अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 64 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 64

अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 64 : अर्णव का सच
लाल आसमान के नीचे वह जंगल अचानक हजारों काली परछाइयों से भर गया था।
पेड़ों पर लटके कागज़ जल रहे थे।
हवा में उड़ते हुए अधूरे पन्ने चारों तरफ घूम रहे थे।
और उन सबके बीच अर्णव अकेला खड़ा था।
उसके सामने भक्षक की काली परछाईं थी।
अनन्या, नैना, आरव और कबीर उसके पीछे खड़े थे।
अनन्या ने घबराकर पूछा—
"अर्णव, ये सब क्या है?"
अर्णव ने उसकी तरफ देखे बिना कहा—
"मेरी दुनिया।"
"और ये परछाइयाँ?"
अर्णव ने धीमे स्वर में कहा—
"मेरी अधूरी यादें।"
अनन्या चौंकी।
"यादें?"
अर्णव ने सिर हिलाया।
"जब माँ ने मुझे कहानी से बाहर किया था, तो सिर्फ मेरा नाम नहीं मिटाया था।"
"उन्होंने मेरी जिंदगी के हर उस हिस्से को अलग कर दिया था जिसमें तुम दोनों थीं।"
"मेरी यादें टूटकर इस दुनिया में फैल गईं।"
नैना की आँखें भर आईं।
"इसलिए तुम्हें हमारे बारे में सब याद था?"
अर्णव मुस्कुराया।
"मैं तुम्हें कभी भूल ही नहीं पाया।"
"क्योंकि मेरी यादें तुम दोनों से जुड़ी थीं।"
नैना उसके पास जाने लगी।
लेकिन अर्णव ने फिर उसे रोक दिया।
"अभी नहीं।"
नैना रुक गई।
"क्यों?"
अर्णव ने सामने खड़े भक्षक की ओर देखा।
"क्योंकि वह चाहता है कि हम एक-दूसरे से मिलें।"
आरव ने पूछा—
"क्यों?"
अर्णव ने कहा—
"क्योंकि उसे मेरी जरूरत है।"
भक्षक की काली आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसकी आवाज़ पूरे जंगल में गूँजी—
"आखिरकार तुमने उन्हें सच बता ही दिया।"
अर्णव ने कहा—
"तुम मुझसे क्या चाहते हो?"
भक्षक हँसा।
"तुम्हारे पास वह चीज़ है जो मेरे पास नहीं।"
"क्या?"
"एक अंत।"
अर्णव की आँखें सिकुड़ गईं।
"तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें अपना अंत दे दूँगा?"
भक्षक ने कहा—
"नहीं।"
"मुझे लगता है..."
"तुम्हें मजबूर किया जाएगा।"
अचानक जमीन फट गई।
काली धुंध से बने हाथ जमीन से बाहर निकलने लगे।
एक हाथ ने नैना का पैर पकड़ लिया।
"नैना!"
अनन्या उसकी तरफ दौड़ी।
आरव ने नैना को खींचकर पीछे किया।
कबीर ने अपनी किताब खोलकर कुछ पढ़ना शुरू किया।
लेकिन तभी एक दूसरी परछाईं ने कबीर को पकड़ लिया।
"कबीर!"
आरव उसकी तरफ बढ़ा।
अर्णव ने हाथ उठाया।
अचानक हवा में सुनहरी रेखाएँ बन गईं।
सारी परछाइयाँ कुछ पल के लिए पीछे हट गईं।
कबीर ने हैरानी से अर्णव को देखा।
"तुम्हारे पास शक्ति है?"
अर्णव ने कहा—
"शक्ति नहीं।"
"अधूरी कहानी पर नियंत्रण।"
कबीर समझ गया।
"तुम कहानी के नियम बदल सकते हो।"
अर्णव ने सिर हिलाया।
"थोड़ा-बहुत।"
"लेकिन सिर्फ अपनी कहानी के अंदर।"
भक्षक ने कहा—
"और यही तुम्हारी कमजोरी है।"
अर्णव ने उसकी ओर देखा।
"जानता हूँ।"
भक्षक मुस्कुराया।
"क्योंकि यह अब सिर्फ तुम्हारी कहानी नहीं है।"
अचानक आसमान में एक विशाल काला पन्ना फैल गया।
उस पर चार नाम दिखाई दिए—
अनन्या
नैना
आरव
कबीर
और सबसे नीचे—
अर्णव
फिर पाँचों नामों को जोड़ती हुई एक काली रेखा बन गई।
अर्णव का चेहरा गंभीर हो गया।
"नहीं..."
