बारह बजे के बाद - 2 Alok Mishra द्वारा जासूसी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बारह बजे के बाद - 2

अध्याय – 2 : सुबह का पहला शव

    पहली जनवरी की सुबह शहर अभी भी पिछली रात के उत्सव की थकान से उबर रहा था। सड़कों पर बिखरे रंगीन कागज़, बुझी हुई आतिशबाज़ी और खाली बोतलें रात के उन्माद की गवाही दे रही थीं। शहर से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर, साल और सागौन के जंगलों के बीच बना सरकारी विश्राम गृह अपनी सामान्य निस्तब्धता में डूबा था। विश्राम गृह का चौकीदार रामदयाल हर दिन की तरह सुबह छह बजे उठा। उसने आँगन में झाड़ू लगाई, चूल्हे पर चाय चढ़ाई और रजिस्टर देखने बैठ गया। रात की ड्यूटी पर आए कर्मचारियों ने कोई विशेष टिप्पणी दर्ज नहीं की थी।

केवल इतना लिखा था—"कमरा संख्या पाँच – वी.आई.पी. आरक्षण। किसी को परेशान न किया जाए।"

  रामदयाल को यह असामान्य नहीं लगा। ऐसे आदेश वह पहले भी देख चुका था। साढ़े छह बजे उसने आदतन कमरा नंबर पाँच के बाहर चाय रखने का निश्चय किया। ट्रे हाथ में लेकर वह बरामदे से गुज़रा। दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था; हल्का-सा खुला हुआ था।

उसने धीरे से आवाज़ दी—"साहब... चाय..."

कोई उत्तर नहीं मिला।

उसने फिर पुकारा—"साहब...?"

फिर भी सन्नाटा। उसने काँपते हाथों से दरवाज़ा थोड़ा और धकेला। अगले ही क्षण उसके हाथ से ट्रे छूटकर फर्श पर गिर पड़ी। चीनी के कप टूटने की आवाज़ पूरे विश्राम गृह में गूँज उठी। कमरे के बीचोंबीच कालीन पर एक व्यक्ति औंधे मुँह पड़ा था। उसके सफ़ेद कुर्ते पर सूख चुका रक्त काले धब्बे की तरह फैल गया था। रामदयाल की साँसें रुक गईं। कुछ क्षण तक वह समझ ही नहीं पाया कि यह सपना है या सच। जब उसने साहस करके शव को पलटने की कोशिश की, तो उसके मुँह से अनायास चीख निकल गई। वह राज्य के प्रभावशाली मंत्री महेश्वर प्रताप सिंह थे। उनकी आँखें खुली हुई थीं—मानो मृत्यु से पहले उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा हो, जिसकी कल्पना भी नहीं की थी।

रामदयाल लड़खड़ाता हुआ बाहर भागा।

"हत्या...! साहब की हत्या हो गई...!"

कुछ ही मिनटों में विश्राम गृह के कर्मचारी इकट्ठा हो गए। किसी ने पुलिस को सूचना दी, किसी ने जिला मुख्यालय, तो किसी ने सीधे राजधानी में फोन मिला दिया। सुबह आठ बजते-बजते पूरा इलाका पुलिस से भर चुका था।पीले रंग की पट्टी लगाकर कमरे को सील कर दिया गया।

    जिले के पुलिस अधीक्षक आर्यन राठौर स्वयं घटनास्थल पर पहुँचे। उनकी ख्याति थी कि वे घटनास्थल को बोलने देते थे; गवाहों से पहले वे दीवारों, फर्श और सन्नाटे से सवाल पूछते थे। उन्होंने कमरे में प्रवेश किया।सबसे पहले उनकी नज़र घड़ी पर गई।

घड़ी रात 12 बजकर 03 मिनट पर बंद थी।

क्या वह संयोग था?

या किसी ने जानबूझकर रोकी थी?

कालीन पर संघर्ष के हल्के निशान थे। एक कुर्सी उलटी पड़ी थी। मेज़ पर दो कॉफी के कप रखे थे। दोनों कप आधे भरे थे।

"मत छूना इन्हें," आर्यन ने फॉरेंसिक दल से कहा।

   उन्होंने खिड़की के पास जाकर बाहर देखा। गीली मिट्टी पर दो तरह के पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे। एक पुरुष के जूते के। दूसरे... किसी महिला की ऊँची एड़ी की सैंडल के लेकिन कुछ ही दूरी पर वे निशान अचानक गायब हो गए जैसे कोई वाहन वहीं से निकल गया हो।आर्यन की भौंहें तन गईं।

"यह हत्या जितनी दिखाई दे रही है, उससे कहीं अधिक जटिल है।"

फॉरेंसिक अधिकारी ने धीमे स्वर में कहा—"सर... हत्या किसी नुकीले हथियार से हुई है। लेकिन हथियार घटनास्थल पर नहीं है।"

"और उँगलियों के निशान?"

"लगभग कुछ भी स्पष्ट नहीं। कमरे की कई सतहें पोंछी गई लगती हैं।"

  आर्यन ने एक गहरी साँस ली। हत्या करने वाला घबराया हुआ व्यक्ति नहीं था। वह सोच-समझकर आया था।



      उसी समय शहर के दूसरे छोर पर...प्रोफेसर विक्रम त्रिवेदी अपने ड्रॉइंग रूम में बैठकर सुबह का अख़बार पलट रहे थे। प्रमीला रसोई में चाय बना रही थी। दोनों सामान्य दिखने का प्रयास कर रहे थे। तभी मोबाइल फ़ोन बजा। विक्रम ने कॉल उठाई। कुछ क्षण तक वे सुनते रहे।उनके चेहरे का रंग बदल गया।

"क्या...?"

प्रमीला दौड़कर बाहर आई।

"क्या हुआ?"

विक्रम ने धीमे स्वर में कहा—"मंत्री महेश्वर प्रताप सिंह... रात में... उनकी हत्या हो गई।"

  प्रमीला के हाथ से चाय का कप छूट गया। कप टूटने की आवाज़ कमरे में फैल गई। उसने तुरंत अपने चेहरे पर भय का नहीं, बल्कि आश्चर्य का भाव लाने की कोशिश की।

"हत्या...? कैसे...?"

विक्रम उसकी आँखों में देखने लगे।

एक पल के लिए उन्हें लगा—प्रमीला की घबराहट केवल एक सामान्य नागरिक की प्रतिक्रिया नहीं थी लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने उस विचार को झटक दिया। उन्हें क्या मालूम था कि पिछली रात उनकी पत्नी उसी विश्राम गृह से होकर लौटी थी।और उन्हें यह भी नहीं मालूम था कि उस रात केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कई लोग उस विश्राम गृह के आसपास मौजूद थे। उनमें से एक... हत्यारा था और बाकी...अपने-अपने रहस्यों के कैदी।

शेष अगले भाग में....... आलोक मिश्रा " मनमौजी "