कुर्सी Madhavi Tripathi द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

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कुर्सी


“कुर्सी बदलते देर नहीं लगती, लेकिन इंसान की पहचान उसके व्यवहार से होती है।”

समय बड़ी खामोशी से यह बदल देता है कि हम कहाँ बैठे हैं।

कुछ साल पहले मैं स्कूल की एक विदाई पार्टी में गई थी।

उस दिन स्कूल का माहौल हमेशा से थोड़ा अलग था। कुछ लोग खुश थे, कुछ भावुक। पुराने किस्से याद किए जा रहे थे और आने वाले बदलाव की बातें हो रही थीं।

प्रिंसिपल मंच पर बैठे थे और हमेशा की तरह सबको निर्देश दे रहे थे।

उनके आते ही शिक्षक खड़े हो जाते थे।

सब उनकी बात ध्यान से सुनते थे।

किसी को कोई काम होता, तो उनकी तरफ देखा जाता।

उस समय उनकी कुर्सी सिर्फ एक कुर्सी नहीं थी। वह उनके पद की पहचान थी। उनके अधिकार की पहचान थी। उनके आसपास का पूरा माहौल जैसे उस कुर्सी से जुड़ा हुआ था।

तब मैंने इस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया था।

लेकिन एक साल बाद मेरी उनसे फिर मुलाकात हुई।

इस बार वे मंच पर नहीं थे।

वे चुपचाप लोगों के बीच बैठे थे।

जिस कुर्सी पर वे कभी बैठते थे, उस पर अब कोई और बैठा था।

कुछ देर तक हम बातें करते रहे। पुराने स्कूल की बातें, कुछ यादें और कुछ सामान्य बातें।

जाते-जाते उन्होंने मेरी तरफ देखा, मुस्कुराए और कहा,

“कमाल है ना... एक कुर्सी कितनी जल्दी भूल जाती है कि उस पर कौन बैठा था।”

मैं भी मुस्कुरा दी।

उस समय मैंने उस बात का कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन उनकी वह एक छोटी-सी बात मेरे मन में कहीं रह गई।

क्योंकि सच तो यही है।

ज़िंदगी में ऐसी बहुत सी कुर्सियाँ होती हैं।

अधिकार की कुर्सी।

सफलता की कुर्सी।

लोकप्रियता की कुर्सी।

पैसों और संपत्ति की कुर्सी।

किसी संस्था में ऊँचे पद की कुर्सी।

किसी परिवार में फैसले लेने की कुर्सी।

और कभी-कभी तो सिर्फ अपने अनुभव की कुर्सी भी।

जब हम किसी कुर्सी पर बैठे होते हैं, तो धीरे-धीरे हमें वह हमेशा की अपनी लगने लगती है।

लोग हमारी बात सुनते हैं तो हमें लगता है कि शायद हमारी बात में ही इतना वजन है।

लोग सम्मान से खड़े होते हैं तो हमें लगता है कि यह सम्मान हमेशा हमारे साथ रहेगा।

लोग हमारी मदद चाहते हैं तो हमें लगता है कि हम हमेशा उनकी जरूरत बने रहेंगे।

लेकिन हम एक बात भूल जाते हैं—

कई बार लोग हमसे नहीं, हमारी स्थिति से जुड़े होते हैं।

सम्मान हमारा हो सकता है, लेकिन कई बार वह हमारे पद का भी होता है।

और पद...

वह हमेशा नहीं रहता।

समय किसी का पक्ष नहीं लेता।

वह न किसी के पद से प्रभावित होता है, न किसी की उम्र से, न किसी की ताकत से।

वह बस चलता रहता है।

आज जो व्यक्ति आगे है, कल कोई और आगे हो सकता है।

आज जो आदेश दे रहा है, कल वही किसी और की बात सुन रहा हो सकता है।

आज जो विद्यार्थी है, वह कल शिक्षक बन सकता है।

आज जो बच्चा अपने माता-पिता का हाथ पकड़कर चलता है, वही एक दिन उनके लिए सहारा बन जाता है।

