अनंत के उस पार - 8 Shivam Dalvadi द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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अनंत के उस पार - 8

घर के पीछे
बिट्टू की वह आख़िरी फुसफुसाहट "वो आदमी हर रात आपके घर के पीछे खड़ा रहता है" मीरा के कानों में किसी भारी घंटी की तरह गूँज रही थी।

नील झील से शर्मा हवेली की तरफ़ जाने वाला संकरा, पथरीला रास्ता चढ़ते हुए मीरा का हर कदम भारी हो रहा था। शाम के चार बज रहे थे, लेकिन नीलगढ़ के ऊपर कोहरे की चादर इतनी घनी हो चुकी थी मानो रात ने अपना पहला साया गिरा दिया हो। चीड़ के पेड़ों के बीच से बहती हवा में एक बर्फ़ीला दंश था जो कपड़ों को चीरकर हड्डियों तक उतर रहा था।

पहाड़ी के मोड़ पर पहुँची तो शर्मा हवेली की विशाल, काली इमारत कोहरे के बीच से किसी विशालकाय रक्षक की तरह उभरी।

तीन मंज़िला यह हवेली अपनी पुरानी काठ की नक्काशी, ढलवां टिन की छतों और ऊँचे चिमनियों के साथ सदियों का इतिहास सीने में दबाए खड़ी थी। लेकिन आज मीरा को इस घर को देखकर वह सुकून महसूस नहीं हो रहा था जो कभी आर्यन के साथ यहाँ आने पर मिलता था। आज यह हवेली एक ऐसे अकेले टापू जैसी लग रही थी जो समय के समंदर में अलग-थलग पड़ गया था।

मीरा हवेली के मुख्य दरवाज़े पर पहुँची। उसने सांकल खोली और अंदर दाख़िल हुई।

हॉल में सन्नाटा पसरा हुआ था। उसने बत्तियाँ जलाईं, लेकिन उनकी पीली रोशनी भी हवेली के अँधेरे कोनों को पूरी तरह से मिटा नहीं पा रही थी।

मीरा के दिमाग़ में सिर्फ़ एक ही बात घूम रही थी घर का पिछला हिस्सा।

शर्मा हवेली का पिछला हिस्सा एक ढलानदार पहाड़ी से सटा हुआ था। वहाँ एक पुराना, आधा-अधूरा बना हुआ बागीचा था जहाँ देवदार के ऊंचे पेड़ और जंगली झाड़ियाँ उगी हुई थीं। उस तरफ़ रसोई और स्टोर रूम के पीछे एक भारी लकड़ी का दरवाज़ा खुलता था, जिसे कई हफ़्तों से किसी ने खोला नहीं था।

मीरा ने एक गहरी साँस ली। उसने रसोई से एक बड़ी बैटरी वाली टॉर्च उठाई और स्टोर रूम की तरफ़ बढ़ी।

शाम के साढ़े पाँच बज चुके थे। बाहर पूरी तरह से अँधेरा छा चुका था।

बारिश फिर से रुक-रुक कर शुरू हो गई थी। टिन की छतों पर गिरती बूँदें एक निरंतर लय पैदा कर रही थीं।

मीरा ने स्टोर रूम का पिछला भारी दरवाज़ा खोला। लकड़ी की किवाड़ें पुरानी जंग लगी कब्ज़ों पर चरचराती हुई खुलीं, और एक झटके में बाहर की ठंडी हवा और भीगी मिट्टी की गंध अंदर घुसी।(Yt:- kahanisafar)

मीरा ने टॉर्च जलाई और उसकी तेज़ सफ़ेद रोशनी को हवेली के पीछे फैले हुए उस सुनसान बागीचे पर घुमाया।

सामने घने चीड़ के पेड़ खड़े थे। ज़मीन पर सड़ी हुई पत्तियों, जंगली घास और भीगी मिट्टी का एक मलबा जमा था। हवेली की विशाल पत्थर की दीवार बागीचे को घेरे हुए थी।

वहाँ कोई नहीं था।

हवा में झूमते पेड़ों की शाखों के अलावा वहाँ जीवन का कोई निशान नहीं था।

"मैं भी क्या सोच रही हूँ..." मीरा ने खुद से फुसफुसाकर कहा। उसकी आवाज़ ठंडी हवा में बिखर गई। "एक १२ साल के बच्चे की बातों पर भरोसा करके मैं आधी रात को घर के पीछे भूत ढूँढने निकली हूँ।"

