अध्याय – 4 : गायब डायरी
पुलिस मुख्यालय की घड़ी रात के ग्यारह बजा रही थी।पुलिस अधीक्षक आर्यन राठौर अपनी मेज़ पर फैली फ़ाइलों को एक-एक करके देख रहे थे। घटनास्थल की तस्वीरें, फॉरेंसिक रिपोर्ट, कॉल डिटेल, सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयान—हर दस्तावेज़ किसी न किसी दिशा में इशारा करता था, लेकिन कोई भी दिशा अंत तक नहीं पहुँचती थी।
उसी समय उनके सामने मंत्री महेश्वर प्रताप सिंह के निजी सचिव दिनेश सक्सेना को लाया गया। दिनेश का चेहरा थका हुआ था। आँखों में भय साफ़ दिखाई दे रहा था।
आर्यन ने सीधे प्रश्न किया—"मंत्री जी की कोई निजी डायरी थी?"
दिनेश कुछ क्षण चुप रहा।"जी... थी।"
"कहाँ है?"
"मुझे नहीं मालूम।"
"झूठ बोल रहे हो।"
दिनेश ने काँपते हुए कहा, "सर... वह डायरी हमेशा मंत्री जी अपने साथ रखते थे। किसी पर भरोसा नहीं करते थे। कहते थे- 'मेरी सबसे बड़ी ताकत भी यही है और सबसे बड़ा खतरा भी।"
"उसमें क्या लिखा था?"
"सब कुछ..."
"सब कुछ... मतलब?"
"किन नेताओं से गुप्त मुलाकात हुई, किस उद्योगपति ने कब पैसा दिया, किस अधिकारी ने क्या वादा किया... और..."
वह रुक गया।"और?"
"कुछ लोगों की निजी ज़िंदगी के ऐसे राज... जिनसे उन्हें अपने इशारों पर नचाया जा सकता था।"
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। आर्यन ने धीमे स्वर में कहा—"अर्थात किसी के लिए वह डायरी करोड़ों रुपये से भी अधिक कीमती हो सकती थी।"
उधर राजधानी में मंत्री के सरकारी बंगले पर शोक व्यक्त करने वालों का ताँता लगा हुआ था। नेता, अधिकारी, व्यापारी, पत्रकार—हर कोई दुखी दिखाई दे रहा था लेकिन आर्यन लोगों के चेहरों पर दुख नहीं, डर पढ़ रहे थे। मंत्री की पत्नी सविता एक कमरे में अकेली बैठी थीं। उन्होंने आर्यन को बुलाया।
"आप हत्यारे को पकड़ पाएँगे?"
"कोशिश पूरी होगी।"
सविता ने गहरी साँस ली।"मेरे पति के बहुत दुश्मन थे।"
"आप किसी पर शक करती हैं?"
उन्होंने कुछ क्षण सोचा।"शक तो बहुतों पर है... लेकिन सबूत किसी के खिलाफ़ नहीं।"
फिर उन्होंने अलमारी की ओर इशारा किया।
"एक बात और..."
"जी?"
"उनकी तिजोरी खुली हुई मिली थी।"
आर्यन तुरंत सतर्क हो गए।
"क्या चोरी हुआ?"
"नकदी नहीं... गहने भी नहीं..."
"फिर?"
"उनकी एक काली चमड़े की डायरी।"
आर्यन की आँखों में चमक आ गई। जिस डायरी का ज़िक्र अनजान फोन करने वाले ने किया था...वह सचमुच गायब थी।
उसी समय, शहर के एक पुराने मकान में...प्रमीला पूरी रात सो नहीं पाई। उसके मन में बार-बार वही दृश्य लौट आता—विश्राम गृह का कमरा...महेश्वर का बेचैन चेहरा...बाहर किसी के कदमों की आहट...और फिर...वह आवाज़...जिसे वह चाहकर भी भूल नहीं पा रही थी। उसने अचानक अलमारी खोली। अंदर रखे हैंडबैग से एक छोटा-सा कागज़ निकाला।
उस पर केवल तीन शब्द लिखे थे—"डायरी बचा लेना।"
उसने काँपते हाथों से वह पर्ची फाड़ दी। कागज़ के टुकड़े कूड़ेदान में गिरते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले।वह खुद से बुदबुदाई—"मैंने ऐसा कभी नहीं चाहा था..."
लेकिन उसने यह नहीं कहा कि वह किसके बारे में बोल रही थी।
अगली सुबह पुलिस को एक और सूचना मिली।विश्राम गृह के पीछे जंगल में एक माली ने झाड़ियों के बीच एक चमड़े का कवर देखा था। आर्यन तुरंत वहाँ पहुँचे। वह सचमुच किसी डायरी का कवर था लेकिन उसके भीतर एक भी पन्ना नहीं था। किसी ने बड़ी सावधानी से सभी पृष्ठ निकाल लिए थे।
आर्यन ने कवर हाथ में लेकर कहा—"जिसे भी यह डायरी मिली है, उसे केवल छिपाना नहीं था..."
"सर?"
"उसे उसमें लिखी बातें चाहिए थीं।"
फॉरेंसिक अधिकारी ने झुककर मिट्टी देखी।
"सर, यहाँ दो लोगों के पैरों के निशान हैं।"
"पहचान?"
"एक भारी जूते का..."
"और दूसरा?"
"नंगे पैर का।"
आर्यन ने भौंहें सिकोड़ लीं। जनवरी की कड़ाके की ठंड में...आधी रात...घने जंगल में...कोई नंगे पैर क्यों चलेगा?यह प्रश्न अब इस हत्या के सबसे विचित्र रहस्यों में शामिल हो चुका था और उन्हें बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उस डायरी के फटे हुए पन्ने अब अलग-अलग लोगों के हाथों में पहुँच चुके थे। हर पन्ना एक ऐसा सच समेटे था...जो किसी एक नहीं, कई ज़िंदगियों को तबाह कर सकता था।
शेष अगले भाग में... आलोक मिश्रा " मनमौजी "