अधूरी किताब
एपिसोड 70 — अगला पात्र
किताब के पन्ने पर उभरे उन शब्दों को देखकर नैना की धड़कन जैसे रुक गई।
“अगला पात्र — नैना।”
उसने काँपते हाथों से किताब बंद करनी चाही, लेकिन किताब बंद ही नहीं हुई।
पन्ने अपने आप पलटने लगे।
एक के बाद एक।
हर पन्ने पर नैना का नाम था।
कहीं वह रो रही थी।
कहीं किसी अंधेरे कमरे में अकेली खड़ी थी।
कहीं वह अनन्या से लड़ रही थी।
और एक पन्ने पर...
नैना जमीन पर पड़ी थी।
उसके सामने अर्णव खड़ा था।
उसके हाथ में वही सुनहरी कलम थी।
और उसके पीछे एक विशाल काली आकृति खड़ी थी।
नैना ने घबराकर किताब दूर फेंक दी।
“नहीं!”
अर्णव तुरंत उसके पास आया।
“क्या हुआ?”
नैना ने किताब की तरफ इशारा किया।
“उसमें मेरा अंत लिखा है।”
अर्णव ने किताब उठाई।
“कहाँ?”
नैना ने काँपते हुए कहा—
“अभी मत देखो।”
अर्णव ने उसकी आँखों में देखा।
“नैना, जो कुछ भी उसमें लिखा है, वह सच होना जरूरी नहीं है।”
नैना ने धीरे से कहा—
“लेकिन अगर वही कहानीकार लिख रहा है तो?”
कबीर की आवाज पीछे से आई—
“तो उसे लिखने मत दो।”
सबने पलटकर देखा।
कबीर अभी भी घायल था, लेकिन इस बार उसके चेहरे पर पहले जैसी कमजोरी नहीं थी।
वह किताब के पास आया।
“पन्ना मुझे दो।”
अर्णव ने किताब उसे दे दी।
कबीर ने पन्ना पलटा।
उसकी आँखें अचानक रुक गईं।
“क्या हुआ?” अर्णव ने पूछा।
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
अनन्या अभी भी उस दूसरी दुनिया में थी।
उसके सामने उसका तथाकथित पिता खड़ा था।
पहला कहानीकार।
अनन्या उसे घूर रही थी।
“तुम मेरे पिता नहीं हो?”
वह आदमी मुस्कुराया।
“नहीं।”
“फिर मेरे पिता कहाँ हैं?”
“जिसे तुम अपना पिता समझती हो... वह भी मेरी कहानी का एक पात्र था।”
अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
“तुमने मेरी पूरी जिंदगी झूठ बना दी?”
“नहीं।”
वह आदमी धीरे-धीरे उसके करीब आया।
“मैंने तुम्हारी जिंदगी लिखी।”
“झूठ और सच का फैसला तुमने खुद किया।”
अनन्या ने गुस्से में कहा—
“तो मेरी माँ?”
“वह भी मेरी कहानी का हिस्सा थी।”
“अर्णव?”
“एक अधूरा अध्याय।”
“नैना?”
“एक गलती।”
अनन्या की आँखें लाल हो गईं।
“और मैं?”
आदमी कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने कहा—
“तुम मेरी सबसे बड़ी गलती थीं।”
अनन्या स्तब्ध रह गई।
“क्यों?”
उसने कहा—
“क्योंकि मैंने तुम्हें कहानी पढ़ने के लिए बनाया था।”
“लेकिन तुमने कहानी बदलनी शुरू कर दी।”
“और फिर...”
वह थोड़ा झुककर बोला—
“तुम कहानी पढ़ने वाली से कहानी लिखने वाली बन गईं।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“अगर मैं इतनी ताकतवर हूँ तो मुझे रोक क्यों नहीं देते?”
उस आदमी के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“क्योंकि तुम्हें रोकना मेरे हाथ में नहीं है।”
“फिर किसके हाथ में है?”
उसने पीछे देखा।
वहाँ एक विशाल काली किताब दिखाई दी।
“उसके।”
अनन्या ने पूछा—
“कौन है उसमें?”
आदमी ने कहा—
“जिसने मुझे लिखा।”
अनन्या की साँस रुक गई।
“तुम भी किसी के पात्र हो?”
पहला कहानीकार पहली बार चुप हो गया।
फिर उसने सिर झुका दिया।
“हाँ।”
“और वह कौन है?”
उसने जवाब नहीं दिया।
अनन्या आगे बढ़ी।
“नाम बताओ।”
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
“तुम उसका नाम पहले ही सुन चुकी हो।”
अनन्या ने सोचा।
अचानक उसकी आँखें फैल गईं।
“कहानीकार?”
वह मुस्कुराया।
“नहीं।”
फिर उसने कहा—
“पाठक।”
उधर वास्तविक दुनिया में...