उसने राहत की एक ठंडी साँस भरी और दरवाज़ा बंद करने ही वाली थी कि... टॉर्च की सफ़ेद रोशनी ज़मीन पर पड़ी भीगी मिट्टी पर अटक गई।

मीरा की आँखें फटी की फटी रह गईं।

रसोई के दरवाज़े से ठीक पाँच फ़ुट की दूरी पर, भीगी मिट्टी और सड़ी पत्तियों के ऊपर... इंसानी पैरों के ताज़ा निशान बने हुए थे।

वे कोई आम निशान नहीं थे। वे भारी, नपे-तुले जूतों के निशान थे साइज़ १० के बूट्स, बिल्कुल वैसे ही जैसे आर्यन पहनता था!

मीरा का दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा मानो उसकी पसलियों को तोड़ देगा। उसने टॉर्च की रोशनी को उन निशानों पर स्थिर किया।

निशान जंगलात की तरफ़ से, घने चीड़ के पेड़ों के बीच से आ रहे थे। वे एक-एक कदम आगे बढ़ते हुए सीधे हवेली की उस भारी, ठोस पत्थर की दीवार की तरफ़ जा रहे थे।

मीरा टॉर्च की रोशनी को निशानों के साथ-साथ आगे बढ़ाती गई।

एक कदम... दो कदम... तीन कदम...

और फिर... सबसे भयानक बात।

निशान हवेली की उस ठोस पत्थर की दीवार से ठीक दो इंच पहले जाकर अचानक खत्म हो गए थे!

वहाँ न तो कोई मुड़ने का निशान था, न ही वापस लौटने के कदम थे। ऐसा लग रहा था मानो वह जो कोई भी इंसान था, वह जंगलात से चलकर आया, हवेली के पीछे खड़ा हुआ, और फिर... सीधे उस ठोस पत्थर की दीवार के अंदर चलकर गायब हो गया!

मीरा के हाथ से टॉर्च छूटते-छूटते बची। उसका पूरा शरीर बर्फ़ की तरह ठंडा पड़ गया।

वे पैरों के निशान गीले थे। उन निशानों के अंदर अभी भी पानी भर रहा था, जिसका मतलब था कि वह जो कोई भी था, वह कुछ ही समय पहले वहाँ खड़ा था!

टक... टक... टक...

हवेली के मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई।

मीरा झटके से पीछे मुड़ी। डर के मारे उसकी चीख निकलने ही वाली थी, लेकिन उसने अपने मुँह पर हाथ रख लिया। उसने तेज़ी से पिछला दरवाज़ा बंद किया, सांकल चढ़ाई और काँपते पैरों से हॉल की तरफ़ भागी।

"मीरा? दरवाज़ा खोलो, मैं हूँ!" बाहर से काव्या की आवाज़ आई।

मीरा ने राहत की एक काँपती हुई साँस ली। उसने सांकल खोली और दरवाज़ा धकेल दिया।

बाहर काव्या खड़ी थी। उसने एक बड़ा सा रेनकोट पहन रखा था और उसके हाथ में एक ढका हुआ टिफिन बक्सा था। काव्या का चेहरा बारिश के पानी से भीगा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में मीरा के लिए वही पुरानी चिंता थी।

"तुमने इतनी देर क्यों लगाई दरवाज़ा खोलने में?" काव्या ने अंदर आते ही अपना रेनकोट उतारते हुए पूछा। "मैं कब से बाहर खड़ी हूँ।"

मीरा ने बिना एक शब्द बोले काव्या की कलाई पकड़ी और उसे घसीटते हुए स्टोर रूम की तरफ़ ले जाने लगी।

"मीरा! क्या कर रही हो? मेरा हाथ छोड़ो! कहाँ ले जा रही हो मुझे?" काव्या चिल्लाई।

"चुपचाप चलो मेरे साथ!" मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में एक ऐसा पागलपन था कि काव्या सहम गई।

मीरा काव्या को स्टोर रूम के पिछले दरवाज़े पर ले आई। उसने ज़ोर से दरवाज़ा खोला और टॉर्च की रोशनी सीधे उस भीगी मिट्टी पर डाल दी जहाँ वे ताज़ा पैरों के निशान बने हुए थे।

"यह देखो!" मीरा चिल्लाई। उसकी उँगली उन निशानों की तरफ़ काँप रही थी। "बिट्टू सही कह रहा था, काव्या! कोई हर रात यहाँ आता है! देखो इन निशानों को... यह आर्यन के जूतों का साइज़ है! और यह देखो... यह निशान सीधे दीवार में जाकर खत्म हो गए हैं! कोई इंसान दीवार के अंदर कैसे जा सकता है, काव्या? जवाब दो मुझे!"

