हर बार हाँ , खुद को ना Madhavi Tripathi द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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हर बार हाँ , खुद को ना

दूसरों के लिए हर बार “हाँ” कहना, कहीं अपने लिए “ना” कहना तो नहीं बन जाता?

आज मैंने अपने भीतर एक बात महसूस की, मैं कितनी आसानी से “हाँ” कह देती हूँ, तब भी जब मेरा मन पूरी तरह तैयार नहीं होता।


इसलिए नहीं कि मैं हमेशा वह काम करना चाहती हूँ…

बल्कि इसलिए कि मैं किसी को निराश नहीं करना चाहती, किसी का दिल नहीं दुखाना चाहती या किसी को असहज महसूस नहीं कराना चाहती।

सुबह किसी ने मुझसे एक छोटा-सा काम करने को कहा। मैं पहले से ही कई कामों में व्यस्त थी। फिर भी मेरी पहली प्रतिक्रिया थी “हाँ”।

और मैंने हाँ कह भी दी।

लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ा, मुझे भीतर हल्की-सी चिड़चिड़ाहट महसूस होने लगी। उस काम की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए कि मैंने अपनी क्षमता से ज़्यादा ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी।

तभी मुझे एहसास हुआ कि कई बार दूसरों के लिए “हाँ” कहना, अपने ही साथ अन्याय बन जाता है।

दिन में फिर एक ऐसी ही स्थिति आई। किसी ने मुझसे एक और काम करने को कहा। मैं वह काम कर सकती थी, लेकिन उसके लिए मुझे अपनी प्राथमिकताएँ बदलनी पड़तीं।

इस बार मैंने तुरंत जवाब नहीं दिया।

मैंने सिर्फ़ इतना कहा: 

“मैं इसे थोड़ी देर बाद कर दूँगी।”

यह पूरी तरह “ना” नहीं था, लेकिन यह एक ईमानदार जवाब था। इससे मुझे थोड़ा समय मिला।

और सबसे अच्छी बात यह रही कि कुछ भी गलत नहीं हुआ।

न कोई नाराज़ हुआ, न कोई समस्या खड़ी हुई।

उसी पल मुझे समझ आया कि हम अक्सर “ना” कहने के परिणामों को वास्तविकता से कहीं ज़्यादा बड़ा मान लेते हैं।

दोपहर में मैंने यही आदत घर के छोटे-छोटे कामों में भी देखी। मैं एक ज़रूरी काम कर रही थी और उसी समय कई छोटे-छोटे अनुरोध आने लगे।

पहले मैं अपना काम बीच में छोड़कर हर काम तुरंत करने लग जाती थी।

लेकिन आज मैंने जल्दबाज़ी नहीं की।

पहले अपना काम पूरा किया, फिर बाकी काम शांति से किए।

और आश्चर्य की बात यह रही कि सब कुछ फिर भी हो गया बस इस बार बिना तनाव के।

तब मुझे समझ आया कि “ना” कहना दूसरों को ठुकराना नहीं है…

यह अपने समय, अपनी ऊर्जा और अपनी मानसिक शांति का सम्मान करना है।

इसके लिए कठोर होने की ज़रूरत नहीं होती।

ऊँची आवाज़ में बोलने की भी ज़रूरत नहीं होती।

कई बार यह सिर्फ़ थोड़ा-सा इंतज़ार होता है…

एक छोटी-सी सीमा तय करना होता है…

और खुद पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ न डालने का एक सरल निर्णय होता है।

दिन के अंत में मुझे अपने ऊपर पहले से ज़्यादा नियंत्रण महसूस हुआ।

इसलिए नहीं कि मैंने कम काम किए….

बल्कि इसलिए कि मैंने हर बात पर बिना सोचे-समझे “हाँ” नहीं कहा।

मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि हर समय हर किसी के लिए उपलब्ध रहना ताकत नहीं है।

असल ताकत यह जानना है कि कब रुकना है और कब अपनी सीमाओं का सम्मान करना है।

आज मैंने हर बात पर “ना” कहना शुरू नहीं किया….

लेकिन हर बात पर “हाँ” कहना ज़रूर छोड़ दिया।

सीख

आपको हर किसी के लिए हर समय उपलब्ध होने की ज़रूरत नहीं है। अपने समय, अपनी ऊर्जा और अपनी मानसिक शांति की रक्षा करना भी आत्मसम्मान का ही एक रूप है।

✍️ यह लेख लेखिका माधवी त्रिपाठी की आगामी पुस्तक का एक अध्याय है।

पढ़ने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद।

यदि इस लेख ने आपको सोचने पर मजबूर किया या आपके मन को छुआ, तो से जुड़ी ऐसी ही प्रेरक सीखों के लिए इस लेखिका की आगामी रचनाओं से जुड़े रहें।