उस कठिन से सिद्धांत को एक मजेदार कहानी के रूप में समझाना शुरू किया।

रघुनाथ जी के समझाने का तरीका इतना अनोखा था कि महज़ दस मिनट में सोनू के चेहरे की घबराहट पूरी तरह गायब हो गई। लेकिन क्या एक बच्चे की मदद से रघुनाथ जी की जिंदगी की तन्हाई मिट सकती थी? और जब गाँव के अन्य लोगों को इस 'मुफ्त की पढ़ाई' का पता चलेगा, तो उनका नज़रिया क्या होगा? जानिए अगले भाग में!

अगर रघुनाथ जी और सोनू का यह आत्मीय रिश्ता आपके दिल को छू गया हो, तो इस भाग को लाइक करें और कमेंट में बताएं कि क्या आपके आसपास भी कोई ऐसे अकेले बुज़ुर्ग हैं? भाग 2 पढ़ने के लिए मुझे फॉलो (Follow) ज़रूर करें!