काव्या ने टॉर्च की रोशनी में उन पैरों के निशानों को देखा।

एक पल के लिए... सिर्फ़ एक पल के लिए, काव्या के चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया। उसकी आँखों में एक ऐसा भयानक, नंगा डर तैर गया जिसे वह छुपा नहीं सकी। उसकी उँगलियाँ अपने आप अपनी कलाई की तरफ़ गईं, जहाँ वह नीला निशान था।

लेकिन अगले ही सेकंड... काव्या ने खुद पर क़ाबू पा लिया। उसने अपनी आँखों के डर को एक ठंडी, पेशेवर ढाल के पीछे छुपा लिया।

"मीरा..." काव्या ने एक गहरी साँस ली और टॉर्च को मीरा के हाथ से ले लिया। "तुम सच में बहुत बीमार हो।"

"क्या?" मीरा अविश्वास से काव्या को घूरने लगी। "तुम क्या बकवास कर रही हो, काव्या? निशान तुम्हारे सामने हैं! तुम अपनी आँखों से देख रही हो!"

"मुझे यहाँ सिर्फ़ कीचड़ और बारिश के पानी के गड्ढे दिख रहे हैं, मीरा," काव्या ने ठंडे स्वर में कहा। उसने टॉर्च की रोशनी को उन निशानों पर इधर-उधर घुमाया। "नीलगढ़ में कल रात से मूसलाधार बारिश हो रही है। पहाड़ों से पानी नीचे बहता है, तो मिट्टी में ऐसे गड्ढे बन जाते हैं। तुम हर बहते पानी के गड्ढे में आर्यन के जूतों का निशान देख रही हो!"

"तुम झूठ बोल रही हो!" मीरा चीखी। "काव्या, तुम जानबूझकर सच पर पर्दा डाल रही हो! तुम रखवालों की सदस्य हो, तुम उस नीले निशान के बारे में जानती हो, तुम जानती हो कि आर्यन डूबा नहीं था! क्यों कर रही हो तुम ऐसा मेरे साथ? मैं तुम्हारी सबसे अच्छी सहेली हूँ!"

काव्या ने मीरा के दोनों कंधों को कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक असीम, दुखभरी दया थी।

"मैं तुम्हारी सहेली हूँ मीरा, इसीलिए कह रही हूँ!" काव्या की आवाज़ में दर्द था। "तुम सदमे में हो। जब कोई अपना इस तरह अचानक चला जाता है, तो दिमाग़ हर खामोशी में उसकी आवाज़ और हर मिट्टी के गड्ढे में उसके पैरों के निशान ढूँढने लगता है। डॉ. सक्सेना ने जो नींद की गोलियाँ तुम्हें दी हैं... तुम्हें उन्हें बदलवाना चाहिए। वे गोलियाँ तुम्हारे दिमाग़ पर असर कर रही हैं, तुम्हें मतिभ्रम (hallucinations) हो रहे हैं!"

"मुझे कोई मतिभ्रम नहीं हो रहा है!" मीरा ने अपना शरीर झटककर काव्या के हाथों से छुड़ा लिया।

"ठीक है," काव्या ने हाथ ऊपर उठाते हुए कहा। "अगर तुम्हें लगता है कि मैं झूठ बोल रही हूँ, तो ठीक है। लेकिन आज रात तुम यह दवा लोगी।"

काव्या ने अपने बैग से एक छोटी सी शीशी निकाली और उसमें से एक नीली गोली निकालकर टेबल पर रख दी।

"यह नई ट्रैंक्विलाइज़र है," काव्या ने कहा। "इसे लो और सो जाओ। अगर तुम अपनी नींद पूरी नहीं करोगी, तो तुम्हारा दिमाग़ तुम्हें पूरी तरह तोड़ देगा।"

काव्या ने टिफिन मेज़ पर रखा, अपना रेनकोट उठाया और बिना पीछे मुड़े हवेली के मुख्य दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई।

दरवाज़ा एक भारी आवाज़ के साथ बंद हो गया।

रात के ग्यारह बज चुके थे।

मीरा अपने बेडरूम में अकेली बैठी थी। उसने काव्या की दी हुई वह नीली गोली नहीं खाई थी वह उस शीशी को टकटकी लगाए घूर रही थी। लेकिन उसका शरीर और दिमाग़ अब और तनाव सहने की स्थिति में नहीं थे। पिछले ७२ घंटों से बिना सोए, बिना खाए, लगातार डर और दुख के माहौल में रहने के कारण उसका सिर फटने लगा था।

