रूह, जिस्म और वो Mayur Chaudhary द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • अनकहा सच (भाग -5)

    अनकहा सच___राजू और हितेश घर जाने के लिए निकल पड़े।हितेश आज ब...

  • पत्थर तले

                    &nbs...

  • Dangerous Love - 13

    डेविड: सोचो, इस समय तुम्हारी माँ घर पर अकेली होगी। अगर इस सम...

  • रूह का आखिरी सफर

    प्लेटफार्म नंबर चार पर जैसे मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था। दिसं...

  • do dilo ka intezar

    दो दिलों का इंतज़ारएक छोटे से गाँव में मोहित नाम का एक लड़का...

श्रेणी
शेयर करे

रूह, जिस्म और वो

पहाड़ों की ढलानों पर घने चीड़ के जंगलों के बीच बनी वह पुरानी औपनिवेशिक हवेली पिछले कई दशकों से वीरान पड़ी थी। बाहर सन्नाटे को चीरती बर्फीली हवाएं चल रही थीं और आसमान में बादलों के बीच से आधा अधूरा चांद कभी छिपता तो कभी झांकता। मयूर ने इस हवेली को अपनी रिसर्च के सिलसिले में एक हफ्ते के लिए किराए पर लिया था। उस सुनसान, डरावनी रात में वह लिविंग रूम की चिमनी के सामने बैठा आग ताप रहा था, जब दरवाज़े पर हल्की, लेकिन साफ़ तीन दस्तकें हुईं।
मयूर चौंक गया। इतनी रात गए इस वीराने में कौन आ सकता था? उसने हिचकिचाते हुए भारी लकड़ी का दरवाज़ा खोला। सामने अनामिका खड़ी थी। उसके बदन पर भीगी हुई लाल शिफॉन की साड़ी लिपटी थी, जो उसके जिस्म से पूरी तरह चिपकी हुई थी। बिखरे हुए काले बाल, दूधिया संगमरमर जैसा सफेद रंग और गहरी, सम्मोहक आँखें, जिनमें एक अजीब सी चमक थी। उसके होंठ हल्के नीले पड़ चुके थे, मानो बहुत देर से ठंड में भटक रही हो।
"मेरी गाड़ी नीचे घाटी में बंद हो गई... क्या मैं कुछ देर यहाँ रुक सकती हूँ?" अनामिका की आवाज़ में एक अजीब सा खिंचाव और कम्पन था, जो मयूर की रीढ़ में सनसनी पैदा कर गया।
मयूर ने बिना कुछ सोचे उसे अंदर आने का रास्ता दे दिया। उसने अनामिका को चिमनी के पास सोफे पर बिठाया और एक ऊनी शॉल लाकर उसके कंधों पर डाल दी। अनामिका ने शॉल को धीरे से हटा दिया और मयूर की आँखों में सीधा देखा। उसकी आँखों में कोई झिझक या डर नहीं था, बल्कि एक बेचैन, दहकती हुई प्यास साफ़ नज़र आ रही थी।
"मुझे इस आग से गर्माहट नहीं मिल रही, मयूर," अनामिका ने फुसफुसाते हुए कहा। मयूर सिहर उठा—उसने तो अभी अपना नाम बताया भी नहीं था। लेकिन उस सम्मोहन में वह इस बात पर गौर ही नहीं कर पाया। अनामिका का रूप, उसकी गीली त्वचा से उठती चंदन और पुरानी मिट्टी जैसी विचित्र महक, मयूर की सोचने-समझने की शक्ति को शून्य कर रही थी।
अनामिका उठी और मयूर के करीब आ गई। उसने अपना बर्फ सा ठंडा हाथ मयूर के सीने पर रख दिया। उस बर्फीले स्पर्श के बावजूद मयूर के अंदर एक बेकाबू आग भड़क उठी। यह डर और वासना का ऐसा अजीब संगम था, जिसने मयूर को अपनी जगह पर जड़ कर दिया। अनामिका के होंठ मयूर की गर्दन के पास पहुंचे, उसकी ठंडी सांसें मयूर की त्वचा को छू रही थीं।
"बहुत सदियों से प्यासी हूँ..." अनामिका की फुसफुसाहट कमरे के सन्नाटे में गूंजी।
मयूर ने अपना सारा संयम खो दिया। उसने अनामिका की पतली कमर को अपनी बाहों में जकड़ लिया। उसका जिस्म बर्फ की तरह ठंडा था, लेकिन जैसे ही मयूर के होंठ उसके होंठों से मिले, एक अजीब सी ऊर्जा मयूर के भीतर खिंचने लगी। यह चुंबन गहरा, उन्मादी और खतरनाक था। अनामिका की उंगलियां मयूर की पीठ में गड़ने लगीं, मानो वह उसकी खाल में उतर जाना चाहती हो।
कमरे की मोमबत्तियां अचानक फड़फड़ाने लगीं। चिमनी की आग का रंग लाल से हल्का नीला पड़ने लगा। मयूर को अनामिका के आलिंगन में एक असीम आनंद की अनुभूति हो रही थी, लेकिन साथ ही उसके जिस्म की ताकत धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही थी। अनामिका की पकड़ और मज़बूत होती गई, उसका स्पर्श अब सिर्फ़ वासना का नहीं, बल्कि मयूर की ज़िंदगी को चूसने का ज़रिया बन रहा था।
मयूर ने उस मादक धुंध में आंखें खोलीं। चिमनी के ऊपर लगे पुराने आईने में उसकी नज़र पड़ी। आईने का दृश्य देखकर उसकी रूह कांप गई—सोफे पर मयूर अकेला खड़ा था, उसकी बाहें हवा में लिपटी थीं, और उसके कंधे पर एक कंकाल का हाथ टिका हुआ था।
मयूर ने झटके से पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन अनामिका का चेहरा अब बदलने लगा था। उसकी दूधिया त्वचा पर झुर्रियां और सड़न उभर आई थी, आँखें पूरी तरह काली और खोखली हो चुकी थीं। उसके होंठों पर एक भयानक, शैतानी मुस्कान थी।
"अब देर हो चुकी है, मयूर... तुम मेरे हो चुके हो," उस खौफ़नाक साए की आवाज़ हवा में गूंजी।
मयूर चीखना चाहता था, पर उसके गले से आवाज़ नहीं निकली। अनामिका के साए ने उसे फिर से अपनी आगोश में खींच लिया। उस ठंडे, घातक स्पर्श में वासना की आखिरी चिंगारी जलकर राख हो गई, और हवेली के उस सन्नाटे में मयूर की सांसें हमेशा के लिए घुट गईं। अगली सुबह जब सूरज की किरणें खिड़की से अंदर आईं, तो कमरे में सिर्फ़ सन्नाटा था—और चिमनी के पास पड़ा एक बुझा हुआ अंगारा।