आज जो नया कर्मचारी है, वह कुछ साल बाद वरिष्ठ बन जाता है।

और जो व्यक्ति कभी सबसे मजबूत दिखाई देता था, उसे भी एक दिन किसी दूसरे के सहारे की जरूरत पड़ सकती है।

यही जीवन है।

हम सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर थोड़ी देर के लिए बैठे हैं।

किसी की कुर्सी बड़ी है, किसी की छोटी।

किसी की कुर्सी ऊँची है, किसी की साधारण।

लेकिन कोई भी कुर्सी हमेशा के लिए हमारी नहीं है।

यह समझ आ जाए, तो शायद हमारे व्यवहार में बहुत कुछ बदल सकता है।

हम अपने से छोटे व्यक्ति से थोड़ा प्यार से बात करेंगे।

किसी नए व्यक्ति को देखकर उसे कमतर नहीं समझेंगे।

किसी कर्मचारी की गलती पर उसे सबके सामने अपमानित करने के बजाय समझाने की कोशिश करेंगे।

किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी आज जरूरत नहीं है, फिर भी सम्मान देंगे।

क्योंकि हमें नहीं पता कि समय कब किसे किस जगह पहुँचा देगा।

और शायद यही बात उस कुर्सी ने मुझे सिखाई।

ज़िंदगी लोगों को एक रात में नहीं बदलती। वह बस उनकी जगह बदल देती है।

तब से जब भी ज़िंदगी मुझे कोई अच्छी जगह, पद या जिम्मेदारी देती है, मैं खुद को एक बात याद दिलाती हूँ—

जब तक कुर्सी पर हो, लोगों के साथ प्यार और सम्मान से पेश आओ।

क्योंकि एक दिन तुम्हें भी उस कुर्सी के पास खड़ा होना होगा।

और उस दिन...

लोगों को यह याद नहीं रहेगा कि तुम्हारी कुर्सी कितनी बड़ी थी।

उन्हें यह भी याद नहीं रहेगा कि तुम्हारे पास कितने अधिकार थे।

उन्हें शायद यह भी याद न हो कि तुम किस पद पर थे।

लेकिन उन्हें यह जरूर याद रहेगा कि उस पद पर रहते हुए तुमने उनके साथ कैसा व्यवहार किया था।

क्या तुमने उन्हें सम्मान दिया था?

क्या तुमने उनकी बात सुनी थी?

क्या तुमने उनकी परेशानी समझने की कोशिश की थी?

या फिर तुम्हें अपनी कुर्सी इतनी बड़ी लगने लगी थी कि तुम्हें उसके सामने बाकी लोग छोटे दिखाई देने लगे थे?

कुर्सी चली जाती है।

पद बदल जाता है।

नाम के आगे लगा हुआ पदनाम बदल जाता है।

लेकिन किसी के दिल में आपके लिए बनी जगह इतनी आसानी से नहीं बदलती।

इसलिए जब भी जीवन आपको कोई अच्छी कुर्सी दे...

उस पर बैठकर खुद को बड़ा मत समझिए।

बस इतना याद रखिए कि यह कुर्सी आपको कुछ समय के लिए मिली है।

इसका सबसे अच्छा इस्तेमाल दूसरों को छोटा दिखाने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए कुछ अच्छा करने में है।

क्योंकि आखिर में...

कुर्सी याद नहीं रखती कि उस पर कौन बैठा था।
लेकिन लोग जरूर याद रखते हैं कि उस कुर्सी पर बैठकर आपने उनके साथ कैसा व्यवहार किया था।

सीख : 

समय हर किसी की जगह बदल देता है।

आज आपके पास जो पद, अधिकार और सम्मान है, वह हमेशा आपके पास नहीं रहेगा।

लेकिन आपने लोगों के साथ जैसा व्यवहार किया, वह आपकी कुर्सी छिन जाने के बाद भी उनके दिल में बना रह सकता है।

इसलिए कुर्सी कितनी बड़ी है, यह मत सोचिए।

जब तक उस पर बैठे हैं, यह सोचिए कि आपका व्यवहार कितना बड़ा है।