नेपाल में जलप्रलय Virendra Dewangan द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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नेपाल में जलप्रलय

नेपाल-तिब्बत सीमा में 26 अगस्त को बर्फ और चट्टानों के ढहने या कहें कि हिमस्खलन से नेपाल के भोटेकाशी व त्रिशुली नदियों में जो अति प्रलयंकारी बाढ़ आई, उससे उत्तरी व मध्य नेपाल में सैकड़ों कस्बे व गांव तबाह होकर मलबे में बदल गए।

प्राप्त मानव शवों के आधार पर मृतकों की गणना 1,127 तक पहुंच गई और करीब 5000 लोग लापता हो गए, जो संभवतः मलबे के नीचे दबकर रह गए। इसमें भारत सहित दुनियाभर के विदेशी सैलानी समाहित हैं।

नेपाल के शहरी विकास और भवन निर्माण विभाग के शुरूआती आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, "रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा और चितवन जिलों में करीब 7,570 घर क्षतिग्रस्त हुए हैं। इसमें से 1,253 घर पूरी तरह से ढह गए हैं। इन इलाकों में 45 सरकारी इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुई हैं।"

घरों को हुए नुकसान का अनुमान करीब 17 अरब रुपये लगाया गया है। वहीं बाढ़ से 31 सड़कें, पुल-पुलिया बेतरह ध्वस्त हो चुके हैं। यह नुकसानी 1 अरब 25 करोड़ रुपये से अधिक का है। अभी तक नेपाल सरकार ने सकल नुकसानी का जो अनुमान लगाया है, वो 30 अरब के आसपास ठहरता है।

वहीं, पेयजल व विधुत व्यवस्था की बर्बादी का तो मत पूछो! बचे-खुचे लोग अंधेरों में रहने के लिए अभिशप्त हैं, जिन्हें पीने के लिए मीठाजल तक मिलना दुश्वार हो गया है। क्योंकि सड़कों में गाद भर जाने से सड़कें दलदली हो गई हैं। राहत सामग्री सड़कमार्ग से पहुंचाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो गया है। लिहाजा, चौपर की मदद ली जा रही है।

नेपाली प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपने संसद में अपने दोनों पड़ोसी देशों की प्रशंसा करते हुए कहा है, ‘‘हमारे दोनों पड़ोसी मुल्क भारत व चीन सहायता के लिए आगे आए हैं। हम उनका धन्यवाद करते हैं। भारत ने राहत सामग्री की पांचवीं खेप भेजी है। भारतीय टीमें सुरंगों में सर्च ऑपरेशन और शवों की पहचान में मदद कर रही है। वहीं, चीन ग्यिरोग बॉर्डर तक जानेवाला हाईवे खोल दिया है, जिससे राहत दल प्रभावित इलाकों तक पहुंच रहे हैं।’’

वहीं, नेपाली पीएम ने दुनिया के उन देशों से इसकी भरपाई करने को कहा है, जो ग्रीन हाउस गैसों का सर्वाधिक उत्सर्जन कर पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ चुके हैं और बिगाड़ रहे हैं। इसमें चीन व अमेरीका क्रमशः आगे हैं, जो महाशक्तियां हैं।

लेकिन, इन मुल्कों पर नेपाली पीएम की अपील का कोई असर होगा, ऐसा सोचना मृग मरीचिका ही है। क्योंकि धनसंपन्न और इनके जैसे कपिपय समृद्ध मुल्क केवल व्यापार करते हैं और व्यापारी की भाषा समझते हैं।

वस्तुतः, नेपाल की त्रासदी भावी प्राकृतिक संकट व आपदा की पूर्व चेतावनी है। यह प्रकृति से छेड़छाड़ व खिलवाड़ का गंभीरतम परिणाम है। ऐसी ही पीड़ादायक घटना साल 2020 में कनाडा की रॉक स्लाइड में और 2023 में सिक्किम में साउथ ल्होनक झील की ग्लेशियर फटने से घटी थी, जो जलवायु परिवर्तन का सुस्पष्ट संकेतक है।

जलवायु परिवर्तन से प्रकृति अपनी विकरालता दिखा रही है। फिर चाहे वह आंधी-तूफान के रूप में हो, दावानल हो या हो, ग्लेशियरों का पिधलना, बादलों का फटना, जलजलों का आना, बेमौसम भारी बरसात का होना, सुनामी व ज्वार-भाटा का एकाएक आना-जाना।

वहीं, नेपाली और अमेरिकी वैज्ञानिकों की रीजनल एनवायर्नमेंटल चेंज जर्नल में प्रकाशित स्टडी से पता चलता है कि इसके लिए ग्लोबल वार्मिंग, फासिल फ्यूल और दूसरे कारकों के साथ-साथ इंसान का पेशाब किसी ग्लेशियर के पिघलाने का बड़ा कारण है, जो माउंट एवरेस्ट पर हो रहा है।

पब्लिश स्टडी कहती है कि माउंट एवरेस्ट पर चढ़नेवाले पर्वतारोहियों का पेशाब क्लाइबिंग सीजन में हर साल 2500 टन बर्फ पिघला रहा है। ऊंचाई पर होने के चलते पर्वतारोहियों को ज्यादा पानी पीना पड़ता है, जो पेशाब के रूप में बाहर आता है।

साल 2023 के सीजन में हर दिन 6,766 लीटर पेशाब यहां बहा। असल में, एवरेस्ट बेस कैंप खुम्बु ग्लेशियर के ऊपर लगता है। ग्लेशियर पर हर वर्ष 1,600 टेंट लगते हैं। इनमें किचन, शावर, जनरेटर, वाई-फाई और दूसरी सुविधाएं होती हैं। लिहाजा, इनसे निकलनेवाली गरमी ग्लेशियर के तापमान को बढ़ा देती है और बर्फ पिघलने लगता है।

दुःखद तथ्य तो यह भी कि ग्लोबल वार्मिंग से समुद्र का जलस्तर 2 मीटर तक बढ़ने की चेतावनी वैज्ञानिक आए दिन दे रहे हैं। लेकिन, किसी विकसित देश के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है।

इसकी जद में भारत सहित पाकिस्तान, कनाडा, पेरु, अमेरिका, चिली, इटली, नेपाल और कोलंबिया जैसे देश हैं, जहां महाविनाशकारी व प्रलंयकारी स्थितियां कभी भी निर्मित हो सकती है।

वहीं, सलतुज बेसिन में जहां विकास परियोजनाओं सहित विद्युत परियोजनाएं व मानवीय दखल निरंतर बढ़ रहा है, वहां आनेवाले भयंकरतम खतरे के रूप में देखा जा रहा है।

जबकि इसकी चेतावनी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी एनडीएनए के विशेषज्ञों के द्वारा पहले ही दी जा चुकी है। पर, सरकारें हैं कि ऐसे रिपोर्टों को कूड़ेदान में डालकर निश्चिंत पड़ी रहती हैं।

जब कोई बड़ा हादसा होता है, तब फिर लकीरें पीटने और लीपापोती के काम में लग जाती हैं। ...और यह जानलेवा सिलसिला अनवरत चलता रहता है।
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