पत्र
सुबह की ठंडी हवा ओस की बूँदों को समेटे हुए हवेली के बरामदे में बह रही थी। मीरा चौखट पर पत्थर की तरह बनी खड़ी थी, और उसके काँपते हाथों में वह पीला लिफ़ाफ़ा था।
लिफ़ाफ़े का कागज़ अजीब तरह से सूखा था जैसे इस पर नीलगढ़ की ओस, बारिश या नमी का कोई असर ही न पड़ा हो। ओस से भीगे हुए बरामदे के बीचों-बीच रखा यह लिफ़ाफ़ा ऐसा लग रहा था मानो समय के किसी दूसरे आयाम से सीधा इस चौखट पर आ गिरा हो।
मीरा ने अपनी साँसें रोक लीं। उसकी उँगलियों ने लिफ़ाफ़े के ऊपरी हिस्से को छुआ। नीली स्याही से लिखा गया एक-एक अक्षर उसकी आँखों के सामने तैर रहा था:
"मीरा के लिए मेरी खोज के बाद।"
लिखवट में आर्यन का वही परिचित खिंचाव था। वह जब भी तेज़ी से लिखता था, तो 'म' अक्षर का ऊपरी हिस्सा थोड़ा घुमावदार हो जाता था और 'र' की लकीर नीचे की तरफ़ लंबी खिंच जाती थी। यह लिखावट कोई नकल नहीं कर सकता था। यह वही हाथ था जिसने तीन साल तक मीरा के हाथों को थामा था, जिसने उसके कैनवास पर रंगों के नाम लिखे थे।
मीरा ने लिफ़ाफ़े को खोला। उसके अंदर से एक कागज़ का टुकड़ा बाहर निकला।
कागज़ साधारण नहीं था। वह थोड़ा मोटा, मखमली और हलका पीलापन लिए हुए था बिल्कुल वैसा ही कागज़ जैसा आर्यन अपनी विशेष रिसर्च डायरी में इस्तेमाल करता था। मीरा ने कागज़ को खोला और उस पर लिखी पंक्तियों को पढ़ने लगी:
"मीरा,
मुझे माफ़ कर देना। मैं तुम्हें सब बताना चाहता था, हर एक सच तुम्हारे सामने रखना चाहता था। लेकिन समय बहुत कम था... और दीवारें बहुत पतली हो चुकी थीं। अगर तुम यह पत्र पढ़ रही हो, तो इसका मतलब है कि वे मुझे ले जा चुके हैं या मैंने पार जाने का रास्ता चुन लिया है। लेकिन डरो मत, मैं मरा नहीं हूँ। मृत्यु वह नहीं है जो इस कस्बे के लोग समझते हैं।*
अगर तुम सच जानना चाहती हो, अगर तुम मुझे ढूँढना चाहती हो... तो मेरी डायरी ढूँढो। मैंने उसे स्टडी रूम में छुपाया है। तीसरी दराज़ के नीचे जो खंभा है, उसके ठीक पीछे।
लेकिन याद रखना मीरा, डायरी खोलने से पहले एक बार खुद से पूछना कि क्या तुम उस सच को सह पाओगी? क्योंकि एक बार जब तुम परतों को देख लोगी, तो तुम कभी पुरानी वाली मीरा नहीं रह पाओगी।*
आर्यन"
पत्र के सबसे निचले हिस्से पर, जहाँ दस्तखत थे, एक तारीख लिखी हुई थी।
मीरा की आँखें उस तारीख पर जाकर टिक गईं, और उसका पूरा शरीर काँप उठा।
तारीख लिखी थी: २५ अक्टूबर २०२४।
२५ अक्टूबर... यानी आर्यन की तथाकथित 'मृत्यु' के दो दिन बाद की तारीख! आर्यन की मृत्यु २३ अक्टूबर की सुबह हुई थी, और उसका अंतिम संस्कार कल, २४ अक्टूबर को किया गया था। फिर यह पत्र २५ अक्टूबर की तारीख के साथ आज, २६ अक्टूबर की सुबह उसके दरवाज़े पर कैसे पहुँच सकता था?
"नहीं... यह... यह मुमकिन नहीं है..." मीरा के मुँह से एक बेबस फुसफुसाहट निकली।
उसकी आँखें बार-बार उस तारीख पर जा रही थीं। क्या आर्यन ने यह पत्र मरने से पहले लिखा था और गलती से भविष्य की तारीख डाल दी थी? लेकिन कोई इंसान अपनी मृत्यु के दो दिन बाद की तारीख गलती से कैसे लिख सकता है? और अगर यह पत्र पहले लिखा गया था, तो आज सुबह ही ओस से भीगे बरामदे पर सूखा का सूखा कैसे मिला?
