बारह बजे के बाद - 3 Alok Mishra द्वारा जासूसी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बारह बजे के बाद - 3

अध्याय – 3 : झूठ की पहली परतपहली

जनवरी की दोपहर।

   मंत्री महेश्वर प्रताप सिंह की हत्या की खबर पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी। समाचार चैनलों पर केवल एक ही खबर थी—

"सत्ता के सबसे ताकतवर मंत्री की रहस्यमय हत्या।"

 कहीं इसे राजनीतिक षड्यंत्र कहा जा रहा था, तो कहीं निजी दुश्मनी लेकिन पुलिस अधीक्षक आर्यन राठौर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी में नहीं थे। वे जानते थे कि हर हत्या अपने पीछे केवल सबूत ही नहीं, बल्कि कई झूठ भी छोड़ जाती है और कई बार झूठ, खून से भी गहरे निशान छोड़ते हैं।

विश्राम गृह के प्रबंधक मधुसूदन मिश्रा को पूछताछ के लिए बुलाया गया।

"कमरा किसने बुक कराया था?"

"सर... मंत्री जी के निजी सचिव ने फोन किया था। उन्होंने कहा था कि रात दस बजे से कमरा खाली रहे। किसी कर्मचारी को आसपास नहीं भटकना चाहिए।"

"क्या मंत्री अकेले आए थे?"

"जी... मैंने नहीं देखा। लेकिन चौकीदार ने बताया कि उनकी गाड़ी करीब साढ़े दस बजे पहुँची थी।"

"उसके बाद?"

"फिर... किसी को आने-जाने की अनुमति नहीं थी।"

आर्यन ने बिना कुछ कहे डायरी बंद कर दी। उन्हें यह उत्तर अधूरा लगा। उधर फॉरेंसिक टीम ने एक नई जानकारी दी।

"सर, कमरे से दो कॉफी के कप मिले हैं।"

"दोनों में क्या मिला?"

"एक कप पर केवल मंत्री के उँगलियों के निशान हैं। दूसरे कप को पूरी तरह साफ़ किया गया है।"

"अर्थात दूसरा व्यक्ति अपनी पहचान मिटाकर गया है।"

"जी।"

आर्यन मुस्कुराए।

"या... किसी तीसरे व्यक्ति ने उसके निशान मिटाए हैं।"

कमरे में उपस्थित अधिकारी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। हत्या का मामला और उलझता जा रहा था। उसी समय पुलिस की एक टीम विश्राम गृह के बाहर लगे पुराने सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग लेकर पहुँची। वीडियो चलाया गया।

रात 10 बजकर 28 मिनट।मंत्री की काली एसयूवी विश्राम गृह के भीतर प्रवेश करती दिखाई दी।

उसके बाद...10 बजकर 41 मिनट। एक सफेद कार कुछ दूरी पर रुकती दिखाई दी। कैमरे का कोण स्पष्ट नहीं था।कार से उतरने वाली आकृति ने सिर पर शॉल ओढ़ रखी थी।चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।वह तेज़ी से विश्राम गृह की ओर चली गई।

"ज़ूम करो।"

तकनीशियन ने कई बार प्रयास किया।चित्र धुँधला ही रहा। आर्यन ने केवल एक बात नोट की—महिला के दाएँ पैर में हल्का-सा लंगड़ापन था। उन्होंने तुरंत फाइल में लिख लिया—

"अज्ञात महिला – दाहिने पैर में हल्की लचक।"

रात 11 बजकर 16 मिनट। वीडियो में एक और गाड़ी दिखाई दी लेकिन इस बार...जैसे ही गाड़ी मुख्य द्वार के पास पहुँची—रिकॉर्डिंग बंद हो गई।स्क्रीन काली हो गई।ठीक बारह बजकर चौदह मिनट पर कैमरा फिर चालू हुआ। गाड़ी गायब थी। आर्यन ने धीरे से कहा—

"कैमरा अपने आप बंद नहीं हुआ है।"

"सर?"

"किसी ने जानबूझकर रिकॉर्डिंग रोकी है।"



उधर

प्रोफेसर विक्रम विश्वविद्यालय पहुँचे। हर कोई मंत्री की हत्या की चर्चा कर रहा था। इतिहास विभाग के प्रोफेसर शेखावत ने कहा—

"सुना है, मंत्री किसी महिला से मिलने गए थे।"

दूसरे ने हँसते हुए कहा—

"राजनीति में यह कोई नई बात नहीं।"

विक्रम ने अखबार मेज़ पर रख दिया। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था लेकिन भीतर एक अजीब बेचैनी जन्म ले चुकी थी। उन्हें याद आया—रात साढ़े दस बजे उन्होंने प्रमीला को फोन किया था। फोन बंद था। प्रमीला ने कहा था कि वह अपनी सहेली नीलिमा के घर है लेकिन आज सुबह नीलिमा का संदेश आया—

"हैप्पी न्यू ईयर! कल तुम लोग पार्टी में नहीं आए, बहुत मिस किया।"

विक्रम की उँगलियाँ ठिठक गईं। अगर प्रमीला नीलिमा के घर नहीं थी...तो कहाँ थी?

शाम को जब विक्रम घर पहुँचे, प्रमीला रसोई में थी।

"कल रात तुम कहाँ थीं?"

प्रमीला एक क्षण के लिए जड़ हो गई फिर सहज स्वर में बोली—"नीलिमा के घर।"

विक्रम ने मोबाइल उसकी ओर बढ़ा दिया।

"नीलिमा कह रही है, तुम गई ही नहीं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। प्रमीला ने पहली बार महसूस किया कि एक झूठ को बचाने के लिए अब उसे कई और झूठ बोलने पड़ेंगे। उसने धीमे स्वर में कहा—"मैं... रास्ते से ही लौट आई थी।"

"क्यों?"

"मन नहीं था।"

"और फोन?"

"बैटरी खत्म हो गई थी।"

विक्रम उसकी आँखों में देखते रहे। वर्षों के वैवाहिक जीवन में उन्होंने पहली बार महसूस किया—प्रमीला उनसे कुछ छिपा रही है लेकिन क्या?



उसी रात पुलिस अधीक्षक आर्यन राठौर अपने कार्यालय में केस डायरी पढ़ रहे थे। तभी उनका निजी फोन बजा।दूसरी ओर एक बदली हुई आवाज़ थी।

"अगर मंत्री के असली हत्यारे तक पहुँचना चाहते हो..."

आर्यन सतर्क हो गए।

"कौन बोल रहा है?"

आवाज़ हँसी।

"हत्या विश्राम गृह में नहीं शुरू हुई थी, अफ़सर...उसकी शुरुआत कई महीने पहले हो चुकी थी।और मंत्री के दुश्मनों की सूची में पहला नाम खोजने के लिए...उसकी डायरी ढूँढ़ो।"

कॉल कट गया। आर्यन कुछ क्षण तक मोबाइल को देखते रहे। उन्हें पता नहीं था कि मंत्री की वह निजी डायरी केवल राजनीतिक रहस्यों का दस्तावेज़ नहीं थी। उसमें ऐसे नाम दर्ज थे, जो यदि सामने आ जाते, तो केवल एक सरकार नहीं, कई परिवार भी बिखर जाते।


शेष अगले भाग में... आलोक मिश्रा " मनमौजी "