नया शहर… नया घर… नई दिनचर्या…
ज़रूरत का सामान जुटाना, नए लोगों से परिचय और छुट्टियों में आसपास की पहाड़ियों पर घूमना—इन्हीं सबके बीच शुरुआती कुछ महीने कब बीत गए, उन्हें पता ही नहीं चला।
धीरे-धीरे जीवन अपनी सामान्य गति से चलने लगा।
मृदुला घर सँवारने के लिए कुछ न कुछ नया करती रहती। दूसरी ओर अभिनव अपने काम के साथ-साथ पदोन्नति की परीक्षा की तैयारी में जुट गया था। रात को वह पढ़ने बैठता तो मृदुला भी उसके पास आ बैठती। कभी कोई पत्रिका पढ़ती, तो कभी उनमें से अपने पसंदीदा लेख काटकर बड़ी सहेजकर अपनी स्क्रैप बुक में चिपकाती रहती।
जिस दिन अभिनव को देर रात तक पढ़ना होता, वह कॉफ़ी बनाने उठता तो मृदुला से भी पूछ लेता। और अगर कभी मृदुला स्वयं रसोई की ओर बढ़ती, तो वह हँसकर कहता, “मेरे हाथ की कॉफ़ी इतनी ख़राब बनती है क्या?” फिर दोनों के लिए कॉफ़ी वही बनाकर लाता।
हर बार उसे अपने घर की एक परिचित तस्वीर याद आ जाती। पापा बैठक से बस इतना कहते—“ज़रा चाय बना देना।” और माँ बिना कुछ कहे रसोई में चली जातीं। यहाँ अभिनव उसी रसोई में उसके लिए कॉफ़ी बना रहा था।
अभिनव का जीवन बड़ा व्यवस्थित था। अपने अधिकांश काम वह स्वयं करता। सुबह व्यायाम से दिन की शुरुआत और रात को अगले दिन की तैयारी—उसकी दिनचर्या में अनुशासन सहज ही दिखाई देता था।
पुरुष का यह रूप मृदुला के लिए बिल्कुल नया था।
अभिनव जब दौड़ने निकलता तो मृदुला को भी साथ ले जाता। पर कुछ ही देर में वह आगे निकल जाता और मृदुला टहलते-टहलते पीछे छूट जाती।
हाँ, रात के भोजन के बाद की सैर दोनों साथ करते। उन कुछ पलों में वे बराबर-बराबर चलते, बातें करते। रास्ते में जब भी स्विमिंग पूल खाली मिलता, अभिनव मुस्कुराकर कहता, “चलो, आज तो सीख लो।” मृदुला हर बार हँसकर मना कर देती।
अभिनव मृदुला का बहुत ख़याल रखता था, फिर भी उसके भीतर किसी अनकही कमी का एहसास बना रहता। वह स्वयं भी समझ नहीं पाती थी कि यह कमी आख़िर किस बात की है। कई रातें वह देर तक करवटें बदलती रहती।
जैसे-जैसे परीक्षा नज़दीक आने लगी, अभिनव का अधिकांश समय पढ़ाई में बीतने लगा। मृदुला को पहले जितना समय नहीं मिल पाता था। शायद उसी कमी को पूरा करने के लिए लौटते समय वह अक्सर उसके लिए कोई छोटी-सी चीज़ ले आता। और अगर कोई नई पत्रिका हाथ लग जाती, तो वह उसे भी ले आता। पत्रिका मिलते ही मृदुला ऐसे खिल उठती, जैसे किसी बच्चे को उसकी मनपसंद चीज़ मिल गई हो।
कई बार लौटने पर अभिनव ने देखा—मृदुला चुपचाप उसकी वर्दी गोद में रखे बैठी है। उसकी आहट पाते ही वह वर्दी समेट देती और मुस्कुराने की कोशिश करती। उस मुस्कान के पीछे कुछ था, जिसे वह समझ नहीं पा रहा था।
एक दिन कुछ फुर्सत मिली तो वह उसके पास आकर बैठ गया।
“काफ़ी दिन हो गए सबसे मिले हुए। अगले हफ़्ते दो दिन की छुट्टी की अर्ज़ी दे देता हूँ। घर चलेंगे, सबसे मिल लेंगे। मैं वापस आ जाऊँगा, लेकिन तुम कुछ दिन वहीं रुक जाना। मायके भी हो आना। जब तुम कहोगी, मैं तुम्हें लेने आ जाऊँगा। क्या कहती हो?”
मृदुला ने हल्की-सी मुस्कान के साथ हामी में सिर हिलाया और चुपचाप उसके कंधे पर सिर रख दिया।
उधर पिछले कुछ दिनों से एल.ओ.सी. पर तनाव लगातार बढ़ रहा था। हालात किस दिशा में जा रहे हैं, इसका अंदाज़ा अभिनव को होने लगा था। इसलिए उसने अभी छुट्टी की अर्ज़ी नहीं दी। वह कुछ दिन और परिस्थितियों पर नज़र रखकर ही निर्णय लेना चाहता था।
एक दिन मृदुला के हाथों में अपनी वर्दी देखकर उसने छेड़ते हुए कहा,
“तुम्हें ये वर्दी इतनी पसंद है तो एक बार पहनकर देख लो।”
मृदुला की नज़रें अब भी वर्दी पर टिकी थीं।
वह गंभीर स्वर में बोली, “इस वर्दी की अपनी ही गरिमा है। जब तुमने अपना जीवन और मृत्यु देश के नाम कर दी, तभी तुम्हें इसे पहनने का अधिकार मिला। मेरे जीवन में वह समर्पण कहाँ… मैं तो बस अपने लिए ही जीए जा रही हूँ।”
अभिनव कुछ क्षण उसे देखता रह गया।
उसे पहली बार लगा कि मृदुला की उलझन अकेलेपन की नहीं, किसी और गहरी तलाश की है।
उस रात अभिनव को देर तक नींद नहीं आई। वह करवटें बदलता रहा। मृदुला की बातें उसके भीतर कहीं अटक गई थीं।
उसके मन में विचारों की बाढ़-सी आ रही थी—
कला में स्नातक है…
सिर्फ़ डिग्री लेने के लिए नहीं पढ़ी। जो सीखा, उसे जीवन में उतारा है।
ऐसे व्यापारी परिवार से आती है जहाँ लड़कियों को पढ़ने की आज़ादी तो मिल जाती है, लेकिन अपने जीवन का रास्ता चुनने की नहीं।
शायद…
इसे भी कभी अपने लिए कोई राह चुनने का अवसर नहीं मिला।
अगले ही क्षण वह एकाएक उठकर बैठ गया।
शादी के बाद इसका सिलेबस बदल गया था…
अब यह मेरी वर्दी और मेरे जीवन को पढ़ रही है…