जल की कलकल करती जलधारा प्रबल वेग से बढ़ रही थी। पत्थर पर जल का प्रहार लगातार हो रहा था। यहाँ-वहाँ अटकी हुई जलकुम्भी भी जकड़न से मुक्त हो बह रहा था। छोटे बच्चे बड़ी सावधानी से अपनी कागज की नाव पानी में छोड़ रहे थे। अपनी-अपनी नाव से आगे बढ़ने की प्रसन्नता और उत्सुकता लिए हुए थे।
नदी किनारे पत्थर पर विराजमान प्रेमी युगल श्याम और मंजरी नयन की भाषा को समझने और समझाने में मग्न थे। कभी-कभी उनका ध्यान विशाल जलराशि की ओर चला जा रहा था। उन दोनों के मन-मस्तिष्क में भी लहरों का शोर था। कभी कभी ही एक दुसरे से मिलने का सौभाग्य मिला था, सो इस अवसर को गंवाना भी नहीं था।
मंजरी की पलकों ने पर्दा गिराया कि वाणी स्पष्ट हो सके, नयन की वाणी नहीं बल्कि मुख की वाणी।
मंजरी ने कहा ’’ यह मिलन की लुकाछुपी कब तक चलेगी, कब तक होगा स्वच्छंद मिलन, कब ऐसा होगा कि हमारा मिलना किसी को खुशी भले ही न दे लेकिन किसी को खले भी नहीं। ’’
श्याम शांत चित होकर मंजरी की बात सुन रहा था और महसुस कर पा रहा था कि बोलते-बोलते मंजरी रूआंसी हो गई थी और आँखों के किनारे आँसू की बुंदें मोती सदृश चमक रही थी। मंजरी ने अपनी बात खत्म कर श्याम को एकटक निहारना शुरू किया और श्याम के जवाब की प्रतीक्षा करने लगी। बेतूकी बातें करने में श्याम माहिर था लेकिन इस बार श्याम में संजीदापन महसुस करना चाह रही थी, मगर अफसोस श्याम ने कहा ’’ हम दोनों को मिलने से जमाना नहीं रोक पाएगा, प्यार के दुश्मन जलते रहेंगे हमेशा। ’’
मंजरी के कान कुछ और सुनना चाह रहे थे जिसमें दिलासा हो और दिलासा पे विश्वास करने का सटीक कारण हो। चुपके-चुपके, समय निकालकर मिल पाना और सबके सामने भी दोनों का नयनमटक्का चलता रहा। ऐसा भी हुआ कि कभी श्याम, मंजरी मिलन स्थल पर नहीं पहुंच पाया तो कभी मंजरी को भी बिना मिले मिलन स्थल से लौटना पड़ा। प्रेमी युगल की भी अपनी मजबूरी होती है। दोनों एक दुसरे की मजबुरी समझते थे, इसलिए अगले मिलन पर दोनों ने इस बात की शिकायत एक दुसरे से नहीं की। अगले मिलन की प्रतीक्षा में दिन को दोनों तड़पते और रात को कड़वटें बदल-बदल कर नींद लाने की चेष्टा भी करते।
बदलाव तो जरूरी है, सबका ही समय बदलता है, कभी किसी के लिए बदलाव अच्छा हो जाता है तो कभी किसी के लिए बदलाव खराब परिणाम के रूप में प्रदर्षित होता है। श्याम और मंजरी के प्रेम संबंध में बदलाव आया। प्रेमी जोड़े मे से एक का तड़पना और रातों को करवट बदलना कम हुआ। नयनमटक्का करने की आदत ने एक जगह से मन भटका कर दुसरे सुन्दर चेहरे पर टीका दिए।
लेकिन फिर भी श्याम, मंजरी से मिल कर बोला ’’ मैंने घर में, हमारे बारे में बात की लेकिन वो नहीं माने। तुम मेरा फिर भी साथ दोगी ?’’
मंजरी ने आश्वस्त करते हुए कहा कि ’’ आज नहीं कल वो लोग जरूर मानेंगे, उनको मानना ही होगा। ’’
श्याम ने विशात बदलकर अपनी चाल चल दी। भोली मंजरी श्याम की बेवफायी को थोड़ा भी न भांप सकी।
वो मिलन स्थल और नदी का किनारा आज भी वहीं है, मगर उस पत्थर पर बैठनेवाले प्रेमी जोड़े में एक का चेहरा नया है और श्याम और छाया का मिलन रोज ही और बहूत ज्यादा हो रहा है। मंजरी मिलन के लिए श्याम से मिलना चाह रही है और उसने रास्ता बदल लिया है।
समाप्त।