अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 61 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधूरी किताब - सीजन 2 - एपिसोड 61

अधूरी किताब – सीजन 2

एपिसोड 62 : भक्षक की असली कहानी
अंतिम पुस्तकालय में चारों तरफ सिर्फ किताबें थीं।
इतनी सारी किताबें कि उनकी कतारें अंधेरे में कहीं खो जाती थीं। कुछ किताबें हवा में तैर रही थीं, कुछ बंद अलमारियों में कैद थीं और कुछ के पन्ने अपने-आप पलट रहे थे।
लेकिन उन सबके बीच रखी वह काली किताब सबसे अलग थी।
उसके कवर पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"भक्षक की असली कहानी"
अनन्या उस किताब के सामने खड़ी थी।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
पहले पन्ने पर उसका नाम लिखा था—
"अनन्या।"
और उसके नीचे—
"लेखक नहीं..."
"पहला पात्र।"
अनन्या की उँगलियाँ काँपने लगीं।
"यह झूठ है।"
कबीर ने किताब को ध्यान से देखा।
"शायद नहीं।"
आरव ने तुरंत कहा—
"लेकिन अनन्या ने ही तो किताब लिखी थी।"
कबीर ने उसकी ओर देखा।
"हमें यही बताया गया था।"
"लेकिन अगर वह सच नहीं था तो?"
नैना धीरे-धीरे किताब के पास गई।
जैसे ही उसने कवर को छुआ...
पूरे पुस्तकालय में हवा चलने लगी।
हजारों किताबों के पन्ने एक साथ पलटने लगे।
फड़फड़... फड़फड़... फड़फड़...
फिर काली किताब के अंदर से एक आवाज़ आई—
"आखिरकार तुम चारों यहाँ पहुँच ही गए।"
अनन्या पीछे हट गई।
"कौन है?"
आवाज़ फिर आई—
"जिसकी कहानी तुम सदियों से पढ़ते आए हो..."
"लेकिन कभी समझ नहीं पाए।"
अचानक किताब के पन्नों से काला धुआँ उठने लगा।
धुआँ हवा में एक इंसानी आकृति में बदल गया।
भक्षक।
लेकिन इस बार उसका रूप पहले जैसा डरावना नहीं था।
उसके चेहरे पर दर्द था।
उसकी आँखों में गुस्से से ज्यादा उदासी थी।
अनन्या उसे देखकर कुछ पल चुप रही।
"तुम..."
भक्षक ने कहा—
"हाँ।"
"आज पहली बार मैं तुम्हें अपना असली रूप दिखा रहा हूँ।"
किताब का पहला पन्ना अपने-आप पलट गया।
उस पर एक बहुत पुराना दृश्य दिखाई दिया।
एक छोटा-सा गाँव।
गाँव के किनारे एक पुराना घर।
घर के अंदर एक छोटी लड़की बैठी थी।
वह कागज़ पर कुछ लिख रही थी।
उसके पास एक आदमी बैठा था।
वह आदमी लड़की से कह रहा था—
"कहानी लिखते समय कभी किसी किरदार से डरना मत।"
छोटी लड़की ने पूछा—
"अगर मेरा किरदार मुझसे डरावना हो तो?"
आदमी मुस्कुराया।
"तब उसे समझना।"
"क्योंकि हर डर के पीछे कोई दर्द छिपा होता है।"
अनन्या उस दृश्य को देखती रही।
उसके माथे पर पसीना आ गया।
"मैंने यह देखा है..."
कबीर ने पूछा—
"तुम्हें याद है?"
अनन्या ने सिर हिलाया।
"नहीं..."
"लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे यह मेरे बचपन का हिस्सा है।"
नैना ने किताब के पन्ने पर हाथ रखा।
दृश्य अचानक बदल गया।
अब वही लड़की बड़ी हो चुकी थी।
वह एक किताब लिख रही थी।
उसके सामने एक खाली पन्ना था।
वह लिख रही थी—
"एक ऐसा इंसान जो सबके डर को अपने अंदर रख सके..."
वह रुक गई।
फिर उसने आगे लिखा—
"ताकि किसी और को डरना न पड़े।"
कबीर ने धीरे से कहा—
"यही शुरुआत थी।"
आरव ने पूछा—
"किसकी?"