अनन्या ने पूछा—
"क्या हुआ?"
अर्णव ने कहा—
"उसने हम सबको एक ही कहानी में बाँध दिया है।"
अचानक जंगल बदलने लगा।
पेड़ गायब हो गए।
उनकी जगह एक पुराना घर दिखाई दिया।
वही घर...
जहाँ अनन्या और नैना बचपन में रहती थीं।
अनन्या ने उसे देखते ही कहा—
"हम वापस यहाँ कैसे आ गए?"
अर्णव ने कहा—
"यह असली घर नहीं है।"
"यह हमारी सबसे पुरानी याद है।"
आरव ने चारों ओर देखा।
"लेकिन यहाँ कुछ अलग है।"
कबीर ने दीवार की ओर इशारा किया।
वहाँ एक तस्वीर लगी थी।
तस्वीर में अनन्या, नैना और अर्णव थे।
लेकिन उनके पीछे...
एक चौथा व्यक्ति खड़ा था।
अनन्या की माँ।
और उनके हाथ में वही काली किताब थी।
अनन्या तस्वीर के पास गई।
"माँ के हाथ में वह किताब क्यों है?"
अर्णव ने कहा—
"क्योंकि यही वह रात थी..."
"जब सब कुछ बदला था।"
नैना ने पूछा—
"कौन-सी रात?"
अर्णव ने तस्वीर को देखते हुए कहा—
"जिस रात माँ ने भक्षक को लिखा।"
अनन्या चौंक गई।
"लेकिन तुमने कहा था कि भक्षक पहले से मौजूद था।"
"था।"
अर्णव ने कहा।
"लेकिन उसका पहला रूप..."
"माँ ने नहीं बनाया था।"
"तो किसने?"
अर्णव ने धीरे से जवाब दिया—
"मैंने।"
अनन्या की आँखें फैल गईं।
"तुमने?"
अर्णव ने सिर झुका लिया।
"मैं बचपन से कहानियाँ लिखता था।"
"मुझे लगता था कि अगर मैं लोगों के डर को एक पात्र में डाल दूँ..."
"तो वे डरना बंद कर देंगे।"
"मैंने एक पात्र बनाया।"
"उसका नाम था..."
वह रुक गया।
भक्षक की आवाज़ आई—
"मेरा।"
अर्णव ने आँखें बंद कर लीं।
"हाँ।"
"लेकिन मैंने उसे सिर्फ डर महसूस करने के लिए बनाया था।"
"मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह खुद डर बन जाएगा।"
अनन्या ने पूछा—
"फिर माँ ने क्या किया?"
अर्णव ने कहा—
"उन्होंने उसे खत्म करने की कोशिश की।"
"लेकिन कहानी का एक नियम था।"
"कौन-सा?"
"जिस पात्र को लेखक जन्म देता है..."
"उसे लेखक सीधे मिटा नहीं सकता।"
कबीर ने धीरे से कहा—
"इसलिए उसे अधूरा छोड़ना पड़ा।"
अर्णव ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"माँ ने कहानी रोक दी।"
"लेकिन भक्षक खत्म नहीं हुआ।"
"वह अधूरेपन में छिप गया।"
अनन्या कुछ देर तक चुप रही।
फिर उसने पूछा—
"और तुम्हें कहानी से क्यों निकाला गया?"
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि मैंने भक्षक को रोकने के लिए अपनी कहानी उसके साथ जोड़ दी थी।"
"अगर मैं कहानी में रहता..."
"तो वह मेरे जरिए तुम दोनों तक पहुँच सकता था।"
नैना ने धीमे स्वर में कहा—
"तो माँ ने तुम्हें हमसे दूर कर दिया..."
"ताकि हम सुरक्षित रहें।"
अर्णव मुस्कुराया।
"हाँ।"
"लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा..."
"कि किसी को भूल जाना भी एक तरह की मौत होती है।"
अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले।
वह अर्णव के पास गई।
इस बार अर्णव ने उसे नहीं रोका।
अनन्या ने उसे गले लगा लिया।
"मुझे माफ कर दो।"
अर्णव की आँखें भी भर आईं।
"तुमने मुझे नहीं छोड़ा था।"
"तुम्हें बस..."
