हुक्म और हसरत - 25 Diksha mis kahani द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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हुक्म और हसरत - 25

💗💗💗 हुक्म और हसरत 💗💗💗

एपिसोड 25 —
#Arsia

"अब आगे…”



"ये... नहीं हो सकता।"

अर्जुन की आँखें उस फाइल पर जमी थीं।

उसके चेहरे पर पहली बार ऐसा भाव था, जैसे सामने रखी किसी बात ने उसके अंदर तक हलचल मचा दी हो।

विवेक ने तुरंत पूछा—

"कौन है?"

अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसकी उँगलियाँ फाइल के उस पन्ने पर जमी थीं, जहाँ राघव सिंह के आखिरी संपर्क का नाम लिखा था।

वीर बेचैनी से बोला—

"बॉस... मैंने पुराने रिकॉर्ड्स को तीन अलग-अलग डेटाबेसेज़ से क्रॉस-चेक किया है। नाम वही है।"

विवेक ने फाइल अर्जुन के हाथ से लेने की कोशिश की।

अर्जुन ने फाइल उसकी तरफ़ बढ़ा दी।

विवेक ने नाम पढ़ा...

और उसके चेहरे का रंग भी उड़ गया।

"लेकिन... ये तो..."

अर्जुन ने उसकी बात काट दी।

"मुझे पता है।"

कमरे में कुछ पल खामोशी रही।

अर्जुन ने धीरे से फाइल बंद कर दी।

उसकी आँखों में फिर वही ठंडापन लौट आया था।

"इस नाम के बारे में अभी किसी को कुछ नहीं पता चलेगा।"

वीर ने पूछा—

"लेकिन बॉस, अगर ये सच है तो—"

"मैंने कहा... किसी को नहीं।" 😠

उसकी आवाज़ इतनी सख्त थी कि वीर तुरंत चुप हो गया।

विवेक अर्जुन को ध्यान से देख रहा था।

"तुम्हें लगता है कि महल में कोई पुराना राज़ फिर से ज़िंदा हो गया है?"

अर्जुन ने सामने लगी स्क्रीन पर राघव की तस्वीर देखी।

"मुझे लगता है..."

वो कुछ पल रुका।

"किसी ने बारह साल पहले जो खेल शुरू किया था, वो अब सिया तक पहुँच चुका है।"

उसकी आँखों में गुस्सा उतर आया।

"और मैं उसे यहीं खत्म करूँगा।" 🔥

---

उधर सिया के कमरे में...

सिया अभी भी जाग रही थी।

उसकी माँ उसके पास बैठी थीं।

रोशनी उसके बालों को धीरे-धीरे ठीक कर रही थी।

काव्या दवाइयों की शीशी और पानी लेकर खड़ी थी।

सिया ने धीमे से पूछा—

"अर्जुन कहाँ गए?"

रोशनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"वो बस कुछ काम से बाहर गए हैं।"

सिया ने उसकी तरफ़ देखा।

"काम?"

काव्या हँसते हुए बोली—

"आपके उस गुस्सैल अंगरक्षक का यही तो काम है—हर चीज़ को अपने तरीके से संभालना।"

सिया के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। ❤️

लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर चिंता उतर आई।

"वो बहुत गुस्से में थे..."

उसकी माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

"तुम्हारे लिए हैं बेटा।"

सिया कुछ नहीं बोली।

उसकी उँगलियाँ अनजाने में उस जगह को छूने लगीं जहाँ कुछ देर पहले अर्जुन ने उसका हाथ थामा था।

---



रात के करीब दो बजे...

अर्जुन अपने प्राइवेट ऑफिस में बैठा था।

सामने राघव सिंह की पुरानी फाइल खुली थी।

उसके साथ एक पुरानी तस्वीर रखी थी।

वीर लैपटॉप पर पुराने रिकॉर्ड्स खंगाल रहा था।

"बॉस, राघव की ऑफिशियल डेथ के बाद उसके नाम से कोई एक्टिविटी नहीं मिली।"

अर्जुन ने पूछा—

"और अनऑफिशियल?"

