गांधीनगर के चौड़े, शांत रास्तों और वीआईपी सेक्टरों के बीच मयूर की दुनिया बेहद चमचमाती थी। उसके पिता गुजरात के जाने-माने रियल एस्टेट और टेक्सटाइल टायकून थे। शहर की सबसे ऊंची इमारतों में उनका नाम चमकता था। मयूर ने विदेश से पढ़ाई की थी और अब पिता के एक बड़े प्रोजेक्ट में चीफ ऑपरेशनल डायरेक्टर था। उसके पास वो सब कुछ था जिसे दुनिया कामयाबी कहती है—कलाई पर महंगी घड़ियाँ, गैराज में खड़ी जर्मन गाड़ियाँ और एक ऐसा रुतबा जो लोगों को झुकने पर मजबूर कर दे।
लेकिन इस चकाचौंध के बीच मयूर के अंदर एक अजीब सी खाली जगह थी। उसे न तो उम्र भर के वादों में दिलचस्पी थी, न ही रिश्तों की उलझनों में। उसे सिर्फ़ रोमांस चाहिए था। वो नर्म छुअन, वो बेचैन निगाहें, वो रात की नशीली गर्माहट और वो पल जब कोई अपना पूरा वजूद उसके आगे खोलकर रख दे। उसे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि यह नशा उसे प्यार से मिले या उसकी बेहिसाब दौलत से। उसके लिए ज़िंदगी एक ऐसा बाज़ार थी जहाँ हर चीज़ की एक कीमत तय की जा सकती थी—यहाँ तक कि किसी की बाहों में बिताए गए लमहे भी।
शहर के हाई-प्रोफाइल लाउंज और वीकेंड क्लबों में मयूर अक्सर लड़कियों से मिलता। उसके पास आकर्षण भी था और पैसे की ताकत भी। वह लड़कियों पर बेशकीमती तोहफे लुटाता, महंगे डिनर कराता और उन्हें यह एहसास दिलाता कि वह उन्हें खरीद सकता है। पर यहीं पर उसका सामना एक अजीब कड़वी हकीकत से होता।
जिन लड़कियों से मयूर की मुलाकात होती, वे उसकी दौलत देखकर आकर्षित तो होती थीं, लेकिन जब बात जिस्मानी नजदीकियों की आती, तो समीकरण पूरी तरह बदल जाता था। उन लड़कियों को शारीरिक मिलन, वह चरम सुख और वह आग तो चाहिए थी, लेकिन वे इसे किसी सौदे का नाम नहीं देना चाहती थीं। उन्हें जिस्म की तलब थी, पर वे उसे 'सच्चे प्यार' के नाम के पीछे छिपाना चाहती थीं।
"मयूर, मुझे तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए," रिया ने एक रात मयूर के पेंटहाउस की बालकनी में कहा था, जब मयूर ने उसके सामने एक महंगा डायमंड ब्रेसलेट रख दिया था। रिया ने वाइन का घूंट भरते हुए मयूर की शर्ट का कॉलर पकड़ा और उसकी आँखों में देखते हुए फुसफुसाई, "मुझे तो तुम चाहिए... तुम्हारी सांसें, तुम्हारा स्पर्श। बस यह कह दो कि तुम मुझसे प्यार करते हो।"
रिया को वह रात मयूर के साथ पूरी शिद्दत से गुज़ारनी थी, वह उस उन्माद की भूखी थी, लेकिन वह खुद को किसी सौदे की भागीदार नहीं दिखाना चाहती थी। उसे अपनी हवस को ढकने के लिए प्यार का एक पर्दा चाहिए था। मयूर ने उस रात उसे अपनी बाहों में तो भरा, लेकिन उसके होंठों से 'प्यार' का झूठा इज़हार सुनकर मयूर का दिल अजीब सी वितृष्णा से भर गया। उसे समझ नहीं आता था कि लोग सच को इतना घुमाते क्यों हैं। अगर जिस्म की भूख है, तो उसे सीधे स्वीकार क्यों नहीं करते? उसे प्यार का पवित्र चोला पहनाने का पाखंड क्यों?