"याद नहीं था।"
नैना भी दोनों को गले लगा लेती है।
तीनों भाई-बहन कुछ पल तक वैसे ही खड़े रहते हैं।
लेकिन तभी...
तालियाँ बजने की आवाज़ आती है।
धीरे...
फिर तेज़।
क्लैप... क्लैप... क्लैप...
तीनों अलग होते हैं।
भक्षक उनके सामने खड़ा था।
"बहुत खूबसूरत।"
"सालों बाद परिवार एक साथ आ गया।"
अनन्या ने गुस्से से कहा—
"तुम्हें क्या चाहिए?"
भक्षक ने कहा—
"अर्णव।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसके पास मेरी शुरुआत है।"
"और तुम्हारे पास?"
"मेरी कहानी का अंत।"
अनन्या ने कहा—
"अगर हम तुम्हें अर्णव नहीं देंगे तो?"
भक्षक मुस्कुराया।
"तब मैं..."
उसने उँगली उठाई।
अचानक नैना की गर्दन के पास काली रेखा उभर आई।
नैना दर्द से चीख पड़ी।
"नैना!"
अनन्या उसकी ओर दौड़ी।
भक्षक ने कहा—
"उसकी आवाज़ हमेशा के लिए बंद कर दूँगा।"
अनन्या रुक गई।
आरव ने गुस्से में कहा—
"उसे छोड़ दो!"
भक्षक ने कहा—
"अर्णव को मेरे हवाले करो।"
अर्णव आगे बढ़ा।
"ठीक है।"
अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"नहीं!"
अर्णव ने उसकी तरफ देखा।
"दीदी..."
"इस बार मैं तुम्हें फिर से अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
"लेकिन अगर मेरी वजह से नैना को कुछ हुआ..."
नैना ने दर्द में भी कहा—
"भैया..."
"मेरी चिंता मत करो।"
अर्णव ने उसकी ओर देखा।
फिर अचानक उसकी आँखों में सुनहरी चमक आ गई।
"यही तो गलती है..."
भक्षक ने पूछा—
"क्या?"
अर्णव ने कहा—
"तुम्हें लगता है कि हममें से किसी एक को चुनना पड़ेगा।"
"लेकिन..."
उसने अनन्या, नैना, आरव और कबीर की तरफ देखा।
"हम पहली बार अपनी कहानी खुद लिखेंगे।"
अर्णव ने हाथ उठाया।
सफेद रोशनी चारों तरफ फैल गई।
भक्षक पीछे हट गया।
"नहीं!"
अर्णव ने कहा—
"अब कोई लेखक नहीं।"
"कोई पात्र नहीं।"
"कोई भक्षक नहीं।"
"आज से..."
"हम सब अपनी कहानी के मालिक हैं।"
जमीन पर पाँच सुनहरे चिन्ह बन गए।
हर चिन्ह एक व्यक्ति के नीचे था।
अनन्या।
नैना।
आरव।
कबीर।
अर्णव।
और उन पाँचों के बीच एक छठा खाली स्थान था।
कबीर ने उसे देखकर कहा—
"यह किसका है?"
अर्णव ने उस खाली स्थान को देखते हुए कहा—
"जिसका नाम अभी कहानी में लिखा ही नहीं गया।"
अनन्या ने पूछा—
"किसका?"
अर्णव ने जवाब देने से पहले भक्षक की ओर देखा।
भक्षक के चेहरे पर अचानक डर दिखाई दिया।
अर्णव ने धीरे से कहा—
"उस व्यक्ति का..."
"जो असली लेखक है।"
अचानक आसमान फट गया।
एक विशाल सफेद पन्ना नीचे गिरा।
उस पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"मैं लौट आई हूँ।"
अनन्या की साँस रुक गई।
"माँ..."
लेकिन अर्णव ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"यह माँ की लिखावट नहीं है।"
कबीर ने पन्ने को देखा।
उसकी आँखों में डर उतर आया।
"तो फिर..."
अर्णव ने कहा—
"जिसने हमारी माँ को भी कहानी लिखना सिखाया था..."
और उसी पल...
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
क्रमशः...