एक सुंदर हरे-भरे गाँव में रामू नाम का एक बहुत ही गरीब लकड़हारा रहता था। वह बहुत मेहनती और ईमानदार था। उसके परिवार में उसकी बूढ़ी माँ और एक छोटी बेटी थी। रामू रोज सुबह कुल्हाड़ी लेकर जंगल जाता, दिन भर लकड़ियाँ काटता और शाम को उन्हें बाजार में बेचकर जो पैसे मिलते, उससे घर का गुजारा चलाता। उसकी कुल्हाड़ी बहुत पुरानी थी, पर वही उसकी सबसे बड़ी दौलत थी।
एक दिन की बात है, गर्मी बहुत तेज थी। रामू नदी के किनारे एक बड़े पेड़ के नीचे लकड़ियाँ काट रहा था। पसीने से उसके हाथ गीले हो गए थे। जैसे ही उसने जोर से कुल्हाड़ी चलाई, गीले हाथों से फिसलकर कुल्हाड़ी सीधे गहरी और तेज बहती नदी में जा गिरी।
रामू यह देखकर सन्न रह गया। वह नदी किनारे बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। वह सोचने लगा, "हे भगवान, अब क्या होगा? यही तो मेरे कमाने का एकमात्र साधन थी। अब मैं माँ और बेटी को क्या खिलाऊँगा? मैं नई कुल्हाड़ी खरीदने के लायक भी नहीं हूँ।"
उसके रोने की आवाज सुनकर नदी से एक बहुत ही सुंदर जलपरी बाहर निकली। जलपरी ने प्यार से पूछा, "हे मनुष्य, तुम इतने दुखी होकर क्यों रो रहे हो? क्या बात है?"
रामू ने आँसू पोंछते हुए अपनी सारी कहानी जलपरी को सुनाई। उसकी ईमानदारी और सच्चाई भरी बात सुनकर जलपरी को उस पर दया आ गई।
जलपरी बोली, "रुको, मैं तुम्हारी कुल्हाड़ी ढूंढकर लाती हूँ।" यह कहकर वह गहरे पानी में चली गई। थोड़ी देर बाद वह एक चमचमाती हुई सोने की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आई। सोने की चमक से रामू की आँखें चौंधिया गईं। जलपरी ने पूछा, "क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?"
रामू ने ध्यान से देखा और ईमानदारी से कहा, "नहीं देवी, यह मेरी नहीं है। मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की है, बहुत पुरानी और साधारण सी है। यह सोने की तो बहुत कीमती है।"
जलपरी मन ही मन खुश हुई। वह फिर से पानी में गई और इस बार एक चाँदी की चमकदार कुल्हाड़ी लेकर आई। उसने फिर पूछा, "तो क्या यह वाली तुम्हारी है?"
रामू ने फिर से मना कर दिया, "नहीं, यह भी मेरी नहीं है।"
तीसरी बार जलपरी पानी में गई और इस बार वह रामू की असली, जंग लगी हुई लोहे की कुल्हाड़ी लेकर आई। अपनी कुल्हाड़ी देखते ही रामू का चेहरा खुशी से खिल उठा। वह बोला, "हाँ! हाँ देवी, यही मेरी कुल्हाड़ी है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!"
रामू की सच्ची ईमानदारी देखकर जलपरी बहुत प्रसन्न हुई। उसने कहा, "तुम सच में बहुत ईमानदार हो। आजकल ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं। तुम्हारी ईमानदारी से खुश होकर मैं तुम्हें तीनों कुल्हाड़ियाँ - सोने की, चाँदी की और तुम्हारी लोहे की - इनाम में देती हूँ।"
रामू खुशी-खुशी तीनों कुल्हाड़ियाँ लेकर घर गया और उसकी गरीबी दूर हो गई।
जब इस बात का पता उसके पड़ोसी श्यामू को चला, जो बहुत लालची था, तो उसके मन में भी लालच आ गया। वह भी नदी किनारे गया और जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंककर रोने का नाटक करने लगा। जलपरी फिर प्रकट हुई और सोने की कुल्हाड़ी लाकर पूछी, "क्या यह तुम्हारी है?"
लालची श्यामू तुरंत लालच में बोला, "हाँ हाँ, यही मेरी है!"
उसका झूठ सुनकर जलपरी क्रोधित हो गई। उसने कहा, "तुम झूठे और लालची हो। तुम इनाम के लायक नहीं हो।" यह कहकर वह उसकी लोहे की कुल्हाड़ी भी लेकर पानी में गायब हो गई। श्यामू रोता हुआ खाली हाथ घर लौट आया।
*सीख:* इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि ईमानदारी सबसे बड़ी दौलत है। ईमानदार व्यक्ति का हमेशा सम्मान होता है और उसे फल भी अच्छा मिलता है, जबकि लालच और झूठ का अंत हमेशा बुरा ही होता है।