अनंत के उस पार - 5 Shivam Dalvadi द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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अनंत के उस पार - 5

पहली रात
शीशे पर लिखा वह भयानक शब्द "अगला" बारिश की बूँदों और धुंध के साथ घुलकर धीरे-धीरे नीचे बह रहा था, जैसे काँच पर किसी अदृश्य आँख से नीले रंग के आँसू छलक रहे हों।

मीरा का दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था मानो उसकी पसलियों को तोड़कर बाहर निकल आएगा। उसने आर्यन की वह चमड़े की डायरी अपने सीने से किसी ढाल की तरह चिपका ली और बदहवास होकर पीछे हटी। उसका पैर स्टडी टेबल की भारी नक्काशीदार टाँग से टकराया, और वह फ़र्श पर गिरते-गिरते बची। हाथों की कँपकँपी के कारण उसके हाथ से मोमबत्ती का स्टैंड छूटकर कालीन पर जा गिरा, और एक ही झटके में पूरा कमरे का माहौल गहरे, स्याह अँधेरे में डूब गया।

स्टडी रूम में अब सिर्फ़ खिड़की के काँच से छनकर आती नीलगढ़ की मद्धम, स्लेटी रात की रोशनी बची थी।

खिड़की के बाहर, उस घने, सफ़ेद कोहरे के पार खड़ी वह लंबी, काली छाया अब भी वहीं मौजूद थी। उसकी रूपरेखा किसी इंसान जैसी ही थी, लेकिन उसमें कोई आयतन, कोई जीवन नहीं था। उसकी दो खाली, रोशनी-हीन आँखें उस धुंधले काँच को भेदती हुई सीधे मीरा के वजूद के अंदर तक झाँक रही थीं।

हवा का एक भयानक, बर्फ़ीला झोंका आया और लकड़ी की भारी खिड़की के दोनों पट बड़े ज़ोर से फड़फड़ा उठे।

मीरा का पूरा शरीर डर की एक ठंडी लहर से काँप रहा था। उसकी त्वचा पर रोंगटे खड़े हो चुके थे और गला इस कदर सूख गया था कि चीखने की कोशिश करने पर भी उसके मुँह से केवल एक हल्की सी सरसराहट ही निकली। लेकिन उस भयावह डर की तह के नीचे, उसके अंदर कहीं गहराई में एक अजीब सी जिद्दी अकुलाहट भी उफान मार रही थी। पिछले तीन दिनों से जो कुछ हो रहा था आर्यन की असामयिक मृत्यु, उसकी हथेली पर बना वह नीला निशान, श्मशान की राख, काव्या का वह संदिग्ध बर्ताव, और अब डायरी में लिखे वे भयानक सच इन सबने मीरा के बर्दाश्त करने की क्षमता को अंतिम सीमा तक धकेल दिया था।

अगर यह सब सच था, अगर आर्यन को किसी साज़िश के तहत इस दुनिया से मिटाया गया था, तो मीरा अब भाग नहीं सकती थी।

उसने कालीन पर पड़ी मोमबत्ती को छोड़ा और टेबल पर रखे पीतल के भारी पेपर-वेट को अपनी उँगलियों में भींच लिया। उसकी आँखों में डर के साथ-साथ एक पागलपन भरी ज्वाला जल उठी।

"कौन हो तुम?" मीरा चीखी। उसकी आवाज़ स्टडी रूम की ऊँची छत से टकराकर गूँज उठी। "बाहर कौन खड़ा है? सामने आओ!"

उसने अपने दोनों हाथों से खिड़की के भारी लकड़ी के पट को धकेल कर पूरा खोल दिया।

बर्फ़ीली हवा और मूसलाधार बारिश की बौछार एक साथ किसी हिंसक जानवर की तरह कमरे के अंदर घुसी। हवा के उस झोंके ने टेबल पर बिखरे आर्यन के रिसर्च पेपर्स को हवा में उड़ा दिया। बारिश की ठंडी, नुकीली बूँदें मीरा के चेहरे, गले और कपड़ों पर आकर पड़ीं। उसने अपनी आँखें मिचमिचाते हुए कोहरे और बारिश की चादर को चीरकर बाहर देखने की कोशिश की।

