राज्य-छत्तीसगढ़। कोरबा, पेंड्रा व जांजगीर जिला। तारीख 15 जुलाई 2026। 24 घंटे में तीन सड़क हादसों में 6 लोगों की मौत। 2 गंभीर रूप से घायल। मृतकों में दो सगे भाई-बहन समेत पिता-पुत्र व दो युवक। आरोपी चालकों के खिलाफ केस दर्ज। वाहन जब्त।
यह तो भारत के मध्यम स्तर के एक राज्य के उत्तर दिशा की तस्वीरें है, जो समाचारपत्रों में सुर्खियां बटोरी। अन्य तमाम राज्यों की तस्वीरें भी इससे जुदा नहीं हैं। आंकड़े इससे बढ़चढ़ कर हो सकते हैं।
कल फिर ऐसे ही आंकड़े अन्य दुघर्टनाग्रस्त लोगों के सामने आएंगे और परिजन रोते-बिलखते दिखेंगे। उसके बाद परसों। फिर नरसों; सिलसिला अनवरत चलता रहेगा। बेकसूर लोग मरते रहेंगे। परिजन कुछ दिन रो-गा कर शांत हो जाएंगे। कुछ दिन हो-हल्ला मचेगा। चक्काजाम, धरना-प्रदर्शन होगा। लेकिन, दुघर्टनाओं का मरणांतक चक्र थमेगा नहीं। यह जारी रहेगा।
आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 में भारत में 4.68 लाख सड़क दुघर्टनाएं हुईं, जिनमें 1.75 लाख से अधिक लोगों ने अपनी जानें गंवाई। वहीं, 61 प्रतिशत से अधिक दुघर्टनाएं ओवर स्पीडिंग से हुई। 26 प्रतिशत की वजहें खतरनाक तरीके से लापरवाही भरी ड्राइविंग एवं ओवरटेकिंग थी ।
इसमें भी सर्वाधिक मौते उस युवावर्ग की हुई, जो 20 से 35 वर्ष के मध्य थे, जो वाहन चालन के वक्त जोश से भरे हुए थे।
2025 व 2026 के आंकड़े इससे कहीं अधिक भयावह हो सकते हैं, क्योंकि तब तक लाखों वाहनें सड़कों पर उतर चुकी होंगी, लाखों अप्रशिक्षितों को ड्राइविंग लाइसेंस दे दिया गया होगा और सड़कों की हालत में कोई सुधार न होकर और अधिक बिगड़ गया होगा।
आप सड़कों पर चलते हुए अपनी लेन में हैं; दूरी सुरक्षित रखे हुए हैं; वाहन की गति निर्धारित स्पीड में है; इसके बावजूद अन्य गाड़ी बगैर संकेत के अचानक कट मारती है; जिससे आप लड़खड़ा जाते हैं और अनबैलेंस होकर किसी और वाहन को ठोकर मार देते हैं।
सबको पता है कि देश की सड़कों की हालत माशाअल्लाह है। एक्सप्रेस हाइवे की सड़कें तक दुरुस्त नहीं हैं, तो नेशलन व स्टेट हाईवे की कौन सुध ले? कहीं गड्ढे-ही-गड्ढे हैं, तो कहीं गड्ढों पे सड़कें।
अर्थात सड़कें ढूंढे नहीं मिलती। कस्बों, शहरों, नगरों व महानगरों में तो सीवर लाइनों के ढक्कनों को खोलकर जानलेवा बनाकर रख दिया जाता है। इसे ढकने की सुध जिम्मेदारों को कतई नहीं रहती।
जहां पुल-पुलिया बने हैं, उसके आसपास गड्ढों का अंबार लगा रहता है। वजह, पुल-पुलिया को जोड़नेवाली सड़कें अलग ठेकेदार बनाता है और सड़कें दूसरा ठेकेदार। दोनों ठेकेदारों में तालमेल कदापि नहीं रहता। ठेके देनेवाले सरकारी मुलाजिम इनमें तालमेल बिठाने की कोशिश तक नहीं करते। सिवाय एक बात को छोड़कर, जो सबको पता है, पर है गोपनीय।
इसी से लगता है कि सड़क व पुल-पुलिया दोनों के ज्वाइंट को बनानेवालों ने हद दर्जे की लापरवाहियां बरत कर उसको दुघर्टना का स्थल बनाकर छोड़ दिया है। तिस पर तुर्रा यह कि कहीं डामर उखड़ी रहती है, तो कहीं गिट्टी का अता-पता नहीं रहता।
इसके बावजूद ड्राइविंग सेंस का हाल देखिए। मोटरवाहन गलत दिशा में चलाना, यथास्थान चूक जाने पर रिवर्स होते रहना, ट्रकों के द्वारा फास्ट लेन घेरे रखना, हाई बीम से आंखें चौंधियाना, ड्राइविंग के दरमियान ड्राइवर का मोबाइल से बातें करना, रांग साइड से साइड लेना आम दृश्य हैं, जो सबको दिखता है।
रहा सवाल लाइसेंसिंग प्रक्रिया का, तो उसको इतना सरल बना दिया गया है कि घूस के दम पर वे लोग भी ड्राइसेंस प्राप्त कर लेते हैं, जो वाहनों के स्टीयरिंग या हैंडल कभी पकड़े नहीं रहते और नशे में धूत रहते हैं।
इस देश में भ्रष्ट विभागों में महाभ्रष्ट विभाग है आरटीओ यानी रोड ट्रांसपोर्ट आफिस। अभी हाल में एक सहायक आरटीओ के घर में छापा पड़ा। उसके पास अकूत धन-दौलत के अलावा चल-अचल संपत्तियां इतनी मिली कि वह ईमानदारी से कार्य करता, तो सात जनम तक इतनी धनराशि नहीं बटोर पाता।
आरटीओ विभाग तो ऐसा है, जहां पैसा फेंको और तमाशा देखो वाली कहावत चरितार्थ होती है। वहां लाइसेंस बनाने के लिए एजेंटों को पकड़ो, तो सात दिन में लाइसेंस आपके हाथ में थमा दिया जाएगा और बगैर एजेंट के आफिस के रास्ते चलो, तो महीनों तक लाइसेंस बनने से रहा।
यह होता कैसे है? कमीशनखोरी के दम पर। फिर कोई क्यों ड्राइविंग सीखकर लाइसेंस बनाए और गाड़ी चलाए? नया मोटरवाहन अधिनियम आने के बावजूद बदहाली में कोई खास परिवर्तन परिलक्षित नहीं हुआ है।
लिहाजा मौतों का आंकड़ा दिन-ब-दिन बढ़ता रहता है और नेता व सरकारी पदो पर बैठे हुए जिम्मेदार लोग केवल बातों के कुलाबे बांधते रहते हैं और वसूली में जुटे रहते हैं।
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