ख़ाकी बिंदिया - भाग 1 Shilpy Aggarwal द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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ख़ाकी बिंदिया - भाग 1

आज मृदुला कुछ अलग ही अंदाज़ में सजी हुई थी। गहरे हरे रंग की सिल्क की साड़ी, माथे पर लाल बिंदिया और जूड़े में लगे सफेद मोगरे के फूल—सब मिलकर उसके भीतर उमड़ते रोमांच को प्रकट कर रहे थे। लगभग एक साल बाद अभिनव घर लौट रहा था।

विवाह के दस दिन के भीतर ही अभिनव अपनी पोस्टिंग पर चला गया था। मेहमानों और रीति-रिवाजों के बीच समय ऐसे निकल गया कि इन दोनों के शर्म के बोल भी न खुल पाए थे। आज मृदुला की आँखों में एक अनकही-सी बेचैनी थी…

सभी ड्राइंग रूम में बैठे बार-बार दरवाज़े की ओर देख रहे थे कि तभी घंटी बजी। अभिनव की छोटी बहन अदिति दौड़कर गई और दरवाज़ा खोल दिया। सामने अभिनव एक हाथ में सूटकेस और कंधे पर बैग लिए खड़ा था। अदिति भाई को देखते ही उसकी बाँहों में झूल गई।

तब तक बाकी सब भी दरवाज़े पर आ गए थे। अभिनव घर के भीतर दाखिल हुआ और माँ-पापा के पैर छूकर उनसे मिला।

उसने चारों तरफ़ नज़र घुमाई तो थोड़ा चौंक गया। घर की हर दीवार और हर कोना मानो उसकी अनुपस्थिति की कहानी कह रहे हों। कहीं कृष्ण की वंशी की गूँज थी, तो कहीं कोई अश्व हवा से बातें कर रहा था।

अचानक उसका ध्यान गया कि कुछ चित्रों के नीचे अदिति का नाम लिखा था। उसने आश्चर्य से अदिति की ओर देखा। अदिति धीरे से मुस्कुराई और फुसफुसाकर बोली, “भाभी ने सिखाया है।”

ड्राइंग रूम की एक दीवार अभिनव और अदिति को मिले ट्रॉफी और मेडल्स को समर्पित थी। इस दीवार को वह पहचानता था, पर उसके साथ वाली दीवार पर लगी एक विशाल पेंटिंग ने उसे ठिठका दिया। जल, थल और वायु सेना के रंगों से सजी एक भव्य ढाल। उस क्षण उसे लगा, मृदुला ने केवल घर नहीं सजाया था, उसने उसकी अनुपस्थिति को भी सम्मान दिया था।

कुछ देर तक घर में बातों और हँसी का सिलसिला चलता रहा। फिर सबने साथ बैठकर भोजन किया। रात गहराने लगी तो माँ और अदिति अपने कमरे में चली गईं। मृदुला भी पापा और अभिनव को बात करता हुआ छोड़कर कमरे में चली गई।

जब अभिनव कमरे में पहुँचा, मृदुला सिमटी-सी बिस्तर पर बैठी थी। वह कमरे की सजावट देखता हुआ बिस्तर तक आया। क्रीम रंग की चादर पर लाल गुलाब कढ़े हुए थे, मानो किसी नवदंपति के लिए गुलाब की टहनियों से सेज सजाई गई हो।

कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा था। उनकी नज़रें बार-बार मिलतीं और फिर झुक जातीं।

अगली सुबह पापा अख़बार पढ़ रहे थे। अभिनव भी उनके पास जाकर बैठ गया। कुछ देर में मृदुला पापा के लिए गर्म पेय लेकर आई।

“ये क्या है? पापा तो सुबह चाय पीते हैं…” अभिनव ने पूछा।

मृदुला बस मुस्कुरा दी।

“भैया, इस घर में सब लोग सिर्फ़ हेल्दी ही खाते-पीते हैं।” पीछे से अदिति की आवाज़ आई।

अभिनव ने त्योरियाँ चढ़ाकर पापा की ओर देखा। पापा मुँह फेरकर अपनी सौंफ की चाय पीने लगे।

“अच्छा! मेरी सारी कोशिशें बेकार गईं और भाभी ने आते ही कमाल कर दिया?”

मृदुला मुस्कुराती हुई रसोई में चली गई।

अभिनव सिर्फ़ पंद्रह दिन की छुट्टी पर आया था और दो हफ़्ते मानो पलक झपकते ही बीत गए। अगले दिन उसकी वापसी थी। मृदुला दिनभर माँ के साथ मिलकर कई तरह के व्यंजन बनाती रही और उन्हें अभिनव के सामान के साथ पैक कर दिया। रात को अभिनव कुछ देर माँ-पापा के पास बैठा रहा। मृदुला चुपचाप अपने कमरे में चली गई।

जब अभिनव कमरे में पहुँचा, मृदुला गुमसुम-सी बैठी थी। वह उसके पास जाकर उसका हाथ पकड़कर बैठ गया और मृदुला अचानक रो पड़ी।

अभिनव ने शरारती स्वर में पूछा, “मैंने इतनी ज़ोर से हाथ पकड़ा क्या?”

मृदुला ने अपना हाथ खींच लिया और मुँह फेरकर बैठ गई।

अभिनव उठकर पैक किया हुआ सामान देखने लगा और बोला, “अरे! कल सुबह हमें निकलना है और अब तक तुमने अपना सामान भी पैक नहीं किया?”

मृदुला उलझन में उसे देखती रही। उधर अभिनव अपनी मुस्कान दबाने की कोशिश कर रहा था।

कुछ ही पलों बाद वह गंभीर स्वर में बोला, “दो साल के लिए मेरी पोस्टिंग पीस ज़ोन में हुई है और माँ-पापा चाहते हैं कि तुम भी मेरे साथ रहो।”

वह कुछ क्षण रुका, फिर मुस्कुराकर बोला,

“तो बताओ… चलोगी मेरे साथ?”

मृदुला खीजते हुए बोली, “तुमने थोड़ा जल्दी नहीं पूछ लिया?”

“सरप्राइज़ था तुम्हारे लिए।”

फिर उसने हँसते हुए कहा, “चलो, अब मुस्कुरा दो। जल्दी-जल्दी सामान निकालो, मैं तुम्हारी पैकिंग कर देता हूँ।”

अगली सुबह जब अभिनव और मृदुला जाने के लिए तैयार थे, मृदुला ने आँखों-आँखों में अदिति से शिकायत की, मानो कह रही हो—तुमने भी मुझे कुछ नहीं बताया।

अदिति हल्का-सा झेंप गई। मृदुला ने उसे बाँहों में भर लिया।

पापा उन्हें रेलवे स्टेशन छोड़ने गए। पूरे रास्ते गाड़ी में एक मौन पसरा रहा।

प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेन लगते ही पापा टिकट लेकर कोच ढूँढ़ने लगे और कुली सामान लेकर उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। अभिनव माँ को दिलासा दे रहा था, जबकि मृदुला अदिति के आँसू पोंछ रही थी।

“जल्दी करो, ट्रेन चलने वाली है।” पापा ने घड़ी देखते हुए कहा।

माँ-पापा का आशीर्वाद लेकर दोनों ट्रेन में चढ़ गए। ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी और प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े तीनों चेहरे पीछे छूटते चले गए।