अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 57 : शहर में खुली अधूरी किताब
शहर की रात हमेशा की तरह रोशनी से भरी हुई थी।
सड़क पर गाड़ियाँ दौड़ रही थीं। लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। दुकानों के बाहर भीड़ थी और आसमान में शहर की रोशनी के कारण सितारे तक साफ दिखाई नहीं दे रहे थे।
किसी को अंदाज़ा नहीं था कि उसी शहर में...
एक ऐसी चीज़ आ चुकी थी जो इंसानी दुनिया की नहीं थी।
एक लड़की सड़क के किनारे खड़ी थी।
उसके हाथ में एक पुरानी किताब थी।
अधूरी किताब।
उसने किताब खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"अधूरी किताब..."
लड़की ने धीरे से दूसरा पन्ना पलटा।
उस पर सिर्फ एक वाक्य था—
"अगर तुम यह किताब पढ़ रही हो..."
लड़की मुस्कुराई।
फिर अचानक उसके चेहरे के भाव बदल गए।
उसकी आँखें पूरी तरह काली हो गईं।
उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—
"तो तुमने मुझे ढूँढ ही लिया।"
किताब के पन्ने अपने-आप पलटने लगे।
एक...
दो...
तीन...
फिर आखिरी पन्ने पर जाकर रुक गए।
वहाँ एक नया नाम लिखा था—
"अनन्या।"
लड़की ने उस नाम पर उँगली रखी।
और अचानक उसकी उँगली से काली स्याही निकलकर पन्ने में समा गई।
उधर...
अनन्या, आरव और कबीर अभी भी उस पुराने कमरे में खड़े थे।
अधूरी किताब उनके सामने खुली थी।
पन्ने पर बने शहर का दृश्य लगातार बदल रहा था।
लोग भाग रहे थे।
गाड़ियाँ चल रही थीं।
और वही लड़की सड़क पर खड़ी थी।
कबीर ने ध्यान से उस तस्वीर को देखा।
"यह लड़की..."
अनन्या ने पूछा—
"क्या तुम इसे जानते हो?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
फिर उसने धीरे से कहा—
"लेकिन..."
"मैं इसकी आँखों को पहचानता हूँ।"
आरव ने उसकी ओर देखा।
"कैसे?"
कबीर ने जवाब दिया—
"ये वही आँखें हैं..."
"जो भक्षक के अंदर थीं।"
अनन्या का चेहरा गंभीर हो गया।
"तो उसका एक हिस्सा सच में शहर में पहुँच चुका है।"
कबीर ने किताब बंद करने की कोशिश की।
लेकिन किताब बंद नहीं हुई।
उसके पन्ने हवा में पलटने लगे।
फिर एक आवाज़ आई—
"कहानी के बाहर आकर भी..."
"क्या तुम मुझे रोक पाओगे?"
भक्षक की आवाज़।
आरव ने कहा—
"हम रोकेंगे।"
आवाज़ हँसी।
"तुम अभी भी नहीं समझे..."
"अब मैं कहानी के नियमों से बंधा नहीं हूँ।"
अनन्या ने तुरंत किताब को पकड़ लिया।
"अगर तुम कहानी से बाहर हो..."
"तो तुम हमारे नियमों से बच सकते हो।"
"लेकिन..."
"तुम्हें हमारी दुनिया के नियम भी नहीं पता।"
कुछ पल शांति रही।
फिर भक्षक ने कहा—
"मुझे नियम सीखने की जरूरत नहीं..."
"मैं लोगों के डर से सीखता हूँ।"
अचानक किताब बंद हो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कबीर ने गंभीर स्वर में कहा—
"हमें शहर जाना होगा।"
आरव ने पूछा—
"अभी?"
"हाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर भक्षक ने एक इंसान के अंदर जगह बना ली..."
"तो वह धीरे-धीरे हजारों लोगों के डर को अपने अंदर जमा कर सकता है।"
अनन्या ने कहा—
"और फिर?"
कबीर ने उसकी ओर देखा।
"फिर वह सिर्फ कहानियाँ नहीं खाएगा।"
"वह लोगों की यादें..."
"उनके सपने..."
"उनके रिश्ते..."
"सब कुछ निगल सकता है।"
आरव ने तुरंत कहा—
"तो देर किस बात की?"
कुछ ही देर बाद...
तीनों शहर की ओर निकल पड़े।
जैसे ही वे हवेली से बाहर आए...
अनन्या को अजीब-सा एहसास हुआ।
उसे लगा जैसे कोई उन्हें देख रहा है।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
दूर एक पेड़ के नीचे वही लड़की खड़ी थी।
अनन्या की साँस रुक गई।
"वो..."
आरव ने भी देखा।
लेकिन अगले ही पल वहाँ कोई नहीं था।
कबीर ने जमीन की ओर देखा।
वहाँ कुछ काले अक्षर लिखे थे।
"तुम देर कर चुके हो।"
अनन्या के चेहरे पर चिंता आ गई।
"वह यहाँ तक आ गई थी।"
कबीर ने कहा—
"नहीं।"
"वह यहाँ आई ही नहीं।"
"तो फिर?"
कबीर ने जमीन पर लिखे अक्षरों को देखा।
"उसने सिर्फ..."
"हमें चेतावनी भेजी है।"
शहर पहुँचते-पहुँचते रात काफी हो चुकी थी।
तीनों एक पुराने कैफ़े में पहुँचे।
कबीर ने कहा—
"हमें पहले यह पता करना होगा कि वह लड़की कौन है।"
आरव ने अपना फोन निकाला।
लेकिन स्क्रीन पर अचानक अजीब-अजीब शब्द दिखाई देने लगे।
"कहानी..."
"पात्र..."