बाहर, देवदार और बलूत के विशाल पेड़ हवा के थपेड़ों से पागलों की तरह झूम रहे थे। चीड़ की पत्तियों की सरसराहट ऐसी लग रही थी मानो सैकड़ों लोग एक साथ फुसफुसा रहे हों। लेकिन... उस खिड़की के ठीक बाहर, जहाँ कुछ ही सेकंड पहले वह छाया खड़ी थी, अब कोई नहीं था।

वह काली आकृति गायब हो चुकी थी।

ज़मीन पर, भीगी घास, सड़ी हुई पत्तियों और कीचड़ के बीच किसी इंसान के पैरों के निशान तक नहीं थे। ऐसा लग रहा था मानो वह छाया हवा में ही विलीन हो गई हो, या शायद वह कभी शारीरिक रूप से वहाँ थी ही नहीं बस नीलगढ़ के इस अभिशप्त कोहरे और मीरा के भयग्रस्त मस्तिष्क का एक भयावह छलावा थी।

मीरा ने हाँफते हुए खिड़की के भारी पटों को वापस खींचा और उनकी लोहे की चिटकनी चढ़ा दी। उसने अँधेरे में ही टटोलकर मेज़ से माचिस ढूँढ़ी। काँपते हाथों से तीली जलाई और मोमबत्ती की लौ को फिर से ज़िंदा किया।

काँच पर लिखा वह शब्द "अगला" अब पूरी तरह बहकर मिट चुका था। लेकिन वह शब्द मीरा की चेतना पर किसी गर्म लोहे की मुहर की तरह छप गया था।

अगला? क्या वह छाया कह रही थी कि आर्यन को मिटाने के बाद अब अगला नंबर मीरा का था? या फिर वह किसी ऐसी बलि की बात कर रही थी जो नीलगढ़ की यह भूखी ज़मीन हर ४७ साल में वसूलती थी?

रात के बारह बज चुके थे।

मीरा ऊपर के स्टडी रूम से नीचे मुख्य हॉल में आ गई थी। वह अब उस अँधेरे, किताबों से भरे कमरे में अकेले एक मिनट भी नहीं रुक सकती थी। उसने हवेली के भारी सागौन के मुख्य दरवाज़े, खिड़कियों और पिछले हिस्से की किवाड़ों को अंदर से मज़बूत सांकलों से बंद कर दिया था। फिर भी, उसे लग रहा था कि यह विशाल, १२० साल पुरानी हवेली किसी सुरक्षा का आश्रय नहीं, बल्कि एक ऐसा भयावह पिंजरा है जिसकी लकड़ी की दीवारें धीरे-धीरे सांस ले रही थीं और अंदर की हवा को सुखा रही थीं।

वह हॉल के बीचों-बीच रखे मखमली सोफ़े पर बैठी थी। उसने अपने दुबले शरीर के चारों तरफ़ आर्यन की वही पुरानी, भूरे रंग की कोरडरॉय जैकेट कसकर लपेट रखी थी। सामने रखी शीशम की टी-पॉय पर आर्यन की वह चमड़े की डायरी खुली रखी थी। डायरी के कवर पर उकेरा गया वह नीला पत्थर अब भी कमरे की मद्धम रोशनी में धीमी गति से स्पंदित हो रहा था—उसकी नीली चमक हर कुछ सेकंड में हल्की होती और फिर गहरा जाती, जैसे किसी जीवित प्राणी की साँसें चल रही हों।

मीरा डायरी में लिखी हर एक पंक्ति को अपने दिमाग़ में बार-बार दोहरा रही थी।

'चेतना की परतें'... 'नील रात का चक्र'... '१७१८ में गायब हुए २३ लोग'... '१८५९ का अंग्रेज़ सर्वेयर मैकिन्टायर'... '१९५३ में परतों के पार चले गए दादाजी'... और सबसे बढ़कर 'रखवाले'।

क्या यह सब सच हो सकता था? क्या कोई ऐसा शहर हो सकता था जहाँ समय एक सीधी लकीर में न बहकर किसी भंवर की तरह घूमता हो?