आख़िरकार, बेबसी में मीरा ने वह नीली गोली उठाई और पानी के साथ गटक ली।

वह पलंग पर लेट गई। उसने आर्यन की कोरडरॉय जैकेट को अपने सीने से लगा लिया।

धीरे-धीरे, दवा का भारी असर उसके नसों में फैलने लगा। उसकी पलकें भारी होने लगीं। कमरे की दीवारें, खिड़की के बाहर गिरती बारिश की आवाज़, और हवेली की पुरानी लकड़ी की गंध सब कुछ एक धुंधले भंवर में बदलने लगा।

मीरा एक गहरी, अस्वाभाविक नींद की आगोश में समा गई।

और फिर... सपना शुरू हुआ।

यह कोई साधारण सपना नहीं था। इसमें कोई धुंधलापन नहीं था, कोई असंगतता नहीं थी। यह सपना हक़ीक़त से भी ज़्यादा वास्तविक और ज्वलंत था।

मीरा ने खुद को नील झील के किनारे खड़ा पाया।

लेकिन यह वह नील झील नहीं थी जो उसने सुबह देखी थी।

आसमान में कोई सूरज या चाँद नहीं था पूरा आसमान एक गहरे, जामुनी रंग की रोशनी से जगमगा रहा था। झील का पानी किसी नीले नीलम की तरह अंदर से चमक रहा था। पानी इतना पारदर्शी था कि ज़मीन से खड़े होकर भी उसकी अगाध गहराइयों को देखा जा सकता था।

और उस झील के ठीक बीचों-बीच... पानी में खड़ा था आर्यन।

वह अपनी वही कोरडरॉय जैकेट और पुरानी कॉटन शर्ट पहने हुए था। पानी उसके सीने तक आ रहा था। उसके बाल भीगे हुए थे, और उसकी गहरी भूरी आँखों में एक ऐसा असीम, दर्दभरा प्रेम था जो मीरा की आत्मा को चीर गया।

"आर्यन!" मीरा चिल्लाई। उसने पानी की तरफ़ कदम बढ़ाना चाहा, लेकिन उसके पैर ज़मीन से जम चुके थे।

आर्यन ने मुस्कुराने की कोशिश की। उसने पानी के अंदर से अपना हाथ उठाया और मीरा की तरफ़ हाथ हिलाया बिल्कुल वैसे ही जैसे वह अपनी मौत की सुबह सड़क के मोड़ पर खड़े होकर हाथ हिला रहा था।

उसने अपने होंठ हिलाए। पानी के ऊपर कोई आवाज़ नहीं आई, लेकिन मीरा उसकी रंगत को पढ़कर शब्द समझ सकती थी।

आर्यन कह रहा था: "नीचे देखो, मीरा..."

मीरा ने अपनी नज़रें नीचे झुकाईं। उसने झील के उस पारदर्शी, नीले पानी के अंदर झाँका।

और जो उसने देखा... उससे उसकी आत्मा तक काँप गई।

नील झील के नीले पानी के नीचे, अगाध गहराई में... एक पूरा कस्बा बसा हुआ था!

वहाँ वही चीड़ के पेड़ थे, वही पत्थर की सड़कें थीं, वही भैरवगढ़ किला था, और वही शर्मा हवेली थी... लेकिन सब कुछ उल्टा लटका हुआ था!

आकाश नीचे था, सड़कें ऊपर थीं। उस जलमग्न, उल्टे कस्बे में इमारतें उल्टी लटकी हुई थीं, और उन उल्टी सड़कों पर कुछ धुंधले, पारदर्शी लोग चल रहे थे जो ऊपर पानी की तरफ़ देख रहे थे!

आर्यन उसी उल्टे कस्बे की आकाशगंगा में खड़ा था। वह पानी के अंदर से नीचे की तरफ़ इशारा कर रहा था उस उल्टे नीलगढ़ की तरफ़!

और फिर... पानी के अंदर से आर्यन की आवाज़ गूँजी, जो सीधे मीरा की चेतना में किसी बिजली की तरह कौंध गई:

"हम यहाँ रहते हैं, मीरा... हम सब यहाँ हैं..."

Yt:- kahanisafar par visual ke saath sunne