वीर कुछ पल चुप रहा।

फिर स्क्रीन पर कुछ डेट्स दिखाई दीं।

"तीन साल पहले... एक अननोन नंबर से उसके पुराने अकाउंट में पेमेंट हुई थी।"

अर्जुन तुरंत सीधा बैठ गया।

"कितनी?"

वीर ने रकम बताई।

विवेक ने हैरानी से कहा—

"इतनी बड़ी रकम?"

वीर ने सिर हिलाया।

"और पेमेंट भारत से नहीं हुई थी।"

अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

"कहाँ से?"

वीर ने लोकेशन दिखाई।

अर्जुन कुछ पल स्क्रीन देखता रहा।

फिर बोला—

"इसका मतलब राघव पिछले तीन साल से किसी के कॉन्टैक्ट में था।"

विवेक ने पूछा—

"और आकाश?"

अर्जुन ने तुरंत उसकी तरफ़ देखा।

"आकाश तक पहुँचना होगा।"

---

उसी वक्त...

महल के पीछे बने सर्वेंट क्वार्टर्स में आकाश अपने कमरे में बैठा था।

उसके सामने वही छोटी नीली शीशी रखी थी। 

उसने उसे कुछ पल देखा।

फिर फोन बजा।

स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था।

आकाश ने कॉल उठाई।

"हाँ?"

दूसरी तरफ़ से धीमी आवाज़ आई—

"तुम्हें कहा गया था कि अर्जुन को शक नहीं होना चाहिए।"

आकाश घबरा गया।

"मैंने पूरी कोशिश की है। लेकिन वो आदमी बहुत चालाक है।"

आवाज़ ठंडी थी।

"तो अब कोशिश नहीं... काम चाहिए।"

आकाश ने होंठ भींच लिए।

"अगला आदेश?"

कुछ पल खामोशी रही।

फिर—

"सिया को महल से बाहर नहीं जाने देना।"

आकाश चौंक गया।

"लेकिन क्यों?"

दूसरी तरफ़ से सिर्फ़ इतना कहा गया—

"क्योंकि अगर वो महल से बाहर गई..."

आवाज़ अचानक और धीमी हो गई।

"...तो उसे सच याद आ जाएगा।" 

कॉल कट।

आकाश कुछ पल फोन को देखता रहा।

उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

---

लेकिन आकाश को पता नहीं था...

उसके कमरे के बाहर कोई खड़ा था।

यश।

उसने फोन पर हुई बातचीत का आखिरी हिस्सा सुन लिया था।

यश ने तुरंत अर्जुन को मैसेज किया—

"बॉस, आकाश को सिया के बाहर जाने से डर है। लगता है सिया की मेमोरी इस पूरे खेल की की है।"

---

अर्जुन को मैसेज मिला।

उसने स्क्रीन पढ़ी।

उसकी आँखें गंभीर हो गईं।

"तो सिया को कुछ ऐसा पता है... जो उसे खुद भी याद नहीं।"

---


सुबह होने से कुछ घंटे पहले...

अर्जुन अकेला महल की पुरानी लाइब्रेरी में पहुँचा।

यह कमरा वर्षों से लगभग बंद था।

पुरानी किताबें...

पुराने डॉक्यूमेंट्स...

और परिवार की कई पुरानी तस्वीरें।

उसने एक-एक करके पुराने सिक्योरिटी रिकॉर्ड्स निकालने शुरू किए।

तभी उसकी नज़र एक पुराने एल्बम पर पड़ी।

उसने एल्बम खोला।

एक तस्वीर।

राठौड़ परिवार का पुराना समारोह।

पीछे कई सिक्योरिटी पर्सोनल खड़े थे।

अर्जुन की नज़र एक आदमी पर जाकर रुक गई।

राघव सिंह।

उसके साथ एक और व्यक्ति खड़ा था।

अर्जुन ने तस्वीर को करीब किया।

उस आदमी की कलाई साफ़ दिखाई दे रही थी।

वही निशान।

वही सिंबल।

अर्जुन की साँसें थम गईं।

लेकिन असली झटका अभी बाकी था।

तस्वीर के पीछे हाथ से कुछ लिखा हुआ था।

अर्जुन ने उसे पलटा।

सिर्फ़ एक लाइन थी—

"राघव अकेला नहीं था।"

अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

तभी पीछे से आवाज़ आई—

"आप यहाँ क्या कर रहे हैं?"