मीरा ने अपनी आँखें मूँद लीं। उसकी यादों में दिल्ली का वह छोटा सा आर्ट स्टूडियो कौंध गया जहाँ वह आर्यन से पहली बार मिली थी। तब आर्यन कितना सहज था, कितना जीवंत था। वह घंटों मीरा को कैनवास पर रंगों के संयोजन के बारे में बताता था। लेकिन जब से वे तीन साल पहले नीलगढ़ आकर इस पुश्तैनी हवेली में बसे थे, आर्यन धीरे-धीरे बदलता चला गया था। उसकी हँसी गायब हो गई थी, उसकी किताबों का दायरा इतिहास से हटकर तंत्र, अलौकिक सिद्धांतों और प्राचीन पांडुलिपियों की तरफ़ मुड़ गया था। वह अक्सर रात-रात भर हवेली के अँधेरे कोनों में खड़ा होकर दीवारों को घूरता रहता था।

"तुम जानते थे, आर्यन..." मीरा ने अँधेरे हॉल में फुसफुसाया। उसकी आवाज़ हवेली की ऊँची लकड़ी की छत से टकराकर वापस आई। "तुम जानते थे कि नीलगढ़ तुम्हें निगल रहा है। फिर भी तुम मुझे छोड़कर चले गए? तुमने अपनी डायरी में लिखा कि मैं तुम्हें ढूँढने न आऊँ... लेकिन तुम जानते थे कि मैं तुम्हारे बिना इस दुनिया में ज़िंदा नहीं रह सकती। तुमने मुझसे यह रास्ता क्यों चुना?"

मीरा के आँसू छलककर डायरी के पन्नों पर गिर पड़े।

तभी... हवेली का अंदरूनी माहौल बहुत अस्वाभाविक तरीके से बदलने लगा।

बाहर बारिश का शोर धीरे-धीरे थमता जा रहा था, लेकिन हवेली के अंदर का तापमान इतनी तेज़ी से गिरा कि मीरा की त्वचा पर चींटियाँ सी रेंगने लगीं। कमरे की हवा इतनी ठंडी हो गई कि मीरा के मुँह से साँस छोड़ते ही सफ़ेद भाप के गुबार निकलने लगे। खिड़कियों के शीशों पर अंदर की तरफ़ से बर्फ़ की पतली, पारदर्शी परतें जमने लगीं।

हॉल के सुदूर कोने में रखी पुरानी ग्रैंडफ़ादर क्लॉक (Grandfather Clock) जो १८९० के दशक की एक विशालकाय लकड़ी की घड़ी थी अचानक अजीब हरकतें करने लगी।

उसका भारी पीतल का लोलक (pendulum), जो पिछले तीन दिनों से एक ही गति से 'टिक-टॉक' कर रहा था, अचानक झटके से रुक गया।

और फिर... वह उल्टी दिशा में दौड़ने लगा!

टिक-टॉक... टिक-टॉक...

घड़ी की पीतल की सुइयाँ किसी विक्षिप्त गति से उल्टी दिशा में घूमने लगीं। बारह से ग्यारह... ग्यारह से दस... दस से नौ...

घड़ी के अंदर के गियरों के घिसने की एक भयावह, लोहे की चरमराहट गूँजी। और फिर, एक भारी, गूँजती हुई आवाज़ के साथ घड़ी की सुइयाँ ३:१७ पर आकर पूरी तरह जम गईं।

कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जो भौतिक नहीं था। वह एक ऐसा सन्नाटा था जिसमें आवाज़ का वजूद ही खत्म हो जाता है। मीरा को अपने सीने के अंदर धड़कते हुए दिल की आवाज़ इतनी साफ़ सुनाई दे रही थी जैसे कोई नगाड़ा बज रहा हो।

मीरा ने अपनी कलाई घड़ी की तरफ़ देखा। उसकी डिजिटल घड़ी की स्क्रीन पर भी अंक टिमटिमाए और ३:१७ पर आकर स्थिर हो गए।

और ठीक उसी पल... उसके ठीक ऊपर से आवाज़ आई।

धम... धम... धम...

वह आवाज़ हवेली की तीसरी मंज़िल से आ रही थी।

यह कोई भ्रम नहीं था। यह हवा का थपेड़ा नहीं था, न ही यह किसी लकड़ी का तापीय खिंचाव था। वह किसी के भारी, नपे-तुले और बोझिल कदमों की आवाज़ थी, जो ठीक मीरा के सिर के ऊपर वाली लकड़ी की छत पर चल रहा था।

कोई तीसरी मंज़िल के उस विशाल, बंद पड़े सेंट्रल हॉल में टहल रहा था।

कदमों की चाप बहुत धीमी थी, लेकिन हर कदम के साथ हवेली की १२० साल पुरानी लकड़ी के बीमों में एक हल्की सी थराहट पैदा होती थी।

धम... (दो सेकंड का पूर्ण सन्नाटा)... धम... (फिर दो सेकंड का सन्नाटा)...

