“कभी-कभी हम इसलिए नहीं थकते कि ज़िंदगी बहुत मुश्किल है। हम इसलिए थक जाते हैं क्योंकि हमारा मन शांत रहना भूल चुका है।”
कल शाम मैं अपने पसंदीदा शो का सिर्फ एक एपिसोड देखने बैठा। सिर्फ एक। मैंने खुद से पक्का वादा किया था कि चालीस मिनट देखूँगा, थोड़ा मन बहलाऊँगा और फिर सीधे अपने ज़रूरी काम में लग जाऊँगा।
लेकिन इससे पहले कि स्क्रीन पर शो शुरू होता, मेरी उँगलियाँ अपने आप चलने लगीं।
हाथ ने खुद-ब-खुद फ़ोन उठा लिया।
एक रील..
फिर दूसरी..
फिर किसी का एक मैसेज आ गया...
कॉलेज के पुराने दोस्त की छुट्टियों की कुछ तस्वीरें दिखीं। फिर एक ऐसी रेसिपी की रील आ गई जिसे मैं ज़िंदगी में कभी बनाने वाला नहीं था।
देखते ही देखते मैं इंस्टाग्राम के पन्ने पलटता चला गया, बिना यह याद किए कि मैंने फ़ोन उठाया ही क्यों था।
जब नज़र दीवार पर टंगी घड़ी पर पड़ी, तो होश उड़ गए। पूरा एक घंटा हवा में ग़ायब हो चुका था।
अजीब बात यह नहीं थी कि वक़्त बर्बाद हुआ।
अजीब बात यह थी कि उस एक घंटे के बाद मैं कैसा महसूस कर रहा था। न कोई खुशी थी, न ताजगी, न कोई नई ऊर्जा।
आँखें भारी थीं, सीने में एक अजीब सा खालीपन था और दिमाग में एक बेचैन कर देने वाली खुजली चल रही थी।
मैंने तय किया कि अब बस। फ़ोन को उल्टा करके मेज़ पर रख दिया।
लेकिन मुश्किल से पाँच मिनट बीते होंगे कि बिना सोचे-समझे हाथ फिर से उसी स्क्रीन की तरफ बढ़ गया।
अपनी इस हरकत पर मुझे खुद पर हँसी भी आई, लेकिन अंदर ही अंदर एक मायूसी भी हुई।
मुझे किसी ज़रूरी काम की तलाश नहीं थी।
न कोई ज़रूरी ईमेल आना था, न कोई आफ़त आ गई थी।
मैं तो बस अपने दिमाग के लिए उस छोटे से 'फील-गुड' अहसास की भीख माँग रहा था।
कोई हँसाने वाला वीडियो, कोई नया नोटिफिकेशन, स्क्रीन पर लाल रंग का कोई दायरा, किसी अजनबी की चमकती ज़िंदगी। बस कुछ भी ऐसा, जो मुझे उस ख़ामोशी से दूर रखे।
यही है आज के दौर का डोपामाइन जाल।
हम फ़ोन इसलिए नहीं उठाते कि हमें कुछ ज़रूरी करना है।
हम इसे इसलिए उठाते हैं क्योंकि हम बोर हो रहे होते हैं, अकेले होते हैं, थके होते हैं, या फिर चुपचाप अपने ही ख्यालों के साथ बैठने से घबराते हैं।
हमने अपने दिमाग को हर पल लगातार उत्तेजना का आदी बना दिया है, यहाँ तक कि अब तीस सेकंड की शांति भी भारी लगने लगती है।
चाय उबलने का इंतज़ार? फ़ोन।
लिफ्ट में खड़े हैं? फ़ोन।
अकेले खाना खा रहे हैं? फ़ोन।
रात को सोने जा रहे हैं? तब तक फ़ोन, जब तक आँखों में जलन न होने लगे।
जब दिमाग को हर तीन सेकंड में नए तमाशे की आदत पड़ जाती है, तो आम ज़िंदगी बेस्वाद लगने लगती है। बिना स्क्रीन के चाय की चुस्की अधूरी लगती है।
अपनों के साथ लंबी, धीमी बातें बोझिल लगने लगती हैं।
कानों में इयरफ़ोन लगाए बिना शाम की सैर सुनी लगती है। और बालकनी में चुपचाप हाथ पर हाथ रखकर बैठना वक़्त की बर्बादी लगने लगता है।
हमने सिर्फ अपना ध्यान केंद्रित करने की ताकत ही नहीं खोई, हमने सादगी का स्वाद भी खो दिया है।
कुछ दिन पहले मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया।
एक कप अदरक वाली चाय बनाई, फ़ोन को दूसरे कमरे में चार्जिंग पर छोड़ दिया और खिड़की के पास आकर बैठ गया।
पहले दो मिनट मन बुरी तरह छटपटाया।
उसने आवाज़ दी कि वक़्त बर्बाद हो रहा है, कम से कम कोई पॉडकास्ट सुन लो या कुछ पढ़ ही लो।
मैंने एक गहरी साँस ली और उस बेचैनी को किनारे कर दिया।
कुछ नहीं हुआ।
न कोई घंटी बजी, न कोई नोटिफिकेशन, न दुनिया भर की कोई खबर। बस हाथ में चाय की गर्माहट थी।
और धीरे-धीरे, कमरा जीवंत होने लगा।
मैंने छत के पंखे की लयबद्ध आवाज़ सुनी।
खिड़की से अंदर आती शाम की सुनहरी धूप को फर्श पर फैलते देखा।
बाहर हल्की बारिश के बाद उठती गीली मिट्टी की महक महसूस की। घर पूरी तरह शांत था, और पूरे हफ्ते में पहली बार, मुझसे किसी को कोई उम्मीद या माँग नहीं थी।
वह बेहद मामूली सा पल था, लेकिन उसने मन को भीतर तक शांत कर दिया।
मुझे समझ आया कि हम अपनी ज़िंदगी के कितने हसीन हिस्से सिर्फ इसलिए गँवा देते हैं क्योंकि हमारी आँखें उस चमकती हुई काँच की स्क्रीन पर किसी और की ज़िंदगी के तमाशे ढूँढने में उलझी रहती हैं।
खुशी अगली रील, अगले पोस्ट या अगले नोटिफिकेशन में नहीं छिपी है।
वह कोई एल्गोरिदम नहीं है। वह तो बस आपके ठीक पास खामोशी से बैठी है, इस इंतज़ार में कि कब आप स्क्रीन से नज़रें हटाकर उसकी तरफ देखें।
सबक:
स्क्रीन पर लगातार मिलने वाले छोटे-छोटे रोमांच की तलाश में असली ज़िंदगी को उबाऊ मत बनने दीजिए। कभी-कभी सबसे गहरा सुकून उसी पल मिलता है, जब आप अपने मन को भागने के लिए कोई वजह नहीं देते।