कुछ हफ़्तों बाद तन्वी आई। तन्वी एक महत्वाकांक्षी मॉडल थी, जो मयूर के साथ क्लबों में घूमती। एक रात होटल के सुइट में, जब माहौल बेहद गरम हो चुका था और तन्वी के हाथ मयूर के सीने पर रेंग रहे थे, उसने अचानक रुककर मयूर से पूछा, "मयूर, क्या हम सिर्फ़ दोस्त हैं? या तुम्हारे दिल में मेरे लिए कुछ गहरा है? मैं किसी के साथ यूँ ही नहीं सो सकती... मुझे पहले वो जज़्बात महसूस होने चाहिए।"
मयूर उसकी आँखों में देख रहा था। वह साफ़ देख सकता था कि तन्वी की सांसें बेकाबू थीं, उसकी उँगलियाँ मयूर के बदन को छूने के लिए तड़प रही थीं, लेकिन उसकी ज़ुबान पर फिर वही रटा-रटाया डायलॉग था। मयूर ने सिगरेट जलाई और खिड़की की तरफ मुड़ गया। उसने कहा, "तन्वी, मैं तुम्हें कार दे सकता हूँ, ट्रिप स्पॉन्सर कर सकता हूँ, बेहतरीन रात दे सकता हूँ। पर प्यार? वो ढोंग मुझसे नहीं होता।"
उस रात तन्वी ने नाराजगी का नाटक किया, लेकिन कुछ ही मिनटों बाद जब मयूर ने उसे अपनी तरफ खींचा, तो उसने खुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। अगली सुबह वह फिर वही साबित करने में जुटी थी कि उसने यह सब सिर्फ़ इसलिए किया क्योंकि वह मयूर से 'जुड़ाव' महसूस करती थी, न कि सिर्फ़ शारीरिक प्यास के चलते।
मयूर इस लगातार चलते पाखंड से थकने लगा था। वह खुद बिल्कुल साफ़ था—उसे रोमांस चाहिए था, चाहे प्यार से मिले या पैसे से। वह अपने इरादों को लेकर बेबाक था। लेकिन उसके सामने आने वाली औरतें पैसे के ज़रिए मिलने वाले ऐशो-आराम को तो भोगना चाहती थीं, जिस्मानी प्यास भी बुझाना चाहती थीं, पर उस रिश्ते को 'खरीदा हुआ' मानने से उनकी ईगो आहत होती थी। उन्हें अपनी वासना को जायज़ ठहराने के लिए 'इश्क़' की झूठी चाशनी की सख्त ज़रूरत थी।
एक शाम गांधीनगर के साबरमती रिवरफ्रंट के पास एक शांत रूफटॉप कैफ़े में मयूर अकेला बैठा था। हवा में हल्की ठंडक थी। उसके सामने एक आर्टिस्ट लड़की, काव्या बैठी थी, जिससे उसकी मुलाकात एक एग्ज़ीबिशन में हुई थी। काव्या बाकी लड़कियों से थोड़ी अलग दिखती थी, लेकिन मयूर अब हर किसी को उसी तराजू में तौलने लगा था।
"तुम हमेशा इतने सीधे और रूखे क्यों रहते हो, मयूर?" काव्या ने कॉफ़ी का कप रखते हुए पूछा।
मयूर ने मुस्कुराते हुए अपनी घड़ी ठीक की। "क्योंकि मैं चीज़ों को उनके असली नाम से बुलाता हूँ। मुझे घुमावदार बातें पसंद नहीं। ज़िंदगी में रोमांस और स्पर्श बहुत खूबसूरत चीज़ें हैं, लेकिन लोग इसे इतना जटिल बना देते हैं कि मज़ा ही किरकिरा हो जाता है। कोई पैसों से बिकना नहीं चाहता, पर पैसों की छांव में प्यार का ढोंग करके वो सब पाना चाहता है जो उसे असल में चाहिए।"
काव्या ने उसे गौर से देखा। "और तुम्हें क्या चाहिए?"
"मुझे सिर्फ़ वो पल चाहिए जब दो जिस्म एक-दूसरे में पिघल जाएं। अगर वो प्यार से होता है, तो बेहतरीन। अगर वो मेरी हैसियत या पैसे की वजह से मुमकिन है, तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं। पर मुझे वो औरतें समझ नहीं आतीं जो बिस्तर पर केवल जिस्मानी आग बुझाने आती हैं, लेकिन खुद को पाक-साफ़ दिखाने के लिए उस आग को 'सच्चे प्यार' का नाम दे देती हैं।"
काव्या कुछ देर चुप रही, फिर उसने मयूर की आँखों में झांकते हुए एक रहस्यमयी मुस्कान दी। "शायद वे डरती हैं, मयूर। समाज ने मर्दों की हवस को तो फिर भी नाम दे दिया, लेकिन औरतों की जिस्मानी भूख को हमेशा गलत समझा। इसलिए वे उस भूख को मिटाने के लिए प्यार का बहाना बनाती हैं ताकि खुद की नज़रों में न गिरें।"
मयूर ने पहली बार किसी को यह सच इतनी सादगी से कुबूल करते सुना था। उस रात, कैफ़े से निकलते वक्त जब मयूर ने काव्या का हाथ थामा, तो उसमें न कोई झूठा वादा था, न कोई लेन-देन की शर्त।
गांधीनगर की सुनसान सड़कों पर मयूर की तेज़ रफ़्तार गाड़ी के अंदर एक अजीब सा ठहराव था। मयूर को एहसास हुआ कि इस दुनिया में लोग पैसे से चीज़ें तो खरीद सकते हैं, लेकिन जब तक इंसान अपने भीतर की सच्ची भूख और अपनी असलियत को बिना किसी मुखौटे के स्वीकार न कर ले, तब तक न तो पैसे से मिला रोमांस सुकून देता है और न ही प्यार के नाम पर किया गया जिस्मानी समझौता। वह शहर अब भी दौड़ रहा था, हज़ारों चेहरों पर झूठे नकाब थे, और मयूर उसी भीड़ के बीच अपनी उस बेपरवाह, बेनकाब तलाश को जारी रखे हुए था।