मीरा सोफ़े पर जम सी गई। उसका दिल हलक में आ गया था।

तीसरी मंज़िल! वह मंज़िल जिसे आर्यन की दादी कमला शर्मा ने १९७७ की घटना के बाद से पूरी तरह से सील कर दिया था। उस मंज़िल की सीढ़ियों के मुहाने पर लोहे की भारी ग्रिल लगी थी और मुख्य दरवाज़े पर पीतल का एक विशाल, जंग लगा ताला लटका हुआ था जिसकी चाबी हवेली में किसी के पास नहीं थी। वहाँ कोई खिड़की नहीं थी जिसे बाहर से खोला जा सके, न ही छत से अंदर आने का कोई रास्ता था।

तो फिर आज रात... इस बर्फ़ीले सन्नाटे में, ३:१७ बजे उस बंद मंज़िल पर कौन चल रहा था?

"कौन है?" मीरा की आवाज़ उसके गले में ही घुट कर रह गई।

वह सोफ़े से खड़ी हुई। डर उसके पैरों में ज़ंजीरों की तरह बँधा था, लेकिन उसके अंदर छुपा चित्रकार, सच की तलाश में भटकती हुई वह पत्नी, अब रुकने के मूड में नहीं थी। अगर ऊपर आर्यन था... अगर ऊपर कोई ऐसा इंसान था जो इस रहस्य का ताला खोल सकता था, तो उसे ऊपर जाना ही था।

मीरा ने टी-पॉय पर रखी पीतल की लालटेन उठाई। उसकी काँपती हुई पीली रोशनी में हवेली का विशाल हॉल किसी विशालकाय कब्रगाह जैसा लग रहा था। उसने अपने कदम सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ाए।

पहली सीढ़ी पर पैर रखते ही लकड़ी ने एक लंबी, दर्दभरी चीख निकाली चूँ...

मीरा रुकी। उसने ऊपर देखा। कदमों की आवाज़ अभी भी आ रही थी। धम... धम...

वह पहली मंज़िल पार कर गई। फिर दूसरी मंज़िल के अँधेरे गलियारे को पार करती हुई उस संकरी, घुमावदार लकड़ी की सीढ़ी के पास पहुँची जो सीधे तीसरी मंज़िल की तरफ़ जाती थी।

इन सीढ़ियों पर धूल की इतनी मोटी परत चढ़ी थी कि मीरा के पैरों के निशान पीछे साफ़ छप रहे थे। जाले उसके चेहरे और बालों से चिपक रहे थे। हवा में एक बहुत पुरानी, बंद कमरे की, सूखी पत्तियों और अस्वाभाविक ओज़ोन जैसी महक भरी हुई थी।

जैसे-जैसे मीरा तीसरी मंज़िल के करीब पहुँच रही थी, कदमों की आवाज़ और ज़्यादा साफ़ होती जा रही थी।

अब वह आवाज़ सिर्फ़ चलने की नहीं थी। वहाँ... कुछ और भी हो रहा था।

कागज़ों के पलटने की आवाज़। और फिर... किसी लकड़ी की मेज पर पेंसिल या पेन के घिसने की निरंतर सरसराहट।

कोई उस बंद कमरे में बैठा कुछ लिख रहा था।

मीरा तीसरी मंज़िल के मुख्य लैंडिंग पर पहुँचकर खड़ी हो गई।

उसके ठीक सामने सागौन की मोटी, काली लकड़ी का विशाल दरवाज़ा था। दरवाज़े की कुंडी में वही बीस साल पुराना, भारी पीतल का ताला लटका हुआ था। ताले पर जमी धूल और जंग बता रही थी कि इसे हाल के दशकों में किसी इंसानी हाथ ने नहीं छुआ था।

लेकिन...