कबीर किताब के पन्ने को घूर रहा था।
उसने अचानक किताब बंद कर दी।
नैना ने पूछा—
“क्या लिखा था?”
कबीर ने उसकी तरफ देखा।
“कुछ ऐसा जिसे तुम्हें अभी नहीं जानना चाहिए।”
नैना ने नाराज़ होकर कहा—
“मेरी जिंदगी के बारे में किताब में लिखा है और तुम मुझसे ही छिपा रहे हो?”
“हाँ।”
“क्यों?”
कबीर ने धीरे से कहा—
“क्योंकि अगर तुमने उसे पढ़ लिया तो वही होगा जो कहानीकार चाहता है।”
नैना ने किताब छीन ली।
“मुझे डराकर तुम मुझे रोक नहीं सकते।”
उसने किताब खोल दी।
अगला पन्ना सामने था।
इस बार उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
“नैना को उसकी पहली याद वापस दो।”
नैना ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“पहली याद?”
कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।
“नहीं।”
अर्णव ने पूछा—
“क्या हुआ?”
कबीर ने कहा—
“उसकी पहली याद कभी वापस नहीं आनी चाहिए।”
“क्यों?”
“क्योंकि वह याद... उसकी नहीं है।”
नैना ने घबराकर पूछा—
“फिर किसकी है?”
कबीर ने जवाब नहीं दिया।
तभी नैना के सिर में तेज दर्द उठा।
“आह!”
अर्णव ने उसे संभाल लिया।
“नैना!”
उसकी आँखें बंद हो गईं।
और अगले ही पल...
उसे एक दृश्य दिखाई दिया।
एक बच्ची।
वही बच्ची जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था।
वह एक अंधेरे कमरे में बैठी रो रही थी।
उसके सामने एक और बच्ची खड़ी थी।
अनन्या।
लेकिन बहुत छोटी।
छोटी अनन्या उस बच्ची का हाथ पकड़कर कह रही थी—
“डरो मत।”
नैना ने दृश्य में मौजूद उस बच्ची को ध्यान से देखा।
उसका चेहरा...
उसके जैसा था।
लेकिन वह नैना नहीं थी।
नैना ने घबराकर पूछा—
“तुम कौन हो?”
बच्ची ने उसकी तरफ देखा।
“मैं तुम नहीं हूँ।”
“तो कौन हो?”
बच्ची ने कहा—
“मैं वह हूँ जो तुमसे पहले थी।”
अचानक पीछे से किसी की आवाज आई—
“उसे मत सुनो।”
नैना ने पलटकर देखा।
कबीर वहाँ खड़ा था।
लेकिन इस बार वह बहुत छोटा था।
शायद दस साल का।
नैना ने हैरानी से पूछा—
“तुम?”
छोटे कबीर ने कहा—
“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
“यह जगह क्या है?”
“पहली कहानी।”
“और ये बच्ची?”
कबीर ने उस बच्ची की तरफ देखा।
“इसे देखकर तुम सब कुछ भूल जाओगी।”
नैना ने पूछा—
“क्यों?”
कबीर ने कहा—
“क्योंकि यही असली नैना है।”
नैना के चेहरे पर सदमा फैल गया।
“तो मैं कौन हूँ?”
छोटे कबीर ने जवाब दिया—
“तुम उसकी जगह लिखी गई थी।”
नैना के पैरों के नीचे से जमीन जैसे खिसक गई।
“किसकी जगह?”
कबीर ने उस दूसरी बच्ची की तरफ देखा।
“अनन्या की।”
नैना ने सिर हिलाया।
“नहीं...”
“नहीं!”
“ये झूठ है!”
छोटा कबीर चुप रहा।
नैना उस बच्ची के करीब गई।
बच्ची ने उसका हाथ पकड़ लिया।
और उसी पल नैना के दिमाग में हजारों यादें भर गईं।
एक आग।
एक अस्पताल।
माँ की चीख।
एक नवजात बच्ची।
दो छोटी लड़कियाँ।
और एक आदमी...
जो उन दोनों के बीच खड़ा था।
उसने एक बच्ची को उठाया।
फिर दूसरी की तरफ देखा।
और कहा—
“एक कहानी में दोनों नहीं रह सकतीं।”
नैना चीख उठी।
“नहीं!”
वास्तविक दुनिया में नैना अचानक जमीन पर गिर पड़ी।
अर्णव ने उसे पकड़ लिया।
“नैना!”
उसकी आँखें खुलीं।
लेकिन वह अर्णव को पहचान नहीं रही थी।
“तुम कौन हो?”
अर्णव के चेहरे पर दर्द उतर आया।
“नैना... मैं हूँ।”
“तुम कौन हो?”
