कंधों पर आसमान Mayur Chaudhary द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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कंधों पर आसमान


उस दिन घर का आंगन लोगों से भरा हुआ था, लेकिन बाईस साल के कबीर की दुनिया पूरी तरह वीरान हो चुकी थी। उसके पिता, राघवजी, महज उनचास साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से अचानक दुनिया छोड़ गए थे। उनचास साल कोई जाने की उम्र नहीं होती। राघवजी घर के मजबूत स्तंभ थे; एक छोटी सी कपड़े की दुकान, सिर पर पुराना कर्ज़, मां का गिरता स्वास्थ्य और कॉलेज में पढ़ती छोटी बहन अनन्या—सब कुछ उनके ही कंधों पर टिका था।
पिता की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि कबीर के सामने जिम्मेदारियों का पहाड़ खड़ा हो गया। कबीर अभी कॉलेज के अंतिम वर्ष में था। उसके सपने हवा में तैर रहे थे—एमबीए करना, किसी बड़े शहर में नौकरी पाना और एक बेफिक्र जिंदगी जीना। लेकिन एक ही रात में किस्मत ने पासा पलट दिया था।
शुरुआती पंद्रह दिन जैसे एक धुंध में बीते। रिश्तेदार दिलासा देकर अपने-अपने घरों को लौट गए। सोलहवें दिन जब घर का राशन खत्म होने लगा और बैंक से होम लोन की किश्त का नोटिस आया, तब कबीर को अहसास हुआ कि रोने और शोक मनाने का वक्त भी अब उसके पास नहीं बचा है। मां कोने में गुमसुम बैठी रहती थी और अनन्या की आंखों में अपनी पढ़ाई छूट जाने का डर साफ झलक रहा था।
कबीर ने पिता की अलमारी खोली। वहां हिसाब-किताब की लाल डायरी रखी थी। दुकान का किराया, थोक व्यापारियों का उधार और बैंक की देनदारियां—सब कुछ मिलाकर रकम बहुत बड़ी थी। कबीर ने डायरी बंद की, शीशे के सामने खड़ा हुआ और अपनी आंखों के आंसू पोंछे। उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह अपने पिता के नाम और परिवार को बिखरने नहीं देगा।
अगली सुबह कबीर ने पिता की पुरानी साइकिल उठाई और सीधे दुकान की ओर चल पड़ा। ताला खोलते वक्त उसके हाथ कांप रहे थे। यह वही दुकान थी जहां वह कभी-कभी सिर्फ जेब खर्च मांगने आया करता था, लेकिन आज वह वहां मालिक बनकर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की ढाल बनकर खड़ा था।
शुरुआत बेहद कठिन थी। थोक व्यापारियों को बाईस साल के नौसिखिए लड़के पर भरोसा नहीं था। वे पुराना बकाया चुकाने का दबाव बनाने लगे। कबीर ने हाथ जोड़कर सभी से वक्त मांगा। उसने कहा, "मेरे पिताजी ने कभी किसी का एक रुपया नहीं डुबोया। मैं उनका बेटा हूं, थोड़ा समय दीजिए, सबका पाई-पाई चुकाऊंगा।"
कबीर ने अपनी दिनचर्या पूरी तरह बदल दी। सुबह पांच बजे उठकर पढ़ाई करना, फिर दुकान जाना, ग्राहकों की पसंद को समझना, नए फैशन के हिसाब से माल मंगाना और रात को देर तक बैठकर पाई-पाई का हिसाब जोड़ना। उसने अपने सारे शौक, दोस्तों के साथ घूमना और आराम को किनारे रख दिया।
कबीर ने समझदारी दिखाते हुए दुकान में कुछ नए बदलाव किए। उसने सोशल मीडिया के जरिए स्थानीय युवाओं तक कपड़े पहुंचाने शुरू किए और होम डिलीवरी की सुविधा दी। उसकी विनम्रता, मेहनत और ईमानदारी देखकर धीरे-धीरे पुराने ग्राहक वापस लौटने लगे।
दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदले। कबीर की मेहनत रंग लाने लगी। उसने सबसे पहले छोटी बहन अनन्या की कॉलेज की फीस भरी, ताकि उसकी पढ़ाई में कोई रुकावट न आए। फिर हर महीने थोड़ी-थोड़ी बचत करके उसने पिता के पुराने कर्ज़ चुकाने शुरू किए।
दो साल का समय किसी तपस्या की तरह बीता। इन दो सालों में कबीर ने न सिर्फ पिता की छोटी सी दुकान को एक मुनाफेदार शोरूम में बदल दिया, बल्कि बैंक का सारा लोन भी चुकता कर दिया। उसने अपनी कॉलेज की डिग्री भी अच्छे अंकों के साथ पूरी की।
अनन्या की ग्रेजुएशन पूरी होने के दिन जब उसे गोल्ड मेडल मिला, तो उसने मंच से उतरकर मेडल सीधे कबीर के गले में डाल दिया। मां ने कबीर के माथे को चूमते हुए नम आंखों से कहा, "बेटा, आज अगर तेरे बाबूजी होते, तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। तूने उनचास साल के पिता की विरासत को अपने युवा कंधों पर इतनी खूबसूरती से संभाला है।"
कबीर ने दीवार पर टंगी अपने पिता की तस्वीर की तरफ देखा। माला के पीछे से राघवजी की मुस्कुराती आंखें जैसे कह रही थीं, "मुझे तुम पर गर्व है, मेरे बेटे।" कबीर को समझ आ गया था कि जिंदगी हालात से नहीं, बल्कि हौसलों और जिम्मेदारी उठाने की ताकत से जीती जाती है।