उस भारी दरवाज़े के निचले हिस्से में, जहाँ फ़र्श और लकड़ी के बीच आधी इंच की पतली सी दरार थी... वहाँ से एक रोशनी बाहर छनकर आ रही थी।

वह रोशनी मोमबत्ती या लालटेन की पीली, गर्म रोशनी नहीं थी। वह एक अमानवीय, मद्धम, पल्स करती हुई (स्पंदित होती हुई) नीली-सफ़ेद रोशनी थी। वही नीली रोशनी जो मीरा ने आर्यन की डायरी के पत्थर में देखी थी!

वह रोशनी ऐसे काँप रही थी मानो अंदर कोई नीली लौ हवा के बिना ही तैर रही हो।

मीरा की साँसें पूरी तरह थम गईं। उसका पूरा शरीर उस भयानक ठंड और डर से काँप रहा था। उसने अपनी लालटेन को फ़र्श पर रख दिया। वह घुटनों के बल ज़मीन पर बैठी और अपनी आँखों को फ़र्श के करीब लाकर उस आधी इंच की दरार से अंदर झाँकने की कोशिश करने लगी।

अंदर का नज़ारा धुंधला था। लेकिन उस नीली रोशनी में मीरा को फ़र्श पर बिखरे हुए सैकड़ों कागज़ात दिखे। और कमरे के बीचों-बीच रखी एक पुरानी मेज के पास... किसी की परछाई बैठी हुई थी।

"कौन है अंदर?" मीरा ने काँपती, टूटती हुई आवाज़ में पूछा। उसने अपना चेहरा दरवाज़े के पास लाते हुए कहा, "आर्यन? क्या तुम अंदर हो? जवाब दो!"

जैसे ही मीरा के मुँह से वह पुकार निकली...

अंदर की तमाम गतिविधियाँ एक झटके में थम गईं।

पेंसिल के घिसने की आवाज़ बंद हो गई। कागज़ों का फड़फड़ाना रुक गया। और सबसे भयावह चलने वाले कदमों की चाप पूरी तरह से शांत हो गई।

पूरी हवेली में एक ऐसा सन्नाटा छा गया मानो समय का चक्र ही रुक गया हो।

मीरा ने अपना कान दरवाज़े की ठंडी, सागौन की लकड़ी से सटा दिया।

अंदर से एक हल्की सी, रेंगती हुई सरसराहट आई जैसे कोई फ़र्श पर अपने कपड़ों को घसीटता हुआ दरवाज़े के बिल्कुल करीब आ रहा हो। कपड़े के सूती रेशों की लकड़ी से रगड़ खाने की आवाज़... और फिर, दरवाज़े की अंदरूनी सतह पर किसी की ठंडी उँगलियों के खुरचने की आवाज़ आई।

वह जो कोई भी था, अब दरवाज़े के ठीक दूसरी तरफ़, मीरा से केवल दो इंच की दूरी पर खड़ा था!

मीरा का दिल इतनी ज़ोर से धड़का कि उसे लगा उसकी छाती फट जाएगी। वह पीछे हटने ही वाली थी कि...

सर्रर्र...

दरवाज़े के नीचे की उस आधी इंच की संकरी दरार से कुछ बाहर खिसका।

मीरा ने नीचे देखा।

धूल से भरे फ़र्श पर, बंद दरवाज़े के नीचे से कागज़ का एक छोटा सा, पीला टुकड़ा बाहर सरक कर आया और मीरा के घुटनों के ठीक पास आकर रुक गया।

कागज़ का वह टुकड़ा बेहद पुराना था, लेकिन उस पर नीली स्याही से लिखे शब्द बिल्कुल ताज़े थे। स्याही की गीली चमक उस नीली रोशनी में साफ़ झलक रही थी।

मीरा के हाथ इतनी ज़ोर से काँप रहे थे कि वह कागज़ को उठा भी नहीं पा रही थी। उसने हिम्मत जुटाई, अपनी उँगलियों को बढ़ाया और उस कागज़ के टुकड़े को उठा लिया।

कागज़ पर केवल दो शब्द लिखे थे।

लिखावट आर्यन की नहीं थी। यह एक बहुत पुरानी, घसीटकर लिखी गई, किसी अत्यधिक वृद्ध इंसान की काँपती हुई लिखावट थी।

कागज़ पर लिखा था:

"सो जाओ।"