अर्जुन तुरंत पलटा।

दरवाज़े पर...

सिया के पिता खड़े थे।

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

अर्जुन ने तस्वीर अपने पीछे कर ली।

सिया के पिता की नज़र तुरंत उसके हाथ में पकड़ी फाइल पर गई।

"क्या ढूँढ रहे हैं?"

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—

"बारह साल पुराना एक सच।"

सिया के पिता का चेहरा एक पल के लिए बदल गया।

बस एक पल के लिए।

लेकिन अर्जुन की नज़र से वो बदलाव छिप नहीं सका।

"आप कुछ जानते हैं?" अर्जुन ने पूछा।

सिया के पिता कुछ पल चुप रहे।

फिर उन्होंने धीरे से कहा—

"कुछ राज़... जितने पुराने होते हैं, उतने ही खतरनाक होते जाते हैं।"

अर्जुन की आँखें उन पर टिक गईं।

"और अगर वही राज़ सिया की जान के पीछे हो?"

उनके चेहरे की गंभीरता बढ़ गई।

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

बस अर्जुन के हाथ में पकड़ी तस्वीर को देखा।

फिर बोले—

"अर्जुन... उस तस्वीर को यहीं छोड़ दीजिए।"

अर्जुन ने तस्वीर को और कसकर पकड़ लिया।

"क्यों?"

कुछ पल की खामोशी के बाद सिया के पिता ने कहा—

"क्योंकि जिस आदमी को आप मरा हुआ समझ रहे हैं..."

उनकी आवाज़ धीमी हो गई।

"...उसकी कहानी में एक और नाम है।"

अर्जुन की आँखें सिकुड़ गईं।

"किसका?"

सिया के पिता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

"उस इंसान का... जिसे देखकर सिया ने उस रात डरकर कहा था—'वो यहाँ है।'" 😨

अर्जुन के चेहरे पर पहली बार सच्चा सदमा दिखाई दिया।

"आप कहना क्या चाहते हैं?"

लेकिन सिया के पिता मुड़ चुके थे।

दरवाज़े तक पहुँचकर उन्होंने बस इतना कहा—

"कुछ सवालों के जवाब ढूँढने से पहले... ये जानना ज़रूरी है कि सच सामने आने के बाद आप उसे सह पाएँगे या नहीं।"

दरवाज़ा बंद हो गया।

अर्जुन वहीं खड़ा रह गया।

उसकी मुट्ठी में तस्वीर अब भी थी।

और तस्वीर में...

राघव के साथ खड़ा वो दूसरा आदमी...

अर्जुन को बेहद जाना-पहचाना लग रहा था।

लेकिन चेहरा आधा तस्वीर के पुराने मोड़ में छिपा हुआ था।

अर्जुन ने तस्वीर को सीधा किया।

उसकी आँखें फैल गईं।

"ये तो..."

जारी रहेगा... 💗🔥

© Diksha 

प्रिय पाठकों,

यह भाग लिखने में मुझे बहुत समय, मेहनत और प्यार लगा है। यदि आपको यह अध्याय पसंद आया हो, तो कृपया इसे रेटिंग दें और अपने रिव्यू ज़रूर साझा करें।

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✨ मेरी रचनाएँ ✨

 1. अनुबंध (Anubandh) — ✅ Completed

 2. वो जो चुपके से देखा करता था — ✅ Completed

3. अनचाही मोहब्बत (Anchahi Mohabbat) — ✅ Completed

4. हुक्म और हसरत (Hukm Aur Hasarat) — ✍️ 
Running... 🌸