एक आम सी प्रेम कहानी
भाग - ११
लेखिका "अनामिका"
दृश्य : मलय का घर (खुशी और उत्साह का माहौल)
मलय और उसकी माँ जैसे ही घर पहुँचे, उसकी माँ के चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी। वह इतनी खुश थीं मानो हवा में उड़ रही हों। हॉल में मलय के पापा को बैठे देख वह सीधी उनके पास गईं और चहकते हुए बोलीं, "अरे सुनिए! आपको याद है मेरी वो दोस्त? और मैंने उस दिन आपसे कहा था न कि जो लड़की मुझे जानी-पहचानी सी लग रही है, वो मेरी उसी दोस्त की बेटी निहारिका है! और आपको याद है उस शादी में हमने बच्चों की शादी की बात छेड़ी थी? आज पता चला कि हमारा मलय तो उसे अभी भी पसंद करता है! और मुझे तो लगता है कि वो लोग भी शादी के लिए तैयार हैं। सब कितना सही बैठ रहा है न!"
मलय के पापा मुस्कुराए और बोले, "क्या बात है! यह तो बहुत अच्छी खबर है। वैसे भी हम इसके लिए लड़की तलाशने ही वाले थे। अब तो लड़का अच्छी जॉब भी करने लगा है, पूरी तरह सेटल है। अगर लड़की अच्छी है और मलय को पसंद है, तो फिर देर किस बात की! हम तो खुशी-खुशी रिश्ता आगे बढ़ाएँगे।"
दोनों पति-पत्नी खुशी-खुशी इस बारे में बातें कर रहे थे, जबकि मलय बिना कुछ बोले, थोड़ा ऑकवर्ड सा महसूस करता हुआ चुपचाप अपने कमरे की तरफ निकल गया।
दृश्य : निहारिका का घर (तनाव और गुस्से का माहौल)
दूसरी तरफ, निहारिका और उसकी माँ जब घर पहुँचीं, तो उसके पापा हॉल में ही बैठे कुछ काम कर रहे थे। निहारिका की माँ उत्साह में उनके पास गईं और बोलीं, "सुनिए जी! आपको याद है उस शादी में मैंने अपनी दोस्त से बच्चों के रिश्ते की बात की थी? आज हम उसी से मिले थे! उसका बेटा और हमारी निहारिका एक-दूसरे को पसंद करते हैं! क्यों न हम दोनों की बातचीत आगे बढ़ाएँ?"
यह सुनते ही निहारिका के पापा का पारा चढ़ गया। वह एकदम चिढ़कर बोले, "ये क्या फिजूल बातें लेकर बैठ गई हो तुम? अचानक शादी बीच में कहाँ से आ गई? तुम्हें जरा भी अक्ल है या नहीं? निहारिका अभी कॉलेज में है, उसे पढ़ाई लिखाई करनी है, अपना करियर बनाना है या अभी से शादी-ब्याह के इन फालतू चक्करों में पड़ना है? आइंदा मेरे सामने इस शादी की बात मत निकालना!"
उनके इस तीखे रवैये से घर का पूरा माहौल तनावपूर्ण हो गया, और निहारिका शांत खड़ी सिर्फ अपने पापा का गुस्सा देखती रह गई।
रात को मलय और निहारिका दोनों ही मन ही मन बेहद खुश थे, लेकिन सुबह कैफे में हुए उस अचानक इकरार की वजह से ऑकवर्ड महसूस कर रहे थे।
झिझक इतनी बढ़ गई थी कि मलय ने निहारिका को कॉल करने की हिम्मत नहीं जुटाई, और निहारिका भी फोन उठाने या खुद मैसेज करने में कतराती रही। दोनों अपने-अपने कमरों में करवटें बदलते हुए बस एक-दूसरे के ख्यालों में खोए रहे।
उतने में ही मलय ने हिम्मत जुटाकर निहारिका को मैसेज किया— "मुझे तुमसे कुछ बात करनी है, पर फोन पर नहीं। ऑफिस जाने से पहले तुमसे एक बार मिलना चाहता हूँ। तुम्हारे कॉलेज वाले रास्ते पर इंतज़ार करूँगा।" निहारिका ने मैसेज देखा, पर घबराहट के मारे कोई जवाब नहीं दे पाई और ऐसे ही रात बीत गई।
अगले दिन सुबह मलय हड़बड़ी में था क्योंकि उसे ऑफिस में अर्जेंट फाइल लेकर पहुँचना था। फिर भी वह निहारिका के कॉलेज वाले रास्ते पर अपनी बाइक रोककर इंतज़ार करने लगा। निहारिका भी आज घर से जल्दी निकल आई थी। मलय को देखते ही वह थोड़ा शर्मा गई और पास जाकर बोली, "आपको तो आज ऑफिस जल्दी जाना था न?"
मलय ने कहा, "हाँ, पर तुमसे कल कैफे वाली बात करनी थी।"
निहारिका धीमी आवाज़ में बोली, "मैंने भी नहीं सोचा था कि आप सबके सामने ऐसा कुछ बोल देंगे..."
उसकी बात सुनकर मलय घबरा गया। उसे लगा कि निहारिका मना करने वाली है। उसने घबराकर बीच में ही टोका, "रुको! अगर तुम मना करने वाली हो या गुस्सा हो, तो कुछ मत कहो। बस यहाँ से चली जाओ, मैं तुम्हारी 'ना' समझ जाऊँगा।"
निहारिका हल्की सी मुस्कान के साथ शर्माते हुए बोली, "मैंने मना कब किया? मैं तो बस..."
इतना सुनते ही मलय का चेहरा खुशी से खिल उठा। वह समझ गया कि निहारिका भी उससे उतना ही प्यार करती है। इतने सालों के इंतज़ार के बाद, आज पहली बार मलय ने पूरी हिम्मत करके निहारिका को गले लगा लिया। निहारिका ने भी मुस्कुराकर अपने हाथ उसके गिर्द फैला दिए और उस सुकून भरे लम्हे में मानो समय पूरी तरह थम सा गया।
मलय और निहारिका अपनी उस छोटी-सी ख़ूबसूरत दुनिया में खोए ही थे कि अचानक मलय के फ़ोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन देखते ही उसे याद आया कि ऑफिस में कोई अर्ज़ेंट काम है।
हड़बड़ाहट में वह तुरंत निकलने के लिए बढ़ा। अपनी बाइक पर बैठकर जैसे ही उसने हेलमेट लगाया, जाने से ठीक पहले मुड़कर निहारिका की तरफ़ देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "अरे हाँ, सुनो! तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है... कॉलेज से सीधा घर आना, कहीं और मत जाना।"
इतना कहकर वह तेज़ रफ़्तार में निकल गया और निहारिका भी अपने कॉलेज की तरफ़ बढ़ गई।
लेकिन पूरे दिन निहारिका का मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगा। वह लगातार यही सोचती रही—क्या सरप्राइज होगा? क्या वह शाम को लौटते वक्त मुझसे दोबारा मिलने आएगा? आख़िर बात क्या है? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
इन्हीं उलझनों के बीच जब वह दोपहर को कॉलेज से घर लौटी और जैसे ही उसने मुख्य दरवाज़ा खोला, तभी अंदर से उसकी माँ के फ़ोन की घंटी बजने की आवाज़ आई...
ग्यारवा भाग समाप्त, कहानी जारी है....