यह पहला मौका नहीं है, जब देश में जून-जुलाई माह में नीट पेपर लीक के मामले को लेकर सीजेपी के साथ छात्र आंदोलन हुआ और सरकार को झुकना पड़ गया। वो भी उसके शिक्षामंत्री के इस्तीफे के बाद आंदोलनकारी माने और वापस अपने घरों की ओर लौट गए।
इसके पहले भी देश ने कई बड़े छात्र आंदोलनों को देखा, परखा और समझा है। सच्चाई तो यही हर बड़े छात्र आंदोलन ने सत्ता के केंद्र को झुकाकर रख दिया है, जिसने बाद में सत्ता को भी उखाड़ने का काम किया।
1. नवनिर्माण आंदोलन गुजरात-साल 1973-74 में एलडी अभियांत्रिकी कॉलेज में मेस शुल्क वृद्धि के खिलाफ छात्र आंदोलन आरंभ हुआ, जो बाद में महंगाई, बेरोजगारी व भ्रष्टाचरण के मुद्दों को जोड़ते हुए स्नेह-स्नेह संपूर्ण गुजरात को अपनी चपेट में ले लिया। उग्र छात्रों ने सांसदों, विधायकों, मंत्रियों व तमाम नेताओं के निवासों को घेरना शुरू कर दिया। इससे ऐसी अफरातफरी मची कि नेताओं के होश ठिकाने लग गए।
इसका व्यापक असर यह हुआ कि 9 फरवरी 1974 को कांग्रेसी मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को रिजाइन देना पड़ गया। विधानसभा भंग कर दी गई और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।
2. संपूर्ण क्रांति, बिहार-साल 1974-75 में बिहार छात्र संघर्ष समिति के आव्हान पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन की अगुआई की। परिणाम यह हुआ कि आंदोलन की भारी सफलता के मद्देनजर लोकनायक ने 5 जून 1974 को ‘‘संपूर्ण क्रांति’’ का बिगुल फूंक दिया। लोकनायक के नेतृत्व में यह ‘‘संपूर्ण क्रांति’’देशभर में फैल गया।
इसी आंदोलन के उपज थे-मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, जार्ज फर्नाडिज एंव अन्य धाकड़ व समाजवादी नेता।
इस जबरदस्त आंदोलन की पृष्ठभूमि में श्रीमती इंदिरा गांधी का आम चुनाव इलाहाबाद हाईकोर्ट से रद्द हुआ। लेकिन, श्रीमती गांधी ने पदत्याग करने के बजाय 1975 में देश में आपातकाल थोंप दिया और हजारों-लाखों विपक्षी नेताओं व कार्यकर्ताओं को जेल में ठूंस दिया।
आपातकाल समाप्ति के बाद हुए आम चुनाव में पहली बार देश में गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार 1977 में बनी, जिसमें 5 पार्टी एक मंच पर आए। इसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण की अनुशंसा पर मोरारजी देसाई ने किया।
3. असम छात्र आंदोलन-वर्ष 1979 से 85 तक अवैध घुसपैठियों को लेकर ऑल इंडिया असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी आंसू और असम गण परिषद ने छह साल तक आंदोलन किया।
परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1985 को असम समझौता हुआ, तब भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में छात्रों के संगठन को अद्धितीय सफलता मिली और उसके नेता प्रफुल्ल कुमार महंत सबसे कम उम्र के युवा मुख्यमंत्री बन गए।
4. तेलंगाना आंदोलन-1969 में आंध्र प्रदेश से अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर उस्मानिया विश्वविद्यायल के छात्रों ने आंदोलन की शुरूआत की। लेकिन बात नहीं बनी।
2009 से 2014 के मध्य छात्र एक फिर इसी मांग को दोहराने के लिए सड़कों पर उतर आए। तब देश में मनमोहन सिंह की सरकार थी। सरकार की उपेक्षा से यह आंदोलन निर्णायक बन गया और उत्तराखंड, झारखंड व छत्तीसगढ़ के बाद तेलंगाना देश का 29वां राज्य बना।
5. मंडल विरोधी आंदोलन-1990 में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के बाद देशभर के विश्वविद्यालयों में सामान्यवर्ग के छात्रों के द्वारा विरोध प्रदर्शन चालू हो गया।
दरअसल, मंडल कमीशन ओबीसी वर्ग को सामान्य वर्ग से अलग करके आरक्षण देना चाहता था। प्रधानमंत्री वीपी सिंह अपने फैसले पर अडिग थे। यहीं से आरक्षण व सामाजिक न्याय की राजनीति आरंभ हुई, जो आज तक बदस्तूर जारी है।