तभी नीचे वाली सड़क से सीटी की आवाज़ आई और किसी के भारी कदमों की चाप सुनाई दी।
"मीरा!"
काव्या हाथ में एक टिफिन और गरम चाय का फ़्लास्क लिए हवेली की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। उसके चेहरे पर रात भर न सोने की थकान साफ़ दिख रही थी, लेकिन मीरा को देखते ही उसकी आँखों में चिंता उभर आई।
"तुम बाहर क्यों खड़ी हो मीरा? और इतनी ठंड में... तुमने स्वेटर भी नहीं पहना!" काव्या ने पास आकर कहा।
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बिना एक शब्द बोले वह कागज़ का टुकड़ा काव्या की तरफ़ बढ़ा दिया।
काव्या ने हैरान होकर मीरा को देखा, फिर हाथ बढ़ाकर पत्र ले लिया। जैसे-जैसे काव्या की आँखें उस पत्र की पंक्तियों पर घूमती गईं, उसके चेहरे का रंग उड़ता गया। उसकी चमकीली आँखें धीरे-धीरे फैलती गईं और उसकी सांसें भारी होने लगीं।
जब काव्या की नज़र नीचे लिखी तारीख पर पड़ी, तो उसके हाथ से टिफिन छूटकर फ़र्श पर गिर पड़ा। दाल और चावल बरामदे की गीली लकड़ी पर बिखर गए, लेकिन किसी का ध्यान उस तरफ़ नहीं गया।
"यह... यह क्या मज़ाक है मीरा?" काव्या की आवाज़ काँप रही थी। "यह पत्र तुम्हें कहाँ से मिला?"
"दरवाज़े पर रखा था," मीरा ने एक ठंडी, सपाट आवाज़ में कहा। "अभी... कुछ ही मिनट पहले। जब मैं नीचे आई, तो यह चौखट पर पड़ा था।"
"कोई मज़ाक कर रहा है तुमसे!" काव्या ने तुरंत कागज़ को मीरा के हाथों में वापस थमाते हुए कहा। वह बहुत तेज़ी से बोल रही थी, जैसे खुद को और मीरा को किसी ख़तरे से बचाने की कोशिश कर रही हो। "कस्बे में बहुत से लोग हैं जो शर्मा परिवार के रहस्यों के बारे में अजीब बातें फैलाते हैं। किसी ने आर्यन की पुरानी लिखावट की नकल की होगी और तुम्हें परेशान करने के लिए..."
"यह नकल नहीं है, काव्या," मीरा ने उसे बीच में ही रोक दिया। उसकी भूरी आँखों में एक अजीब सी स्थिरता आ गई थी। "मैं आर्यन की लिखावट को किसी भी दुनिया में पहचान सकती हूँ। यह उसी के हाथ का लिखा हुआ है। और देखो... यह स्याही... यह अभी भी ताज़ी है। अगर तुम इसे ध्यान से देखोगी, तो स्याही की हल्की सी महक अब भी आ रही है।"
काव्या ने पीछे हटते हुए हवेली के अँधेरे गलियारे की तरफ़ देखा। "मीरा, मेरी बात सुनो। आर्यन... आर्यन अब इस दुनिया में नहीं है। हमने कल खुद अपनी आँखों से उसका अंतिम संस्कार देखा है। तुम जानती हो कि मौत के बाद कोई पत्र नहीं लिख सकता! शायद आर्यन ने यह पत्र अपनी मौत से हफ़्तों पहले लिखा होगा और भूल गया होगा... और तारीख... तारीख उसने गलती से..."
"गलती से भविष्य की तारीख?" मीरा ने तीखेपन से पूछा। "काव्या, आर्यन एक इतिहासकार था! वह हर तारीख, हर साल को तीन बार जाँचता था। वह ऐसी गलती कभी नहीं कर सकता। और अगर यह पत्र हफ़्तों पुराना है, तो आज सुबह यह दरवाज़े पर सूखा कैसे मिला? रात भर बारिश हुई है, काव्या! पूरा बरामदा पानी में डूबा है, लेकिन यह लिफ़ाफ़ा सूखा था!"
