अतृप्त देह Mayur Chaudhary द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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अतृप्त देह

शहर के एक पॉश अपार्टमेंट की बालकनी में खड़ी सुनैना जब रात के सन्नाटे को देखती, तो उसकी अपनी सांसों की गर्माहट उसे बेचैन कर देती। बत्तीस साल की उम्र में पति को खोने के बाद दुनिया ने उस पर सादगी और संन्यास का जो लबादा ओढ़ा दिया था, वह उसकी रगों में दौड़ते लहू को ठंडा नहीं कर सका था। समाज के लिए वह एक शांत और संभ्रांत विधवा थी, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे उसकी देह स्पर्श, सुख और तृप्ति की एक गहरी आग में झुलस रही थी।
उसकी इस गुप्त यात्रा का पहला सिरा विक्रम था। विक्रम उसके पति का पुराना दोस्त था, जो सांत्वना देने के बहाने घर आने लगा। एक बारिश भरी शाम, चाय की प्याली थमाते वक्त जब विक्रम की उंगलियां सुनैना की कलाई से छुईं, तो भीतर दबा हुआ सूखा बिखर गया। उस रात बेडरूम की मंद रोशनी में सुनैना ने अपनी देह को वर्षों बाद किसी मर्द के आगोश में सौंप दिया। लेकिन विक्रम के लिए यह सिर्फ एक आसान मौका था, जिसे वह बार-बार भुनाना चाहता था। सुनैना को जल्द ही समझ आ गया कि यहाँ सिर्फ हवस है, ठहराव नहीं।
इसके बाद उसकी ज़िंदगी में आया अरहान—एक युवा फिटनेस ट्रेनर। अरहान के सुगठित शरीर और बेबाक नज़रों ने सुनैना के भीतर की दबी हुई कामुकता को पूरी तरह जगा दिया। जिम के बाद शुरू हुआ यह सिलसिला अरहान के अपार्टमेंट तक पहुँच गया। अरहान के साथ के पलों में एक जंगली वेग था, जिसने सुनैना की देह के हर हिस्से को तृप्त करने की कोशिश की। यह रिश्ता विशुद्ध रूप से शारीरिक था, जहाँ हर मुलाकात पसीने, तेज सांसों और बेलगाम आलिंगन के साथ खत्म होती थी।
पर मन की भूख अब भी अधूरी थी। तभी उसकी मुलाकात देव से हुई, जो एक आर्किटेक्ट और तलाकशुदा था। देव के साथ रिश्तों में एक नफासत थी। एक रिसॉर्ट की वीकेंड ट्रिप पर, वाइन के घूंट और मंद संगीत के बीच देव के सधे हुए हाथों ने जब सुनैना के जिस्म को छुआ, तो उसे महसूस हुआ कि जिस्मानी सुख में संवेदना की गहराई क्या होती है। लेकिन देव अपनी पुरानी ज़िंदगी के तनाव से बाहर नहीं निकल सका और दूर हो गया।
चौथा पड़ाव था कबीर, एक बेपरवाह लेखक। कबीर ने सुनैना को किसी बंधन में नहीं बांधा। उसकी नजरों में सुनैना सिर्फ एक खूबसूरत, जीवंत स्त्री थी। कबीर के साथ के रिश्ते में कोई गिल्ट नहीं था, केवल दो आज़ाद शरीरों और रूहों का उन्मुक्त मिलन था।
पाँचवाँ रिश्ता एक युवा सहकर्मी राघव के साथ बना, जहाँ उम्र का फासला मिट गया और सिर्फ आकर्षण की तीव्रता बाकी रही। राघव का उत्साह और सुनैना का अनुभव जब मिले, तो सुनैना ने अपनी इच्छाओं की हर उस सीमा को पार कर लिया जिसे समाज ‘पाप’ कहता है।
अलग-अलग मर्दों के स्पर्श, अलग-अलग कमरों की गर्माहट और कई अनुभवों से गुजरने के बाद, एक रात सुनैना ने शीशे के सामने खड़े होकर अपनी नग्न देह को देखा। उसके चेहरे पर अब किसी समाज का डर नहीं था और न ही कोई पछतावा।
उसने यह सच्चाई दिल से स्वीकार कर ली थी कि विधवा हो जाने से एक औरत की शारीरिक और मानसिक ज़रूरतें नहीं मर जातीं। उसने अपनी देह, अपनी भूख और अपनी आज़ादी को पूरी तरह अपना लिया था—बिना किसी पाखंड के, अपनी शर्तों पर।