6. अन्ना आंदोलन-2011 में लोकपाल की स्थापना को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने बड़ा आंदोलन खड़ा किया था। इस आंदोलन को भी देशभर से समर्थन मिला।
इसी आंदोलन का फायदा उठाकर अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी ने आप बना डाली और पहले दिल्ली की गद्दी पर कब्जा किया। फिर पंजाब पर आसीन हो गए।
परंतु, अफसोस यही कि आज वे भ्रष्टाचरण के दलदल में फंसे हुए हैं। आप के नेता भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भी जा चुके हैं और अभी तक जा रहे। सत्येंद्र जैन और उसके साथियों का ताजा मामला इसका दृष्टांत है।
7. झारखंड का छात्र आंदोलन-झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और अनियमितताओं को लेकर 24-25 जुलाई 2026 से जारी छात्र आंदोलन के बीच हेमंत सोरेन की सरकार को झुकना पड़ गया।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विवादित प्राइवेट एजेंसी टीडीपीएल द्वारा 2014 से आयोजित की गई सभी परीक्षाओं और उसकी पूरी प्रक्रिया को रद्द करने का फैसला ले लिया। साथ ही मुख्यमंत्री ने जेपीएससी, जेएसएससी और सीजीएल परीक्षाओं को भी रद्द करने का निर्णय लिया।
लेकिन, मुख्यमंत्री ने छात्रों की मांग सीबीआई जांच पर कुछ नहीं कहा। जबकि छात्रों की मांग है कि सारी परीक्षाओं की सीबीआई द्वारा जांच होनी चाहिए। क्योंकि प्रत्येक पद की बोली 20 लाख से 1 करोड़ की लगाई गई थी।
आखिर, सारी प्रतियोगी परीक्षा व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त, पारदर्शी और निष्कलंक बनाने की जिम्मेदारी किसकी है सरकार? जनता ने आपको चुनकर इसीलिए बिठाया है कि आप जनाकांक्षाओं की निष्पक्षता की पूर्ति के लिए हर वो कदम उठाएंगे, जो आवश्यक हो। पर, आपने किया क्या?
इसमें हेमंत सोरेन सरकार को समर्थन देनेवाली कांग्रेस की हालत सांप छछुंदर की हो गई है। उसे यह आंदोलन उगलते बन रहा है, न निगलते। जो राहुल गांधी दिल्ली सीजेपी आंदोलन के दौरान मौका भुनाने के लिए प्रधानमंत्री आवास के सामने धरना देने के लिए चले गए थे, वे झारखंड क्यों नहीं गए?
न उन्होंने हेमंत सोरेन को चेताया कि आप दो दिन में मामले को सुलझाइए, वरना हमारे विधायक आपसे समर्थन वापस लेंगे।
विदित हो कि हेमंत सोरेन की सरकार कांग्रेसी विधायकों की बैशाखियों पर टिकी हुई है। उसके चार विधायक मंत्रीपद पर आसीन हैं। लेकिन, राहुल गांधी केवल बकौली कर रहे हैं।
हां, उन्होंने हेमंत सोरेन को दिनांक 17 अगस्त को पत्र लिखा जरूर था, जो केवल खानापूर्ति भर लगता है। सीधी-सी बात है कि किसी बात को टालने के लिए हम जब पत्रों का सहारा लेते हैं, तो उससे आभास होता है कि टालमटोली गहरी है। जबकि आधुनिक युग में सीधे फोन से बातकर हेमंत सोरेन को वे धमका भी सकते थे।
नीट पेपर लीककांड में शिक्षामंत्री का इस्तीफा ले लेने से छात्रों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं, अब देशभर में छात्र आंदोलनों की बाढ़-सी आ गई है।
ऐसा मामला बिहार सहित महाराष्ट्र में भी तुल पकड़ लिया है। बिहार में तो छात्रों व पुलिस की जबरदस्त झड़प हुई है। बिहार के छात्रों ने भी बार-बार के पेपरलीक से तंग आकर सारे प्रतियोगिता परीक्षाओं को चाक-चौबंद करने की मांग की है।
महाराष्ट्र में भी छात्र आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया है। दरअसल आंकड़े कहते हैं कि देश में 8-9 करोड़ युवा बेरोजगार हैं और अकुशल होने की वजह से घर पर बैठे हुए हैं। ये वही लोग हैं, जो परीक्षाओं में धांधलीबाजी और भ्रष्टाचरण को लेकर सड़कों पर बवाली बन जाते हैें।
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