काव्या के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। उसने अपनी सूजी हुई आँखों को मूँद लिया और एक लंबी साँस ली।
"तुम क्या करना चाहती हो मीरा?" काव्या ने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।
"मैं स्टडी रूम में जा रही हूँ," मीरा ने कहा। उसने पत्र को कसकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया। "मैं वह डायरी ढूँढूँगी।"
"नहीं मीरा!" काव्या ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया। उसका स्पर्श अचानक बहुत सख्त और डरा हुआ लगा। "मत जाओ उस कमरे में! तुम्हें नहीं पता तुम क्या कर रही हो। कुछ दरवाज़े अगर बंद हैं, तो उन्हें बंद ही रहने देना चाहिए!"
मीरा ने चौंककर काव्या की तरफ़ देखा। "तुम फिर वही बात कह रही हो, काव्या! रात को भी तुमने कहा था कि कुछ दरवाज़े बंद रहने चाहिए। तुम्हें क्या पता है जो तुम मुझसे छुपा रही हो? क्या तुम जानती हो कि आर्यन उस कमरे में क्या कर रहा था?"
काव्या ने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसके चेहरे पर एक पल के लिए अपराधबोध का साया लहराया, लेकिन उसने फौरन खुद को सँभाल लिया।
"मैं बस... मैं बस तुम्हारी चिंता कर रही हूँ, मीरा," काव्या ने नज़रें चुराते हुए कहा। "रावत साहब ने कहा है कि पुलिस मामले की जाँच कर रही है। तुम्हें इन सब अजीब चक्करों में नहीं पड़ना चाहिए। अगर तुम मानसिक रूप से टूट गईं तो..."
"मैं टूट चुकी हूँ, काव्या," मीरा ने शांत लेकिन अटल आवाज़ में कहा। "लेकिन अगर आर्यन ने मुझे कोई रास्ता दिखाया है, तो मैं उस रास्ते पर जाऊँगी। चाहे वह रास्ता मुझे सच तक ले जाए... या किसी तबाही तक।"
मीरा मुड़ी और हवेली के अंदर जाने लगी। काव्या कुछ देर तक बरामदे में खड़ी रही, बिखरे हुए खाने और उस भीगे हुए फ़र्श को ताकती रही, और फिर एक ठंडी साँस भरकर मीरा के पीछे-पीछे अंदर आ गई।
स्टडी रूम शर्मा हवेली का सबसे खामोश और सबसे पुराना कमरा था। यह पहली मंज़िल के सुदूर कोने में स्थित था, जहाँ दिन में भी सूरज की सीधी रोशनी नहीं पहुँचती थी।
जब मीरा ने भारी सागौन का दरवाज़ा धकेला, तो अंदर से पुरानी किताबों, चमड़े के जिल्दों, सूखी स्याही और सीलन की वही परिचित महक आई जो हमेशा आर्यन के आसपास रहती थी। कमरे की ऊँची-ऊँची अलमारियाँ छत तक किताबों से भरी हुई थीं इतिहास, पुरातत्व, पुरानी लोककथाएं और उत्तराखंड की प्राचीन लिपियों पर लिखी दुर्लभ पुस्तकें।
कमरे के बीचों-बीच आर्यन की वही भारी शीशम की स्टडी टेबल रखी थी। टेबल पर अभी भी आर्यन का चश्मा, उसकी अधूरी चाय का कप और कुछ सूखे हुए फ़ाउंटेन पेन वैसे ही पड़े थे जैसे वह उन्हें छोड़कर गया था।
मीरा धीरे-धीरे टेबल के पास पहुँची।
काव्या दरवाज़े के पास ही खड़ी रही। उसने कमरे के अंदर कदम नहीं रखा। उसकी नज़रें बार-बार कमरे की खिड़की से बाहर नील झील की तरफ़ जा रही थीं, जैसे वह किसी अनहोनी की राह देख रही हो।
"मीरा... सोच लो," काव्या ने दरवाज़े से ही फुसफुसाकर कहा। "एक बार अगर तुमने वह डायरी ढूँढ ली, तो तुम पीछे नहीं हट पाओगी।"
मीरा ने काव्या की बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना हाथ स्टडी टेबल के दाहिने हिस्से पर रखा, जहाँ तीन भारी लकड़ी की दराज़ें बनी हुई थीं।
पहली दराज़ में आर्यन के कॉलेज के कागज़ात और रिसर्च पेपर्स थे।
दूसरी दराज़ में पुरानी चिट्ठियाँ, बिल और दवाइयों की रसीदें थीं।
और तीसरी दराज़...