"लेखक..."
फोन बंद हो गया।
आरव ने दोबारा चालू किया।
इस बार स्क्रीन पर एक तस्वीर थी।
वही लड़की।
उसके नीचे लिखा था—
"नाम: नैना"
अनन्या ने तस्वीर देखी।
"नैना..."
कबीर अचानक चुप हो गया।
आरव ने पूछा—
"क्या हुआ?"
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
"मैंने यह नाम पहले सुना है।"
"कहाँ?"
"बहुत पुरानी कहानी में।"
अनन्या ने पूछा—
"कौन-सी कहानी?"
कबीर ने उसकी ओर देखा।
"वह कहानी..."
"जिसे तुमने कभी लिखना शुरू किया था..."
"लेकिन पूरा नहीं किया।"
अनन्या का चेहरा बदल गया।
"मुझे कुछ याद नहीं।"
कबीर ने कहा—
"क्योंकि वह कहानी तुमने खुद मिटा दी थी।"
आरव ने पूछा—
"उस कहानी में नैना कौन थी?"
कबीर ने कुछ पल चुप रहकर जवाब दिया—
"एक ऐसी लड़की..."
"जो इंसानों के डर को देख सकती थी।"
अनन्या ने धीरे से पूछा—
"और भक्षक?"
"वह उसके पीछे क्यों है?"
कबीर ने कहा—
"क्योंकि नैना..."
"उसे पहचान सकती है।"
उसी समय...
शहर के दूसरे हिस्से में नैना एक पुराने अपार्टमेंट की छत पर खड़ी थी।
उसके सामने सैकड़ों लोग नीचे सड़क पर चल रहे थे।
लेकिन नैना उन्हें इंसानों की तरह नहीं देख रही थी।
उसे हर इंसान के आसपास अलग-अलग रंग दिखाई दे रहे थे।
किसी के आसपास डर।
किसी के आसपास दुख।
किसी के आसपास अकेलापन।
और किसी के आसपास प्यार।
नैना ने अपनी आँखें बंद कीं।
एक आवाज़ उसके भीतर गूँजी—
"किसका डर सबसे बड़ा है?"
नैना ने जवाब दिया—
"मेरा नहीं।"
आवाज़ हँसी।
"झूठ।"
नैना की आँखें खुलीं।
उसने नीचे एक लड़के को देखा।
वह अकेला सड़क पर चल रहा था।
उसके पीछे एक विशाल काली परछाईं थी।
नैना ने आँखें सिकोड़कर देखा।
परछाईं धीरे-धीरे लड़के के शरीर में समाने लगी।
लड़का रुक गया।
उसने अपना सिर ऊपर उठाया।
उसकी आँखें काली हो गईं।
नैना घबरा गई।
"नहीं..."
उसने नीचे दौड़ने के लिए कदम बढ़ाया।
लेकिन तभी उसके पीछे किसी ने कहा—
"उसे बचाना चाहती हो?"
नैना जम गई।
उसने धीरे से पीछे देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ दीवार पर एक काला वाक्य लिखा था—
"तो पहले अनन्या को मेरे पास लाओ।"
नैना ने दाँत भींच लिए।
"मैं ऐसा कभी नहीं करूँगी।"
दीवार पर दूसरा वाक्य उभरा—
"तुम्हें करना पड़ेगा।"
"क्योंकि..."
तीसरी पंक्ति दिखाई दी—
"तुम्हारी जिंदगी भी मेरी कहानी का हिस्सा है।"
नैना की आँखों में डर उतर आया।
उसे अचानक अपना बचपन याद आया।
एक कमरा...
एक पुरानी किताब...
और एक लड़की...
जिसका चेहरा अनन्या जैसा था।
वह लड़की नैना को किताब दे रही थी।
और कह रही थी—
"जब समय आए..."
"इस किताब को उसके पास ले जाना।"
नैना ने आँखें खोल दीं।
उसने अपने बैग से वही पुरानी किताब निकाली।
कवर पर लिखा था—
अधूरी किताब
लेकिन इस बार...
उसके कवर के नीचे एक नया नाम उभर रहा था—
"नैना की कहानी।"
नैना की उँगलियाँ काँपने लगीं।
उसी समय किताब के अंदर से एक आवाज़ आई—
"अनन्या तुम्हें ढूँढ रही है।"
नैना ने किताब बंद कर दी।
"तो..."
"अब मुझे भी उसे ढूँढना होगा।"
कैफ़े में...
अनन्या अचानक उठ खड़ी हुई।
"मुझे पता है वह कहाँ है।"
आरव ने पूछा—
"कहाँ?"
अनन्या ने खिड़की से बाहर देखा।
शहर के बीचोंबीच एक पुरानी इमारत थी।
उसकी सबसे ऊपरी मंज़िल की एक खिड़की से हल्की सुनहरी रोशनी निकल रही थी।
अनन्या ने कहा—
"वहीं।"
कबीर ने खिड़की की तरफ देखा।
उसका चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
"हमें वहाँ नहीं जाना चाहिए।"
आरव ने पूछा—
"क्यों?"
कबीर ने धीमे स्वर में कहा—
"क्योंकि वह जगह..."
"कहानी के बाहर नहीं है।"
"वह..."
"दो दुनियाओं के बीच है।"
अनन्या ने किताब को कसकर पकड़ा।
"तो फिर वहीं जाना होगा।"
तीनों कैफ़े से बाहर निकल पड़े।
उन्हें पता नहीं था कि जिस जगह वे जा रहे थे...
वहीं नैना उनका इंतज़ार कर रही थी।
और नैना अकेली नहीं थी।
उसके पीछे...
एक पूरी दीवार पर हजारों काली आँखें खुल चुकी थीं।
क्रमशः...