चौंकानेवाला उपचुनाव Virendra Devangan द्वारा पत्रिका में हिंदी पीडीएफ

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चौंकानेवाला उपचुनाव

हाल में संपन्न तीन राज्यों के तीन विधानसभा उपचुनाव परिणामों ने सबको चौंकाया है। ये तीन सीटें हैं-गुजरात का मांजलपुर, बिहार का बांकीपुर और मध्यप्रदेश का दतिया।

आश्चर्य यही कि इन तीनों राज्यों में बीजेपी सत्ता में है। हालांकि गुजरात में बीजेपी उम्मीदवार सतीश पटेल सीट जीतने में कामयाब हो गए हैं, लेकिन बिहार और मप्र के बीजेपी उम्मीदवार अपनी परंपरागत सीटें बचाने में नाकामयाब रहे।

बिहार में बीजेपी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के द्वारा खाली किए गए बांकीपुर सीट को बचा न सकी, जो किसी मायने में गहरे सदमे से कम नहीं है। जबकि इस सीट पर पिछले 31 साल से बीजेपी काबिज थी।

बांकीपुर सीट, राजनीतिक रणनीतिकार और जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जीत लिया है और विधानसभा में धमाकेदार प्रवेश किया है।

चौंकानेवाला तथ्य यही कि इसकी पार्टी का हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव में खाता तक नहीं खुला था। जन सुराज पार्टी के 238 उम्मीदवारों में-से 236 उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गई थी।

सच पूछो, तो यह हार बिहार के मुख्यमत्री सम्राट चौधरी की हार है, जिसका मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला विधानसभा चुनाव सामने आया और वे इसमें बुरी तरह फेल हो गए।

आखिर क्या करता रहा उनका मंत्रिमंडल; उनके सांसद-विधायक, उनके महापौर, पार्षद, उनके सरपंच और तमाम पदों पर बैठे हुए बीजेपी के अध्यक्ष; जो सत्ता की मलाई खा रहे हैं। यदि इनमें से दशमांश भी चुनावी मैदान में डटकर काम करते, तो बीजेपी की यूं हार व फजीहज कतई नहीं होती।

ऐसा ही सवाल संगठन पर भी उठ रहा है। संगठन के पदाधिकारी आखिर कौन-सा पहा़ड़ खोदते रहे कि एक ऐसा चुनाव जीता न सके, जिसमें नरेंद्र मोदी, अमित शाह या योगी आदित्यनाथ जैसे स्टार प्रचारकों की इंट्री नहीं हो सकी। जबकि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन वहां डेरा जमाए हुए थे।

कयास है कि मप्र में, जो हार पार्टी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की हुई, वह भीतरघात व विश्वासघात का नतीजा है। दरअसल, दतिया सीट पर पार्टी के एक कद्दावर नेता व पूर्वमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने दावेदारी की थी, लेकिन उसको टिकट नहीं दिया गया।

इससे नरोत्तम मिश्रा अंदरूनी तौर पर खफा हो गए और उन्होंने ऐसा खेल रचा कि बीजेपी उम्मीदवार चारों खाने चित्त हो गया।

ऊपर से कोढ़ में खाज यह कि मप्र के मुख्यमंत्री मोहन यादव को कुछ सूझ नहीं आ रहा था कि यहां हो क्या रहा है? जबकि नरोत्तम मिश्रा अपनी टेढ़ी चाल चल चुके थे।

ऐसे में, इस सीट का हारना मुख्यमंत्री के रूप में मोहन यादव की नाकामी कही जाएगी, जिसके पास सत्ता की ताकत रहने के बावजूद इसका लाभ उठा न सके। इससे पता चलता है कि संगठन व सत्तातंत्र रहने के बावजूद सही रणनीति न अपनाई जाए, तो चुनावों में हार संभावित है।

तीन विधानसभा उपचुनावों में-से दो की हार से विपक्षियों को यह नैरेटिव फैलाने में कामयाबी मिल गई है कि जहां ईवीएम हैक नहीं होती, वहां बीजेपी हार जाती है और जहां ईवीएम हैक की जाती है, वहां बीजेपी की बंफर जीत होती है।

ऊपर से जेन-जी व पेपर लीक के आंदोलन ने एनडीए सरकार को अच्छा-खासा झटका दे दिया है। ऐन मतदान की तिथि 30 अगस्त को दिल्ली में छात्र आंदोलन का भयंकर उफान व तूफान आया हुआ था। मतदाता के मन में इसका बुरा प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी था।

ऐसे में बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वह सत्ता में काबिज ऐसे नकारा मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, विधायकों, अध्यक्षों, महापौरों को चिंहित करे औरे ऐसा सबक सिखाए कि वे दोबारा सत्ता तक न पहुंच पाएं।

यदि यही ढीलपोल व रवैया रहा, तो इन उपचुनावों के परिणामों से बीजेपी के पतन की तथा-कथा लिखी जा सकती है। उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है।

यदि मतदाता नाराज हो गए व कार्यकर्ता उपेक्षित और सत्ता में बैठे हुए लोग सत्ता की मलाई खाते रहे, तो बीजेपी के लिए संकट की घड़ी आने में देरी नहीं लगेगी।

हालांकि इन परिणामों का असर वर्तमान सत्ता पर नहीं पड़ेगा, लेकिन दीर्धकालिक प्रभाव पड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को संजीदगी से देखना-परखना होगा कि वह ऐसे लोगों से कठोरता से निपटे, जो सत्तासुख भोग रहे हैं, पर बीजेपी की जीत और जनता का काम आसान करने में जरा भी योगदान नहीं दे रहे हैं।

ऐसे लोग चुनावों को चलताऊ ढंग सेे ले रहे हैं कि ये तो नेतृत्व का काम है। फिर चाहे वे महापौर, पार्षद, सरपंच, अध्यक्ष, सांसद-विधायक हों या कोई मंत्री।

इसी चलताऊपने का परिणाम है कि बीजेपी 2024 के आम चुनाव में 240 सीट पर सिमट गई थी। सभी जीत के लिए आश्वस्त होकर आरामतलबी हो गए थे। पर, परिणाम, जो आया, वह आंखें खोलनेवाला था।
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