मीरा घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गई। तीसरी दराज़ सबसे नीचे थी। उसने दराज़ के पीतल के हैंडल को पकड़ा और उसे बाहर की तरफ़ खींचा।
दराज़ लकड़ी की पुरानी खाँचों में चरचराती हुई बाहर निकल आई। अंदर नीलगढ़ के कुछ पुराने नक्शे और खाली रजिस्टर रखे थे। मीरा ने उन सब कागज़ों को बाहर निकाल कर फ़र्श पर रख दिया।
अब दराज़ पूरी तरह खाली थी।
पत्र में लिखा था: "तीसरी दराज़ के नीचे जो खंभा है, उसके ठीक पीछे।"
मीरा ने दराज़ के खाली हो जाने के बाद उसके अंदर अपना हाथ डाला। दराज़ का पिछला हिस्सा लकड़ी की एक मोटी दीवार से बंद था। मीरा ने अपनी उँगलियों से उस लकड़ी को दबाया।
कुछ नहीं हुआ।
"शायद दराज़ को पूरा बाहर निकालना होगा," मीरा ने खुद से कहा।
उसने दोनों हाथों से दराज़ को पकड़ा और ज़ोर से बाहर खींच लिया। पुरानी दराज़ अपनी जगह से निकलकर बाहर आ गई। दराज़ के हटते ही टेबल के अंदरूनी हिस्से में एक गहरा, अँधेरा कोना दिखाई देने लगा। वह एक ऐसी जगह थी जो बाहर से कभी नज़र नहीं आ सकती थी टेबल के भारी ढाँचे के नीचे एक गुप्त खाँचा।
कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि मीरा की तेज़ साँसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी। बाहर बारिश फिर से हल्की-हल्की शुरू हो चुकी थी, और शीशों पर बूँदें बजने लगी थीं।
मीरा ने अपनी बाईं बाँह को टेबल के उस अँधेरे खाँचे के अंदर डाला।
वहाँ धूल की एक मोटी परत जमा थी। जाले उसकी उँगलियों से चिपक गए। उसने अपनी बाँह को और गहराई में धकेला। उसकी उँगलियाँ टेबल के पिछले खंभे की लकड़ी को छू रही थीं।
उसने खंभे के पीछे हाथ घुमाया।
तभी... उसकी उँगलियों के पोरों ने किसी चीज़ को छुआ।
मीरा का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया।
वह कोई साधारण चीज़ नहीं थी। वह बहुत ठंडी थी बिल्कुल वैसी ही बर्फ़ जैसी ठंडी जैसी सुबह झील के पास आर्यन की त्वचा थी।
मीरा ने अपनी उँगलियों को और आगे बढ़ाया और उस चीज़ को महसूस करने की कोशिश की। वह एक मोटा, चमड़े की जिल्द वाला बक्सा या डायरी जैसी आकृति थी। लेकिन अजीब बात यह थी कि उस चीज़ को छूते ही मीरा की उँगलियों में एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई जैसे किसी बहुत कम पावर के बिजली के तार को छू लिया गया हो।
"मीरा? क्या मिला?" काव्या की आवाज़ में एक भयानक घबराहट थी। वह एक कदम अंदर आई।
"यहाँ... यहाँ कुछ है," मीरा ने काँपती आवाज़ में कहा।
उसने अपनी उँगलियों को उस ठंडी वस्तु के चारों तरफ़ लपेटा और उसे बाहर खींचने की कोशिश की। वह चीज़ भारी थी, जैसे किसी धातु की बनी हो।
मीरा ने अपनी पूरी ताक़त लगाई और अपनी बाँह को बाहर खींचा।
जैसे ही वह ठंडी चीज़ टेबल के अँधेरे खाँचे से बाहर आई और कमरे की मद्धम रोशनी में उभरी, मीरा के मुँह से एक हल्की सी चीख निकल गई।
वह एक पुरानी, काले चमड़े की डायरी थी। लेकिन डायरी के ऊपरी हिस्से पर... एक अजीब सा चिह्न खुदा हुआ था। तीन संकेंद्री वृत्त (concentric circles), जो एक-दूसरे के अंदर बने थे, और उनके बीच में एक नीले रंग का पत्थर जड़ा हुआ था जो कमरे के मद्धम उजाले में भी धीमी नीली रोशनी उत्सर्जित कर रहा था!
वही नीली रोशनी... जो रात को मीरा ने तीसरी मंज़िल के बंद दरवाज़े के नीचे देखी थी!