कबीर ने भक्षक की तरफ देखा।
"भक्षक की।"
दृश्य बदल गया।
अब वह कहानी जीवित हो चुकी थी।
एक आदमी दिखाई दिया।
वह बिल्कुल साधारण था।
उसके चेहरे पर कोई डरावनी चीज़ नहीं थी।
वह लोगों के बीच रहता था।
लेकिन धीरे-धीरे उसके अंदर लोगों के डर जमा होने लगे।
एक बच्चा उससे डरता था।
एक बूढ़ी औरत अपने बेटे को खोने से डरती थी।
एक आदमी गरीबी से डरता था।
एक लड़की अकेलेपन से डरती थी।
हर डर उस आदमी के अंदर जाकर एक काला निशान बन जाता।
वह चीखने लगा।
"बस करो!"
"मैं और नहीं सह सकता!"
लेकिन कोई उसकी आवाज़ नहीं सुनता था।
क्योंकि वह सिर्फ एक कहानी का पात्र था।
उसके पास अपनी आवाज़ नहीं थी।
अपनी इच्छा नहीं थी।
अपनी जिंदगी नहीं थी।
उसकी पूरी जिंदगी दूसरे के लिखे शब्दों पर निर्भर थी।
अनन्या ने फुसफुसाकर कहा—
"वह..."
भक्षक ने उसकी ओर देखा।
"हाँ।"
"वह मैं था।"
अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
"लेकिन फिर तुम इतने खतरनाक कैसे बने?"
भक्षक ने कहा—
"क्योंकि एक दिन..."
"लेखिका ने मेरी कहानी अधूरी छोड़ दी।"
दृश्य बदल गया।
वह लड़की—अनन्या—किताब बंद कर रही थी।
उसके चेहरे पर डर था।
उसने आखिरी पन्ने पर लिखा—
"यह कहानी यहीं खत्म होती है।"
लेकिन उसने कहानी खत्म नहीं की।
उसने किताब बंद कर दी।
और उस पात्र को...
उसके सारे डर के साथ...
अकेला छोड़ दिया।
भक्षक की आवाज़ भारी हो गई।
"मैं खत्म नहीं हुआ था।"
"मैं उस अधूरे पन्ने में फँस गया।"
"वर्षों तक..."
"सदियों तक..."
"मैं वहीं पड़ा रहा।"
"हर बार जब कोई किताब अधूरी छूटी..."
"हर बार जब कोई इंसान अपना डर दबाकर आगे बढ़ा..."
"मुझे उसकी आवाज़ सुनाई दी।"
"और मैं और ताकतवर होता गया।"
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
"तो तुम लोगों की कहानियाँ इसलिए खाते थे?"
भक्षक ने कहा—
"मैं कहानियाँ नहीं खाता था।"
"मैं..."
"अपने लिए एक अंत ढूँढ रहा था।"
अनन्या कुछ नहीं बोल पा रही थी।
उसने धीरे से पूछा—
"फिर मुझे तुम्हारे बारे में क्यों नहीं याद था?"
भक्षक मुस्कुराया।
"क्योंकि तुमने अपनी यादें खुद मिटाईं।"
"तुम्हें डर था कि अगर तुम्हें सब याद रहा..."
"तो तुम्हें मेरे साथ किए गए अपने वादे की याद भी रहेगी।"
अनन्या ने सिर पकड़ लिया।
"कौन-सा वादा?"
अचानक पुस्तकालय की सारी रोशनियाँ बुझ गईं।
एक छोटी-सी रोशनी काली किताब के ऊपर पड़ी।
पन्ने पर एक दृश्य दिखाई दिया।
छोटी अनन्या उस अधूरे पात्र के सामने खड़ी थी।
वह रो रही थी।
वह कह रही थी—
"मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी।"
भक्षक की आँखों में आँसू आ गए।
"तुमने वादा किया था।"
"लेकिन तुमने मुझे भूल दिया।"
अनन्या टूट गई।
"मुझे माफ कर दो..."
भक्षक चुप रहा।
आरव ने अनन्या की तरफ देखा।
लेकिन इस बार उसने उसे सांत्वना देने के बजाय उसे खुद बोलने दिया।
अनन्या आगे बढ़ी।
"मैंने तुम्हें भुलाया..."
"लेकिन अब नहीं भूलूँगी।"
भक्षक ने पूछा—
"और अगर मुझे याद रखोगी..."