कबीर आगे आया।
“उसकी यादें वापस आ रही हैं।”
अर्णव ने गुस्से से पूछा—
“तुमने कहा था कि ऐसा नहीं होगा!”
“मैंने कहा था कि उसे याद नहीं आना चाहिए।”
“तो अब?”
कबीर ने किताब की तरफ देखा।
“अब कहानीकार ने फैसला कर लिया है।”
अचानक दीवार पर एक विशाल वाक्य उभरा—
“पहला सच सामने आ चुका है।”
फिर दूसरा—
“अब दूसरा सच बाकी है।”
तीसरा—
“अनन्या को चुनना होगा।”
नैना ने दीवार की तरफ देखा।
“क्या चुनना होगा?”
कबीर ने कहा—
“तुम।”
“और अनन्या में से किसी एक को।”
नैना ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
“मैं उसे कभी नहीं चुनूँगी।”
अर्णव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें कुछ चुनने की जरूरत नहीं है।”
लेकिन तभी अनन्या वापस आ गई।
उसकी आँखों की काली परत गायब हो चुकी थी।
वह लड़खड़ाते हुए जमीन पर गिरी।
नैना तुरंत उसकी तरफ दौड़ी।
“दीदी!”
अनन्या ने उसे देखते ही गले लगा लिया।
दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को पकड़े रहीं।
फिर अनन्या ने धीमे से कहा—
“नैना...”
“मुझे सब पता चल गया।”
नैना ने पूछा—
“क्या?”
अनन्या ने उसकी आँखों में देखा।
“हम बहनें नहीं हैं।”
नैना की आँखों से आँसू निकल आए।
“मुझे भी पता चल गया।”
अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन एक बात और पता चली।”
“क्या?”
अनन्या ने पीछे खड़े कबीर की तरफ देखा।
“कहानीकार हमें एक-दूसरे के खिलाफ करना चाहता है।”
कबीर ने सिर हिलाया।
“हाँ।”
अनन्या ने कहा—
“लेकिन हम ऐसा नहीं होने देंगे।”
तभी किताब फिर खुली।
इस बार पन्ने पर कोई चेतावनी नहीं थी।
एक पूरा अध्याय लिखा था।
शीर्षक था—
“दो बहनों में से एक का अंत।”
नैना ने पन्ने को देखा।
अचानक उस पर खून जैसी लाल स्याही से एक नाम उभरने लगा।
पहले...
अनन्या।
फिर वह नाम मिट गया।
और उसकी जगह लिखा गया—
नैना।
नैना पीछे हट गई।
अर्णव ने किताब छीनकर फाड़ने की कोशिश की।
लेकिन पन्ना फटने के बजाय उसके हाथ से काली स्याही निकलने लगी।
कबीर चिल्लाया—
“किताब को मत छुओ!”
देर हो चुकी थी।
काली स्याही अर्णव की हथेली से पूरे शरीर में फैलने लगी।
वह दर्द से चीख उठा।
अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अर्णव!”
कबीर ने कहा—
“उसे छोड़ो!”
“नहीं!”
“अनन्या, अभी छोड़ो!”
लेकिन अनन्या ने हाथ नहीं छोड़ा।
अचानक उसकी हथेली से सुनहरी रोशनी निकली।
वह रोशनी अर्णव के शरीर में फैल गई।
काली स्याही पीछे हटने लगी।
लेकिन उसी समय...
दूर कहीं एक बच्चा हँसा।
बहुत धीमी हँसी।
फिर आवाज आई—
“तुम लोग अभी भी नहीं समझे...”
“कहानी का सबसे जरूरी पात्र तुममें से कोई नहीं है।”
सबने ऊपर देखा।
छत पर वही काली आकृति दिखाई दी।
लेकिन इस बार उसके साथ एक बच्चा भी था।
वही बच्चा...
जिसे अनन्या ने दूसरी दुनिया में देखा था।
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं हूँ असली पहला पात्र।”
कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।
“नहीं...”
बच्चे ने उसकी तरफ देखा।
“कबीर...”
“तुमने मुझे बहुत सालों तक छिपाकर रखा।”
कबीर ने काँपती आवाज़ में कहा—
“मैंने तुम्हें बचाया था।”
बच्चा हँसा।
“नहीं।”
“तुमने मुझे कैद किया था।”
फिर उसने अनन्या की तरफ देखा।
“और अब...”
उसकी आँखें चमक उठीं।
“मैं अपनी कहानी वापस लेने आया हूँ।”
उसी पल किताब के आखिरी पन्ने पर एक नया शीर्षक उभरा—
“तीसरा पात्र जाग चुका है।”
और उसके नीचे...
एक नाम।
आर्या।
अनन्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
क्योंकि आर्या...
उसका अपना दूसरा नाम था।
क्रमशः...