"तो क्या करोगी?"
अनन्या ने कहा—
"तुम्हारी कहानी पूरी करूँगी।"
कबीर अचानक चौंका।
"नहीं!"
अनन्या उसकी ओर मुड़ी।
"क्यों?"
कबीर ने कहा—
"अगर तुम उसकी कहानी पूरी करोगी..."
"तो वह हमेशा के लिए एक पात्र बन जाएगा।"
भक्षक मुस्कुराया।
"और यही मैं चाहता हूँ।"
"मुझे बस..."
"एक अंत चाहिए।"
अनन्या ने काली किताब की तरफ देखा।
फिर उसे समझ आया।
"नहीं।"
भक्षक की मुस्कान गायब हो गई।
"क्या?"
"मैं तुम्हारी कहानी पूरी नहीं करूँगी।"
"मैं..."
अनन्या ने सुनहरी कलम उठा ली।
"तुम्हें अपनी कहानी खुद लिखनी होगी।"
पूरा पुस्तकालय शांत हो गया।
नैना ने अनन्या की ओर देखा।
"लेकिन वह लिखेगा कैसे?"
अनन्या ने कहा—
"क्योंकि वह अब सिर्फ पात्र नहीं है।"
कबीर ने धीरे से कहा—
"वह लेखक बनने की कोशिश कर रहा है।"
भक्षक ने अचानक हाथ फैलाए।
सैकड़ों किताबें हवा में उठ गईं।
उनके पन्नों से काला धुआँ निकलने लगा।
"हाँ!"
"मैं लेखक बनना चाहता हूँ!"
"मैं किसी और के शब्दों से नहीं जीना चाहता!"
"मैं खुद तय करना चाहता हूँ कि मेरा अंत क्या होगा!"
आरव ने कहा—
"तो फिर कर लो।"
भक्षक उसकी तरफ मुड़ा।
आरव ने कहा—
"लेकिन दूसरों की कहानियाँ चुराकर नहीं।"
"अपनी कहानी खुद बनाकर।"
भक्षक चुप हो गया।
उसके चेहरे पर पहली बार उलझन दिखाई दी।
तभी...
अधूरी किताब हवा में उठी।
उसका आखिरी पन्ना खुला।
और उस पर एक नई लाइन लिखी गई—
"हर कहानी का सबसे कठिन हिस्सा उसका अंत नहीं..."
"अपनी कहानी की जिम्मेदारी स्वीकार करना है।"
भक्षक उस पन्ने को घूरता रहा।
उसका शरीर धीरे-धीरे छोटा होने लगा।
काला धुआँ कम होने लगा।
लेकिन उसी क्षण...
काली किताब के अंदर से एक तेज़ चीख सुनाई दी।
"नहीं!"
पन्ने फटने लगे।
नैना ने घबराकर कहा—
"यह क्या है?"
कबीर ने किताब को देखा।
"भक्षक अकेला नहीं है।"
"उसके पीछे..."
"कुछ और है।"
काली किताब का आखिरी पन्ना फट गया।
उसके पीछे एक दूसरी किताब दिखाई दी।
छोटी...
पुरानी...
और पूरी तरह सफेद।
उसके कवर पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—
"लेखक"
अनन्या ने उसे देखते ही कदम पीछे कर लिए।
"यह किताब..."
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
"यह भक्षक की भी नहीं है।"
आरव ने पूछा—
"तो किसकी है?"
कबीर ने किताब को देखते हुए कहा—
"जिसने पहली बार..."
"भक्षक को लिखा था।"
नैना ने डरते हुए पूछा—
"और वह कौन था?"
किताब अपने-आप खुली।
पहले पन्ने पर एक नाम उभरने लगा।
अक्षर धीरे-धीरे साफ हुए।
अनन्या की आँखें फैल गईं।
क्योंकि उस पन्ने पर लिखा था—
"अनन्या की माँ।"
अनन्या के हाथ से सुनहरी कलम गिर गई।
"मेरी..."
"माँ?"
भक्षक ने पहली बार डरकर उस किताब को देखा।
उसने धीमे स्वर में कहा—
"वह वापस आ गई है..."
और अंतिम पुस्तकालय की सारी किताबें एक साथ बंद हो गईं।
क्रमशः...